२० साल का हो चुका था और जवानी कूट कूट के भरी हुई थी। जवानी का जो सुरूर होता है वो सबसे पहले आपको विद्रोही बनाता है और आप उसकी आजमाइश घर से करते हैं और उस पर करते है जो कमजोर हो..
घर में मां सबसे कमजोर होती है ऐसा वो ढोंग करती हैं..
हम भी सबसे ज़्यादा अपनी अम्मा को ही सताते थे..
एक्शन का रिएक्शन बहुत दिखाने लगे थे।
पिताजी के सारे एक्शन ,
माशूका के सारे टेंटरम्स,
दोस्तो के इमोशंस..
सबके रिएक्शंस हम जाके अपनी अम्मा को ही दिखाते थे।
कभी कभी तो वो हंस कर सहन कर लेती थी और कभी चुप से जा के चौके में जा के प्याज़ छीलने लगती थी।
ये साला प्याज का नाटक बहुत सालों बाद समझ आया कि ये वही बरसात में रोने जैसा है।
खैर उस रोज़ पिताजी पढ़ाई को लेकर सुबह सुबह कुछ कह दिए।

रात को देर से आए थे आवारागर्दी करके सो पिताजी नाराज़ थे और अम्मा बचा रही थी हमे पर पिताजी ने सोते से उठा कर पूछ लिया था
"ये आवारागर्दी कब जाएगी?"
हमने अम्मा की तरफ देखा जो मायूस सी खड़ी थी फिर पिताजी को देखा जो खाना खा रहे थे।
चप्पल डाली और मोटर साइकिल स्टार्ट कर के ये जा और वो जा..

अम्मा पीछे से आवाज़ लगाती रह गई थी..
बेसन की सब्जी बनाई है..

बेसन के गट्टे वाली सब्जी मुझे लुभाने का उनका सबसे कारगर तरीका होता था शुरू से..
पता हमे भी था कि सुबह सुबह गट्टे की सब्जी बनाना नामुमकिन था क्यूंकि अगर बनती तक सब्जी से पहले गट्टे हमारे सामने होते थे नमक चखने के लिए।

सुबह ९३० बजे निकल कर जा पहुंचे मंदिर,
वहां पड़े रहे दोपहर तक, भूख लगी तो भंडारे से खा लिया था।
मोबाइल फोन तो होते नहीं थे उन दिनों तो कुछ टेंशन नहीं था हमे और अम्मा की तो कदर ही नहीं थी उस रोज़।
पिताजी को खबर होने से पहले लौट आने का प्लान था।

उस उम्र में सारे गुनाहों का ठीकरा अम्मा के सिर ही फोड़ा जाता था..
गलती हमारी भुगतती पर अम्मा थी..
दोपहर में बोरियत होने लगी तो अपने मित्र के घर पहुंच गए करीब ४ बजे। वहां एक घंटे बिताकर जब ५ बजे घर पहुंचे तो घर पर भीड़ जमा थी।
पिताजी आ चुके थे और साथ में डॉ साहब भी।

अम्मा को लकवा मार गया था उस रोज़...

हमारी जुबान पर कुछ ना कहने को था और ना करने को...
थोड़ी देर में चौके में गए पानी पीने तो गैस पर कड़ाही में अध घुंटा बेसन पड़ा था..
सूख चुका था बेसन और वहीं स्लैब पर पड़ी थी बेसन में सनी हुई कलछूल.….

स्लैब के नीचे अम्मा की चूड़ियों के कुछ लाल हरे टुकड़े पड़े थे।

वहीं बैठ गया मै धम्म से...
दौड़ कर आया अम्मा के पास...
अम्मा की आंखों में गुस्सा था , बहुत गुस्सा फिर सीधे हाथ से इशारे से पूछा,

"खाना खा लिया ????"

पता नहीं ये जो अम्माएं होती है इनके लिए ज़िंदगी का सबसे ज़रूरी काम अपनी औलादों को खिलाना ही क्यों होता है ??
पिताजी कमरे से बाहर चले गए थे उस रोज़..
उनका हमारा युद्ध उसी रोज़ शुरू हुआ था जो करीब आने वाले २३ साल चलता रहा...

