𝐌𝐚𝐫𝐲𝐚𝐦 𝐋𝐢𝐲𝐚𝐪𝐮𝐞𝐭 𝐇𝐮𝐬𝐬𝐚𝐢𝐧 Profile picture
•••𝐈 𝐚𝐦 𝐚 𝐬𝐢𝐥𝐞𝐧𝐭 𝐩𝐞𝐧, 𝐌𝐲 𝐬𝐢𝐥𝐞𝐧𝐜𝐞 𝐢𝐬 𝐚 𝐫𝐞𝐯𝐨𝐥𝐮𝐭𝐢𝐨𝐧•••

Aug 10, 2021, 17 tweets

आखिरी पोस्ट है ये मेरी जिन्हें एक साथ पूरी पोस्ट पढ़नी हो तो मुझे Dm कर के माग सकते है कोई हर्ज नहीं है।।

👉 ऐसी 5,6 लड़कियां सोशल मीडिया के ज़रिए मेरे रबिते में आईं जिनको मैं महीनों मेहनत करने के बाद कुफ़्र और शिर्क के चंगुल से निकालने में कामयाब हो पाई लेकिन मैंने उन__/ 1/16

सब के अंदर गुमराही की कुछ बातें एक सी देखीं जो इस तरह से थीं।

👉1- वो तमाम लड़कियाँ मुस्लिम लड़को की ग़ैर मुस्लिम लड़कियों से शादी से मुतास्सिर थीं और उनको ग़लत से रोकने पर उनका पहला जवाब ये ही थी कि ऐसा लड़के भी तो करते हैं उनको क्यो नहीं रोकते यानी उनको सामने से ये बहुत

अच्छे से समझाया गया था कि जब लड़के ऐसा कर सकते हैं तो तुम क्यों नहीं।

👉2- तमाम लड़कियां पढ़ी लिखी थीं जो या तो प्राइवेट जॉब में थीं या स्टूडेंट थीं और अपनी मर्ज़ी की ऐश और मज़े की ज़िंदगी जीने की ख्वाहिशमंद थीं यानी उनके लिए दुनिया की ऐश ही हासिले ज़िन्दगी था।

👉3- तमाम लड़कियां ग़ैर इस्लामी मुआशरे के असर में थीं और उनका मानना था कि सभी मज़हब एक जैसे होते हैं किसी को भी अपनाना बुरा नहीं है जो उनको अपने जाल में फंसाने वालों ने बहुत मज़बूती से समझाया हुआ था।

👉4- तमाम लड़कियों का मानना था कि मुहब्बत का कोई मज़हब नहीं होता वो किसी से

भी हो सकती है ये बात और है कि वो मुहब्बत और हरामकारी का फ़र्क़ नहीं जानती थीं।

👉5- उन तमाम लड़कियों के ख़्वाब फिल्मों की तरह एक दिन सब अच्छा हो जाने के थे और उनको मौत व आख़िरत की ज़रा भी परवाह नहीं थी यानी उनके ज़हनों पर सिनेमा हावी थी।

👉6- कुछ लड़कियां नमाज़ भी पढ़ती थी और उनका मानना था कि उनका साथी ग़ैर इस्लामी है तो क्या हुआ वो अपना मज़हब माने हम अपना मानेंगे, यानी जैसे कोई एहराम पहन कर किसी शराबख़ाने के चक्कर लगाए और कहे कि उसने हज कर लिया, मतलब ये निकला के उनको नमाज़ तो आती थी मगर नमाज़ क्यों पढ़ते हैं

इसकी वजह का ज़रा भी इल्म नहीं थी।

👉7- उनको हराम/ हलाल मौत और आख़िरत, गुनाह और नेकी का इल्म तो थी लेकिन उनके अंजाम का ख़ौफ़ बिल्कुल नहीं थी यानी उनका मज़हबी अक़ीदा इतना कमजोर थी कि उनको लगती थी कि जो भी कुछ है वो दुनिया में ही है मरने के बाद का किसने देखा है।

👉8- तमाम लड़कियों को मुसलमानों पर ज़ुल्म और ज़्यादती से कोई मतलब नहीं थी और उनकी नज़र में सब एक से नहीं थे यानी ताक़त दौलत और ज़ुल्म की तरफ़ माइल थीं।

