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Sep 30, 2020, 15 tweets

अपने यहाँ जातिगत भेदभाव एक बड़ी समस्या रही है, इससे मुँह नहीं मोड़ा जा सकता। हिन्दू धर्म की सबसे ज्यादा आलोचना यदि किसी बात को लेकर होती है तो वो यही है। यद्यपि, पिछले कई दशकों में हमने इसको कम करने के लिए भरपूर प्रयास किये हैं और ऐसा नहीं है की हमे सफलता नहीं मिली है।

हाँ, सफलता जैसी मिलनी चाहिए, वैसी नहीं मिली परन्तु हम यह जरूर कह सकते हैं कि समाज के एक बड़े तबके में अब इस भेदभाव के लिए स्थान नहीं है।
दलितों आदिवासिओं को अभी भी इस दंश का सामना करना पड़ता है, इसी का फ़ायदा उठाकर धर्मान्तरण करने वाले अपने व्यापार का प्रसार करने में सफल हुए हैं।

इसलिए विशेषकर दलितों और आदिवासिओं को समाज में उनका गौरवशाली स्थान पुनर्स्थापित करने के लिए हमे और प्रयास करने होंगे।

यहाँ दो बातों पर ध्यान देना विशेष आवश्यक है, जो इस बीमारी का समूल नाश करने में सहायक होंगी –

प्रथम - जो एक बात इस भेदभाव को समाप्त करने में सबसे ज्यादा कारगर साबित हुई है और आगे भी होगी, वह है - अंतर्जातीय विवाह। हिन्दू हित में कार्य कर रहे संगठनों, धर्माचार्यों, संतों का यह विशेष दायित्व है कि अंतर्जातीय विवाह को बढ़ावा देने के अधिक से अधिक प्रयास करें

और इस दिशा में कार्य कर रहे लोगों को प्रोत्साहित भी करें।

दलितों के सामाजिक उत्थान के लिए इससे बेहतर कोई और उपाय नहीं है - हाँ, आर्थिक उन्नति के सहारे भी इस विकृति को समाप्त किया जा सकता है - परन्तु दलितों के आर्थिक उत्थान का कई दशकों से प्रयास किया जा रहा है,

क्रीमी लेयर को छोड़कर अन्य दलितों को इसका ज्यादा लाभ मिला नहीं है। इसलिए आर्थिक उत्थान के भरोसे रहे तो अगले सौ सालों में भी यह विकृति दूर नहीं होगी। इसलिए अंतर्जातीय विवाह एक विकल्प है जिसके माध्यम से हमे त्वरित परिणाम मिल सकते हैं।

द्वितीय - मंदिरों और धार्मिक कर्मकांडों में दलितों, आदिवासिओं को स्थान देना होगा। यद्यपि मंदिर में प्रवेश को लेकर मुझे नहीं लगता कि आज के समय में कोई भी समस्या है। आज मंदिरों में सभी हिन्दुओं को सामान रूप से प्रवेश करने का अधिकार है - चाहे वह किसी भी जाति का हो।

हाँ, अपवाद स्वरुप कहीं पर यह समस्या यदि है तो नहीं कहा जा सकता।
असली समस्या है दलितों का धार्मिक कर्मकांड में जुड़ाव न होना। उन्हें मंदिरो का पुजारी नियुक्त करना होगा, उन्हें यज्ञ, हवन, पूजन इत्यादि करने का प्रशिक्षण देना होगा और अपने घरों में दलित पुजारी से हवन, पूजन करने के लिए

खुले मन से उन्हें आमंत्रित करना होगा। वैसे इसकी शुरुवात हो चुकी है और कई मंदिरों में दलित पुजारी नियुक्त हो रहे हैं। वीएचपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनो ने आगे आकर इस दिशा में काफी प्रयास किये हैं।

अभी पिछले दिनों वीएचपी ने ५००० से ज्यादा दलितों को पुजारी के रूप में प्रशिक्षण कराया है। अग्निवीर जैसे कुछ संगठन भी इसके लिए बहुत प्रयास कर रहे हैं। हमारे धर्माचार्यों और संतों को इसके लिए और जोर से आवाज़ उठानी होगी और कार्य करना होगा।

यह दो कार्य यदि हो गए तो जातिगत भेदभाव का दंश हिन्दू समाज से अगले दो दशकों में आसानी से मिटाया जा सकता है।

लेकिन इस कार्य में जो सबसे बड़ी बाधा है, वो है – धर्मान्तरण। हिन्दू धर्म का त्याग कर इस्लाम या क्रिस्चियन कल्ट अपनाने वाले दलितों का यह नहीं पता कि जिस दंश से पीछा छुड़ाने के लिए उन्होंने यह कार्य किया है, वह दंश पहले से भी ज्यादा खतरनाक तरीके से धर्मान्तरण के बाद उनको डंसता है।

धर्मान्तरण के बाद दलित कि हिन्दू पहचान तो मिट जाती है परन्तु उसकी दलित पहचान बनी रहती है। फ़र्क़ केवल इतना है कि हिन्दू दलित से वह मुस्लिम या क्रिस्चियन दलित हो जाता है। यदि हिन्दू धर्म में वो अपने आप का दोयम दर्ज़े का समझता था तो नए संप्रदाय में वह एक दर्ज़ा और नीचे चला जाता है।

अव्वल तो उसे असली मुस्लिम या क्रिस्चियन नहीं माना जाता, दूसरा उसकी दलित पहचान जस कि तस बनी रहती है और वहां पहले से भी ज्यादा भेदभाव का सामना करना पड़ता है।

इसलिए यदि जातिगत भेदभाव मिटाना है तो दलितों और आदिवासियों के धर्मान्तरण पर पूर्णतः रोक लगानी होगी।

दलितों का सामाजिक उत्थान उनके हिन्दू बने रहने में ही संभव है। धर्मान्तरण न केवल उनकी हिन्दू पहचान को मिटा देता है बल्कि उसके सामाजिक उत्थान का रास्ता हमेशा के लिए बंद कर देता है। इसको रोकने के लिए सरकार और हिन्दू समाज दोनों को सामान रूप से प्रयास करने होंगे।

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