दीपक शर्मा(सनातन सर्व श्रेष्ठ) Profile picture
🇮🇳भारत महापुरुषो की तपोभूमि 🇮🇳ओर कार्मभूमि है सर्वे भवन्तु सुखिनःसर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वेभद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्
11 Apr
#जरुर_पढे
कहते हैं कि यहाँ की मिट्टी में ही कुछ ऐसा अनोखा है कि यहाँ खराब से खराब स्थिति में भी बहादुर जन्म लेते हैं.
आज हम आपके सामने एक ऐसे ही वीर योद्धा की कहानी लेकर आये हैं. बात उन दिनों की है जब अफगान से आने वाले शासकों से पूरा भारत डरता था.
लेकिन सरदार हरि सिंह नलवा ने पूरे अफगानिस्तान को ही हिला कर रख दिया था. पठान और अफगानी लोग तो इनके यहाँ पर नौकरी किया करते थे.
हरि सिंह नलवा जी का जन्म 1791 ई. में अविभाजित पंजाब के गुजरांवाला में हुआ था. 1805 ई. के वसंतोत्सव पर एक प्रतिभा खोज प्रतियोगिता में, जिसे महाराजा रणजीत सिंह ने आयोजित किया था, हरिसिंह नलवा ने भाला चलाने, तीर चलाने तथा अन्य प्रतियोगिताओं में अपनी अद्भुत प्रतिभा का परिचय दिया.
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10 Apr
~नरक {NARAK}~

★हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार नरक का वर्णन★

इस ब्रह्माण्ड में चौदह भुवन (लोक) हैं -
सात ऊपर के लोक हैं - भू:, भुव:, स्व:, मह:, जन, तप, सत्य।
सात नीचे के लोक हैं - अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।

पृथ्वी (भू: लोक) की ऊँचाई सत्तर हजार योजन है।
पृथ्वी के भीतर ही नीचे के सात लोक स्थित हैं, जिनमें प्रत्येक की ऊँचाई 10-10 हजार योजन है। इनकी भूमि क्रमशः काली, सफेद, लाल, पीली, कँकरीली, पथरीली और सुवर्णमयी है।
नीचे के ये सातों तल (लोक/भुवन) बड़े-बड़े महलों से सुशोभित हैं।
उनमें दानवों और दैत्यों की सैकड़ों जातियाँ निवास करती हैं। विशालकाय नागों के कुटुम्ब भी उनके भीतर रहते हैं।
वहाँ सूर्य की किरणें दिन में केवल प्रकाश फैलाती हैं, धूप नहीं। इसी प्रकार चन्द्रमा की किरणें रात में केवल उजाला करती हैं, सर्दी नहीं।
पाताल के नीचे भगवान विष्णु का तमोमय
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9 Apr
भौतिक विज्ञान के नियमो की धज्जियां उड़ाती हजारो वर्ष पुरानी श्रीकृष्ण मक्खन गेंद --

यह पत्थर #श्रीकृष्ण_बटरबॉल के नाम से प्रसिद्ध है ।। आपको यह साधारण पत्थर लगता होगा, लेकिन यह पत्थर विज्ञान के सारे नियमो की धज्जियां उड़ाते हुए अडिग है :--
यह पत्थर ढलान वाली पहाड़ी पर, 45 डिग्री के कोण पर मात्र 4 फुट की जगह घेरकर बिना लुढ़के टिका हुआ है ।। इस पत्थर का वजन 250 टन है, इसे साथ हाथियों की मदद से यहां से हटाने का प्रयास किया गया था, लेकिन यह हिला तक नही ।
ढलान के ऊपर इस पत्थर का अपने आप टिका रहना ही किसी आश्चर्य से कम नही, उल्टे यह महान प्रयासों के बाद भी हिलाने से भी नही हिलता, यह महाआश्चर्य की बात है ।

