ब्रह्मराक्षस Profile picture
॥एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति॥ Ph.D. in Sarcasm from the same f*king University who awards Masters in Entire Political Science. RT=इदम् न मम:
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24 Nov
यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् ।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ।।
त्रयोवेदस्य कर्तारौ भण्डधूर्तनिशाचराः ।
-महर्षि चार्वाक

मनुष्य जब तक जीवित रहे तब तक सुखपूर्वक जिये । ऋण करके भी घी पिये । अर्थात् सुख-भोग के लिए जो भी उपाय करने पड़ें उन्हें करे ।
..1/8
दूसरों से भी उधार लेकर भौतिक सुख-साधन जुटाने में हिचके नहीं । परलोक, पुनर्जन्म और आत्मा-परमात्मा जैसी बातों की परवाह न करे ।
भला जो शरीर मृत्यु पश्चात् भष्मीभूत हो जाए, यानी जो देह दाह संस्कार में राख हो चुके, उसके पुनर्जन्म का सवाल ही कहां उठता है ?
..2/8
तीनों वेदों के रचयिता धूर्त प्रवृत्ति के मसखरे निशाचर रहे हैं, जिन्होंने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य जैसी बातों का भ्रम फैलाया है ।
(स्रोत: ज्ञानगंगोत्री, संपादन: लीलाधर शर्मा पांडेय, ओरियंट पेपर मिल्स, अमलाई, म.प्र., पृष्ठ 138)
..3/8
😇😇
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21 Nov
'कुकरहाव' कुत्तों की लड़ाई का वो तसल्लीबक्श पल होता है, जब कुत्तों के दल आपस में एक दूसरे पर झपट पड़ने, पीछा करने, खदेड़ने या रगड़ने के बजाय थोड़ी थोड़ी दूरी पर बैठ कर इत्मीनान से बैठ कर, या लेट कर या खड़े होकर एक दूसरे पर भौंकते हैं, गर्राते हैं या खौं खौं करते हैं। 😄
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उनके हाव भाव से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वे लड़ाई को किसी निर्णायक क्षण पर ले जाने के उत्सुक हैं, बल्कि तसल्ली के साथ, सिर्फ लड़ाई का आनंद लेना चाहते हैं। क्योंकि बीच बीच में शरीर को खुजाने, चाटने या गाहे बगाहे टाँग उठा कर हल्के होने का क्रम चलता रहता है। 😄
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ऐसा लगता है कि वे गहन गंभीर बहस कर रहे हैं। हम दुर्भाग्यवश उनकी भाषा नहीं समझते, वरना दिख जाता कि वे कुत्तों के विभिन्न धर्म, या उनकी सीमा पर घुसपैठ या दूसरे मोहल्ले के कुत्तों द्वारा किसी की सीमा में अतिक्रमण के मुद्दों पर विरोधी कुत्तों की भूमिका पर सवाल उठा रहे होते हैं।
..3/6
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20 Nov
ईशावास्य उपनिषद में एक सूत्र है -तेन त्यक्तेन भुंजीथा: !
इसका अर्थ है कि जो त्याग करते हैं वे ही भोग पाते हैं।
यह उन विरोधाभासी सूत्रों में से है जो अस्तित्व के रहस्य का उद्घाटन करते हैं। अब इसका अर्थ क्या हुआ? यह तो पहेली सी बुझा दी?
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त्याग और भोग तो एकदम विपरीत हैं, या तो त्याग करो या भोग करो - दोनों एक साथ कैसे हो सकते हैं?
तर्क और बुद्घि से सोचें तो यह विरोधाभास लगता है, लेकिन अस्तित्वगत रूप से देखें तो यही अस्तित्व का रहस्य है।
अस्तित्व विरोधाभासी ही है।
..2/10
और यह विरोध एक दूसरे के विपरीत नहीं है, एक दूसरे के परिपूरक हैं।
रात और दिन एक दूसरे के विरोधी हैं? क्या दुख और सुख परस्पर विपरीत हैं? मेरा वक्तव्य विरोधाभासी लगता है, पर है नहीं। यह दृष्टिकोण है।
यह शब्द विरोधाभास बहुत सटीक है, इसका अर्थ हुआ विरोध का आभास, विरोध नहीं।
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13 Nov
कल, 12 नवंबर को डॉ. सालिम अली का 125 वां जन्म दिवस था!
भावभीना पुण्यस्मरण!
💐🙏💐
भारत के सर्वश्रेष्ठ पक्षी-शास्त्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण, डॉ. सालिम अली से मेरी 1960 के दशक के अंत में हुई एकमात्र मुलाकात को याद कर के आँखें नम हैं।
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बड़ा अजीब था वो मंज़र, जब साइकिल के युग में अपने शहर से एक अकेले बुजुर्ग को 5 हॉर्स पॉवर की Sunbeam motorcycle से अकेले गुज़रते देखना।
पीछे कैरियर पर लदा हुआ बड़ा सा बैग, चमड़े की जैकिट, आँख पर चश्मा, कंधे पर भारी भरकम कैमरा और 5 क्विंटल की बाइक और बामुश्किल 50 किलो का शरीर!
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उस पर कहर, मोटरसाइकिल का खराब हो जाना! बुज़ुर्गवार को अकेला परेशान देख मैंने अपनी साइकिल रोकी, और उस कार्टूननुमा शख्स से कौतूहलवश पूछ ही लिया - 'अंकल, कोई दिक्कत है क्या?'

