पितरों का श्राद्ध क्यों करना चाहिए :

प्रत्येक व्यक्ति पर देवऋण, पितृऋण एवं ऋषिऋण रहता है। श्राद्ध क्रिया द्वारा पितृऋण से मुक्त हुआ जाता है।

देवताओं को यज्ञ-भाग देने पर देवऋण से मुक्त हुआ जाता है।

ऋषि-मुनि-संतों के विचारों को, आदर्शों को अपने

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जीवन में उतारने से, उनका प्रचार-प्रसार करने से एवं उन्हें लक्ष्य मानकर आदर सहित आचरण करने से ऋषिऋण से मुक्त हुआ जाता है।

औरंगजेब ने अपने पिता शाहजहाँ को कैद कर दिया था, तब शाहजहाँ ने अपने बेटे को लिख भेजा "धन्य हैं हिन्दू जो अपने मृतक माता-पिता को भी खीर और

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हलुए-पूरी से तृप्त करते हैं और तू जिंदा बाप को एक पानी की मटकी तक नहीं दे सकता? तुझसे तो वे हिन्दू अच्छे हैं, जो मृतक माता-पिता की भी सेवा कर लेते हैं।"

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गरुड़ पुराण में श्राद्ध की महिमा :

कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति।
आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।।

पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।
देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।।

देवताभ्यः पितृणां हि पूर्वमाप्यायनं शुभम्।

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समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।

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अमावस्या के दिन पितृगण वायु रूप में घर के दरवाजे पर उपस्थित रहते हैं और अपने स्वजनों से श्राद्ध की अभिलाषा करते हैं। जब तक सूर्यास्त नहीं हो जाता, तब तक वे भूख-प्यास से व्याकुल होकर वहीं खड़े रहते हैं। सूर्यास्त हो जाने के पश्चात वे निराश होकर दुःखित मन से

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अपने-अपने लोकों को चले जाते हैं। अतः अमावस्या के दिन प्रयत्नपूर्वक श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। यदि पितृजनों के पुत्र तथा बन्धु-बान्धव उनका श्राद्ध करते हैं और गया-तीर्थ में जाकर इस कार्य में प्रवृत्त होते हैं तो वे उन्हीं पितरों के साथ ब्रह्मलोक में निवास करने का

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अधिकार प्राप्त करते हैं। उन्हें भूख-प्यास कभी नहीं लगती। इसीलिए विद्वान को प्रयत्नपूर्वक यथाविधि शाकपात से भी अपने पितरों के लिए श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

जो लोग अपने पितृगण, देवगण, ब्राह्मण तथा अग्नि की पूजा करते हैं, वे सभी प्राणियों की अन्तरात्मा में समाविष्ट

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मेरी ही पूजा करते हैं। शक्ति के अनुसार विधिपूर्वक श्राद्ध करके मनुष्य ब्रह्मपर्यंत समस्त चराचर जगत को प्रसन्न कर देता है।

हे आकाशचारिन् गरूड़! पिशाच योनि में उत्पन्न हुए पितर, मनुष्यों के द्वारा श्राद्ध में पृथ्वी पर जो अन्न बिखेरा जाता है उससे संतृप्त होते हैं।

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श्राद्ध में स्नान करने से भीगे हुए वस्त्रों द्वारा जो जल पृथ्वी पर गिरता है, उससे वृक्ष योनि को प्राप्त हुए पितरों की संतुष्टि होती है। उस समय जो गन्ध तथा जल भूमि पर गिरता है, उससे देव योनि को प्राप्त पितरों को सुख प्राप्त होता है। जो पितर अपने कुल से बहिष्कृत हैं,

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क्रिया के योग्य नहीं हैं, संस्कारहीन और विपन्न हैं, वे सभी श्राद्ध में विकिरान्न और मार्जन के जल का भक्षण करते हैं।

श्राद्ध में भोजन करने के बाद आचमन एवं जलपान करने के लिए ब्राह्मणों द्वारा जो जल ग्रहण किया जाता है, उस जल से पितरों को संतृप्ति प्राप्त होती है।

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जिन्हें पिशाच, कृमि और कीट की योनि मिली है तथा जिन पितरों को मनुष्य योनि प्राप्त हुई है, वे सभी पृथ्वी पर श्राद्ध में दिये गये पिण्डों में प्रयुक्त अन्न की अभिलाषा करते हैं, उसी से उन्हें संतृप्ति प्राप्त होती है।

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इस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्यों के द्वारा विधिपूर्वक श्राद्ध किये जाने पर जो शुद्ध या अशुद्ध अन्न जल फेंका जाता है, उससे उन पितरों की तृप्ति होती है जिन्होंने अन्य जाति में जाकर जन्म लिया है। जो मनुष्य अन्यायपूर्वक अर्जित किये गये पदार्थों से श्राद्ध करते हैं,

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उस श्राद्ध से नीच योनियों में जन्म ग्रहण करने वाले चाण्डाल पितरों की तृप्ति होती है।

हे पक्षिन् ! इस संसार में श्राद्ध के निमित्त जो कुछ भी अन्न, धन आदि का दान अपने बन्धु-बान्धवों के द्वारा किया जाता है, वह सब पितरों को प्राप्त होता है।