👉9- कुछ लड़कियों की माँ या बहन को उनके हर अमल का इल्म था लेकिन उन्होंने उनको कभी रोकने की कोशिश नहीं की थी।

👉 और आख़िर में इन तमाम बातों का लब्बोलुआब ये निकलती है कि आज हमारी क़ौम का पहला मदरसा यानी माँओं का आँचल दीनी इल्म और फिक्र से ख़ाली हो चुकी है और दुनियावी ख़्वाहिशों से भरी हुई है, और इसकी सुबूत ये है कि इस वक़्त मुस्लिम मर्दों में मची हुई इतनी हाय तौबा और बुलंद होती आवाज़ों

के बीच भी आपको कोई मुझ जैसी आम मुस्लिम लड़की या औरत इस मसले पर आवाज़ बुलंद करती हुई दिखाई नहीं देगी। 😢

साथ ही इन साजिशों का असर लड़के और लड़कियों पर अलग अलग है यानी कोई बहुत गुनाहगार लड़का ग़ैर मज़हबी लड़कियों से बहुत से गुनाह तो कर सकता है मगर अपने ईमान को तर्क करने की शर्त

को वो कभी नहीं मानता जिस से साबित होती है कि हमारे मुआशरे की औरतों और लड़कियों तक ईमान की पहुंच इतनी कमज़ोर है कि वो नमाज़ रोज़े को मुस्लिम होने की एक रस्म के तौर पर निभा रही हैं।

आज के नौजवानों तक हर बुरा इल्म मोबाइल के ज़रिए उनके ज़हनों तक हर वक़्त पहुंच रही है,

लेकिन सच्चा और पाकीज़ा इल्म किसी भी ज़रिये से उन तक नहीं पहुंच रही है क्योंकि हमें दुनिया कमाने से फ़ुरसत ही नहीं है।

👉 इसलिए अब वक़्त आ गया है कि मुसलमानों को अफ़्रीका के जंगलों, अमेरिका के जंज़ीरों और यूरोप के पहाड़ों तक दीन पहुंचने की फिक्र छोड़ कर अपने घरों तक दीन

पहुंचाने के काम पर फौरन लग जाना चाहिए और अपनी औलादों को दुनिया में आने की मक़सद, नेकी और बदी में फ़र्क़, नमाज़ों और तिलाबतों का अस्ल मक़सद, दीन और दुनिया की मोहब्बत, इस्लामी तारीख़, मुहब्बत और हरामकारी में फ़र्क़ और मौत के बाद आख़िरत की ज़िंदगी की सच्ची इल्म देने के काम को

ज़िम्मेदारी से अंजाम देने पर लग जानी चाहिए वरना शिर्क और ईमान को बराबर मानने वाले अपने अपने घरों से मुनकिर और मुर्तदों को निकलते हुए देखने को तैयार रहिये।

👉 और अपनी औलादों तक सच्ची दीन पहुंचाने की हर मुमकिन कोशिश करने के साथ ग़ैर मुस्लिम लड़कियों से होने वाली ऐसी शादियों की

मुख़ालिफ़त करनी चाहिए जिन की बुनियाद इस्लाम से मुतास्सिर होना न हो, बिना दहेज़ और कम ख़र्च की शादियों को आम करना चाहिए, शादी अल्लाह के भरोसे पर सही वक़्त पर करनी चाहिए न कि दुनियाबी ख़्वाहिशों की वजह से बहुत देर से, क्योंकि जब तक आप सच्चा दीन और इल्म अपनी औलादों तक नहीं

पहुंचाएंगे तब तक आप इस दज्जाली दौर में उनको किसी चार दीवारी में क़ैद कर के भी गुमराही से नहीं बचा सकते इसलिए अब हमारे पास सिर्फ़ एक ये ही आख़िरी रास्ता बचा है अपने ईमान के वजूद को बचाये रखने की___/

ख़ुदा हाफ़िज़ ___सय्यद मरयम लियाकत हुसैन
#Stop_Bhagwa_love_trap
#shanghiPremJal

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