देखने से यह पत्थर ऐसे लगता है की किसी भी क्षण यह पत्थर लुढ़ककर इस पहाड़ी को चकनाचूर कर देगा
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9 Apr
ગુજરાત મા આવેલ પાટણ શહેર ના પટોળા એટલે પાટણની વિશિષ્ટ રેશમી સાડીઓ. પટોળા વિષેની દંતકથા એવી છે કે રાજા કુમારપાળ 12મી સદીમાં દૈનિક પુજા કરવા માટે રોજ નવો ઝભ્ભો પહેરવા દક્ષિણ મહારાષ્ટ્રના જૈનાના પટોળા ઝભ્ભા મંગાવતા હતા.
જ્યારે રાજાને ખબર પડી કે, જૈનાના રાજા વાપરેલાં કપડાં પાટણ મોકલે છે, ત્યારે તેમણે દક્ષિણ પર હુમલો કર્યો, દક્ષિણના રાજાને હરાવ્યો અને ત્યાંથી પટોળાના 700 વણકર કુટુંબોને પાટણ લઈ આવ્યા. આ કુટુંબો પૈકીના માત્ર સાળવીઓએ આજે આ કારીગરી જાળવી રાખી છે.
પટોળા એ વિશ્વભરમાં વણાટ સ્વરૂપનો સૌથી મુશ્કેલ પ્રકાર છે. તેમાં બેવડી ઇક્કત શૈલીનો ઉપયોગ કરવામાં આવે છે. જેમાં તાણવાણાને વણતા પહેલાં અગાઉથી નક્કી કરી શૈલી મુજબ કાળજીપુર્વક રંગવામાં આવે છે. ત્યાર બાદ વણકર તેને ચોક્સાઇપુર્વક શાળ પર ગોઠવે છે
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7 Apr
महाराजा सूरजमल जी जाट 🙏🙏
मुगलों के आक्रमण का प्रतिकार करने में उत्तर भारत में जिन राजाओं की प्रमुख भूमिका रही है, उनमें भरतपुर (राजस्थान) के महाराजा सूरजमल जाट का नाम बड़ी श्रद्धा एवं गौरव से लिया जाता है। उनका जन्म 13 फरवरी, 1707 में हुआ था। Image
ये राजा बदनसिंह ‘महेन्द्र’ के दत्तक पुत्र थे। उन्हें पिता की ओर से वैर की जागीर मिली थी। वे शरीर से अत्यधिक सुडौल, कुशल प्रशासक, दूरदर्शी व कूटनीतिज्ञ थे। उन्होंने 1733 में खेमकरण सोगरिया की फतहगढ़ी पर हमला कर विजय प्राप्त की।
इसके बाद उन्होंने 1743 में उसी स्थान पर भरतपुर नगर की नींव रखी तथा 1753 में वहां आकर रहने लगे।

महाराजा सूरजमल की जयपुर के महाराजा जयसिंह से अच्छी मित्रता थी। जयसिंह की मृत्यु के बाद उसके बेटों ईश्वरी सिंह और माधोसिंह में गद्दी के लिए झगड़ा हुआ।
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6 Apr
हिन्दू सिक्ख ..

दशमेश पिता गुरू गोविंद सिंह जी सैनिको में उत्साह भरने के लिये जो भाषण देते थे, उनका संग्रह 'चंड़ी दी वार' कहलाता है । उसमें लिखे दोहे पर सेक्युलर गौर करें :-

मिटे बाँग सलमान सुन्नत कुराना ।
जगे धमॆ हिन्दुन अठारह पुराना ॥
यहि देह अँगिया तुरक गहि खपाऊँ ।
गऊ घात का दोख जग सिऊ मिटाऊँ ॥

अर्थात :- हिंदुस्तान की धरती से बाँग (अजान), सुन्नत (इस्लाम) और कुरान मिट जाये, हिन्दू धर्म का जागरण होकर अट्ठारह पुराण आदर को प्राप्त हों। इस देह के अंगों से ऐसा काम हो कि सारे तुर्कों को मारकर खत्म कर दूँ
और गोवध का दुष्कृत्य संसार से नष्ट कर दूँ ।

