बचपन की यादों में बसे लोग बरबस कब क्यूं याद आ जाते हैं इसका कोई लॉजिक नहीं होता है। नाना जी के दोस्त थे वो और नाना के साथ उनको होश संभालते ही देखा था और आज भी लिखते वक़्त उनकी शक्ल सामने है।
वो राय बहादुरों वाली सफेद पगड़ी और उस पर चुन्नट वाली सुनहरी कलगी और पगड़ी पर बना हुआ सुनहरे रंग का बॉर्डर। सुर्ख सफेद छल्ले बनाती हुई कड़क मूंछ , एक कान में कुण्डल जैसा कुछ, कत्थई रंग के फ्रेम वाला चश्मा जो कभी आंखों पर नहीं होता था तो उनके सीने से झूला झूलता रहता था।
लाल लाल टमाटर वाले गाल जिनको मै उनकी गोदी में बैठकर सहलाता रहता था और वो नाना जी के शेरों पर दाद दिए जाते थे। बीच बीच में मेरा हाथ पकड़ कर नीचे करते थे , अपने लंबे मेहंदी लगे बालों को कान के पीछे ले जाया करते थे और फिर उर्दू में कुछ बड़बड़ाया करते थे।
कम्बल नाना कहते थे हम उनको और जैसा कि रिवाज़ होता है कि देखा दाखी हमारे और जिज्जी के दोस्त भी उनको कम्बल नाना कहने लगे थे। अम्मा उनको बड़े बाबू कहती थी कारण कि, बाबू वो हमारे नाना को कहती थी।
जमाना वो था कि आप को रिश्ता बना ही लेना है।छोटे चाचा ,बड़े बाबू हुआ करते थे पिता के छोटे बड़े दोस्त और  छोटे मामा ,छोटी मौसी हुआ करती थी अम्मा की तरफ के दोस्त।आपके बाबा सबके बाबा हुआ करते थे और फिर वो मुहल्ले के बाबा बन जाते थे।अंकल आंटी सिर्फ ईसाई दोस्तों के घर में सुना जाता था।
कम्बल नाना, जो मेरे नाना से उम्र में लगभग १०/१२ साल बड़े रहे होंगे,  की कहानी बहुत बाद में नाना ने सुनाई थी।
कम्बल नाना लाहौर के रहने वाले थे और वहां के रईसों में शामिल हुआ करते थे।
रायबहादुर अजमेरी लाल लाहौरी   कहा जाता था उनको जिनकी लाहौर में कुछ नहीं तो आधा दर्जन हवेली और २ दर्जन कें आसपास दुकानें हुआ करती थी।

लाहौर के पल्ले वाले छोर पर वो अपने परिवार के साथ रहते थे और बाकी सब जायदाद उन्होंने किराए पर दिया हुआ था।
अजमेर में उनकी पैदाइश हुई थी पर कारोबार के सिलसिले में अपने माँ बाप भाई को वहीं छोड़ कर लाहौर आ बसे थे।

लाहौर से उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे तक का उनका सफर बस वैसा ही था जैसा मोदक गांधी के करते १९४७ में बाकियों का हुआ था।
दंगाइयों की भीड़ से बचाने के लिए अपनी २२ साल की जवान बेटी और एक बहु को अपने हाथों ही शूट किया था उन्होंने। एक १८ साल की बेटी को सरदार बना कर पगड़ी पहना कर और एक लौते बेटे को अंधो वाला काला चश्मा पहन कर भिखारियों वाले कपड़े पहना कर अजमेर पहुंचे थे।
लाहौर से आते वक़्त सरदार बेटी के बदन पर कुर्ता और पजामा था ,बेटे के बदन पर कुछ नहीं और लाला जी के बदन एक पठानी कुर्ता पाजामा और हाथ में एक पुट्ठे का डब्बा। आते वक़्त वो अपनी आंखो में अपनी जलती हुई हवेली और उसके अंदर भस्म हुई बहु बेटी को बसा लाए थे।
"लाला कभी रोता नहीं है और तुम जरा सी बात पर टसुए बहाने लगते हो"

नाना जी का फेवरेट डायलॉग था ये , वो जब भी मुझे, या घर के किसी बच्चे को रोते देखते थे तो बस यही सुना देते थे।
लाला जैसे लोग एक बार ही रोते है , और फिर इतना रो लेते है कि आंसू भी घबरा जाते है। दुनिया का सारा नमक एक बार में बहा कर चले आए थे लाला उणरात लाहौर में तो अब कैसे और रोते।
दिल्ली कैसे आए और फिर अजमेर कैसे पहुंचे वो लंबा किस्सा किसी और रोज़ पर जब वो अजमेर पहुंचे तो वहां हवेली के दरवाज़े को खटखटाने के बाद जिस शख्स ने दरवाज़ा खोला , लाला जी ने "माफ कीजिए " कह कर कदम पीछे लौटा लिए थे।
उस दरवाजे पर खड़ी वो लाल लाल आंखे और चौखाने वाली लूंगी ने कहानी बयान कर दी थी। हफ्ते भर तक लाला जी ढूंढ़ते रहे अपने परिवार को और फिर जब समझ आ गया कि अब कोई नहीं दिखेगा तो वो वहां से भी कूच कर गए।
अजमेर आने से पहले अपनी गृहस्थी में एक चीज और जोड़ी थी लाला जी ने और वो था एक कम्बल। उत्तर पूर्वी भारत की सर्दी , सर्दी नहीं होती वो आपको ऊपर से नीचे तक चीर देने की ताकत रखती है।
रात रात भर वो रद्दी अखबार ढूंढ़ते और फिर उनको एक एक ऊपर एक रख के चिपका कर इतना बड़ा बना लिए कि बेटी उसमे अपने को ढक सके। अपना कुर्ता अपने बेटे को दे चुके थे।