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अन्न जल और शाकपात आदि के द्वारा यथासामर्थ्य जो श्राद्ध किया जाता है, वह सब पितरों की तृप्ति का हेतु है।

(गरूड़ पुराण)

अश्रद्दधानाः पाप्मानो नास्तिकाः स्थितसंशयाः।
हेतुद्रष्टा च पंचैते न तीर्थफलमश्रुते।।

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गुरुतीर्थे परासिद्धिस्तीर्थानां परमं पदम्।
ध्यानं तीर्थपरं तस्माद् ब्रह्मतीर्थं सनातनम्।।

श्राद्ध न करने वाले, पापात्मा, परलोक को न मानने वाले अथवा वेदों के निन्दक, स्थिति में संदेह रखने वाले संशयात्मा एवं सभी पुण्यकर्मों में किसी कारण का

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अन्वेषण करने वाले कुतर्की-इन पाँचों को पवित्र तीर्थों का फल नहीं मिलता।

( वायु पुराणः 77.127.128)

'वायु पुराण' में आत्मज्ञानी सूत जी ऋषियों से कहते हैं -

"हे ऋषिवृंद ! परमेष्ठि ब्रह्मा ने पूर्वकाल में जिस प्रकार की आज्ञा दी है उसे तुम सुनो। ब्रह्मा जी ने कहा है :

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"जो लोग मनुष्यलोक के पोषण की दृष्टि से श्राद्ध आदि करेंगे, उन्हें पितृगण सर्वदा पुष्टि एवं संतति देंगे। श्राद्धकर्म में अपने प्रपितामह तक के नाम एवं गोत्र का उच्चारण कर जिन पितरों को कुछ दे दिया जायेगा वे पितृगण उस श्राद्धदान से अति संतुष्ट होकर देने वाले की

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संततियों को संतुष्ट रखेंगे, शुभ आशिष तथा विशेष सहाय देंगे।"

पिता की आज्ञा प्राप्त करके जब भगवान श्री राम वन को चले गये तो उसके बाद सीता जी के साथ श्रीराम ने पुष्कर तीर्थ की यात्रा की। पुष्कर तीर्थ में पहुँचकर भगवान श्री रामजी ने भी श्राद्ध किया था।

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यदि श्राद्घ नहीं कर सकते हैं तो?

अगर पंडित से श्राद्ध नहीं करा पाते तो सूर्य नारायण के आगे अपने बगल खुले करके (दोनों हाथ ऊपर करके) बोलें :

“हे सूर्य नारायण! मेरे पिता (नाम), अमुक (नाम) का बेटा, अमुक जाति (नाम), (अगर जाति, कुल, गोत्र नहीं याद तो ब्रह्म गोत्र बोल दें)

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को आप संतुष्ट/सुखी रखें। इस निमित्त मैं आपको अर्घ्य व भोजन कराता हूँ।” ऐसा करके आप सूर्य भगवान को अर्घ्य दें और भोग लगाएं।

श्राद्ध पक्ष में रोज भगवदगीता के सातवें अध्याय का पाठ और 1 माला द्वादश मंत्र "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" और

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1 माला "ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं स्वधादेव्यै स्वाहा" की करनी चाहिए और उस पाठ एवं माला का फल नित्य अपने पितरों को अर्पण करना चाहिए।

Via SM
🙏ॐ पितृदेवोभ्यै नम:🙏
🙏🌹ॐश्री विष्णवे नम:🌹🙏

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20 Sep
सप्तर्षियों का अवतरण :

“नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः।।”
– मुण्डकोपनिषद २/३/११

‘परम् ऋषियों को नमस्कार है, परम् ऋषियों को नमस्कार है।’

सप्तर्षियों का प्रादुर्भाव श्री ब्रह्मा जी के मानस संकल्प से हुआ है।

१/१७
सृष्टि के विस्तार के लिए ब्रह्मा जी ने अपने ही समान दस मानस पुत्रों को उत्पन्न किया।

उनके नाम हैं – मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष तथा नारद।

२/१७
मरीचिरत्र्यङ्‌गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः ।
भृगुर्वसिष्ठो दक्षश्च दशमस्तत्र नारदः ॥
– श्रीमद्भागवत महापुराण ३/१२/२२

ये ऋषि गुणों में ब्रह्मा जी के समान ही हैं, अतः पुराणों में ये नौ ब्रह्मा भी कहे गए हैं। – “नव ब्राह्मण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः॥” (विष्णु पुराण १/७/६)

३/१७
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11 Sep
शिव और भस्म :

भगवान शिव तो स्वयं विश्वम्भर हैं, समस्त जगत के स्वामी हैं। वे किसी भी तरह की सुगन्धित कोमल प्रसाधन सामग्री का प्रयोग कर सकते हैं पर वे अपनी देह पर भस्म ही क्यों रमाते हैं?