देही शिवा बर मोहे, शुभ कर्मन ते कभुं न टरूं ।
न डरौं अरि सौं जब जाय लड़ौं, निश्चय कर अपनी जीत करौं ॥

अर्थात :-
हे परमशक्ति माँ(शिवा) ऐसा वरदान दो कि मैं अपने शुभ कर्मपथ से कभी विचलित न हो पाऊँ
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6 Apr
संस्कृत बोलने से दिमाग तेज होता है
संस्कृत विश्व की एकमात्र वैज्ञानिक भाषा है। स्वर-विज्ञान के सिद्धांतों का इसमें पूरा-पूरा उपयोग किया गया है। कंप्यूटर के लिए भी यह सर्वाधिक उपयुक्त भाषा मानी जाती है, हालांकि इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं हुआ है।
संस्कृत के उच्चारण से मन और मस्तिष्क पर भी सकारात्मक प्रभाव होता है। स्पेन के 'बास्क भाषा एवं मस्तिष्क संस्थान' में शोध-रत स्नायु-विज्ञानी डॉ. हार्टजेल ने सिद्ध किया है कि संस्कृत के लगातार शुद्ध उच्चारण से मस्तिष्क की क्षमता बढ़ जाती है।
डॉ हार्टजेल प्रसिद्ध स्नायु वैज्ञानिक (न्यूरो साइंटिस्ट) हैं तथा उन्होंने वर्षों तक संस्कृत के प्रभाव का अध्ययन किया है।
2 जन. 2018 को प्रकाशित अपने शोध-पत्र में उन्होंने लिखा है - " मैंने पाया कि जितना अधिक मैंने संस्कृत का अध्ययन किया उतनी ही अधिक मेरी याददाश्त बढ़ गई।
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6 Apr
अग्नि में किए जाने वाले होम - अर्थात् अग्नि में घी, समिधा, चावल अर्पित करने को ही 'अग्निहोत्र' कहते हैं।
विशेष कर, सूर्योदय-सूर्यास्त समय के ठीक क्षण में गायत्री मंत्र हो या "अग्नये स्वाहा, अग्नये इदं न मम" इस मंत्र का उच्चारण करते हुए, अग्नि को घी - समिधा - चावल समर्पित करने के
विधान को ही अग्निहोत्र कहते हैं।
इस प्रकार संध्या समय में निरंतर अग्निहोत्र करने हेतु तांबे से बनाए गए होमपात्र में - प्रातः पूर्व दिशा तथा सायंकाल पश्चिम दिशा की ओर मुख करते हुए बैठ कर, ठीक उसी क्षण को मंत्रोच्चार करते हुए द्रव्य समर्पित करने चाहिए ।
इस होम का आचरण पुरुष
महिलाएँ, बच्चे, चाहे जो कोई कर सकता है । ठीक उसी समय पर करना चाहिए।

*अग्निहोत्र से होने वाले लाभ *

 इसका आचरण करने से करने वालों की बुद्धि - विवेक सवंर्धित होती है। अच्छी संतान प्राप्ति होती है। तेज- कांति बढ़ती है। परिसर शुद्ध होता है। आसपास के कृमि-किट अंदर नहीं आ सकते।
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5 Apr
पूर्वांचल के महान क्रान्तिवीर शम्भुधन फूंगलो

भारत में सब ओर स्वतन्त्रता के लिए प्राण देने वाले वीर हुए हैं। ग्राम लंकर (उत्तर कछार, असम) में शम्भुधन फूंगलो का जन्म फागुन पूर्णिमा, 1850 ई0 में हुआ। डिमासा जाति की कासादीं इनकी माता तथा देप्रेन्दाओ फूंगलो पिता थे।
शम्भुधन के पिता काम की तलाश में घूमते रहते थे। अन्ततः वे माहुर के पास सेमदिकर गाँव में बस गये। यहीं शम्भुधन का विवाह नासादी से हुआ।