"तू बच कैसे गया उस सर्दी में लाला?" नाना ने एक बार पूछा था
" अबे मास्टर, लाहौरी हूं , घर में १० गाय पाली हुई थी। एक किलो दूध सुबह , एक किलो शाम और आधे किलो मक्खन का रोज़ काम तमाम करेगा तो तू भी बच जाएगा।"
एक हफ्ते बाद दिल्ली के रिफ्यूजी कैंप पहुंचते पहुंचते उनके पास तीन कम्बल हो चुके थे और सर्दी से पहली जंग वो जीत चुके थे। बेटे बेटी को कैंप में छोड़ कर लाला जी काम पर निकल जाते , स्टेशन जाते जहां कुली का काम आसान भी था और अखबार भी ढेर थे।
लाला रात को बैठ कर बेटे बेटी के साथ फिर कम्बल बनाते और गरीबों में बांट देते। सुबह करीब ४ या ५ बजे तक एक कम्बल बन पता था और फिर तीनों सो जाते थे।
सुबह फिर लाला जी स्टेशन पहुंच जाते और काम में लग जाते।ये सिलसिला करीब दो महीने तक चला और लाला जी रोज़ अखबार वाला कम्बल बांटते रहे।
ये कहानी मुझे नाना जी ने कम्बल नाना के उठावनी के दिन सुनाई थी जिस रोज़ नाना वो एक पहला कम्बल उनके बेटे को वापिस करने गए थे। लाला जी ने नाना से मिलने के बाद वो कम्बल गिरवी रख कर कुछ पैसे लिए थे।
नाना कम्बल रखने को तैयार नहीं हुए थे और तब लाला जी ने वो कम्बल वाली कहानी सुनाई थी और कहा था।

"मास्टर आज बस १०० रुपए दे दे कल को इस कम्बल के बदले जो मांगना हो मांग लेना, ये लाहौरी का वादा है "
नाना जी ने कुछ नहीं मांगा था दोस्ती के आलावा पर शर्त के थी कि कम्बल वापिस नहीं मिलेगा।

नाना जी की दोस्ती और लाला जी यानी कम्बल वाले नाना जी की दोस्ती जय वीरू वाली दोस्ती की तरह फेमस थी उस ज़माने में।
हां, तो लाला जी एक दिन जब स्टेशन पहुंचे तो देखा एक अंग्रेजी मेम को लोग घेरे खड़े हैं और वो रो रही है।

सामने खड़ा एक जवान अंग्रेज़ चीख रहा है। उन दिनों हिन्दुस्तानियों की कम हिम्मत होती थी कि अंग्रेजो से सामना करें….
लाला जी को कुछ पल्ले नहीं पड़ा था और वो अपने काम में लगने वाले थे कि हल्ला बड़ने लगा। लाला जी ने नज़र दौड़ाई तो वो अंग्रेज़ अपनी पतलून से बेल्ट निकालने की कोशिश में लगा हुआ था।

लाला जी को समझ आ गया कि क्या होने वाला है और लाला जी ने कहा वहीं से आवाज़ लगाई..

"ओ कंजरा.…."
जब तक लाला जी वहां पहुंचे अंग्रेज़ अपनी बेल्ट उतार चुका था।
लाला जी पहुंचे और शांत हो पूछा,
" व्हाट इज योर प्रॉब्लम मेन"

लाला जी उस ज़माने के पोस्ट ग्रेजुएट थे जब लोग स्लेट की पढ़ाई करके रईस हो गए थे।

अंग्रेज़ ने चौंक कर देखा और चिल्लाया था,
"गो अवे यू ब्लडी इंडियन"
लाला जी कुछ जवाब देते उस से पहले ही बेल्ट वाला हाथ अंग्रेज़ का हवा में उठा पर उसके पहले कि वो बेल्ट अंग्रेज़ औरत के जिस्म पर जा लगती लाला जी का हाथ बेल्ट के सामने आ गया और अपने साथ लाला की चमड़ी उधेड़ के गया।
लाला जी ने पीछे मूड के देखा वो अंग्रेज़ औरत लाला जी के पैरों के पीछे छुपी थर थर कांप रही थी।

तभी उस औरत ने अपनी आंखे ऊपर की और लाला के सामने लाहौर घूम गया।

वो रात, वो हाथ जोड़े भीड़ के सामने हाथ खड़ी उनकी बेटी और बहु ...

लाला जी अपना आपा खो बैठे उस रोज़...
मुड़े लाला जी, साढ़े छह फीट लंबे लाला जी के हाथो में उस अंग्रेज़ की गर्दन थी और अंग्रेज़ के पैर ज़मीन से एक फीट ऊपर।
गौं गौ करके आवाज़ निकाल रहा था वो अंग्रेज़ और हाथ पैर से जैसे जान निकली जा रही थी।
लाला जी ने उस अंग्रेज़ को हवा में उछाल कर पहले तो ज़मीन पर पटका और फिर उस रात की सारी भड़ास उस अंग्रेज़ पर निकाल कर तभी रुके जब आधे दर्जन पुलिस वालो ने जैसे तैसे खींच तान कर लाला जी को रोका।

अंग्रेज़ की शायद कुछ हड्डियां टूटी थी या बची थी ये लाला जी को कुछ पता नहीं चला बाद तक।
लाला जी को जब हवालात में उस रात होश आया तो वो अंग्रेज़ औरत किसी अधेड़ के साथ सींखचो के सामने खड़ी ज़ोर ज़ोर से आवाज़ लगा रही थी।

लाला जी को पुलिस वाले बाहर लेकर आए और उस रात ही लाला जी की जमानत हो गई।
वो औरत, उस अधेड़ अंग्रेज़ की बेटी थी, वो जवान अंग्रेज़ उस बेटी का प्रेमी था जो फुसला कर भगा कर लेकर आया था और अब किसी को बेचने की फिराक में था।

स्टेशन पर अपनी प्रेमिका को छोड़ के जाने की फिराक में ही उस रोज़ हंगामा हुआ था जिसने लाला जी की ज़िंदगी में फिर एक करवट बदल दी थी।
लाला जी की कहानी जब उस अधेड़ ने सुनी तो अपने साथ शहर आने के बारे में पूछा था।
साथ में नौकरी की पेशकश भी से डाली जब मालूम हुआ कि लाला जी पोस्ट ग्रेजुएट हैं।

वो अधेड़ आदमी ,हमारे शहर का आर्मी गुड्स सप्लायर था , शहर का ही नहीं उस कमिश्नरी का भी।
दो दिन बाद लाला जी बच्चो को लेकर ट्रेन में बैठ कर दिल्ली से दूर चले जा रहे थे।

करीब ३०० मील का फासला तय करना था लाला जी को उस शहर में जहां उनको कोई जानने वाला नहीं था।
ना घर था ना ठिकाना था...
नाना जी बताते हैं कि शहर हमारा उन दिनों दो हिस्से में बंटा हुआ था।
शहर और सदर बस...
सदर वाले हिस्से में अंग्रेज़ का गोदाम था जहां के आगे वाले हिस्से में रिहाइश का इंतजाम था अंग्रेज़ के परिवार का।
परिवार के नाम पर कुल जमा दो लोग थे उस अंग्रेज़ के जिसका नाम ऐबट कुछ था।
लाला जी को कहा गया था कि वो उसी बंगले के पीछे वाले हिस्से में एक कमरे में रह सकते हैं अपने परिवार के साथ।