'बेटा, ज़िंदगी खुद एक दिक्कत है' जवाब मिला।
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12 Nov
बिहार में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र को ‘बिहार बदलाव पत्र’ का नाम दिया था, लेकिन नतीजों से साबित‍ किया कि बदलाव की असल जरूरत बिहार से ज्यादा कांग्रेस को ही है।
राज्य में 2015 के चुनाव में जहां कांग्रेस ने 27 सीटें जीती थीं, वहीं इस बार यह आंकड़ा 19 ही रह गया। 🤦‍♂️
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कांग्रेस का चुनाव अभियान भी कोई खास दमदार नहीं था। पार्टी के स्टार नेता राहुल गांधी ने जिन क्षेत्रों में सभाएं कीं, पार्टी वहां भी ज्यादतर सीटें हार गईं।
सभाओं में राहुल उसी मोदी से प्रश्नवाचक मुद्रा में भाषण देते रहे, जैसे कि पहले देते रहे हैं।
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लेकिन राजनेता की विश्वसनीयता तब बनती है, जब सवालों के जवाब भी उसके पास हों।
राहुल गांधी के भाषणों से कई बार ऐसा लगता है कि कहीं वो भारतीय राजनीति के ‘पर्मनेंट पेपर सेटर’ तो नहीं बन गए हैं?
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11 Nov
ओपीनियन पोल, एग्जिट पोल, काउंटिंग ट्रेंड और एक्जेक्ट रिजल्ट। हर चुनाव की वो स्टेप्स हैं, जिनको नापना चुनाव विश्लेषक की जिम्मेदारी और शगल होता है। हकीकत में उन्हें उड़ती चिडि़या को देखकर बताना होता है कि वो किस डाल पर बैठेगी।
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अब चिडि़या है कि कई बार उस डाल पर जा बैठती है, जो विश्लेषकों की नापसंद होती है या कई दफा वो किसी भी डाल पर बैठने के बजाए फुर्र से उड़ जाती है या फिर आसमान में ही पर मारती रहती है।
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चुनाव विश्लेषक चिडि़या की हर अदा का विश्लेषण इस अंदाज में करते हैं ‍कि मानो चिडि़या उन्हीं से पूछकर उड़ी थी। वैसे कई चुनाव विश्लेषक अपनी राय जताते हुए यह भी कहे जाते हैं कि वो जो कह रहे हैं, अंतिम परिणाम वैसा होगा, जरूरी नहीं है।
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6 Nov
‘ये मेरा आखिरी चुनाव है’- जैसा जुमला उस राजनीतिक बूटी की तरह है, जिसका इस्तेमाल सारे वशीकरण मंत्र फेल होने के बाद किया जाता है। निर्मोह के आवरण में सत्ता के मोह पाश की यह ऐसी हवस है, जो मिटते नहीं मिटती और बाहर से भीतर तक ‘मैं ही मैं’ के रूप में गूंजती रहती है।

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नेताओं का बस चले तो वो यमदूतों को भी यह कहकर लौटा दें कि यह मेरा ‘आखिरी चुनाव’ है। अगले चुनाव के वक्त आना। दूसरे शब्दों में कहें तो यह नेताओं के लिए अपने सियासी वजूद की वो जीवन रक्षक दवा है,जिसके कारगर होने की संभावना फिफ्टी- फिफ्टी रहती है।

