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#Thread on उज्जैन अमृत की बूँद से मंदिरो के रहस्य तक ।

हिंदुओं के 7 पवित्र शहरों में से एक उज्जैन, भारत के मध्यप्रदेश के क्षिप्रा नदी के किनारे में स्थित है।

उज्जैन के बारे में कहा गया है कि यह पृथ्वी के एक ऐसे विशेष स्थान पर स्थित है "जहां मृत्यु तक को भी मोक्ष

@LostTemple7
प्राप्त हो जाता है । उज्जैन को भगवान शिव के रूप महाकाल के शहर के नाम से जाना जाता है। यह माना जाता है कि भगवान शिव अभी भी यहां निवास करते हैं और हमेशा इस स्थान पर आने वाले लोगों के लिए अपना आशीर्वाद दिखाते हैं। जो भी इस शहर में आता है, वह अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
मंदिरो के शहर की खूबसूरती देखते ही बनती है।

वैसे तो पौराणिक काल से ही उज्जैन के कई नाम रहे है। स्कंद पुराण में उज्जैन का 'प्रतिकल्प' के रूप में वर्णन मिलता है - जिसका अर्थ है 'निर्माण की शुरुआत' - जो कि इसकी प्राचीन उत्पत्ति को दर्शाता है।
स्कंद पुराण, अवंति खंड, अवंतक्षेत्र महात्म्य, अध्याय 47, श्लोक 5-7 के अनुसार-

उज्जयनीपुरी को पहले कल्प में स्वर्णसिंग के नाम से जाना जाएगा। दूसरे कल्प में इसे कुशस्थली के नाम से जाना जाएगा। तीसरे कल्प में इसे अवंति के नाम से जाना जाएगा। चौथे कल्प में इसे अमरावती के नाम से
जाना जाएगा। पांचवे कल्प में इसे चूड़ामणि के नाम से जाना जाएगा। छठे कल्प में, इसे पद्मावती के रूप में जाना जाएगा और सातवें कल्प में इसे उज्जयिनी के नाम से जाना जाएगा।

ध्यान रखिएगा की द्वारका का प्राचीन नाम भी कुशस्थली था।

काल और कल्प के बारे में विस्तार से जाने-
महाभारत में उज्जैनि को अवंती महाजनपद की राजधानी के रूप में बताया गया है । दरअसल तक्षशिला तथा नालंदा की तरह उज्जैन द्वापर युग में ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। कहा जाता है कि यहां के गुरु संदीपनी आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण, उनके मित्र सुदामा और भाई बलराम ने
शिक्षा प्राप्त की थी। श्रीमद् भागवत, महाभारत तथा अन्य कई पुराणों में इस जगह के बारे में बताया गया है। वैसे भी उज्जैन ने भास्करचार्य और कालिदास जैसे कई विद्दवान दिए है।

अगर इतिहासकारो की माने तो ईसा पूर्व, छठी शताब्दी में उज्जैन, चंद्रप्रायोट के अधीन था, जो एक बहुत ही कुशल और
शक्तिशाली सम्राट था। प्रद्योत वंश के बाद, उज्जैन मौर्यों के अधीन आ गया। सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य अपने समय में उज्जैन आए थे। अशोक उज्जैन का वाइसराय था। 232 ईसा पूर्व में अशोक की मृत्यु के बाद, उसका विशाल साम्राज्य गिरने लगा और यह शक और सातवाहनों सहित कई राजाओं के अधीन आ गया।
लेकिन उज्जैन ने 1 शताब्दी में विक्रमादित्य के अधीन आने पर एक स्वर्ण युग देखा। विक्रमादित्य ने शकों को पराजित करने के बाद 57 ईसा पूर्व में विक्रम संवत युग की शुरुआत की। वह भारतीय इतिहास के सबसे महान राजा में से एक थे।

विक्रमादित्य के बारे में विस्तार से जाने 👇
विक्रमादित्य के बाद शकों ने दुबारा इसे अपने अधीन कर लिया। पर बाद में गुप्ता समराज्य ने इसे मुक्त कराया।फिर यह 7 शताब्दी से 11 शताब्दी तक ये राजपूतों के साम्राज्य में फूलता फलता रहा ।

पर बाक़ी राज्यों की तरह इसपर भी 12वीं शताब्दी के मध्य में मुस्लिम शासकों की नज़र लग गयी।
पहले अल्तमुश ने 1210-36 तक शासन किया, फिर
1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने उज्जैन पर कब्जा कर लिया।उसके बाद मुहम्मद-बिन-तुगलक ने भी मध्य भारत पर हमला किया और 1327 में इसे दिल्ली सल्तनत के अधीन लाया। 1351, फ़िरोज़ शाह तुगलक ने दिल्ली के सिंहासन पर चढ़ाई की और दिलावर खान घूरी को मालवा
का राज्यपाल नियुक्त किया।

इस दरमियान अनेको मंदिर तोड़े गए। कई धार्मिक स्थलो को बंद कर दिया गया। पर जहाँ महाकाल स्वयं बसते हो वहाँ अँधेरा कितनी देर तक रह सकता है ? 17वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य ने ना सिर्फ़ अंधेरे को छाँटा बल्कि,अपने आधिपत्य की स्थापना के साथ, हरदा सिद्धी
मंदिर, गोपाल मंदिर जैसे कई मंदिरों का निर्माण कर सबेरे की किरण भी दिखाई। 1750, उज्जैन सिंधियों के हाथों में चला गया, जिन्होंने बाद में अपनी राजधानी ग्वालियर में स्थानांतरित कर दी।