लाला जी जिस रोज़ आए और उस कमरे को देखा तो बेटी और बेटे को कमरे में बिठा कर खुद बाहर आ गए थे।

उसी हिस्से में एक बगीचा भी था जहां एक सिंचाई के लिए पम्प लगा हुआ था।
लाला जी चुपचाप गए ,
पम्प को खोला और उसके नीचे बैठ कर रोते रहे रोते रहे , रोते रहे।
लाला जी जब ये किस्सा नाना जी को सुनाए थे तो नाना जी को गुरुवाणी के कुछ शबद भी बोले थे जो नाना जी को याद थे पर मुझे आज याद नहीं।

लाला जी रोते जाते और शबद बोलते जाते....
लाला जी तब रुके जब पानी तो बंद हो गया पर लाला जी की रोने की आवाज़ आती रही।उनकी बेटी और बेटे भाग कर आए थे और लाला जी को कंधे का सहारा देकर अंदर ले गए थे।

"मास्टर वो कमरे में हम जानवर भी नहीं बांधते थे जो कमरा उस अंग्रेज़ ने हमें रहने को दिया था"

नाना जी ने रुमाल से आंसू पोंछा..
"वो रात लाला जी की पहली और आखरी रात थी उस कमरे में " नाना जी बोले।
लाला जी इस नए शहर आने से पहले अपने दिल्ली वाले कैंप गए थे और सबको बोल कर आए थे।

"मेरा इंतजार करना..
या तो मै लौट के आ जाऊंगा गा फिर तुम सबको इस जंगल से निकाल के के जाऊंगा।"

स्टेशन पर भी यही वादा किया था उन्होंने
लाला जी नौकरी पर दूसरे ही दिन से लग गए।
काम गोदाम के माल के हिसाब किताब का था।
लाला ने ज़िंदगी भर यही किया था और शाम होते होते उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कुराहट आने लगी थी।
शाम को वो स्टेशन के पास चक्कर लगाने गए और वेटिंग रूम वाले से दोस्ती गांठ आए।आते वक़्त वेटिंग रूम वाले के हाथ में पेंसिल से लिख कर गोदाम का पता थमा आए कि कुछ विदेशी "माल" चाहिए हो तो आ जाए वो कभी।

वो रात लाला जी का परिवार बहुत रातों बाद पक्की छत के नीचे सोया था..

वेटिंग रूम में.
हफ्ते भर में लाला जी ने दो काम किए। उस अंग्रेज़ को हिसाब किताब में घपले सामने लाकर अपने बस में किया और अपनी तनख्वाह का आधा हिस्सा एडवांस में मांग लिया।

१००० रुपए का फायदा करा कर १०० रुपए गंवाने को तैयार हो गया था अंग्रेज़।
लाला जी ने २५ रुपए में महीने भर के अंदर स्टेशन के पास वाले ही मैदान में एक छत खड़ी कर चुके थे। २५ रुपए अपने बेटे बेटी को देकर घर का सामान मंगवाया, २५ रुपए एक चावल के कनस्तर में बंद किए और बाकी बचे पच्चीस रुपए लेकर दिल्ली की टिकट कटा ली थी।
सर्दियां अभी भी गई नहीं थी। लोग अभी भी सर्दी के कारण कैंप में दम तोड ही रहे थे। लाला जी बताते हैं कि वो जब दिल्ली कैंप पहुंचे तो बच्चे गोद में चड़ने को मचल रहे थे। आदमी गले लग रहे थे और औरतें बस रो रही थी..

लाला जी रोना भूल चुके थे तब तक।

लाला जी के साथ एक छोटा ट्रक था उस दिन..
कैंप में परिवार बहुत परिवार नहीं थे उन शुरआती दिनों में।
लाला जी ने सबसे पहले औरतों को और बच्चो को कम्बल और शॉल बांटे और आदमियों को सिर्फ टोपी और मफलर दिया।

"मर्द हो तुम सब, ज़रा मजबूत बनो"

संदेश साफ था, अभी इतना ही हो पाया है।
पेट भर के खाना शायद उस हर परिवार ने महीनों बाद खाया था।

"खाते थे और रोते थे सब के सब कर्मजले, मास्टर, पर सब साथ थे मास्टर.. ये भूख सबको दोस्त बना देती हैं ना मास्टर ?"

नाना जी मुंह देखते रह गए थे उस पागल लाला का..
स्टेशन पर दूसरे दिन पूरा कैंप छोड़ने आया था लाला जी को।

"मै जल्दी आऊंगा"
जेब में १५ रुपए अभी भी बचे थे लाला जी के।
लाला जी ने जेब थपथपाई और मुस्कुरा दिए।

लाला जी फिर लौटे अगले हफ्ते पर इस बार वो एक दूसरे कैंप में गए थे..

वहां से भी दुआएं बटोरी और बाकी ५ रुपए लेकर वापिस आगाए।
लाला जी शुरू मै हर हफ्ते आते थे फिर १५ दिन हुआ और फिर एक महीना पर ना उनका आना बंद हुआ और ना कम्बल बांटना।
रिफ्यूजी आते रहते थे दिल्ली ,
लाला जी जाते रहते थे दिल्ली,
रिफ्यूजी परिवार खो कर आते थे,
लाला जी परिवार वापिस करने जाते थे उन अभागों का...

लाला जी को एक मौके की तलाश थी अब..
और वो मौका आया..
नोटिस लगा शहर में कि बेतवा पर पुल बनाया जाएगा और मजदूर चाहिए।

लाला जी रात को अंग्रेज़ के बंगले पहुंचे । वक़्त वो तय किया था जब अंग्रेज़ घर ना हो..
बेटी सिर्फ घर पर थी और उस स्टेशन वाली घटना के बाद अपने बाप से ज़्यादा लाला को मानती थी।
बहुत बार लाला जी के हाथ में पैसे रख चुकी थी बाप से छुपा कर पर लाला जी हर बार उसके सर पर न्योछावर कर के , सर पर हाथ फेर कर चले आते थे।

उस रात गए तो हाथ में वहीं एक पूट्ठे का डब्बा था जो वो लाहौर से बचा कर लाए थे।

दरवाज़ा खोला बेटी ने तो लाला जी को रात को देखकर चौंक गई..