शम्भु बचपन से ही शिवभक्त थे। एक बार वह दियूंग नदी के किनारे कई दिन तक ध्यानस्थ रहे। लोगों के शोर मचाने पर उन्होंने आँखें खोलीं और कहा
कि मैं भगवान शिव के दर्शन करके ही लौटूँगा। इसके बाद तो दूर-दूर से लोग उनसे मिलने आने लगे। वह उनकी समस्या सुनते और उन्हें जड़ी-बूटियों की दवा भी देते। उन दिनों पूर्वांचल में अंग्रेज अपनी जड़ें जमा रहे थे। शम्भुधन को इनसे बहुत घृणा थी। वह लोगों को दवा देने के साथ-साथ देश और धर्म
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5 Apr
*भारत के विभाजन से पूर्व एक अति सम्पन्न धनाढ्य हिन्दुओं का नगर था नाम था सियालकोट ...*…

उस समय के पंजाब के मुख्य नगरों में से दूसरे नंबर का नगर सियालकोट उपजाऊ भूभाग और जम्मू के पास होने के कारण सियालकोट अति महत्व का नगर था *...*…
कपास, गन्ना, गेहूँ, चॉवल की भरपूर फसलें, फलों के बाग, नगर में उद्योग अति महत्वपूर्ण स्थान रखते थे कपड़ा मिलें जिसमें उत्तम प्रकार के सूती कपड़े बनाये जाते थे, चमड़े का व्यापार, चमड़े से बनी वस्तुएं, सियालकोट पूरे संसार में आयात करता था सियालकोट की कृषि संबंधी
मशीनें और अन्य मशीनों का उत्पादन में अतिविशिष्ट स्थान था *...*…

सियालकोट में 85% जनसँख्या हिन्दुओं की थी और व्यापार तो 100% हिन्दुओं के पास ही था सियालकोट में बाहर से आये मुस्लिम, हिन्दुओं के सेवक बन कर कार्य करते थे उस समय सियालकोट में बैंकिंग का कार्य
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5 Apr
🙏🏻❤️हमारा धर्म पहले संपूर्ण धरती पर व्याप्त था।
पहले धरती के सात द्वीप थे- जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। इसमें से जम्बूद्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है। राजा प्रियव्रत संपूर्ण धरती के और राजा अग्नीन्ध्र सिर्फ जम्बूद्वीप के राजा थे।
जम्बूद्वीप में नौ खंड हैं- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। इसमें से भारतखंड को भारत वर्ष कहा जाता था। भारतवर्ष के 9 खंड हैं- इसमें इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व और वारुण तथा यह समुद्र से घिरा
हुआ द्वीप उनमें नौवां है। भारतवर्ष के इतिहास को ही हिन्दू धर्म का इतिहास नहीं समझना चाहिए।
ईस्वी सदी की शुरुआत में जब अखंड भारत से अलग दुनिया के अन्य हिस्सों में लोग पढ़ना-लिखना और सभ्य होना सीख रहे थे, तो दूसरी ओर भारत में विक्रमादित्य, पाणीनी, चाणक्य जैसे विद्वान व्याकरण और
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4 Apr
🌹सदोष और निर्दोष जीवन 🌹

एक आदमी है जो मनौतियाँ मानता है कि जहाज में बैठ जाऊँगा तो प्रसाद बाँटूगा, नारियल फोड़ूँगा। वह पैसा भी खर्च रहा है और जहाज की यात्रा करने के बाद नारियल भी फोड़ता है, प्रसाद भी बाँटता है, खुशियाँ मनाता है। लेकिन जहाज में नौकरी वाला पायलट तथा दूसरे
मददगार लोग जहाज में बैठते भी हैं, ऊपर से पैसा भी लेते हैं और घड़ी देखते रहते हैं कि कब समय पूरा हो। डयूटी पूरी हुई तो ‘हाश! जान छूटी!’ करके घर पहुँचते हैं क्योंकि वे सुख लेने के लिए जहाज में नहीं बैठते, डयूटी के लिए बैठते हैं। जैसे यात्री सैर करने जाता है, ऐसे पायलट के मन में
सैरबुद्धि नहीं है। साधन में होते हुए भी उसमें सुखबुद्धि नहीं है। ऐसे ही देहरूपी साधन में ब्रह्मवेत्ता भी होगा और अज्ञानी भी होगा, बुद्धू भी होगा और बुद्ध भी होगा लेकिन बुद्धु शरीररूपी साधन में सुखबुद्धि करके जियेगा और बुद्धपुरुष शरीररूपी साधन का उपयोग करने के लिए जियेगा। यात्री
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4 Apr
~पंचकोष~