अनेक शिव स्तुतियों में शिव जी की महिमा उनके भस्म रमाये शुभ्र शरीर का वर्णन मिलता है।

१/११
जैसे,
ॐ गात्रं भस्मसितं,
विभुं विश्वनाथं विभूत्यंग भूषम,
चर्माम्बराय शवभस्म विलेपनाय,
और 'कस्तूरिका चन्दन लेपनाय श्मशान भस्मांग विलेपनाय' आदि।

लेकिन उन्हें श्मशान का भस्म ही क्यों प्रिय है?

२/११
इस विषय पर पुराणोंक्त एक कथा है कि मतिहीन कामदेव ने ध्यानस्थ शिव जी को कामोद्दीप्त करने के लिए कामवाण चलाया था, जिस से शिव जी की समाधी भंग हुई और उनकी क्रोधाग्नि मे कामदेव जल कर भस्म हो गया।

३/११
Read 11 tweets
8 Sep
श्रीकृष्णनाम और पारस पत्थर :

एक बार एक ब्राह्मण निर्धनता के कारण बहुत दु:खी था। जहां कहीं भी वह सहायता मांगने जाता, सब जगह उसे तिरस्कार मिलता। वह ब्राह्मण शास्त्रों को जानने वाला व स्वाभिमानी था।

उसने संकल्प किया कि जिस थोड़े से धन व स्वर्ण के कारण

१/२०
धनी लोग उसका तिरस्कार करते हैं, वह उस स्वर्ण को मूल्यहीन कर देगा। वह अपने तप से पारस प्राप्त करेगा और सोने की ढेरियां लगा देगा।

उसने सोचा कि ‘पारस मिलेगा कहां? ढूँढ़ने से तो वह मिलने से रहा। कौन देगा उसे पारस?

देवता तो स्वयं लक्ष्मी के दास हैं, वे उसे क्या पारस देगें?

२/२०
ब्राह्मण ने भगवान औघड़दानी शिव की शरण में जाने का निश्चय किया— ‘जो विश्व को विभूति देकर स्वयं भस्मांगराग लगाते हैं; वे कपाली ही कृपा करें तो पारस प्राप्त हो सकता है।’

ब्राह्मण ने निरन्तर भगवान शिव का रुद्रार्चन, पंचाक्षर- मन्त्र का जप और कठिन व्रत करना शुरु कर दिया।

३/२०
Read 20 tweets
5 Sep
परोपकार की ईंट :

बहुत समय पहले की बात है एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे। उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े रजा महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे।

१/१२
वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी।

“आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं।”

२/१२
आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया।

ऋषिवर बोले , “प्रिय शिष्यों, आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है। मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें।

यह एक बाधा दौड़ होगी और इसमें आपको कहीं

३/१२
Read 12 tweets
4 Sep
कलयुग का सच :

एक बार कबीर दास ने बड़ी कुशलता से पगड़ी बनाई। झीना - झीना कपड़ा बुना और उसे गोलाई में लपेट कर पगड़ी तैयार की।

पगड़ी को हर कोई बड़ी शान से अपने सिर सजाता है। यह नई नवेली पगड़ी लेकर कबीर जी दुनिया की हाट में जा बैठे।

1/8
ऊँची - ऊँची पुकार उठाई- 'शानदार पगड़ी! जानदार पगड़ी! दो टके की भाई! दो टके की भाई!'

एक खरीददार निकट आया। उसने घुमा- घुमाकर पगड़ी का निरीक्षण किया। फिर कबीर दास से प्रश्न किया- 'क्यों महाशय एक टके में दोगे क्या?'

2/8
कबीर दास ने अस्वीकार कर दिया- 'न भाई! दो टके की है। दो टके में ही सौदा होना चाहिए।'

खरीददार भी नट गया। पगड़ी छोड़कर आगे बढ़ गया। यही प्रतिक्रिया हर खरीददार की रही।

सुबह से शाम हो गई। कबीर दास जी अपनी पगड़ी बगल में दबाकर खाली जेब वापिस लौट आए।

3/8
Read 8 tweets
3 Sep
दूसरी कथा "मदद" :

मैं पैदल घर आ रहा था। रास्ते में एक बिजली के खंभे पर एक कागज लगा हुआ था। पास जाकर देखा,

लिखा था:

"इस रास्ते पर मैंने कल एक 50 का नोट गंवा दिया है। मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता। जिसे भी मिले कृपया इस पते पर दे सकते हैं।"

1/7
यह पढ़कर पता नहीं क्यों उस पते पर जाने की इच्छा हुई। पता याद रखा। यह उस गली के आखिरी में एक घर था। वहाँ जाकर आवाज लगाया तो एक वृद्धा लाठी के सहारे धीरे-धीरे बाहर आई। मुझे मालूम हुआ कि वह अकेली रहती है। उसे ठीक से दिखाई नहीं देता।

2/7
"माँ जी", मैंने कहा - "आपका खोया हुआ 50 मुझे मिला है उसे देने आया हूँ।"

यह सुन वह वृद्धा रोने लगी।

"बेटा, अभी तक करीब 50-60 व्यक्ति मुझे 50-50 दे चुके हैं। मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूँ। ठीक से दिखाई नहीं देता। पता नहीं कौन मेरी इस हालत को देख मेरी मदद करने के उद्देश्य से

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