"आप ?
उन दिनों अमूमन पुराने रहने वाले अंग्रेज़ टूटी फूटी हिंदी बोल लिया करते थे और बेटी तो पैदा ही भारत में हुई थी।

"मै अंदर आ सकता हूं बिटिया?"
"प्लीज़ प्लीज़.. बेटी ने दरवाजे से हटते हुए लाला जी को अंदर आने का इशारा किया।
"बेटी कुछ मांगने आया हूं"

बेटी की बड़ी बड़ी आंखों में ढेर सारे सवाल थे।
वो समझ गई और अंदर से अपना पर्स के अाई।

लाला जी मुस्कुराए और डब्बा खोला..
अंदर से वहीं पगड़ी उठा कर रख दी बेटी के पैरों के सामने जिसे वो लाहौर से अपनी जान समझ कर ले कर आए थे।
"वही राय बहादुरों वाली सफेद पगड़ी और उस पर चुन्नट वाली सुनहरी कलगी और पगड़ी पर बना हुआ सुनहरे रंग का बॉर्डर"

वहीं पगड़ी जो उनके सर से कभी नहीं उतरी, आखरी सांस तक।
पगड़ी का रंग उतर गया, सुनहरा रंग काला हो गया , धागे निकल आए पर पगड़ी नहीं बदली थी लाला ने ...
"इस में मेरी जान है बिटिया, पगड़ी को पैरों केंपास रखते हुए बोले थे लाला और बिटिया ने एक दम से पगड़ी उठा कर लाला जी के हाथो में वापिस रख दी थी।

"क्या होना है आपको बौजी"

कहां से सीखी थी वो बाऊजी कहना??

सब कहते थे लाला जी को तो वो भी कहने लगी थी..
लाला जी ने पगड़ी डब्बे में वापिस डाली और गोद में लेकर बैठ गए।
जेब से एक कागज निकाला और बोले,
"तेरे बाउजी ने अपना काम शुरू करना है और उसके लिए तेरे डैडी जी की हेल्प होनी है"

कागज में लिखा था कि मिस्टर ऐबट लाला जी को जानते है और वो मेहनती है और गारंटी लेते हैं..
उस रात बऊजी की अंग्रेज़ बेटी ने आखिर कार अपने अंग्रेज़ बाप को मना ही लिया।
रोई, गिड़गिड़ाई पर आखिर में कागज पर दस्तखत हो ही गए।
लाला जी ने लिखकर दिया कि वो कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिसमें ऐबट पहले से जुटा है।

लाला जी ने वादा किया था.

आखिर तक निभाया भी...
लाला जी ने अगले दिन कागज जमा कराया और कम्पनी की शुरुआत की..

रिफ्यूजी कम्पनी ....

१०० से ऊपर आदमियों की जरुरत थी उस पुल को बनाने में...

लाला जी ने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी है रात और पहुंचे कैंप...
करीब २ महीने बाद शक्ल दिखी थी लाला जी की इस बार..
लोग कुछ नाराज़ थे और कुछ शांत ..
बच्चे तो आए थे पर बहु बेटी को आने नहीं दिया गया था।
लाला जी के कपड़े अब पूरे और बिना सलवटों के होने लगे थे।
"लाला बड़ा आदमी हो गया है तू"
"क्यूं हमारा मज़ाक उड़ाने आया है"

लाला जी ने सबकी सुनी..
"काम करोगे" लाला जी खड़े हुए और उस भीड़ से बोले..

मेहनत का काम है , बहुत मेहनत का काम है यारों..

भूलना होगा कि कहां से आए हो, क्या करते थे कितना कमाते थे , कैसा घर था ।

सब भूलना होगा..
बस भरोसा रखना अपने लाला पर कि इज्जत की रोटी खिलाऊंगा और बहु बेटी पर कोई उंगली नहीं उठाएगा।

सन्नाटा छाया रहा पहले..

किसी की समझ में कुछ नहीं आया।

"क्या काम है लाला जी"

लाला ने काम बताया तो दबी दबी आवाज़ें आने लगी..
"खुद तो पैसे कमा रहा है और हमें मजदूर बना कर रखेगा" कोई बोला

"लाला तेरे जैसे हमारे घर में नौकर थे" ये आवाज़ दूर से अाई थी .. 

सेठ जगतार नाम था उनका जो रावलपिंडी से जान बचा कर आए थे पर ठसक अभी भी नहीं गई थी।
लाला जी मुस्कुराए ,

पास गए और हाथ जोड़ कर बोले,

सेठ जी आप भी हमें रख लीजिए नौकर , हम तैयार है । बताइए क्या काम करना है।

सेठ जी के मुंह पर ताला था अब..

१००० के उपर वाले कैंप में लाला जी १०० लोग नहीं तैयार कर पाए थे उस रोज़।
परिवार के बच्चे जवान बच्चे तैयार थे पर मां बाप नहीं।

लाला जी बड़ी उम्मीद लेकर गए थे। नाउम्मीद होकर लौट आए। 

"मास्टर , कम्पनी जिन के लिए खोली थी वहीं धोका दे गए.." 

लाला जी उस दिन करीब ५० लोगो को राजी कर आए।

काम शुरू होने में अभी तीन महीने थे।
लाला जी हर हफ्ते जाते पर बात नहीं बनती। बनती क्या बिगड़ने ज़्यादा लगी।

सर्दियां जाने लगी थी ,कम्बल को लोग भूलने लगे थे। भूलने लगे थे उस आदमी को जो लोगों को उनकी जड़ों से फिर जोड़ना चाहता था।
तभी एक रोज़ जब लाला अपने टीन के शेड वाली रिफ्यूजी कम्पनी में  थे तभी एक साइकिल आ के रुकी थी। लाला जी उस समय कपड़ा लेकर "रिफ्यूजी कम्पनी" का बोर्ड साफ कर कर रहे थे।

"भैया, मालिक साहब कहां है तुम्हारे"
लाला जी ने मुड़कर देखा, सलेटी रंग की पेंट जिसके पौंचे को नीचे से मोड़ कर एक गोल रिंग में फंसाया गया था जिस से वो साइकिल की चैन में ना फंसे। सफेद कमीज़, पैंट में खुर्सी हुई और एक चमड़े कि बेल्ट कमर से पैंट को थामे हुए। सर में लगा हुआ तेल थोड़ा थोड़ा कानों पर से नीचे आने को आतुर..
उल्टे हाथ से निकली हूं सलीकेवाली मांग बालों की।

लाला जी को ठिठोली सूझी..

