बलात्कार की दो अलग घटनाओं की तुलना करना सही नहीं है, पर फिर भी दो अलग सरकारों ने निर्भया और हाथरस की घटनाओं को किस तरह संभाला ये देखना चाहिए। निर्भया को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती किया गया था। सरकार में बैठी सोनिया गांधी पीड़िता के परिवार से वहा मिलने आई थी।
जगह जगह आंदोलन हुए, सोनिया गांधी आंदोलन करने वालो से मिलने आईं। सरकार ने निर्भया को सिंगापुर भेजा। शांत कहे जाने वाले प्रधानमंत्री और कांग्रेस की अध्यक्ष एयरपोर्ट पर निर्भया के मृत शरीर को लेने आए।
दिल्ली पुलिस ने तेज़ी से छानबीन कर एक उलझे हुए कैसे में आरोपियों को हिरासत में लिया। बलात्कार पर एक नया कानून बना। वहीं कानून जिसके बारे में अभी के ADG, Uttar Pradesh को शायद ही कुछ पता है।
निर्भया के परिवार ने किसी भी सरकारी दबाव या धमकी की पुष्टि नहीं की। वे अपनी बेटी को आखरी बार घर लेकर गए और उसका अंतिम संस्कार किया। अंतिम संस्कार में दिल्ली के मुख्यमंत्री और MoS Home के साथ साथ तब विपक्ष में बैठी पार्टी बीजेपी के अध्यक्ष भी आए।
जो हाथरस में हुआ वो हम सब देख सकते है, क्या CM पीड़ित के परिवार से मिलने आए? लोगो के दबाव पर उन्होंने परिवार वालो से वीडियो call पर बात की। पीड़ित के पिता को वीडियो में धमकी देते हुए दिखाई दे रहे DM पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं हुई?
आखिर बार अपनी बेटी का हल्दी लगाकर अंतिम संस्कार करने के लिए एक मां को पुलिस से भीक क्यों मांगनी पड़ी? पुलिस ने पीड़ित का बिना परिवार की अनुमति के जल्दी में अंतिम संस्कार क्यों किया?
पीड़ित की भाभी वीडियो में DM की कार के पीछे भागती हुई दिखाई दे रही है, उन्होंने DM पर उन्हें धमकाने का आरोप लगाया है। क्यूं परिवार को ऐसा लगता है कि उनकी जान अब खतरे में है? क्यूं लोगो को परिवार से मिलने नहीं दिया जा रहा?
पीड़िता के मरते वक़्त खुद बयान देने पर भी की उसके साथ बलात्कार हुआ है, पुलिस ये प्रेस कॉन्फ्रेंस में केह रही है कि बलात्कार नहीं हुआ क्योंकि semen नहीं है? बलात्कार के कानून के अनुसार रेप semen से नहीं बल्कि penetration से पता चलता है।
क्यूं UP सरकार ने एक PR एजेंसी को ये काम दिया है कि वो सबसे कहे की ये रेप नहीं है? सवाल पूछने वालो को FIR की धमकी क्यों दी जा रही है? इस तरह केस की मैनेजमेंट पहले तो कभी नहीं देखी गई, क्यों देश शोक नहीं मना सकता?
पत्रकार के तौर पर हमारा ये काम है कि हम सरकार से सवाल पूछे। ऐसा क्या बदल गया है निर्भया के वक़्त से की हमें सवाल ना पूछने की धमकी दी जा रही है? सवाल जनता के हित में है, इसलिए नहीं कि वो किसी सरकार को नुक़सान पहुंचा सके।
बलात्कार एक दर्दनाक घटना है। अपनी बेटी को आखरी बार ना मिलने देने से लेकर उन्हें धमकाने तक जिस मानसिक पीड़ा से ये परिवार गुजर रहा है वो हम सबको बहुत दुख पहुंचाता है। अगर एक नागरिक और पत्रकार के तौर पर आज हम सवाल नहीं करेंगे तो ये हमें complicit बनाता है। अपनी आवाज़ उठाए।
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