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Sep 13, 2020, 20 tweets

थ्रेड: संडे का ज्ञान

शक्ति का केन्द्रीकरण मानव की प्रवृति है। ये प्रवृति लालच से उत्पन्न होती है और अहंकार से पोषित होती है। जैसे जैसे व्यक्ति के पास शक्ति आती जाती है वो शक्ति का उतना ही ज्यादा भूखा हो जाता है। इसका सीधा उदाहरण भारतीय लोकतंत्र में देखने को मिल जाता है।

भारतीय लोकतंत्र के तीन स्तंभ हैं १.विधेयिका २.कार्यपालिका ३. न्यायपालिका। पॉलिटी की क्लास में घोंट घोंट के रटाया जाता है कि इन तीनों स्तम्भों में "बैलेंस ऑफ़ पावर" यानि शक्ति का संतुलन होता है।

लेकिन मेरा भ्रम तभी टूट गया जब मैंने संविधान में, संशोधन करके, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को ताक पे रख के जबरदस्ती घुसेड़ी गयी नवीं अनुसूची के बारे में पढ़ा। नवीं अनुसूची के मुद्दों में सुप्रीम कोर्ट का टाँग अड़ाना मना है।

दुसरे शब्दों में कहें तो न्याय के पहलू को ताक पे रख कर वोटबैंक को पोषित करने का जरिया है नवीं अनुसूची। नेताओं को असीम शक्ति देती है नवीं अनुसूची। कार्यपालिका के मुखिया यानि मंत्रीगण भी न्यायपालिका के ही सदस्य होते हैं।

कुलमिलाकर भारतीय लोकतंत्र का बैलेंस ऑफ़ पावर सिर्फ एक छद्मावरण है। वैसेतो किताबें येभी कहती हैं कि नेता को जनता चुनती है इसलिए जनता सर्वशक्तिशाली है। लेकिन हिन्दू-मुस्लिम, सवर्ण-दलित, मुफ्त बिजली-पानी, मुफ्त लैपटॉप-टीवी से खरीदी जा सकने वाली जनता नेताओं केलिए सिर्फ एक वोटबैंक है।

निष्कर्ष यह है कि भारत में नेता ही सबसे ज्यादा शक्तिशाली प्राणी है। और आप अगर स्वतंत्र भारत का इतिहास उठा के देखेंगे तो पाएंगे कि नेताओं की शक्ति और संपत्ति अद्भुत तरीके से बढ़ी है। इस शक्ति संवर्धन में तकनीक का काफी बड़ा हाथ है।

जब मोबाइल का जमाना नहीं था तब "मैन ऑन दी स्पॉट" यानि स्थानीय अधिकारी के पास काफी शक्ति हुआ करती थी। चाहे वो कलेक्टर हो या बैंक मैनेजर। अधिकारी स्थिति के हिसाब से जमीनी हकीकत के अनुरूप निर्णय लेने में सक्षम थे। कुछ ने इसका सही उपयोग किया और बहुत सारों ने दुरूपयोग।

नेताओं ने सोचा की जब दुरूपयोग ही करना है तो नीचे का अधिकारी क्यों करे, हम खुद क्यों न करें? जब से मोबाइल और इंटरनेट आया है तब से नेताओं ने सारी शक्ति सोख ली है। कहीं भी दंगे हों, कलेक्टर खुद से कोई निर्णय ले उससे पहले नेता का फ़ोन आ जायेगा।

नेताओं को छोड़ के देश का हर तबका दुखी है। बैंकों में तो और भी बुरा हाल है। पहले मैनेजर स्वविवेक से लोन बांटता था। फिर ये पावर प्रोसेसिंग सेंटर के नाम पे उच्चाधिकारियों ने ले ली। तब तक तो फिर भी ठीक था क्यूंकि शक्ति अभी भी बैंक के पास ही थी।

बैंक जानता है की उसके पास जो पैसा है वो पब्लिक के विश्वास का है, हराम का नहीं। लेकिन पिछले कुछ सालों से नेताओं की नजर बैंकों के पैसे पे पड़ गयी है। बैंकों के पास जमा पैसे को देख के नेताओं की लार टपकने लगी है। ऐसी लार हर्षद मेहता की भी टपकी थी।