"मालिक साहब तो नहीं है पर आपको काम क्या है।"

"भैया, वो आज पता चला कि लाला जी को टाइपिस्ट की जरुरत है तो काम मांगने आया था।"
"अच्छा अच्छा,आओ बैठो। लाला जी आते होंगे।

साइकिल सवार ने साइकिल स्टैंड पर लगाई और माथे पर से पसीना पोंछा और कैरियर से टाइप रायटर उतारा।

सोच सकते हैं आप लोगों की शिद्दत कि अपना टाइप रायटर ही लेकर इंटरव्यू देने चले आए।
"पानी है भैया यहां पीने का ?"

बार बार भैया कहना लाला की आंख में मोती बना कर चला जा रहा था। अजमेर याद आता था, भाई याद आता था। वो लाहौर का पड़ोसी धनी राम याद आता था।

लाला जी ने पानी के साथ बेटी के बने हाथ का लड्डू भी कटोरी में दिया तो टाइप बाबू इस बात को दिल पर ले गए।
"कहां से आए हो भैया ?

" क्या बताएं अब.. लाला की दुखती रग थी"

"समझ गया"..टाइप बाबू ऐसे चेहरे आजकल रोज़ ही देख रहे थे जिनके चेहरे की लाली उनके काले कपड़ों से मैच नहीं करती थी।

"अरे वाह लड्डू तो घर जैसा ही है....

और फिर अचानक शांत हो गए टाइप बाबू"
बात बदलते हुए पूछा, कब आयेंगे मालिक आपके भैया?

आते ही होंगे , आप इंतजार करो जब तक।

"आप क्या करते हो भैया यहां "

"माली, रसोइया, नौकर सब ही हूं" और लाला जी हंसने लगे
बात होने लगी तो टाइप बाबू ने बताया कि टाइप तो उनका ओवर टाइम है , वैसे तो वो नौकरी कुछ और करते हैं। परिवार में ३ लड़के और २ लड़कियां है। तनख़ाह से ढंग से गुजरा होता नहीं तो कहीं भी कोई टाइप का काम होता है तो शाम को जाकर कर देते हैं। अंग्रेज़ी पढ़ लिख लेते हैं ,ड्राफ्टिंग आती है.
टाइप बाबू सेलेक्ट हो चुके थे और उनको पता भी नहीं चला था। मालिक साहब का इंतजार करते करते टाइप बाबू उसके बोर्ड साफ करने वाले माली से दोस्ती गांठ चुके थे।

टाइप बाबू ने जाते समय कसम देकर माली भैया को घर पर खाना खाने के लिए आने के लिए राज़ी कर लिया।
"आज पहला इतवार है तेरी भाभी ने गोश्त बनाया होगा।बच्चों को लेकर आजा शाम को..."

जिस आदमी के घर में महीने में एक बार गोश्त बनाया जाता था , आधा किलो ६ आदमियों के लिए , वो आदमी और तीन बंदो को न्योता देकर आया था खाने का।

लाला जी को उनका खास आदमी मिल गया था..
ये थी टाइप बाबू की लाला जी से पहली मुलाकात।

शाम को जब माली भैया खाने पर गए तो टाइप बाबू के उस एक कमरे में दुनिया की सारी खुशियां थी।

बेटा था, बेटी थी, बीबी थी, घर था , परिवार था, हंसी थी..

सब साथ थे...

कोई किसी से बिछड़ा नहीं था..

कोई किसी का इंतजार नहीं कर रहा था..
टाइप बाबू को एक लिफाफा थमाया लाला जी ने जिसे खोल कर देखा तो समझ नहीं आया।
महीने में जितना टाइप बाबू कमाते थे उस से २ गुना तनख्वाह दी गई थी पर शर्त एक थी कि फुल टाइम बैठना पड़ेगा। टाइप बाबू की समझ कुछ नहीं आया कि लाला जी मिले नहीं,बात हुई नहीं, इंटरव्यू हुआ नहीं तो ये सब क्या है।
आखिर लाला जी ने भेद खोल दिया..
टाइप बाबू ,चुपचाप देखते रहे लाला जी को..
"मज़ाक उड़ाने आए हो लाला ?"
लाला जी को लगा कि मज़ाक ज़्यादा लंबा हो गया है।हाथ जोड़ कर बोले, 
टाइप बाबू, नमक खा लिया है तेरे घर का तो बुरा तो सोचूंगा नहीं तेरा पर अगर बुरा लगा हैतो हाथ जोड़ कर माफी मांगता हू।
टाइप बाबू पहले तो ज़रा भी नहीं पसीजे पर वो भी लाला जी थे.. 

टाइप बाबू माने भी, नौकरी करने को भी तैयार हुए और ये वादा भी कर ही दिए कि आज के बाद वो ऐसे कहीं और पार्ट टाइम काम नहीं करेंगे।
तय हुआ कि जो भी काम होगा , लाला जी किसी के हाथों घर पहुंचवा दिया करेंगे और काम होने के बाद टाइप बाबू खुद कागज लेकर जाएंगे और अपनी फीस उसी समय लेकर जाएंगे।

और इस तरह रिफ्यूजी कम्पनी में पहले आदमी की भर्ती हुई। वो लाला जी का अकाउंटेट था, क्लर्क था और सेक्रेट्री भी।
उसका नाम था मास्टर दुर्गा प्रसाद....

जो एक सरकारी स्कूल में मास्टर थे और ओवर टाइम के लिए टाइपिस्ट का काम करते थे।

दुर्गा प्रसाद यानी कि मेरे नाना श्री...
लाला जी ने नाना जी से तीसरे रोज़ ही बता दिया कि ये कम्पनी क्यों खोली है और वो क्या करना चाहते हैं।काम शुरू करने के लिए पैसे चाहिए थे और वो लाला जी पर थे नहीं। आदमी चाहिए थे पर वो थे नहीं।लाला जी ने सोचा था कि आदमी हैं दिखा कर बड़े बाबू से कुछ एडवांस मिल जाएगा और का शुरू हो जाएगा।
लाला जी जितना बचाए थे पिछले छह महीने में वो सब दिल्ली के रिफ्यूजी कैंप में पिछली बार बांट आए थे पर वो सब अब पानी में था..

और फिर एक दिन लाला जी अखबार वाला कम्बल लेकर आए थे नाना की के पास कि किसी सेठ से पैसा दिलवा दें , पर फिर बस नाना जी से पैसा लेकर मुस्कुराते गए थे।
नाना जी ने , नानी का मंगलसूत्र गिरवी रख कर ९० रुपए और ५ रुपए मंदिर की गुल्लक तोड कर लाला जी के सामने रख दिए थे।

लाला जी ने १०० मांगे थे...