सनातन धर्म के मनीषियों ने आत्मा के ऊपर पाँच कोषों का वर्णन किया है जिसे पाँच शरीर भी कहते हैं-
【१】अन्नमय कोष - अन्न और जल से बना स्थूल शरीर त्वचा से लेकर हड्डी तक पृथ्वी और जल तत्त्व से निर्मित है जिसे अन्नमय शरीर कहते हैं। अन्न और जल के द्वारा ही इस शरीर का विकास
होता है।

【२】प्राणमय कोष - अन्नमय कोष के भीतर प्राणमय कोष है जो पाँच प्राण, पाँच उपप्राण और पाँच कर्मेन्द्रियों से निर्मित होता है। श्वास को लेने और छोड़ने की प्रक्रिया, पूरे शरीर में प्राणों का संचार करना, भोजन पकाना, मल विषर्जित करना आदि कार्य प्राणमय शरीर
करता है।
पाँच प्राण हैं - प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान।
पाँच उपप्राण हैं - देवदत्त, नाग, कृंकल, कूर्म, धनञ्जय।
प्राण एक ही है किन्तु इनके अलग-अलग कार्य से इनको प्राण व उपप्राण में विभाजित किया गया है। भूख-प्यास का अनुभव प्राणमय शरीर में होता है।
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20 Mar
तालचेर(ओडिसा) शहर का मुख्य ऐतिहासिक आकर्षण यहां खड़ा तालचेर पैलेस है। इस खूबसूरत और विशाल महल को सम्राट सदन महल के नाम से भी जाना जाता है। यह एक लग्जरी हेरिटेज प्रॉपटी है जिसका निर्माण 14वीं शताब्दी के आसपास किया गया था।
आकर्षक वास्तुकला के साथ बनाया गया यह महल पर्यटकों को काफी ज्यादा आश्चर्यचकित करने का काम करता है। इस पैलेस के प्रवेशद्वार पर बनी पत्थर की चक्र संरचना सबका ध्यान आकर्षित करती है, जिसे देख इस सरंचना के प्रति जिज्ञासा और बढ़ जाती है।
जानकारी के अनुसार यह राजा राजेंद्र चंद्र देव का शाही निवास हुआ करता था। राजा राजेंद्र चंद्र देव यहां अपनी पत्नी रानी साहेब पुष्पा देवी और दो बच्चे युवराज विजेंद्र देब और शैंलेंद्र चंद्र देब के साथ रहा करते थे।
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18 Mar
मूर्ति के हाथ मे जो डमरू देख रहे हो ना, वो पत्थर का है। ये तो कुछ भी नही है,डमरू पर जो रस्सी देख रहे हो ना, वह भी पत्थर की है। ओर तो ओर आप पत्थर की रस्सी के निचे उंगली भी डाल सकते हो इतनी जगह है।हुआ ना आश्चर्य।
अब जरा सोचिए बिना किसी तकनीक के क्या केवल छेनी और हथौड़ी से यह सब कैसे संभव है।
एक हल्की सी गलत चोट क्या पूरी मूर्ति को खराब नहीं कर सकती थी।
और अगर छेनी -हतोड़े से संभव है तो आज इतनी तकनीक के बावजूद भी इतनी सटीकता से कोई इसकी प्रतिलिपि क्यों नहीं बना पाता है ।
ऐसे हजारों आश्चर्य है सनातन में लेकिन कुछ वामपंथी इतिहासकारों ने इनको आश्चर्य ही बनाकर रहने दिया किसी के सामने आने ही नहीं दिया और हमारी विडंबना देखिए कि हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन हमें हमारे पूर्वजों द्वारा बनाई गई इन महान कलाकृतियों का ज्ञान भी नहीं है।
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18 Mar
"वराह विष्णु"
गुफा मंदिर 2 6 वीं या 7 वीं शताब्दी के अंत में बनाया गया था ।