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इसमें राजनीतिक वानप्रस्थ का छद्म वैराग्य भाव छिपा रहता है।
वैसे भी राजनीति में खाने और दिखाने के दांत अलग होते हैं।
एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि भले ही नीतीश इस विधानसभा चुनाव को अपना ‘आखिरी चुनाव’ बता रहे हों, लेकिन खुद उन्होंने 2004 के बाद से कोई चुनाव नहीं लड़ा है।
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2 Nov
मित्रों,

जब आपको लगने लगे कि आपकी रीच कम हो गई है, आपके घर पर पत्थर नहीं फेंके जा रहे हैं, या आपके मन में सवाल उठने लगे कि देश में से अंडभक्तों की संख्या चिंताजनक रूप से कम हो गई है तो एक मजेदार प्रयोग करें। 😄

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एक संदेहास्पद विश्वसनीयता वाली पोस्ट करें। देखिए तुरंत किसी बिल से नकल कर भक्तों की फौज हरिश्चंद्र की औलादों के सुर में तत्काल आपकी पोस्ट पर फुफकारने लगेगी। 😂
आपको चैलेंज किया जाने लगेगा, आपकी माता बहनों को याद किया जाने लगेगा, ..

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और आपको हलाला की औलाद वगैरह विशेषणों से नवाजते हुए सत्य की दुहाई दी जाने लगेगी। 😆

समस्त दूध से धुला हुआ भक्त संसार आपको झूठा, कपटी, चमचा आदि सिद्ध करते हुए दुनिया का निकृष्टम व्यक्ति साबित कर देंगे। 😁

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1 Nov
आपने दूरदर्शन देखना छोड़ा, प्राइवेट ऑपरेटरों ने 500 रुपये महीने निकाल लिए।

BSNL छोड़ा, प्राइवेट वाले दोगुना लेने की तैयारी में ताल ठोकने लगे हैं।

आप सरकारी रेडियो आकाशवाणी नही सुनेंगे तो प्राइवेट FM वाले आपको गाना और सिर्फ गाना सुनाकर खुद करोडों कमाएंगे।
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आपने दूरदर्शन देखना छोड़ा, प्राइवेट ऑपरेटरों ने 500 रुपये महीने निकाल लिए।

BSNL छोड़ा, प्राइवेट वाले दोगुना लेने की तैयारी में ताल ठोकने लगे हैं।

आप सरकारी रेडियो आकाशवाणी नही सुनेंगे तो प्राइवेट FM वाले आपको गाना और सिर्फ गाना सुनाकर खुद करोडों कमाएंगे।
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आप लोग रोडवेज बसों में सफर नहीं करेंगे और दो पैसे बचाने के चक्कर में निजी बसों में यात्रा करेंगे तो रोडवेज बंद हो जाएगी। फिर निजी बस वाले मनमाना किराया वसूलेंगे और रोज सरकार का करोड़ों रूपये का टैक्स रूपी राजस्व चोरी करेंगे। उनमें सुरक्षा की भी कोई गारंटी नहीं।
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30 Oct
क्या ‘धार्मिक कट्टरवाद बनाम धर्मनिरपेक्षतावाद’ की लड़ाई अब एक नए दौर ‘उदार धर्मनिरपेक्षतावाद ( सेक्युलरवाद) बनाम कट्टर धर्मनिरपेक्षतावाद’ में तब्दील होती जा रही है?

...1/15
यह सवाल इसलिए क्योंकि धर्मनिरपेक्ष समाज और सत्ता तंत्र का पालन कहे जाने वाले फ्रांस में इस को लेकर तगड़ी बहस छिड़ी है कि धार्मिक और विशेषकर इस्लामिक कट्टरवाद से मुकाबला किस तरह से किया जाए।
...2/15
इस सवाल का उत्तर वाकई जटिल है कि धार्मिकता की हदें कहां तक होनी चाहिए और धर्मनिरपेक्षता को किस हद सहिष्णुता का मास्क पहनना चाहिए। कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि धर्मनिरपेक्षता में धार्मिक सहिष्णुता स्वत: निहित है।

यानी तुम्हारी भी जय-जय और हमारी भी जय-जय!
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28 Oct
एक प्रधानमंत्री को क्या विधान सभा चुनावों मे अपने गठबंधन के लिए प्रचार करना चाहिए ?

