Thread : मदारी और उसके बन्दर
(Disclaimer: इस कहानी के सारे पात्र काल्पनिक हैं और उनका वास्तविकता से कोई लेना देना नहीं है)
एक बार एक शहर में एक मदारी आया। बातें बनाने में बड़ा चतुर। ऐसी मीठी मीठी बातें करता कि भीड़ लग जाती। लोग उसके खेल से ज्यादा उसकी कहानियों के दीवाने थे।
उस मदारी ने ढेर सारे बन्दर भी पाले हुए थे। सबके अलग अलग नाम रखे हुए थे। किसी का इनकम टैक्स, किसी का GST, किसी का पुलिस, किसी का नगर निगम, वगैरह वगैरह। खेल बढ़िया चल रहा था। लेकिन बातों से कब तक काम चलता। लोग बोर होने लगे। फिर मदारी ने नयी तरकीब निकली।
मदारी जब भी खेल दिखाने जाता केवल एक ही बन्दर को अपने साथ ले जाता। "बैंक" नाम था उस बन्दर का। बाकी सारे बंदरों को वो शहर में छोड़ देता। वे बन्दर शहर में जाके लोगों के घरों से जो भी मिलता चुरा के ले आते और शाम को मदारी को दे देते।
मदारी सुबह जाता, दिन भर कहानियां सुनाता और शाम को थोड़े से पैसे बैंक के हाथों से इकठ्ठा हुए लोगों में बंटवा देता। लोगों को पता चला कि मदारी कहानी सुनने के लिए पैसे भी देता है तो भीड़ बढ़ने लगी।
शाम को बँटने वाली थोड़ी से खैरात के चक्कर में लोग अपना काम धाम छोड़ के दिन भर मदारी के पास बैठे रहते और उसकी बकवास सुनते। उधर मदारी के सिखाये हुए बन्दर लोगों के खाली घरों में लूटपाट करते। जो उनको रोकता उसको काट लेते।
लोग मदारी की मनोहर कहानियों और उसकी बाँटी हुई खैरात में इतने मस्त हो गए कि उनको ये भी होश न रहा कि जो खैरात उन्हें मिल रही है वो मदारी अपनी जेब से नहीं दे रहा है बल्कि उनके खुद कि ही मेहनत की कमाई है। धीरे धीरे लोग निकम्मे हो गए। उनके घर खाली हो गए।
मदारी के पास भी बांटने को कुछ न बचा। लोगों को जब खैरात मिलनी बंद हो गयी तो उनका गुस्सा उसी खैरात बांटने वाले बन्दर पे निकला। एक दिन मदारी ने अपने बन्दर बेच दिए और चुपके से झोला उठा के चल दिया। लोगों ने मेहनत करना छोड़ दिया है। वे अब नए मदारी का इंतज़ार कर रहे हैं।
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