"लाला जी , बस इतने ही है अभी" 

लाला जी मास्टर साहब का मुंह देख रहे थे कभी पैसों की तरफ..
चिल्लर में आती खुशबू आती देख कर समझ गए थे लाला कि कहां से आए हैं पैसे

और नए नोट देख कर ये भी कि मास्टर खुद कुछ गिरवी रख कर पैसे लाया है।

"आज से जी नहीं, लाला कहा कर मास्टर"

पर लाला , जी,  ही रहे नाना जी के लिए और हमारे लिए कम्बल नाना..
अब पैसे आ गए थे पर आदमी नहीं..

लाला जी को नाना ने सुझाया कि कैंप वालो की सबसे बड़ी कमजोरी कैंप ही है। जब तक वहां से जाएंगे नहीं वो यहां आयेंगे नहीं। और मजदूर कह कर तो बिल्कुल नहीं अयंगे। सबको काम का न्योता मत दो और मुझे जाने दो।

इस बार नाना जी गए लाला जी के साथ।
लाला जी अपने काम में लग गए यानी की कपड़ा मिठाई खाना आदि, पर पुराने  कैंप में नाना ने इस बार कुछ नहीं करने दिया।

लाला जी को आगे अमृतसर भेज दिया कि अभी वहां भी एक जत्था आया है और बहुत परेशानी है।

लाला जी ने अमृतसर की तरफ कदम बढ़ा दिए थे...
नाना जी कुछ देर बाद कैंप ऑफिसर के पास बैठे मूंगफली खा रहे थे।

नाना जी ने सिगरेट जलाई तो कैंप ऑफिसर की बांछे खिल गई। किमाम वाले पान ने रहा सहा काम कर दिया।नाना जी के धुएं के छल्ले जब तक ख़तम होते तब तक कैंप में रहने वालों कि फाइल नाना जी के सामने पड़ी थी।
नाना जी ने ११२ परिवार की पूरी लिस्ट में से ५३ परिवार पर निशान लगाया और ऑफिसर के कान में कुछ कहा। 

सिगरेट की डब्बी मेज पर छोड़ कर नाना जी उठे तो आधा काम हो चुका था। शाम को लाला जी अमृतसर से आकर स्टेशन पर इंतजार कर रहे थे।
तीन दिन बाद ४ आदमी कैंप से शहर आकर उतरे, फिर १२ आदमी , ४ दिन बाद २३ आदमी और १० दिनों में लाला जी की कम्पनी में ४३ लोग शामिल हो चुके थे।

हुआ यूं था कि नाना जी ने जिन परिवारों पर निशान लगाए थे वो सब पहले से सताए हुए थे।मजदूर ही थे या छोटे मोटे किसान।
उनको तोड़ना आसान था। कैंप ऑफिसर की कमिशन नाना जी बांध कर आए थे कि जब भी पहली कमाई होगी उसमे से ५ % ऑफिसर का।

नाना को पता था कि बस एक बार कुछ परिवार बस गए तो फिर आदमियों कि कमी नहीं होनी है।
ऐबट गर्मी के मौसम में लंदन चला जाता था गोदाम बंद करके, जिसकी चाभी वो लाला जी को देकर गया था इस बार। 

पहले आए चार आदमियों ने आने के बाद अगले ६ घंटो में ४ बड़े बड़े तम्बू वहीं खड़े कर दिए जिस मैदान में लाला जी का टप्पर था।
अगले दो दिन में ३ और तम्बू तैयार थे। एक में खाने का इंतजाम और एक दूर वाले में गुसल का इंतजाम। फिलहाल उस कॉलोनी में सिर्फ मर्द थे जिस का नाम दूसरे रोज़ नाना जी खुद कर गए।

शाम को लाला जी लौटे तो देखा उस मैदान के पास एक बोर्ड लगा था,

"रिफ्यूजी कॉलोनी.."
तम्बू का सामान, शुरू में रसद सब ऐबट के गोदाम से आती रही जिसको चुकाने के लिए ३ महीने थे।

ऐबट को सितम्बर में आना था।

पुल का काम शुरू हुआ, २ महीने में ख़तम हुआ, पैसा आया, अब तम्बू में मर्द नहीं थे उनके परिवार साथ थे।

लाला जी शाम को महफ़िल ज़माने लगे थे।
हुक्का कोई गरम कर देता, नाना के साथ शतरंज की बाजी भी लगती और अब नाना के यहां गोश्त हर इतवार को बनने लगा था।

लाला जी पुल बनेने के बाद फिर दिल्ली कैंप गए और इस बार कैंप वाले कुछ साथ लौट कर गए।

इस बार साथ आने को ज़्यादा नहीं कहना पड़ा, वो तो जैसे तैयार ही बैठे थे।
नाना जी ने पैर दबाया और फुसफुसाए

"लाला जी खिलाओगे कहां से ? काम तो कुछ है नहीं" 

लाला जी ने उंगली ऊपर उठाई और बोले,

"काम नहीं तो क्या ,वो तो है" 

रब राखा.....
रब ही रखे हुए था देखा जाए तो लाला जी को।

इतने संयोग तो सिर्फ किस्से कहानी में ही हुआ करते थे जो लाला जी की ज़िंदगी में हुए जा रहे थे। 

सितम्बर में जब ऐबट आया तो लाला जी ने जो जो सामान लिया था उसके गोदाम से उसका हिसाब लेकर पहुंच गए।
ऐबट ने पहले लाला जी को देखा और फिर लिस्ट को और बोला था,

लाला , मेरे को तो पता भी नहीं चलता कि सामान कहां गया है अगर तुम बताता नहीं तो।

लाला जी बोले थे,

उसको तो पता था ना, उंगली ऊपर थी लाला जी की..