उसने बैंकों का पैसा शेयर मार्किट में लगाया था। मार्किट में जबरदस्त उछाल आया। उसने खूब पैसा पीटा। इस सरकार की भी मंशा कुछ ऐसी ही है। भाड़े पे उठाये गए सलाहकारों की गोबर-सलाहों से बनायीं गयी ऊल-जलूल योजनाओं में देश के टैक्सपेयर का सारा पैसा फूंकने के बाद सरकार कंगली हो चुकी है।

एक दो को छोड़कर बाकी सारी योजनाएं सिरे से विफल रहीं। और जो एक दो सफल हुईं वो भी बैंकरों की बदौलत। और विफल होती भी क्यों न? योजनाओं का लक्ष्य अगर देश का विकास करना होता तो वे सफल होती न। यहां तो केवल लोगों की आखों में धूल झोंकनी थी। वोट बैंक को खुश रखना था।

एक के बाद एक हड़बड़ी में तैयार की हुई कई सारी योजनाएं देश पर थोप दी गयी। और डंडे के जोर पर लागू की गयी। ऐसी ही एक योजना है Digitization। आनन्-फानन में Digitization लागू कर दिया गया। न कोई पूर्व तैयारी, न कोई सोच विचार, न ग्राउंड रियलिटी का पता। बस लागू कर दो।

अब Digitization के लिए सामान चाहिए, स्टाफ चाहिए। देश में कुछ बनता नहीं, और अब बनाने का समय भी नहीं। सारी बायोमेट्रिक डिवाइसेस चीन से मंगवाई गयी। बहुत से सॉफ्टवेयर भी चीन से मंगवाए गए। भारत सरकार की मूर्खता को चीन ने जम के भुनाया।

पहले से ही डांवाडोल अर्थव्यस्था पर चीन ने कोरोना के रूप में भरपूर प्रहार किया। फलस्वरूप देश की सरकार कंगाल हो गयी है। लेकिन अगर देश की जनता को पता चल गया कि हम कंगाल हो गए हैं तो फिर चुनाव कैसे जीतेंगे। इसलिए २० लाख करोड़ का झुनझुना बजाया गया।

किसी ने नहीं पूछा कि कंगाल सरकार के पास इतना पैसा आएगा कहाँ से। अब समझ आ रहा हैं कि सरकार की नजर बैंकों के पैसे पे हैं। अब सरकारी योजनाओं में बैंकों का पैसा लगेगा। कुछ गड़बड़ हुई तो ठीकरा बैंकों के सर और किस्मत से सफल हुए (जिसकी कि उम्मीद न के बराबर हैं) तो सरकार की वाहवाही।

वोट बैंक के पोषण के लिए जनता की मेहनत की कमाई से बचा के जमा किये हुए पैसे की आहुति दी जायेगी। देश की इकॉनमी का उत्थान अब बैंकों के पैसे से, बैंकों के दम पर होगा। यही तो हर्षद मेहता कर रहा था। अब सरकार सीधे सीधे तो बैंकों का पैसा हड़प नहीं सकती।

इसलिए पहले बैंकों की लोन बांटने की शक्ति छीनी। अब सरकार तय करती है कि लोन किसे बाँटना है। अब बैंक का पैसा वोट बैंक बनाने के काम आ रहा है। पुरानी यारियां निभाने के काम आ रहा है। दान के नाम पर किये गए एहसान चुकाने के काम आ रहा है। बस जिस काम आना चाहिए उस काम नहीं आ रहा है।

हर्षद मेहता तो बेचारा पकड़ा गया और जेल में ही मर गया। एक बैंक के चेयरमैन ने सुसाइड कर लिया। पैसा डूबा पब्लिक का। इस बार भी कुछ ऐसा ही होगा। अब चूंकि सरकार को जेल में डाल सकते इसलिए बैंकों की पाली चढ़ेगी। घाटे के नाम पर सरकारी बैंक बेच दिए जाएंगे।

सुसाइड इस बार भी बैंकर ही करेगा। और पैसा तो पब्लिक का डूबना ही है।

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