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कुछ नए-पुराने #पसमांदा कार्यकर्ताओं ने पसमांदा विमर्श को एक ख़ास दिशा देने की कोशिश की है. पहली कोशिश #वहाबी/सलाफी/देवबंदी नज़रिए को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करना और बरेलवी/शिया तबकों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना है. 1/n
जब #सय्यदवाद हर मसलक (पंथ) में है तो कुछ ख़ास मसलक को घेरने का क्या मकसद है? आवामी समझ यह ही है की वहाबी/सलाफी/देवबंदी मसलक सऊदी अरब के पेट्रोडॉलर से पल रहे मदरसों से फलती-फूलती है और इस्लाम का सब से कट्टर रूप है. 2/n
ऐसे में अगर पसमांदा आन्दोलन को #वहाबियत से जोड़ दिया जायेगा तो आन्दोलन का क्या होगा? पसमांदा आन्दोलन तो मुस्लिम और हिन्दू कट्टरवाद के खिलाफ़ उभरा था. अगर वह इस्लामी विस्तारवादी सोच का शिकार हो जायेगा तो उसका मूल उद्देश्य ही नष्ट हो जायेगा. 3/n
दूसरा, पसमांदा आन्दोलन की यह समझ थी कि जाति एक सामाजिक समस्या है न की धार्मिक. इसका इलाज जनतान्रिक प्रणाली और सामाजिक आंदोलनों के ज़रिये से होगा न की धर्म से. अगर धर्म ही इसका इलाज होता तो गैर-हिन्दू धर्मों में यह सवाल उठता ही क्यों? 4/n
तो फिर अचानक कुछ आवाजें ऐसी क्यों उठ रही हैं जो धर्म से जाति के सवाल को सुलझाना चाहती हैं? हिंदुत्ववादी विमर्श के वर्चस्व के दौर में #इस्लामिस्ट विमर्श क्यों? 5/n
कुल मिला के यह जो नया ट्रेंड शुरू हुआ है यह #हिन्दू_मुस्लिम #बाइनरी को मज़बूत करने की कोशिश कर रहा है जिस के फंदे से पसमांदा आन्दोलन बहुजन समाज को आज़ाद कराने की सतत कोशिश करता रहा है. 6/n
मोटाभाई अक्सर सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जाते हैं. वहाबियत का गढ़ वहीं है. सबके रिश्ते इजराइल से भी अच्छे हो रहे हैं हैं. जब कट्टर इस्लाम फैलेगा तो कट्टर हिंदुत्व भी मज़बूत होगा. हरा-भगवा एक है. हरा भगवे में घुसा हुआ है और भगवा हरा में. 7/n
धर्म, पंथ और मसलक के नशे से बाहर निकलकर #जनतंत्र पर वापस लौटें. पसमांदा आन्दोलन #रोज़ी_रोटी और #आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ रहा है. किसी #धर्मतंत्र बनाने की नहीं. 8/n
आन्दोलन अक्सर अन्दर वाले ही कमज़ोर करते हैं. बाहर वाले तो सिर्फ वहां घुसते हैं जहाँ गड्ढा होता है. अपने आस-पास निगाह डालिए. वह कौन लोग हैं जो हमारे छोटे-छोटे स्वार्थ पूरा कर रहे हैं या एहसास-ए-कमतरी का फायदा उठा कर एक पसमांदा भाई को दूसरे पसमांदा भाई के खिलाफ खड़ा कर रहे हैं?9/n
मैं फिर से कह रहा हूँ पसमांदा विमर्श में बहुत दम है. यह जम्हूरियत के पहिये को पूरा घुमायेगा. 10/n
आन्दोलन के इतने कमज़ोर होने के बाद भी शासक वर्ग इसे हलके में नहीं लेता है. आप भी मत लीजिये. सब की निगाहें इधर ही हैं. अभी कुछ ख़ास कर नहीं सकते तो कम से कम आँख में आँख डाल के घूर ही लीजिये.

जय #पसमांदा! जय #भीम! 11/11
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