प्रधानमंत्री पद की एक गरिमा होती है क्योंकि वह देश का प्रधानमंत्री होता है न कि किसी दल गठबंधन का प्रधानमंत्री होता है।

...1/7
ऐसे में जब प्रधानमंत्री के लिए लोकसभा चुनाव होते हैं केवल तभी अपने गठबंधन हेतु चुनाव प्रचार करना चाहिए जो न्यायसंगत होता है. लेकिन प्रधानमंत्री होते हुए किसी राज्य मे विधान सभा चुनावों में गठबंधन हेतु प्रचार करना न्यायसंगत नहीं लगता।

...2/7
क्योंकि विधानसभा चुनाव में यदि विरोधी सत्ता में जीत कर आ जाये तो क्या प्रधानमंत्री उस विरोधी को कहे शब्द वापिस लेगा ?
क्या उस सत्ता पक्ष को स्वीकार नहीं करेगा ?
क्या उसे केन्द्र की ओर से असहयोग करेगा ?

...3/7
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23 Oct
अंदेशा तो था ही, अब विज्ञान ने भी कह दिया है कि हम अपनी अक्कल दाढ़ खोते जा रहे हैं। अक्ल गंवाने का सबूत तो इंसान पहले भी कई बार दे चुका है, लेकिन डाढ़ के जाते रहने की पुष्टि अब हुई है।

..1/7
आप मानें न मानें, एक प्रजाति के रूप में हम मनुष्यों में कई बदलाव हो रहे हैं। ये बदलाव शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और भौतिक रूप में हैं। इसे माइक्रोइवोल्युशन कहा जा रहा है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक बीते 250 सालों में मनुष्य की संरचना में तेजी से परिवर्तन हो रहे हैं।
..2/7
हाल में ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा किया ‍िक एक तरफ मनुष्य की अकल दाढ़ विलुप्ति की कगार पर है तो दूसरी तरफ हमारी बांहों में एक अतिरिक्त आर्टरी (धमनी) पाई जा रही है।
..3/7
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16 Oct
एमपी के बिके हुए काँग्रेस विधायकों में 'सुरेश' वाकई 'धाकड़' निकले!
😂😂😂

अब भाजपा के उपचुनाव प्रत्याशी सुरेश धाकड़ ने पोहरी में अपनी चुनावी सभा में कबूलनामा पेश किया कि ‘हां, मैं बिका, लेकिन आपकी खातिर बिका।'
...1/11
सुरेश ने अपनी इस फरोख्त में उस आम जनता को भी भागीदार बना लिया है, जो हतप्रभ भाव से इस राजनीतिक सौदेबाजी का आख्यान सुन और देख रही है।

धाकड़ ने दबी जबान से यह भी कहा कि 'मैं (अपने नेता) सिंधिया के लिए बिका हूं।' इसके भी कई राजनीतिक और आर्थिक मायने निकाले जा रहे हैं।
...2/11
जाहिर है यह कोई आध्यात्मिक सौदा नहीं था, जो आत्मा से परमात्मा के बीच होता है। जिसका साध्य केवल ऐहिक बंधनो से मुक्ति होता है।

यह तो सियासत के प्रांगण में सत्ता का सौदा था, एक सत्ता को ठुकराकर सत्ता के नए शीशमहल में निवास के लिए ‘बिक’ जाना था।
...3/11
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14 Oct
शीर्षक :- पाँच स्त्रियाँ

पहली स्त्री है
जिसके दूध के दाँत नहीं टूटे
उसे चॉकलेट पसन्द है
उसका मुँह दबोचा गया एकांत में
और कहा गया "चुप रहना"
समय आने पर उसे दफ़ना दिया जाएगा
या जला दिया जाएगा
उसी एकांत में

1/7
दूसरी स्त्री क़ैद है
रिश्तों की चारदीवारी में
उसकी जाँघें खरोंचकर
टाँगों के बीच भरी गईं
सुहाग की निशानियाँ
उसके गालों को खींचकर
चिपका दिया गया
मर्यादा की दीवारों से
ताकि बनी रहे उसके होठों पर
चिरकाल तक एक स्थिर मुस्कान

