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Oct 2, 2020, 22 tweets

थ्रेड: लोकल लैंग्वेज की ट्रेनिंग

नौकरी ज्वाइन करते ही सबसे पहली चीज होती है ट्रेनिंग। पहली ट्रेनिंग शुगर कोटेड कड़वी दवाई की तरह होती है। किसी होटल जैसे ट्रेनिंग सेंटर में हफ्ते-दो हफ्ते के लिए अपने ही जैसे नए लोगों के साथ रहने का मौका मिलता है।

विभिन्न अभिरुचियों और आदतों के हिसाब से नए दोस्त बनते हैं। गंजेड़ियों का अलग ग्रुप, दारूबाजों का अलग, सुटेरियों का अलग। लड़कियों का अलग ग्रुप और उन पर लाइन मरने वालों का अलग। कइयों के दिल टूटते हैं तो कुछ सौभाग्यशालियों को कन्या राशि मिल भी जाती है।

कुलमिला कर कॉलेज वाला माहौल रहता है इसीलिए ट्रेनिंग को नौकरी का हनीमून पीरियड भी कहते हैं। ट्रेनिंग ख़तम होने के बाद कड़वी दवाई यानि पोस्टिंग की शुरुआत होती है।
ट्रेनिंग किसी भी जॉब का सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी हिस्सा होता है। ट्रेनिंग एक सतत प्रक्रिया है।

ट्रेनिंग सिर्फ नौकरी के शुरुआत में नहीं होती बल्कि हर नयी जिम्मेदारी के लिए भी होती है। जब भी कोई नयी तकनीक, कोई नया बदलाव आता है तो ट्रेनिंग होती है। कैश ऑफिसर, ब्रांच मैनेजर, फील्ड ऑफिसर सबके लिए अलग ट्रेनिंग होती है। आर्मी वाले तो साल में नौ महीने ट्रेनिंग ही करते हैं।

वो अलग बात है कि आर्मी की ट्रेनिंग और बैंकों की ट्रेनिंग में जमीन आसमान का अंतर होता है। ट्रेनिंग केवल काम सिखाने के लिए ही नहीं होती। इसके और भी फायदे हैं। व्यक्ति रोज एक ही ऑफिस जा के, एक ही कुर्सी पे बैठ के, एक ही काम कर कर के, एक ही जैसे लोगों के साथ बैठ के बोर हो जाता है।

ट्रेनिंग उस मनहूसियत भरी मशीन जैसी जिंदगी में बहार की तरह आती है। थोड़ा सैर सपाटा हो जाता है, साथ में TA/DA मिलता है वो अलग। नए लोगों से मिलना हो जाता है और कुछ नया सीखने को भी मिलता है। घिसी-पिटी जिंदगी में थोड़ी ताजगी आ जाती है।

पहले के समय में ट्रेनिंग अच्छे से हुआ करती थी। बढ़िया दो-तीन महीने की। लेकिन जब से उदारवाद का दौर आया है ट्रेनिंग सिर्फ एक औपचारिकता रह गयी है। "On The Job Training" के नाम पे पहले दिन से ही ब्रांच में रगड़ाई शुरू हो जाती है।

एक हफ्ते के लिए ओरिएंटेशन प्रोग्राम के तहत HR वाले आके थोड़ा मन बहला देते हैं। बाद में ब्रांच की हालत देख के उन्ही HR वालों पे गुस्सा आने लगता है, कि "छोटी गंगा बोल के गंदे नाले में कुदा दिया"।

नयी जिम्मेदारी के लिए ट्रेनिंग की प्रथा भी समाप्त कर दी गयी है। चट ट्रांसफर, पट रिलीविंग, झट जॉइनिंग। कुछ पूछें तो कहते हैं कि सर्कुलर पढ़ लो सब सीख जाओगे। ट्रेनिंग की कोई जरूरत नहीं। आजकल ट्रेनिंग पे केवल बैक ऑफिसेस वाले जाते हैं।

उनको गप्पें लड़ाने की, कुर्सी तोड़ने की, पॉलिटिक्स करने की ट्रेनिंग चाहिए होती है ना। ब्रांच वाले को तो ट्रेनिंग की कोई जरूरत ही नहीं।

वो तो खाली ब्रांच ऑपरेशन, कस्टमर हैंडलिंग, क्राउड मैनेजमेंट, इंस्पेक्शन, वेरिफिकेशन, कम्प्लाइंस, KYC, कैश मैनेजमेंट, लोन सोर्सिंग, क्रॉस सेलिंग, मेंटेनेंस ही तो करता है।

अगर उसी को ट्रेनिंग पे भेज देंगे तो काम कौन करेगा। ब्रांच चलाने जैसा नीच काम बैक ऑफिसेस में बैठे ऊंची पहुँच वाले लोग थोड़े ही करेंगे। कौन कहता है कि जात पात समाप्त हो गयी है। इन RBO में बैठे इन नए ब्राह्मणों से मिले हैं आप?

