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Thread by @seriousfunnyguy: "पिताजी के बनाए घर में कुछ ईंटें दादाजी की भी लगाई हुई हैं गाड़ी मैने खरीदी लेकिन कुछ किश्तें उनके पसीने ने चुकाई हुई हैं मीलों पैदल चलते थे […]"

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पिताजी के बनाए घर में कुछ ईंटें दादाजी की भी लगाई हुई हैं

गाड़ी मैने खरीदी लेकिन कुछ किश्तें उनके पसीने ने चुकाई हुई हैं

मीलों पैदल चलते थे तांगे का एक आना बचाने को

प्यास रोके रखते थे, दादी और बच्चों को कुछ दिलाने को

कैसे भूल जाऊं, इस समृद्धि की नींव उन्हीं की बनाई हुई है।
मेरी लोरी से जो झट से सो जाती है बिटिया
इसमें स्नेह का स्पर्श और धुन दादी की सजाई हुई है
यूंही नहीं झुका देता सर मंदिर की चौखट पर
घंटों गोद में चुन्नी से सर ढक रामायण दादी ने सुनाई हुई हैं,
उनके चेहरे की झुर्रियों में खुशी दुख पढ़ना,
आज भी कहीं हवाओं में दादी की महक छाई हुई है।
एक दूर के बाबाजी कभी मिलने आते थे
पांव छूने भी न देते थे , पहले गले लगाते थे
मेरे कंघी किए बालों को बिगाड़ते,
चोरी से अठन्नी पकड़ा जाते थे

आज जो बच्चों को चाकलेट में प्यार बंटता फिरता हूँ
बाबाजी की अठन्नियों की सौगात उन चाकलेटों में समाई हुई है
एक बुआ थी मेरी चंचल सी प्यारी
ज़ोर से काट कर हाथ पर घड़ी थी बनाती
मैं दर्द में चीखता, वो ठहाके लगाती
कभी इमली खिलाती कभी झूले झुलाती

उस रोज़ लेटी थी वो आंखों को मूंदे।
सभी रो रहे थे, बुआ सो रही मुस्कुराती
बिलबिला रहा था मैं बेतहाशा,
बस एक बार बुआ से थी वो घड़ी फिर बनवानी।
जहाज पर बैठ दुनिया बहुत हूँ घूमा
पैसे भी कमाए और सुख पूरा लूटा।

एक कमी सी फिर भी कसकती है मन में
खुशी कहांँ है आज जो थी बचपन में

कंधे पर बिठाकर जो रावण दिखाया
उंगली पकड़ चलने से एमबैसडर कार चलाना सिखाया

लाखों से कीमती था वो इम्पोर्टिड पैन
जो पापा ने छटी कक्षा में दिलवाया।
सख्त चांटे फिर घंटों मनाने को लाड वो करती थी
अच्छा क्या है क्या है बुरा, सब वही सिखाया करती थी
किचन की स्लैब पर बिठा, हर पकवान खिलाया करती थी

कल हम चिपकते थे आंचल में आज वो तरसती है समय के लिए
फोन भी तो झटपट रख देता हूं उनका अक्सर।
आज सब छोड़कर कुछ घंटे निकालता हूँ मम्मी के लिए
तीन थे मामा जो प्यार लुटाते
एक ही फिल्म तीनों अलग अलग ले जाते
कभी नानी के परांठे कभी समोसे खिलाते
फिर दुकान पर बिठाकर थे काम भी सिखाते

एक थान से कमीज़ सिलती थी सबकी और एक सी सब पतलून सिलवाते
आज तक समझ नहीं पाया हूँ कि वज़न किससे था बढता
नानी के मक्खन से या जो प्यार वो लुटाते।
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