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Sep 18, 2020, 15 tweets

बम्बई में जितने स्टार नहीं बनते हैं, उससे ज्यादा ब्यूरोक्रेट्स प्रयागराज, बैंकर पटना और इंजीनियर कोटा में बनते हैं। लेकिन ऐसा क्या खास है फिल्मी सितारों में कि उनकी आलोचना नहीं कर सकता कोई। आप जैसे ही उनसे कोई सवाल करेंगे तो वह बम्बई की बेइज्जती माना जायेगा। बम्बई रूठ जाएगी।

ब्यूरोक्रेट्स से सवाल पूछने या उनकी आलोचना करने पर प्रयागराज ने कभी बुरा नहीं माना। ऐसे ही बैंकर्स और इंजीनियरों की आलोचना होने पर कभी पटना या कोटा ने भी बुरा नहीं माना।
ये बम्बई के पेट में फिर क्यों दर्द होने लगता है? इस दर्द की वजह क्या है?

दरअसल ये बॉम्बे स्पिरिट और मराठा प्राइड के नाम पर फिल्मी दुनिया के काले कारनामों को दबाने की कोशिश की जाती है।
आप नेताओं को दिन भर पानी पी पीकर बुरा भला कह सकते हैं, गाली दे सकते हैं, सवाल पूछ सकते हैं लेकिन अभिनेताओं से नहीं पूछ सकते क्योंकि थाली में छेद हो जाएगा।

ऐसा क्या है फिल्मी सितारों में कि वो इतने बड़े स्टार बन जाते हैं और आलोचना के बंधन से मुक्ति पा लेते हैं? जबकि प्रधानमंत्री तक आलोचना से परे नहीं हैं।कला की अनेकों विधाओं में से फिल्में भी केवल एक विधा ही है। तो इन कलाकारों को विशेषाधिकार क्यों?

माहौल बनाने वालों ने राजनीति को भ्रस्टाचार का पर्यायवाची बना दिया। वही माहौल बनाने वाले अभिनय की दुनिया को नशे का अड्डा बताने पर नाराज़ हो जाते हैं? पिछले दस बीस सालों में कई फ़िल्मी कलाकार ड्रग्स के साथ पकड़े गए या उनपर ड्रग रखने का आरोप लगा।

फरदीन खान, डीजे अक़ील, विजय राज, गौरी खान, ममता कुलकर्णी और न जाने कितने ड्रग्स के साथ पकड़े गए। संजय दत्त, रणबीर कपूर और प्रतीक बब्बर जैसों ने तो खुद भी माना कि उन्हें नशे की आदत थी। राज कपूर और फ़िरोज़ खान की महफ़िलें आज तक मशहूर हैं। और बात सिर्फ नशे तक नहीं है।

1993 में संजय दत्त और 2008 मुम्बई धमाकों में राहुल भट्ट की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। और सलमान खान के अपराधों के बारे में सब जानते हैं। सैफ अली खान, शक्ति कपूर, आदित्य पंचोली, सूरज पंचोली जैसों पर मारपीट और कास्टिंग काउच जैसे आरोप लग चुके हैं।

संगीतकार नदीम पर गुलशन कुमार की हत्या का आरोप लगा। तौरानी भाइयों पर भी आरोप लग चुके हैं।
इसके अलावा भी बहुतों पर घरेलू हिंसा, बैंक फ्रॉड, अंडरवर्ल्ड से रिश्तों जैसे तमाम आरोप लगते रहे हैं। लेकिन आप इनमें से किसी पर उंगली नहीं उठा सकते।

दरअसल, आजकल यूपीएससी में जिस तरह ज़कात फाउंडेशन की भूमिका को लेकर आशंका जाहिर की जा रही है, उसी तरह से बॉलीवुड की इन समस्याओं की जड़ में जाएं तो पता चलेगा कि सभी समस्याओं के मूल में बॉलीवुड का जकातीकरण है।

फ़र्क़ केवल फंडिंग सोर्स का है ~ बॉलीवुड में ज़कात की जगह दाऊद और अंडरवर्ल्ड के दूसरे कई गुर्गों का पैसा लगता रहा है। जब फंडिंग का सोर्स ही गलत होगा तो उसके परिणाम भी गलत ही होंगे। बॉलीवुड के अपराधीकरण और ज़कातीकरण की जड़ में यही फंडिंग है।

माता रानी के भक्त गुलशन कुमार की सरेआम गोली मारकर हत्या हो जाती है। राजीव राय और राकेश रौशन पर जानलेवा हमले होते हैं। दिव्या भारती को मजबूरन आत्महत्या (?) करनी पड़ती है। प्रिटी जिंटा को अंडरवर्ल्ड से धमकियां मिलती रहीं। किसी खान को कभी अंडरवर्ल्ड से धमकी या गोली नहीं मिली। क्यों?

क्या कारण है कि अंडरवर्ल्ड गैंग और उसके गुर्गों से अलग चलने वाले कलाकारों का कैरियर समाप्त हो जाता है - सनी देओल, सोनू निगम, अभिजीत, प्रिटी जिंटा, नील नितिन मुकेश जैसे कितने ही होनहार और सफल कलाकारों को किनारे कर दिया गया। क्यों बॉलीवुड में पाकिस्तानी कलाकारों की बाढ़ सी आ गयी?

सुशांत की हत्या भी इसी ट्रेंड की एक कड़ी है। कंगना और रवि किशन पर जो हमले हो रहे हैं, वह भी इसी की कड़ियाँ हैं।
अच्छी बात ये है कि अब पब्लिक सब जानती है और पब्लिक सेंटिमेंट धीरे धीरे बदल रहा है। सुशांत के मामले में न्याय के लिए जैसे अपार जनसमर्थन मिला वो एक सकारात्मक शुरुआत है।

और यही कारण है गैंग की बौखलाहट का। उन्हें पता चल चुका है कि उनकी पोल धीरे धीरे ही सही, खुल चुकी है। अब वो ज़माना गया जब कोई भी सड़ी सी मूवी बनाकर ये गैंग करोडों कमा लेता था। आज ये करना मुश्किल होता जा रहा है। इसीलिए ये इतने हैरान परेशान होकर दूसरों को गालियां दे रहे हैं।

खुद को बचाने के लिए बॉम्बे स्पिरिट और मराठा प्राइड की बातें करने लगे हैं क्योंकि बचाव के लिए इनके पास कोई और तर्क है ही नहीं।

अभी आगे और तमाशा होगा, आप बस देखते जाइये। भरपूर मनोरंजन भी होगा। हां, बस आप टिके रहिएगा अपनी जिद पे - इनकी एक भी फ़िल्म हिट नहीं होने देना है।

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