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आर्टिकल 370 के लिए नेहरू गुनहगार हैं तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी हीरो कैसे हैं??

राज्यसभा में गुलाब नबी आजाद को जवाब देते हुए श्री अमित शाह ने कहा, "आर्टिकल 370 कश्मीर को भारत में नहीं मिलाता, क्योंकि ये आर्टिकल 1949 में आया जबकि कश्मीर का भारत में विलय 1947 में हो चुका था।"

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क्या श्री शाह को ये नहीं पता कि संविधान ही 1949 में स्वीकार किया गया?

1947 में कश्मीर के भारत में विलय के बाद भी घाटी में अस्थिरता थी।
अस्थिरता व भारत में कश्मीरियों के विश्वास को देख 1949 में संविधान सभा ने आर्टिकल 370 को अपनाया।

श्री शाह को इतना इतिहास तो साफ होना चाहिये।

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डॉ. अंबेडकर के मना करने के बाद आर्टिकल 370 को गोपालस्वामी अयंगर ने ड्राफ़्ट किया, जो आर्टिकल 370 के सबसे बड़े पैरोकारों में एक थे।

अक्टूबर 1949 में जब आर्टिकल 370 का स्वरूप संविधान सभा में पेश तो सबसे पहले विरोध करने वालों में एक भारतीय कवि व विचारक मौलाना हसरत मोहानी थे।

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श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी उस संविधान सभा के सदस्य थे, लेकिन उन्होंने आर्टिकल 370 का कोई विरोध नहीं किया।

ना इस मुद्दे पर मुखर्जी ने नेहरु सरकार से इस्तीफा ही दिया था।

मुखर्जी ने नेहरू कैबिनेट से इस्तीफा 1950 के "नेहरू-लियाकत पैक्ट" से असहमति के कारण दिया था।

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..ये पैक्ट भारत और पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा की बात करता था।

फिर आखिर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आर्टिकल 370 का 'विरोध कब शुरू' किया??

दरअसल 1949 के सीजफायर के बाद कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्लाह ने एक परिवर्तनकारी कानून बनाया।

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यह कानून था The Big Landed Estate Abolition Act 1950.

भूमि सुधार का परिवर्तनकारी कानून कुछ कम्युनिस्ट राज्यों को छोड़ कहीं देखने को नहीं मिलता।

इस कानून के द्वारा 186 kanals (22 एकड़) से ज्यादा ज़मीन रखने वालों की ज़मीनों को भूमिहीनों और खेतिहर मजदूरों में बांटा जा रहा था।

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इस कानून से 1756 से ही अफ़ग़ान, सिख व डोगरा शासकों द्वारा शोषित कमजोर वर्गों में काफी उत्साह था,

लेकिन वर्तमान के डोगरा शासकों, ज़मींदारों और भूस्वामियों ने शेख के इस क्रांतिकारी कदम का विरोध किया।

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राजा हरि सिंह से मिलकर राष्ट्रीय जनसंघ, हिन्दू महासभा की कश्मीर इकाई, प्रजा परिषद व मुस्लिम साम्प्रदायिक दलों ने भूसुधार के इस आंदोलन का विरोध किया।

कश्मीर राज्य हिंदू सभा ने तो 1947 में मुस्लिम सांप्रदायिक दलों के साथ राजा हरि सिंह के उस प्रस्ताव का समर्थन भी किया जिसमें..

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..कश्मीर को स्वतन्त्र रखने की बात थी।

बाद में माहौल बदलता देख वो कश्मीर के भारत में विलय के समर्थन में आये।

अपनी पार्टी के 1944 के "सोपोर अधिवेशन" के सिद्धांत अपनाते शेख अब्दुल्लाह ने जो भूमिसुधार कानून बनाया-ज़मींदारों को बिना मुआवजा दिए उनकी ज़मीन कमजोरों में बांटा जा सकता
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ये (जमीन बांटना) इसलिए सम्भव था क्योंकि आर्टिकल 370 की वजह से सारे भारतीय प्रावधान कश्मीर में लागू नहीं होते थे।

ऐसे में बड़े हिंदू ज़मींदारों का "साथ" दे रहे "श्यामा प्रसाद मुखर्जी" ने आर्टिकल 370 का विरोध शुरू किया।

जिसे वो एक राष्ट्रवादी जामा पहनाने में कामयाब रहे।

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आर्टिकल 370 का मूल उद्देश्य पीछे कर मुखर्जी इसे भारत की अस्मिता से जोड़ने में इसलिए भी कामयाब हुए क्योंकि वो भारतीयों के "इतिहास बोध" को अच्छे से समझते थे।

बाद में #ब्राह्मणवादी_मीडिया ने भी इसी 'इतिहासबोध' का फायदा उठाकर मुखर्जी को आर्टिकल 370 के विरोध का हीरो बना दिया।
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