आइए अब जानते है की उज्जैन को इतना पवित्र क्यूँ मानते है-
1. षिप्रा नदी- जिस नदी के किनने उज्जैन बसा है उसे पुराणों में गंगा के जितना ही पवित्र बताया गया है। यह मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय देवताओं और राक्षसों के बीच लड़ाई के दौरान,क्षिप्रा नदी में दिव्य अमृत की एक बूंद गिर गई थी और इस तरह यह अमरता के अमृत से भरी एक शुद्ध नदी बन गई।
यही कारण है की उज्जैन में कुंभ मेला का आयोजन किया जाता है। यह आयोजित कुम्भ मेले को सिंहस्थ कुंभ के नाम से जाना जाता है।

2. महाकालेश्वर मंदिर - यह मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। 12 ज्योतिर्लिंगों में से महाकाल ही एकमात्र सर्वोत्तम शिवलिंग है।
कहते हैं कि 'आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम्। भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते।।' अर्थात आकाश में तारक शिवलिंग, पाताल में हाटकेश्वर शिवलिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है। महाकाल की उत्पत्ति कैसे हुई, इसके पीछे एक कहानी है-
एक समय अवंतिका नगरी में एक ब्राह्मण रहता था। उस ब्राह्मण के चार पुत्र थे। दूषण नाम का राक्षस ने अवंतिका में आतंक मचा दिया।उस राक्षस के आतंक से बचने के लिए उस ब्राह्मण ने भगवान शिव की आराधना की। ब्राह्मण की तपस्या से खुश होकर भगवान शिव महाकाल के रूप में प्रकट हुए और उस राक्षस का
वध करके नगर की रक्षा की। तब नगर के सभी भक्तों ने भगवान शिव से उसी स्थान पर हमेशा रहने की प्रार्थना की। भक्तों के प्रार्थना करने पर भगवान शिव अवंतिका में ही महाकाल ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीं स्थापित हो गए।

12 ज्योतिर्लिंगो के बारे में विस्तार से जाने-👇
3. भस्मा आरती - भगवान शिव की भस्‍म आरती केवल उज्‍जैन के महाकालेश्‍वर मंदिर में होती है। यह आरती बेहद अलग ढंग से प्रात: 4 बजे किया जाता है। यह आरती पहले चिता की ताजी राख से होती है। हालाकि कुछ कारणों से अब इस आरती को चिता की राख से नहीं किया जा रहा ।शिवपुराण के अनुसार भस्म सृष्टि
का सार है। एक दिन पूरी सृष्टि इसी राख के रूप में परिवर्तित होनी है। सृष्टि के सार भस्म को भगवान शिव सदैव धारण किए रहते हैं। इसका अर्थ है कि एक दिन यह संपूर्ण सृष्टि शिवजी में विलीन हो जाएगी।

4. हरसिद्धि मंदिर- यह मंदिर पूरे भारत में स्थित 52 शक्ति पीठों में से एक है। शक्ति
पीठ वे स्थान हैं जहां सती के शरीर का अंश अर्थात हाथ की कोहनी आकर गिर गई थी। रुद्रसागर तालाब के सुरम्य तट पर चारों ओर मजबूत प्रस्तर दीवारों के बीच यह सुंदर मंदिर बना हुआ है।

5. कालभैरव मंदिर- यह मंदिर लगभग छह हजार साल पुराना माना जाता है। इस मंदिर के संबंध चमत्कारी बात ये है कि
यहां स्थित कालभैरव की प्रतिमा मदिरा (शराब) का सेवन करती है। आश्चर्य की बात यह है कि देखते ही देखते वह पात्र जिसमें मदिरा का भोग लगाया जाता है, खाली हो जाता है। यह शराब कहां जाती है, ये रहस्य आज भी बना हुआ है।मंदिर के अंदर पाताल भैरवी मंदिर भी मौजूद है, और पास में ही एक पुराना
मंदिर स्थित है जहाँ राजा विक्रमादित्य ने 'बैताल सिद्धी' प्राप्त की थी।

.6. तंत्रिको का गढ़- उज्जैन में तंत्र विद्या का अलंग ही महत्व है। चाहे महाकालेश्वर मंदिर हो, हरसिद्धि मंदिर हो या काल भैरव मंदिर तांत्रिक क्रियाएँ हर जगह की जाती है। और हो भी क्यू ना आख़िर महाकाल स्वयं तंत्र
के जनक माने जाते है।यहां शिप्रा नदी के तट पर स्थित चक्रतीर्थ (शमशान घाट) पर दूर-दूर से तांत्रिक तंत्र क्रिया के लिए आते हैं। यहाँ आपको क़दम क़दम पर अघोरी मिल जाएँगे।

7.. भक्तों का मानना है कि वैशाख के शुभ दिनों के दौरान उज्जैन में सिर्फ 5 दिन रहना, एक व्यक्ति को परम ज्ञान
प्राप्त करने में सक्षम बनाता है जो की काशी में कई सौ साल रहने के बराबर है। उज्जैन की एक और ख़ास बात यह है की आज भी उज्जैन के राजा महाकाल को ही माना जाता है । पहले किसी भी राजा को महाराज महाकाल की नगरी उज्जैन में ठहरने की इजाजत नहीं थी।

काशी के बारे में विस्तार से जाने-👇
ऐसा इसिलए था क्योंकि कहा जाता है कि सदियों पहले कोई ओर राजा एक रात यहां गुजार ले तो उसे अपनी सल्तनत गंवानी पड़ती थी। आज भी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री रात के समय उज्जैन में नहीं रुकते है। इसे आप अंधविश्वास कहे या डर या फिर महाकाल का आदर करना यह आपकी मर्ज़ी।
@namanojha35 I hope, u will be glad to read this 🙏
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