हम उस रोज़ जो गुस्सा त्यागे , ऐसा त्यागे कि अब किसी से गुस्सा होना आता नहीं।
कभी कभी अपने से हो लेते हैं बस....
२ साल की मेहनत के बाद अम्मा के शरीर में हरकत आनी शुरू हुई थी। उठने लगी, बैठने लगी पर सीधा हिस्सा पूरी तरह काम नहीं कर पाता था। बिना सहारे के खड़ी नहीं हो पाती थी।
चलने में सहारा चाहिए पड़ता था।
दो साल हम अपनी अम्मा की अम्मा बनने की सिर्फ कोशिश करते रहे और असफल होते रहे..
इसी बीच पहली नौकरी भी लग गई थी।
खाने की अय्याशी हम बाप बेटे, दोनों की बंद हो चुकी थी। आधे घंटे में मन मर्ज़ी का खाना अम्मा के वक़्त तैयार होता था और अब कभी २ दिन पुरानी सब्जी फ्रिज वाली , कभी बाज़ार की तंदूरी सूखी रोती सी रोटी से गुजारा करते थे।
अम्मा का रोना शुरू हो जाता था जब वो पिताजी और हमे ऐसे खाना खाते देखती थी।
क्या है कि अम्मा के ठीक होते हुए कभी याद नहीं कि ठंडा खाना या बासी खाना भी मेज पर आया हो।

ऐसा नहीं कि बचता नहीं होगा, पर वो तो अम्मा की प्लेट में जाता था हमेशा से..
एक रोज़ घर आए तो अम्मा अपने कमरे में नहीं थी। घबरा कर काम वाली को आवाज़ लगाई तो चौके से आवाज़ अाई,

"भैया यहां है अम्मा"
घबरा कर हम चौके की तरफ गए तो देखते हैं स्लैब से उठा कर गैस कोने में ज़मीन पर रखी है। गैस पर चढ़ी है कढ़ाही और उस में भून रहा है बेसन और अम्मा के बाएं हाथ में है कल्छूल जिसे वो भरपूर कोशिश के बाद भी नहीं चला पा रही है।
गुस्से में थीं अम्मा उस वक़्त याद है मुझे
अपनी टूटी फूटी ज़ुबान में बोली कि ये लड़की कोई काम की नहीं है । इसे बेसन भूनना नहीं आता है।
हमे समझ नहीं आ रहा था कि हम हंसे या रोए अपनी अम्मा की इस हरकत पर पर फिर हंस दिए और गले से लिपट गए अपनी अम्मा के..
कपड़े बदल कर आए और बैठ गए अम्मा के बगल में। अम्मा को ज़मीन से उठा कर कुर्सी पर बिठाया। गैस स्लैब पर रखी और कल्च्छुल पकड़ी अपने हाथ में..

वो पहला दिन था हमारी कुकिंग क्लास का..
अम्मा बताती गई और हम बनाते गए...
बेसन के गटटे की सब्जी..

जैसे जैसे बोलती गई ,हम सब मसाले डालते गए...
फिर चावल बनाए और सबसे पहले बेसब्री से हमने अपने हाथो से अम्मा को खिलाया।
बाएं हाथ से अंगूठे और तर्जनी को जोड़कर इशारा किया था अम्मा ने..

बहुत शानदार बनी है सब्जी..

फिर वो सब्जी हमने अपनी थाली में परोसी और खाई थी...
उस से घटिया सब्जी हमने आज तक नहीं खाई ज़िंदगी में।
ना नमक का स्वाद, ना धनिए का अतापता,
बेसन कच्चा , तेल पका नहीं पर अम्मा मज़े से खा रही थी।
उनको मेरे हाथ का स्वाद आ रहा था सब्जी में और मै उनके हाथ की खुशबू ढूंढ़ रहा था सब्जी में...

नहीं मिलती अब वो खुशबू..
और ना मिलेगी अब कभी..
खुशनसीब होंगे अगर आज भी आपकी मां आपके साथ हैं।

अगर आप मजबूरी में उनसे दूर हैं तो अभी ट्विटर बंद कीजिए और उनको कॉल लगाइए और कहिए कि उनके हाथ का खाना खाना है फिर देखिए क्या कहती है वो..

और साथ रहती है तो एक झप्पी तो बनती ही हैना...
है ना ?

😍😍😍😍
Missing some Tweet in this thread?
You can try to force a refresh.

Like this thread? Get email updates or save it to PDF!

Subscribe to नाम में क्या रखा है🇮🇳
Profile picture

Get real-time email alerts when new unrolls are available from this author!

This content may be removed anytime!

Twitter may remove this content at anytime, convert it as a PDF, save and print for later use!

Try unrolling a thread yourself!

how to unroll video

1) Follow Thread Reader App on Twitter so you can easily mention us!

2) Go to a Twitter thread (series of Tweets by the same owner) and mention us with a keyword "unroll" @threadreaderapp unroll

You can practice here first or read more on our help page!

Did Thread Reader help you today?

Support us! We are indie developers!


This site is made by just three indie developers on a laptop doing marketing, support and development! Read more about the story.

Become a Premium Member and get exclusive features!

Premium member ($30.00/year)

Too expensive? Make a small donation by buying us coffee ($5) or help with server cost ($10)

Donate via Paypal Become our Patreon

Thank you for your support!