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saket suryesh 🇮🇳 @saket71
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एक छोटी सी कहानी- इमर्जेंसी का दु:स्वप्न।

नायक खिन्न था। आज शाम को नायिका से बहस हो गई। लड़कियों को राजनीति की कुछ समझ है नहीं, बहस करती हैं। ऐसा भी क्या हुआ था जो आज मोदी के अघोषित आपातकाल मे नहीं है। बेचारे पत्रकार आईफ़ोन का उपयोग कर रहे हैं पर बिल का पैसा कहाँ
ग़रीब पत्रकार इस तानाशाही मे ना तो कोठी के लॉन मे बत्ती जला पा रहा है, ना सरकारी ख़र्च पर विदेश जा पा रहा है। इससे बुरी क्या इमर्जेंसी हुई होगी? कल ही एक ट्वीट मोदी विरोध मे किया कि भक्त टूट पड़े। अनकाऊथ इल्लीट्रेट भैया भैया कर के ज्ञान दे रहे थे। दो बार फ**ंग लिखा तब माने।
भक्तों को लगता है मानों इन्हीं के टैक्स से देश चल रहा है और हम इनके पैसों पर शैंपेन पीते हैं। जैसे जीवन की सब समस्या इन्हीं को है जो घर से बाहर नाईट शिफ्ट मे जवानी झोंक कर घर पैसा भेजते है। हमारा जो मोदी ने नर्क बनाया सो क्या। बाप भी अब उतना पैसा नही भेजता कि डीसेंट वैकेशन हो
दृश्य परिवर्तन- नायक प्रेमिका से मिलने जा रहा है। कल की बहस और मर्दाना मूर्खता को परे रख कर प्रेमिका से समझौता करने का प्रयास किया जा रहा है। युवा क़दम कॉफ़ी हाऊस की ओर चल रहे हैं, आशा है प्रेम राजनैतिक बहस को दरकिनार कर दे और फ़ैज़ के शब्दों मे हर इक चीज़ वही हो कि जो है।
समय बीतता जाता है, नायिका को वैचारिक वैमनस्य बहुत नागवार गुज़रा है। वह आज नहीं आई, कल भी नही आएगी, परसों भी प्रेम ख़ाली सिगरेट की डिब्बियों पर ही लिखा जाएगा, और फेफड़े की धौंकनी का प्रेमविहीन धुआँ निराशा की कथा लिखेगा।
प्रेमी हताश होकर पत्र लिखता है। बुरा हो इस आपातकाल का कि प्रेमी हृदयों मे मतभेद उत्पन्न किया। क्या प्रियतमा सत्य वाचन पर ऐसी रूठेगी कि मिलन की अमावस पर चंद्र कभी उदय ही ना होगा? प्रेमी उद्वेलित हो कर शायरी से सुसज्जित पत्र भेजता है। मेघदूत के स्थान पर सरकारी डाक का स्पीटपोस्ट है
ग़ालिब लिखते थे, ज़िक्र उस परीवश का और फिर बयाँ अपना, बन गया रक़ीब आख़िर जो था राजदाँ अपना। सरकारी राजदाँ जब कुर्सी की पीठ पर सफ़ेद तौलिया बिछा कर राजदाँ बन के नायक का ख़त सेंसर करता है तो रक़ीब नही बनता, सरकारी गवाह बनता है। परीवश का ज़िक्र सरकारी दफ़्तर का लुत्फ़ बढ़ा देता है।
नायिका सेंसर से अनभिज्ञ प्रेम मे पिघल कर मिलन की स्वीकृति देती है। ग्रीष्म ऋतु मे वसंत का भान होता है। सेंसर से अनजान प्रेमी युगल टूट कर मिलते हैं, और कॉफ़ी हाऊस के धुँधले कोने मे फ़िल्टर कॉफ़ी का कप प्रेम का अकेला गवाह बनता है। फ़ैमिली केबिन के भारी पर्दे के बाहर बूटों की आवाज़
घबराया हुआ वेटर आ कर फुसफुसाता है- साहब, आप को ढूँढ रहे हैं। नायक आस्तीनों चढ़ा कर उठता है। चे ग्युावारा के भाव युवा मुख पर आते है। बाहर से ठसक भरी पुलिसिया आवाज़ आती है - साले, मोदी सरकार समझे हैं, गाली भी देंगे और फील्स लाईक इमरजेंसी कह कर कॉन्क्लेव मे कबाब तोड़ेंगे।
प्रेम पत्र मे इमरजेंसी की लिखते हैं। अब वह सरकार है जिसे आपातकाल लगाना और सरकार चलाना बख़ूबी आता है। अँदर कर के तोड़े जाएँगे तो सब राजनीति निकल जाएगी। पिरेमी ह पिरेम करो, भगतसिंह ना बनो।
पीछे से सिपाही का स्वर- प्रेमिका भी गदराई सुंदरी है इसकी फिर भी नेतागीरी। मस्त लिखा ख़त मे!
भला हो राजीव जी के डाक सेंसर का, वरना पैक्टसा, हमारी ज़िन्दगी नीरस हो जानी थी।

