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Sep 23, 2020, 10 tweets

बचपन में पढ़ा करते थे कि भारत एक कृषि प्रधान देश है, आज है या नहीं पता नहीं। हमेशा यही सुनने को मिलता था कि किसानों की तरक्की के बग़ैर इस देश का भला नहीं हो सकता। किसानों की आर्थिक उन्नति भारत की उन्नति के लिए अत्यावश्यक है। किसान का बेटा होकर यह सब सुनना अच्छा लगता था।

लेकिन पिछले साठ सत्तर सालों में किसानों की दशा दिशा सुधारने को लेकर कोई विशेष कार्य नहीं हुआ। हरित क्रांति के नाम पर रासायनिक खाद झोंककर कुछ राज्यों के किसानों ने उत्पादन बढ़ा लिया, इसके अलावा किसान और किसानी की उन्नति के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ।

साल दर साल एमएसपी बढ़ाकर कर्तव्य की इतिश्री करने वाले नेता, गांव और किसान के नाम पर सबसे ज्यादा वोट मांगते रहे। वही नेता यदि किसानों के लिए भूले भटके कोई सरकार एक आध अच्छा कदम उठाती है तो उसका दम भर विरोध करते हैं। आखिर यह विरोधाभास क्यों?

इसके दो कारण हैं - पहला किसान यदि समृद्ध हो गया तो जो आज के समय में एकमुश्त वोटबैंक के रूप में उसका दोहन होता है, वो नहीं हो पायेगा। दूसरा, नेताओं ने जो मंडियों पर कब्ज़ा कर रखा है, वो खत्म हो जायेगा। किसान के अच्छे दिन आ गए तो नेता किसानों की बदहाली के नाम पर वोट कैसे लेंगे?

किसान के समृद्ध होने का मतलब है कि उसको सब्सिडी का लालच नहीं दिया जा सकेगा। उससे लोन माफी का वादा नहीं किया जा सकेगा। उसको एमएसपी में दस बीस रुपये बढ़ाने का लॉलीपॉप नहीं दिया जा सकेगा। खाद बीज के लिए सुहावने वादे नहीं किये जा सकेंगे।

और यदि ये सब नहीं कर पाएंगे तो वोट कैसे मांगेंगे किसानों से? यही सबसे बड़ा डर है उन नेताओं का जो बातें तो करते हैं गांव किसान की लेकिन सबसे ज्यादा विरोध भी कर रहे हैं, सरकार के नए कानूनों का जो किसान की आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करने वाले हैं।

किसान को सरकारी मंडी के बाहर बाज़ार उप्लब्ध कराने का मतलब होगा कि सरकारी मंडी नेताओं के किसी काम की नहीं रह जायेगी। आज इन मंडियों पर कब्ज़ा करके नेता लोग की जो गाढ़ी कमाई हो रही है, वो बंद हो जाएगी। ये कमाई बंद होने का खतरा भी उन्हें मजबूर कर रहा है विरोध करने के लिए।

आज सरकारी मंडी तक अपने उत्पाद को ले जाने में कम से कम पांच प्रतिशत का अनाज नष्ट हो जाता है। पांच से दस प्रतिशत उत्पाद के आवागमन पर खर्च हो जाता है। कई मंडियों में जो मंडी शुल्क है वो तीन से आठ प्रतिशत तक है। इसके अलावा मंडी में जो जिल्लत झेलनी पड़ती है, वो अलग।

यानी यदि निजी कंपनियां किसान के उत्पाद को केवल एमएसपी पर ही खरीदती हैं तो भी किसान को १५-२५ प्रतिशत की अतिरिक्त आमदनी हो सकती है, बिना कोई अन्य उपाय किये, वो भी घर बैठे बैठे अपनी मर्ज़ी से अनाज़ बेचकर। हां, लेकिन निजी कंपनियां भी कोई दूध की धुली नहीं हैं। वहाँ भी झोल होता है।

ये विधेयक किसानों की उन्नति का मार्ग खोलते तो जरूर हैं पर किसान भाइयों को निजी कंपनियों से करार, व्यापार करते समय विशेष सावधानी भी रखनी होगी। ये हमारा आपका दायित्व है कि किसान भाइयों को इसके नफा नुकसान की सही जानकारी देकर उनको भ्रम की स्थिति से बचाएं।
जय जवान, जय किसान 🙏

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