फिर रब को रो राख्णा ही था ना...
ऐबट ने पैसे नहीं लिए लाला जी से, भले ही हो अंग्रेज़ पर इंसान भी था और जब जब लाला को देखता था , बेटी की स्टेशन पर रोती हुई शक्ल सामने आ जाती थी।

लाला जी जब लौट रहे थे तो ऐबट बोला,

लाला इस बार बड़ा दिन में हम नहीं रहेगा , हम अब वापिस जाने का टाइम हो गया।
लाला जी को समझ नहीं आया कुछ, वहीं रुक गए ।
"ये गोदाम को तुम ले लो लाला, समझना कि बेटे को से रहा हूं"

लाला जी हक्केबक्के रह गए।नहीं मानना था लाला जी को और ना माने ।दिसंबर में जब ऐबट गया तो साथ में एक स्टाम्प पेपर में भी था कि हर महीने लालाजी, ऐबट को सामान का पैसा चुकाएंगे।
लाला जी शायद आने वाले अगले १० साल तक पूरा पैसा चुकाने के बाद ही माने।

ऐबट ने स्टेशन से ट्रेन छूट ते ही स्टाम्प पेपर फाड़ के खिड़की से बाहर फेंक दिया था।

अगले दस साल तक जो भी पैसा लाला जी भेजते रहे वो पैसा ऐबट वापिस नाना जी को भेजता रहा इस शर्त पर कि लाला को कुछ ना पता हो।
ऐबट ने दुनिया देखी थी, वक़्त बदल रहा था और उसे पता था कि नए व्यापारी अब सामने आयेंगे और लाला जी जैसे ईमानदार आदमी को एक बार चोट लगेगी ही।

बस उसी चोट का इंतजाम ऐबट कर के चला गया।

चोट लगी लाला जी को जब एक रात लाला जी को खबर लगी कि उनका गोदाम आग के हवाले हो गया।
किसने किया या क्या हुआ लाला जी ने जानने कि बहुत कोशिश की पर हासिल कुछ ना हुआ।

नाना एक हफ्ते बाद सारी रकम लाला जी को जब देने आए तो लाला जी उस दिन बहुत बार नाना ने नज़रे चुराते हुए देखा था।
वक़्त बदल रहा था पर एक चीज नहीं बदली थी और वो था लाला जी की दिल्ली यात्रा।
वहां अब सब उन्हें कम्बल लाला कहने लगे थे।
दिल्ली के आसपास वाले इलाके में कहानी कोई रिफ्यूजी परिवार आके बसा हो ,लाला जी वहां पहुंच ही जाते थे।
ये विभाजन की शायद तीसरी सर्दी वाली रात थी जब नाना जी का दरवाजा किसी ने रात को २ बजे खटखटाया था ।
"मास्टर, खबर अाई है कि अमृतसर में एक जत्था उतरा है और बहुत बुरा हाल है उन सभी का। इस बार तू साथ चल"

नाना जी की ना नहीं होनी थी, नहीं हुई, रात को ही दोनों रवाना हो गए।
आर्मी इलाके में रहते रहते लाला जी की दोस्ती यारी काफी आर्मी वालो से हो गई थी और उस रोज़ एक पलटन जो उत्तरी इलाके से पूर्व की ओर जा रही थी , उसके साथ एक शक्तिमान ट्रक में बैठ कर लाला जी और नाना रवाना हो गए अमृतसर के लिए।
सुबह दिल्ली और उसके बाद रात को अमृतसर में जा के रुके सब..
नाना बताते है कि वो मंजर उन्होंने ना सोचा था और देखना चाहा था।
जैसे लिखते हुए मेरे हाथ थर थरा रहे है वैसे ही नाना जी को बोलते हुए झुरझुरी लेते हुए देखा है मैंने।
जत्था अमृतसर मंदिर के पास एक घड़ी वाले टॉवर के नीचे रुका हुआ था।
२ दर्जन के आसपास औरते और करीब उतने ही आदमी होंगे।
फर्क सिर्फ इतना था कि औरतें ज़िंदा थी और मर्द लाश में तब्दील हो कर आए थे। औरतें ज़िंदा नहीं थी असल में बल्कि ज़िंदा लाशें थी।
एक तम्बू में सभी को ठहराया गया था।
किसी की जाने की हिम्मत नहीं थी पर नाना जी और लाला जी गए अंदर....
लाला जी तो मजबूत हो चुके थे पर नाना वहीं दरवाजे पर कपड़ा पकड़ कर बैठे रह गए।
लाला जी ने आंखों पर पट्टा बांध लिया था और नाना ने मुंह फेर लिया था।
जितना नाना देख पाए वो ज़िंदगी भर उनको हौलाता रहा।
दो दो या तें तीन औरतें सिर्फ एक दुपट्टे में अपने को लपेटे एक दूसरे से चिपकी हुई दहाड़े मर के रोती हुई।आदमी नंग धड़ंग पड़े हुए किसी के बदन पर एक कपड़ा नहीं।
औरतों की शक्ल पर नीले,लाल और जाने कितने निशान जो बिना बोले सब बयान कर रहे थे। उनकी आंखों में को दहशत नाना जी ने देखी थी वो..
नहीं लिख पाऊंगा....
सब घूम रहा है आंखो में...

नाना जी तुरंत बाहर आ गए और लाला जी ने एक घंटे में बाज़ार से जाकर , दुकान खुलवा कर कपड़े निकलवाए। डॉ को पकड़ कर लाए और औरतों की मरहम पट्टी करवाई।सुबह अपने सामने सब लाशों का दाह संस्कार कराया और फिर स्वर्ण मंदिर में माथा टेकने चले गए।
इन बारह घंटो में लाला जी किसी से कुछ नहीं बोले , आँख सूनी और लाल से लाल होती हुई।
स्वर्ण मंदिर से लौटे तो नाना बाहर ही इंतजार कर रहे थे।
बोले,
"मास्टर ,दिल्ल्ल ट्यूट्ट गया तेरे लाला का आज"

बहुत दूर से आती हुई आवाज़ थी लाला जी की..
कुछ और भी सुनाई से गया था नाना जी को उस रोज़..
लाला जी ने दूसरे दिन सबको मनाया और साथ लेकर अपने शहर रवाना हो गए। रास्ता थोड़ा खतरनाक था उन दिनों के हिसाब से पर लाला जी ने वो अमृतसर से दिल्ली तक का सफर ट्रैक्टर में खुद आगे बैठ कर अपनी तलवार लहराते हुए किया था।
आवाज़ मेजो दहाड़ थी लाला जी के , आधे तो अपने आप रास्ता छोड़ देते थे
नया टेंट लगा रिफ्यूजी कॉलोनी में एक और उस दिन के बाद ,जबकि कुछ परिवार टेंट से मकान में पहुंच चुके थे।
सुबह लाला जी ने खटिया पकड़ ली थी।
नाना जी आके बैठे पास तो हाथ पकड़ कर मुस्कुराने लगे,

"तुझे पता था ना मास्टर के मेरे जाने का टाइम आ गया?
नाना ने हाथ झटके से छुड़ा लिया था।
लाला जी ऐसे जाने वाले नहीं थे।अभी बहुत कुछ बाकी था। एक रोज़ उन्होंने नाना जी को बुलाया और एक लिस्ट बनाने को कहा जिसके वहां रिफ्यूजी कॉलोनी में रहने वाले परिवारों का लेखा जोखा हो।