गुफा प्रवेश द्वार एक बरामदा है जो चार वर्ग के स्तंभों से विभाजित है, जिसमें आधे स्तंभों के रूप में समाप्त होता है, सभी एकांत पत्थर के चेहरे से तराशा जाता है ।
गुफा 2 में बड़ी राहत में से एक ने विष्णु की किंवदंती को ब्रह्मांडीय महासागर की गहराई से देवी (भुदेवी) को बचाने के लिए अपने वराह (एक सूअर) अवतार में दिखाया है।

नक्काशी एक मूर्तिकला राहत दिखाती है जो विष्णु के दस अवतारों में से तीसरे वराह अवतार की कहानी को दर्शाती है
जो मुखमंतपा (बरामदा) के बाएं किनारे पर तराशा गया है । संस्कृत में वराह अर्थात जंगली सूअर । इस अवतार में वह एक जंगली सूअर का रूप लेता है और भूदेवी को हिरण्याक्ष नामक दुष्ट राक्षस से बचाता है, जो उसे परेशान कर रहा था ।
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17 Mar
THE POWER OF MEDITATION
आर्यभट्ट(Aryabhata, जन्म: 476 ई. - मृत्यु: 550 ई.)
प्राचीन भारत के एक महान ज्योतिषविद्, खगोलशास्त्री और गणितज्ञ थे, जिनका जन्म कुसुमपुर (बिहार) में हुआ था। *नालन्दा विश्वविद्यालय में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की थी।
23 वर्ष की आयु में उन्होंने खगोल विज्ञान पर एक लेख लिखा और गणित पर एक अविश्वसनीय ग्रंथ "आर्यभट्टीयम" कहा, उन्होंने ग्रहों की गति और ग्रहण के समय की गणना की प्रक्रिया तैयार की। आर्यभट्ट ने पहली बार घोषणा की थी कि पृथ्वी गोल है।
यह अपनी धुरी पर घूमती है, सूर्य की परिक्रमा करती है और अंतरिक्ष में निलंबित हो जाती है - कोपरनिकस ने अपने हेलियोसेंट्रिक सिद्धांत को प्रकाशित करने के हजारों साल पहले। उनका सबसे शानदार योगदान शून्य की अवधारणा थी, जिसके बिना आधुनिक कंप्यूटर प्रौद्योगिकी अस्तित्वहीन रही होती ।
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15 Feb
हिमाचल प्रदेश के स्पीति घाटी में यह एक प्रसिद्ध तिब्बती मठ है। यह बौद्ध मठ हिमाचल प्रदेश की स्पीति घाटी में स्पीति नदी के किनारे स्तिथ है। इस प्रसिद्ध बौद्ध मठ की ऊंचाई समुद्रतल से लगभग 13504 फीट है। यह मठ एक शंक्‍वाकार चट्टान पर निर्मित है।
पौराणिक मान्यताओ के अनुसार यह इस मठ का निर्माण रिंगछेन संगपो ने करवाया था। यह मठ महायान बौद्ध के जेलूपा संप्रदाय से संबंधित एक धार्मिक बौद्ध मठ है।
की गोम्पा हिमाचल प्रदेश में स्तिथ बहुत ही ऐतिहासिक स्थानों में से एक है।इस मठ का निर्माण 11 वीं शताब्दी का माना गया है। यह मठ लगभग एक हज़ार साल से भी पुराना माना जाता है। इसमें अभी भी प्राचीन बौद्ध स्क्रॉल और पेंटिंग हैं।
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15 Feb