2/7
तीसरी स्त्री वो है जो
उठा ली गयी राह चलते
उसे बांध दिया गया
जकड़कर
मजबूर किया गया उसे
साँस लेने को
जब तक उसके शरीर से
माँस का एक-एक क़तरा
न नोच लिया गया हो

3/7
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9 Oct
प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी से देश में ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और उसकी परिसीमा का मुद्दा फिर चर्चा में है। शाहीन बाग प्रकरण में अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विरोध प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार सब को है, लेकिन इसकी आड़ में सार्वजनिक स्थान पर कब्जा नहीं किया जा सकता।
..1/9
जबकि तब्लीगी जमात से जुड़े मामले में एक याचिका पर सुनवाई में चीफ जस्टिस एस.ए.बोबडे ने गंभीर टिप्पणी की कि आज ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ सबसे ज्यादा दुरूपयोग हो रहा है। इन पर बहुत गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।
..2/9
बेशक आज जरूरत इस बात की भी है कि कोर्ट को ऐसी टिप्पणी करने की नौबत क्यों आई? और ऐसा होने देने के लिए कौन जिम्मेदार है, तंत्र की मनमानी या व्यक्ति की स्वच्छंदता?
.. 3/9
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4 Oct
मैं कांग्रेस को सिर्फ इसलिये नहीं पसन्द करता कि आज़ादी की लड़ाई में इसके लीडरों ने देश का नेतृत्व किया..
बल्कि मेरी सोच, मेरी विचारधारा का राजनैतिक पटल पर कोई दल यदि प्रतिनिधित्व करता है तो वह काँग्रेस है।
..1/9
मैं जानता हूँ, व्यक्तिपूजक होना खतरनाक होता है,किन्तु नेहरू के प्रति मुझे आकर्षण है। मुझे नेहरू की तार्किकता और बुद्धिमानी आकर्षित करती है,
गांधी जी की सात्त्विक सीमा है, नेहरू की व्यवहारिकता असीम है।
...2/9
तमाम मानवीय कमजोरियों और भूलों के बावजूद सिर्फ नेहरू ही इस देश के सलामी बल्लेबाज बन सकते हैं, यह सोचने की दूरदर्शिता गांधी जी में थी और वे सही साबित हुए।
...3/9
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1 Oct
पप्पू लगभग हर दूसरे भारतीय घर में मिल जाएंगे। तकरीबन हर दूसरे तीसरे मां बाप अपने लाडलों का नाम पप्पू रखते हैं।

आपने गुंडों मवालियों को लड़ते हुए देखा होगा, जिसे ये लोग कमज़ोर समझते हैं, जिसे चिढ़ाना चाहते हैं, उसे कहते हैं बच्चा है ये, पप्पू है ये।

...1/8
तो जो ये पप्पू है , इसका नामकरण इन बड़ों के सबसे बड़े आदर्श बलात्कार सम्राट ठग आशुमल (आसाराम) ने रखा था। ज़ाहिर है टारगेट करना था इसे। लेकिन ये पप्पू अंदर से भी मासूम है।

नहीं भड़का। भड़का लो जितना चाहे।

...2/8
मुझे अगर कोई बाल बुद्धि या बच्चे की तरह कहता है तो खुशी होती है।
जीसस ने कहा था मेरे स्वर्ग के राज्य में वही प्रवेश कर सकेगा जो बच्चा बन जायेगा।
मतलब निर्दोष! छल कपट से दूर।
बड़ों की दुनिया ! क्या देख रहे हैं बड़ों के हाथ में?
युद्ध, छल, कपट, हिंसा, बलात्कार, अपहरण!
..3/8
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28 Sep
मोदी जी तो हमारे देश के लिए भगवान हैं...
क्योंकि 2014 से पहले भारत में सब भूखे नंगे थे, ना रहने को घर था, ना कोई रोज़गार था, ना शौचालय था, ना कोई हिंदू सुरक्षित था।
मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले कांग्रेस ने 60 साल में इतने घोटाले किये कि देश कंगाल हो चुका था।
..1/8
कांग्रेस ने ना कोई यूनिवर्सिटी, ना IIT, ना AIIMS जैसे बड़े सरकारी अस्पताल, ना एअरपोर्ट, ना ISRO जैसे वैज्ञानिक संस्थान और ना ही BSNL, LIC जैसे सरकारी संस्थान बनाए,
देश का सारा पैसा गाँधी परिवार ने इटली भेज दिया था, बैंक दिवालिया हो चुके थे, जनता त्राहि त्राहि कर रही थी।
..2/8
दुनिया की भी हालात बद से बदतर होती जा रही थी 2014 आते आते तो धरती ने घूमना ही बंद कर दिया था, फिर 2014 में मोदी रूपी भगवान आए और देश को पहला ईमानदार प्रधानमंत्री मिला जिसकी कृपा से धरती ने फिर से घूमना शुरू कर दिया।
...3/8
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27 Sep
आर्थर कॉनन डायल की कृति शेरलॉक होम्स में एक कहानी है, "The Illistratious Client". लड़की को पता है कि जिससे प्रेम करती है वह womanizer है, मानसिक रोगी है, और अपनी पत्नियों का हत्यारा भी। फिर भी वो उसे बेइंतहा चाहती है, उसकी मीठी मीठी flattering बातें उसे बेहद पसंद हैं।
...1/9
वह लड़की मरने के करीब पहुँच जाती है। उसका अगला शिकार बनने के बेहद करीब। लेकिन ख़ुद को गलत कैसे माने?