कौन पहले क्या करता था और क्या कर सकता है। लाला जी के दिमाग में कुछ चल रहा था।
लिस्ट बनाई गई और उसके बाद सबको बिठा कर समझाया गया।
अब लाला जी के भरोसे नहीं बैठना था किसी को भी। लाला जी ने किसी को परचूनी की दुकान खुलवाई, किसी को जनरल स्टोर, किसी को टेलरिंग की दुकान।
लब्बो लबाव ये कि अब लाला जी हो ना हो उनकी गृहस्थी चलती रहने वाली थी।
लाला जी को शहर में आए हुए भी १५ साल से ऊपर हो चुके थे। रिफ्यूजी कॉलोनी अब टेंट वाली नहीं रह गई थी। लाला जी का काम बहुत शानदार हो चुका था।
रिफ्यूजी बंधुओं का आना रुक सा चुका था पर लाला जी हर सर्दी आते ही निकल पड़ते थे। फर्क इतना कि अब वो अपनी बड़ी वाली कार लेकर निकलते थे।
काम वही था, कम्बल बांटना। रोज़ रात को निकल पड़ते कम्बल भर के किसी भी पास के इलाके में और जो मजबूर दिखता उसको थमा कर चले आते।
महीने में एक बार किसी भी पैसेंजर ट्रेन में का चड़ते और हर स्टेशन पर उतर उतर कर गरीबों को कम्बल बांट कर चले आते।

नाना जी ने एक बार पूछा बताते है...
लाला जी आप कम्बल की जगह कुछ पैसे ,खाना क्यों नहीं देते ?

लाला जी ठहाका लगा कर बोले थे,
मास्टर, वो जब ठंड में हड्डी कड़कड़ाती है तो ना भूख लगती है और ना नोट दिखते हैं।

तू नहीं समझेगा..

नाना जी सब समझते थे, तभी तो आखरी दम तक लाला जी का अखबार वाला कम्बल अपने पास सहेजे रहे.
सन ७५ में, मैं पहली बार कार में बैठा था और वो भी इंपाला , लाला जी की कार थी।
मुझे याद है मैंने बहुत मुश्किल से वो कम्बल उठाया था और जाके एक बूढ़ी औरत को ओढ़ा दिया था और खड़ा हो गया था।

लाला जी ने पूछा था कि की होता पुत्तर ?
मैंने पूछा था कि इसके पैसे ????
लाला जी बहुत हंसे थे।
उस दिन का भी याद है और बस के दिनों का भी कि लाला जी जब हंसते थे तो उनकी मूंछें हिलती थी और आपस में मिल जा ती थी।
गाल इतने मोटे कि आंखें बंद हो जाती थी हंसते हुए।

लाला जी हंसते हुए बोले थे ,
"पैसे वहां जमा हो गए पुत्तर.."

उंगली फिर ऊपर की ओर उठी हुई थी
और फिर एक दिन लाला जी मंदिर गए और वहां से लौट कर आए ही नहीं।
लाला जी की वसियत नाना जी के पास थी।
लाला जी का आदेश था कि दाह संस्कार से पहले खोलेगा मास्टर तू उसे..

खोली मास्टर , टाइपिस्ट दुर्गा प्रसाद ने वो वसीयत..
"मास्टर, शहर के बाहर किसी को खबर नहीं करना मेरे जाने की फिलहाल।
गोदाम तेरे नाम कर के जा रहा हूं जिससे तू जब तक ज़िंदा रहे कम्बल और लाला का साथ रहे।
बाकी सब जायदाद हिस्सों में बंटा हुए था।
नाना जी ने ना गोदाम लेना था और ना लिया। बेटी बेटे और पोते नतियों ने बहुत ज़िद की नाना से पर नाना नहीं माने।

लाला के जाने के बाद अब नाना जी की ड्यूटी लगा गई थी कम्बल बांटने की।

करीब सन८३ तक मै नाना जी के साथ जाता रहा। स्टेशन, बस अड्डे , अस्पताल, अनाथालय ..
वो जो जुनून नाना जी आंखों में दिखता था उस बुढापे में वो फिर से दिखा मुझे इन दो शख्सों में।

साथ तो में @sssingh21 और @seriousfunnyguy के साथ करीब साल भर से हूं पर ये कम्बल वाली कहानी की याद इन्हीं दो बे मिसाल इंसानों की वजह से आप तक पहुंची।
क्या हासिल होगा इन दोनों को या इन जैसे कुछ और लोग जो जुड़ते का रहे हैं।
@samirkapoor1971 भी जुड़ गए और बन गए कम्बल वाले नाना 🤗।
मैंने तो जुड़ना ही था सो जुड़ चुका हूं।
जैसे लाला जी नाना से वादालेकर गए थे वैसे ही मेरे नाना जी मुझ से वादा लेकर गए थे।
मुसीबत ये है कि पिछले १५ सालों से इस इलाके में हूं वहां सर्दी नहीं पड़ती तो जनवरी दिसंबर में आता हूं और बन जाता हूं कम्बल वाला नाना मै भी। पर अब शायद मेरे हाथ अकेले नहीं और आप सब साथ हैं।
वो जो ठिठुरते हुए हाथ जब आप कभी छू कर देखेंगे और फिर उन आंखों को देखेंगे तो आप अपने को रोक नहीं पाएंगे।
@humanaidint और @sssingh21 जी की टीम से जुड़ना शायद लाला जी का आशीर्वाद ही था मेरे लिए।

बाकी तो वो है ही ना .....

लाला जी की उंगली याद आई आपको ????
🤗🤗🤗😋😋
Missing some Tweet in this thread?
You can try to force a refresh.

Like this thread? Get email updates or save it to PDF!

Subscribe to नाम में क्या रखा है🇮🇳
Profile picture

Get real-time email alerts when new unrolls are available from this author!

This content may be removed anytime!

Twitter may remove this content at anytime, convert it as a PDF, save and print for later use!

Try unrolling a thread yourself!

how to unroll video

1) Follow Thread Reader App on Twitter so you can easily mention us!

2) Go to a Twitter thread (series of Tweets by the same owner) and mention us with a keyword "unroll" @threadreaderapp unroll

You can practice here first or read more on our help page!

Did Thread Reader help you today?

Support us! We are indie developers!


This site is made by just three indie developers on a laptop doing marketing, support and development! Read more about the story.

Become a Premium Member and get exclusive features!

Premium member ($30.00/year)

Too expensive? Make a small donation by buying us coffee ($5) or help with server cost ($10)

Donate via Paypal Become our Patreon

Thank you for your support!