यहां तक तो फिर भी ठीक था। जब से कोरोना आया है अलग ही भसड़ मची हुई है। वेबिनार ट्रेनिंग की। अब चूंकि ट्रेनिंग ऑनलाइन होनी है, इसलिए किसी को कहीं जाना नहीं। अब सारी ट्रेनिंग ब्रांच वालों को ही कराई जाएंगी।

रोज सुबह-सुबह फोन आ जाएगा,
"सर आज शाम चार बजे टीम्स पे लॉगिन कर लेना, रूरल बैंकिंग का वेबिनार है, मेल पे इनविटेशन भेज दिया है।"
और मजे की बात ये है कि रूरल बैंकिंग पे वेबिनार देने वाला खुद मेट्रो सिटी में बैठा है, जिसने कभी रूरल ब्रांच की शकल भी नहीं देखी।

RBO वालों को कोई लेना देना नहीं कि शाम को चार बजे ब्रांच मैनेजर क्या कर रहा है या ब्रांच में कितनी भीड़ है। अब तो बकरी पालने से लेकर कुत्ता खरीदने के लिए लोन देने के लिए भी ट्रेनिंग मिलेगी।

पिछले हफ्ते दो वेबिनार करने के बाद तीसरे वेबिनार के लिए जब फोन आया तो मेरा धैर्य जवाब दे गया।
"मैडम, ये बता दीजिये कि मैं कस्टमर अटेंड करूँ या ये वेबिनार अटेंड करूँ?"
"सर, इसीलिए तो शाम को चार बजे का प्रोग्राम रखा गया है, ताकि कस्टमर को कोई दिक्कत नहीं हो।"

"और जो कस्टमर आलरेडी ब्रांच के अंदर आ गया है, जो कस्टमर मेरे सामने बैठा है, जो कस्टमर एक घंटे से मेरे फ्री होने का इंतज़ार कर रहा है, उसको क्या बोलूं? कि DGM साहब की ईगो पैम्परिंग का टाइम हो गया है, आप भाड़ में जाइये??"

"सर, आप बस ज्वाइन कर लीजिये, माइक और कैमरा ऑफ कर लीजिये, टीम्स को मिनीमाइज कर दीजिये, फिर चाहे तो अपना काम कीजिये, अटैंडेंस लग जायेगी और आपका काम भी नहीं रुकेगा। सर आप तो जानते हैं ये बड़े अफसर किसी की नहीं सुनते, इनको केवल अटेंडेंस से मतलब है।"

एक तो कन्या राशि, ऊपर से बात भी सही बोल रही है। मैं भी नरम पड़ गया।
अभी आज ताईजी का फरमान सुना। बैंक स्टाफ को स्थानीय भाषा का ज्ञान होना चाहिए। घरों से 3000 किलोमीटर दूर पड़े हुए कई लोगों की बरसों से मन में दबी होम पोस्टिंग की उम्मीद दोबारा जाग उठी।

But I seriously doubt that. मुझे पूरी उम्मीद है की एक दो हफ्ते में एक और वेब ट्रेनिंग का फरमान आता ही होगा। जिसमें वही शाम को चार बजे लोकल लैंग्वेज की ट्रेनिंग दी जायेगी। केवल अटेंडेंस काउंट की जायेगी। ब्रांच मैनेजर बेचारा आँख कान मुंह बंद करके अपना काम करता रहेगा।

क्यूंकि कंप्यूटर में वीडियो चला के, स्पीकर ऑन करके अगर उसने ट्रेनिंग करी, तो कोई ना कोई कस्टमर उधम मचा देगा कि BM तो बैठ के कंप्यूटर पे वीडियो देख रहा है। उधर उच्चाधिकारी ढोल पीट देंगे कि ताईजी के आदेश का पालन करते हुए हर ब्रांच के हर कर्मचारी को लोकल लैंग्वेज सिखा दी गयी है।

ना किसी को कोई डेप्युटेशन पे लगाना पड़ा, ना कोई TA/DA का खर्चा। ट्रेनिंग देने वाला भी मजे में, क्यूंकि सवाल तो कोई कुछ पूछ पायेगा नहीं। मतलब हींग लगे ना फिटकरी, रंग भी चोखा आये।

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