एक घिनाई हुई सरकारी हँसी।

प्रेमिका क़समें देती है और पुरुषार्थ को अल्पनिद्रा मे भेजती है। मीसा-२ मे बँद देव की याद दिलाती है, बहन की डोली पड़ोसियों ने उठवाई और उसको दो माह बाद पिता की अर्थी भी!
प्रेमी युगल पीछे को रास्ते से निकलता है। युवक कहता है क्यों ना सिनेमा देखें। सिनेमा घँटे भर का होता है। बनता तो अब भी तीन घँटे का है, सेंसर के बाद, सुरजेवाला जी का सर्टीफिकेट लेने के बाद घँटे डेढ़ घँटे का बचता है। कला का माँस सत्ता ने निचोड़ लिया है, हड्डियाँ बची हैं।
युगल सिनेमा मे घुसता है। स्वप्न लोक बन जाता है। “खेलेगा इक दिन वो, तेरे आँचल में” प्रेमिका प्रेमी को कँधे पर सर रख देती है। भविष्य का भान चेहरों पर मुस्कान बिखेर देता है।
प्रोजेक्टर पर लगी फ़िल्म अचानक अटक जाती है। लाईट ऑन, दरवाज़ों से पुलिस के साथ सरकारी लोग- लाउडस्पीकर
घोषणा- राष्ट्रहित मे नसबँदी कराएँ। युवक भागने का प्रयास करता है, धर लिया जाता है। कसमसाता है, रेडियो के स्थान पर अब एलसीडी का उपहार है नसबँदी पर- अधिकारी बताता है, दो नुमांईदे काग़ज़ पर हस्ता़क्षर करवाते हैं. हँगामे में प्रेमिका भाग कर प्रेमी के पिता के पास पहुँचती है।
“अँकल, उसे सरकारी लोग पकड़ ले गए, नसबंदी विभाग वाले। उसे बचा लीजिए। आपकी तो राजनैतिक पहुँच है। विपक्षी नेता से कहिए।”- साँस टूटती है, आशा नहीं।

बुजुर्ग पिता मुख हाथो मे ढाँप लेता है।
“विपक्ष तो जेल में है।”
“कोर्ट चलिए अँकल”
बेटा, सुप्रीम कोर्ट जज इस्तीफ़ा दे चुके है, जीवन का अधिकार सर्वोपरि नहीं है, संविधान स्थगित है।”

“ आप तो लिखते हैं। अख़बार मे छपवाईए। कुछ तो करें, अँकल”

“सरकार विरोध मे लिखा छाप जेल कौन जाएगा? कोई लाभ नहीं।” पटाक्षेप
साल निकल गया। प्रेमी जेल से निकलता है।
खोया हुआ पौरूष पाँव घसीटता आता है। हर दृष्टि मे एक चिंतित तिरस्कार झाँकता है। पिता वँश का वादा उसके चेहरे में ढूँढते हैं, प्रेमिका आगे बढ़ कर लँगड़ाते बदन को साथ देती है। डेढ़ बरस का टार्चर आत्मा क तोड़ चुका है। नायक मूक घर लौट कर छत पर लगे पँखे को तकता है।
पुराना एसी ख़राब हो गया था पिताजी बता रहे थे। नए ऐसी के लिए लायसेंस की प्रतीक्षा है। दो साल की वेटिंग है, कुछ पैसे ख़र्च कर के, काँग्रेसी विधायक की सिफ़ारिश से एक साल मे मिल जाएगा। युवक बिस्तर के नीचे से पुराने ख़त निकालता है।
“तुम कहते हो तुम्हें मुझ जैसी बेटी चाहिए, मुझे तुम सा नटखट बेटा चाहिए, सूर्य सा प्रखर और जीवन्त।”
बाहर से मुफ़्त मे मिले एलसीडी पर प्रधानमंत्री का संदेश। युवक मुट्ठियों मे ख़त भींच लेता है। पँखे को देखता है, कोने मे टेबल पर रस्सी पड़ी है।”
अकबका कर युवक नींद से उठता है। एसी बहुत ठँडा भान होता है पर शरीर पर उतरा स्वेद धारा पर निष्प्रभाव है। कैलेंडर देखता है, २०१९ है। बाहर बाबूजी समाचार देख रहे हैं। आवाज़ आती है - “मित्रों..”

युवक चैन की साँस लेता है।

- समाप्त- #ModiOnceMore
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