રણછોડરાય અથવા રણછોડજી તે ભગવાન શ્રીકૃષ્ણનું જ એક સ્વરુપ છે. ગુજરાત રાજ્યમાં રણછોડરાયજીનું પ્રખ્યાત મંદિર ડાકોરમાં આવેલું છે જે શ્રદ્ધાળુઓ માટે યાત્રા ધામ છે. રણછોડની સંધિ છુટી પાડીએ તો રણ + છોડ એમ થાય, જેનો અર્થ છે કે રણ (યુદ્ધ મેદાન) છોડીને ભાગી જનાર.
ભગવાન કૃષ્ણને આ અનોખુ પણ ભક્તોનું ખુબ લાડીલું નામ મળ્યું કારણકે તેમના કાલયવન રાક્ષસ સાથેનાં યુદ્ધમાં, ભગવાન યુદ્ધ ત્યજીને મથુરા વાસીઓને લઈ દ્વારકા ભણી આવ્યાં, અને ગુજરાતમાં આવી વસ્યા. કદાચ આ જ કારણે ગુજરાતીઓને કૃષ્ણનાં અન્ય રૂપો કરતા રણછોડજીનું રૂપ વધુ પ્રિય છે
કેમકે કૃષ્ણએ ગુજરાતને અને ગુજરાતીઓને પોતાના કર્યા.દ્વાપરયુગમાં ભગવાન શ્રીકૃષ્ણનો સખો વિજયાનંદ હતો. હોળીના તહેવાર નિમિત્તે જ્યારે આખું ગામ ભગવાન શ્રીકૃષ્ણ સાથે રંગે રમી રહ્યું હતુ ત્યારે વિજયાનંદ કોઇક કારણસર રિસાઇને હોળી રમવા આવ્યો નહી.
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15 Feb
देश में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जो साल के 8 महीने पानी में डूबा रहता है और इसके नजारे इतने खूबसूरत हैं कि आप इसकी ओर खींचे चले आएंगे।
पंजाब के तलवाड़ा से करीब 34 किलोमीटर की दूरी पर पोंग डैम की झील के बीच बना एक अद‌्भुत मंदिर,जो साल में सिर्फ चार महीने (मार्च से लेकर जून तक)ही नजर आता है बाकी समय मंदिर पानी में ही डूबा रहता है साल के बाकी आठ महीने ये पानी में डूबे रहते हैं, जहां केवल नाव से ही पहुंचा जा सकता है
पानी उतरने के कारण अब ये मंदिर नजर आने लगा है, जिससे यहां पर टूरिस्ट का आना शुरू हो जाएगा।
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14 Feb
उदयपुर शहर के बाहरी इलाके में बांस डारा पर्वत पर स्थित सज्जनगढ़ किला मेवाड़ राजवंश से संबंधित एक पूर्व शाली निवास है। इस का निर्माण लगभग 1884 में महाराणा सज्जन सिंह द्वारा करवाया गया था। जिन्होंने दस्को तक इस रियासत पर शासन किया था।
सज्जन गढ़ पैलेस पिछोला झील के साथ समुंद्र तल से लगभग 1944 मीटर की ऊंचाई पर स्थित उदयपुर के सबसे लोप्रिय पर्यटक स्थलों में से एक है।

सज्जन गढ़ किले को बनवाने के पीछे कई किस्से है
जिन में से एक है कि महाराणा सज्जन सिंह एक ऐसा महल बनवाना चाहते थे कि जहां से उनका पैट्रिक घर या चितौड़गढ़ का किला दिखाई दे। और दूसरा कारण यह है कि महाराणा चाहते थे कि महल सेल के बाहर ऊंची जगह पर बने और जहां से बदल आसानी से देखने लगे,जिसके उदयपुर के मौसम का अंदाजा लगाया जा सके।
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