उसी तरह, देश के एक एक इंच को बेचा जा रहा है, लेकिन मोदी समर्थक लोगों को ज़रा सा भी संदेह नहीं हो रहा है।
...2/9
जब तक इनके खुद के घर नहीं जल रहे, ये भरपूर चटखारे लेकर सरकार का विरोध करने वालों का मज़ाक उड़ाते रहते हैं।

कुछ रिजल्ट तुरन्त पाने की बेचैनी ने ही क्रांतिकारियों को हथियार उठाने पर मज़बूर किया होगा, वे राम और कृष्ण के द्वारा किये गए अंतिम विकल्प को पहले आजमा रहे थे।
...3/9
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20 Sep
प्रासंगिकता तो देखिए 😂

1950 में सोहराब मोदी की फिल्म 'भिखारियों का सरदार' रिलीज़ हुई थी। फिल्म बुरी तरह फ्लॉप रही थी और आज इसका कोई प्रिंट मौजूद भी नहीं है।

फिल्म की कहानी थी -
एक व्यापारी एक भिखारी को सड़क से उठाकर एक राज्य का राजा बना देता है,
...1/4
लेकिन चूंकि भिखारी को राजपाट का कोई अनुभव या अंदाजा नहीं होता, इसलिए वह पूरे राज्य का बंटाधार कर देता है।
दुश्मन राजा की सेना उसके राज्य की सीमा पर पड़ने वाले गाँवों को कब्ज़िया लेती है और जनता भुखमरी की शिकार हो जाती है।
..2/4
इस कारण सैकड़ों लोग खाने की तलाश में अपने घरों से निकल जाते हैं और रास्ते में मारे जाते हैं।

फिल्म के अंत तक भिखारी एकदम राजसी गेटअप में आ जाता है, दाढ़ी बढ़ा कर। लेकिन तब तक राज्य की माली हालत इतनी खराब हो जाती है कि वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता।
...3/4
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19 Sep
अंधभक्त कभी भी गलत को गलत नहीं मान सकता!
जो जहाँपनाह कह दें वो सही ! 🙏

जब वो जीएसटी को बुरा कहते थे तब वो सही थे, जब उन्होंने जीएसटी लागू किया तब वो सही हो गए!
जब वो आधार कार्ड का विरोध करते थे तब वो सही थे, जब उन्होंने आधार लागू किया तब वो सही हो गए!
..1/7
जब वो मनरेगा का भरी संसद में मजाक उड़ा रहे थे तब वो सही थे, जब उन्होंने मनरेगा लागू की तब वो सही हो गए!
जब उन्होंने नोटबंदी जैसी मूर्खता की तब भी आपने तालियाँ बजाईं,
जब उन्होंने बोला न कोई घुसा है न घुसाया गया है तब भी आपने तालियाँ बजाईं,
...2/7
जब उन्होंने चार घंटे के नोटिस पर पूरे देश में ताला डाल दिया तब भी आपने तालियाँ बजाईं,
आप लोग बोले कि मोदी ने अर्थव्यवस्था डुबाई तो सोच कर देशहित में ही डुबाई होगी..
उन्होंने ताली, थाली, टॉर्च से कोरोना भगाने का गणित दिया आप सब उस जहालत में एक साथ लगे रहे!
...3/7
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