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16 Sep, 7 tweets, 3 min read
प्रणाम
इन देवी जी का कहना है कि शिव को शक्ति पूर्ण करती है। इसमें कदाचित कुछ भी गलत नहीं। महादेव विध्वंस के देवता है। उनका प्रमुख कार्य विध्वंस करना है परंतु अगर उनके पास शक्ति ना हो तो वह विध्वंस नहीं कर पाएंगे। इसलिए उन्हें शक्ति की आवश्यकता होती ही है
परंतु इसका अर्थ कहीं से भी नहीं है कि शिव शक्ति से कमतर है। ना तो शिव शक्ति से कमतर है और ना ही शक्ति से उसे कमतर है।" शिव और शक्ति एक दूसरे से अभिन्न है, उनका अर्धनारीश्वर रूप उसी बात का द्योतक है। शिव शक्ति का मूर्त रूप हैं तो शक्ति शिव का अध्यात्म है।
सृष्टि के निर्माण के हेतु शिव ने अपनी शक्ति को स्वयं से पृथक किया। शिव स्वयं पुल्लिंग के तथा उनकी शक्ति स्त्री लिंग की द्योतक हैं । पुरुष (शिव) एवं स्त्री (शक्ति) का एका होने के कारण शिव नर भी हैं और नारी भी, अतः वे अर्धनरनारीश्वर हैं।
इनका कहना है कि शक्ति संपूर्ण है परंतु यह गलत है
शक्ति शिव की अभिभाज्य अंग हैं। शिव नर के द्योतक हैं तो शक्ति नारी की। शिव के बिना शक्ति का अथवा शक्ति के बिना शिव का कोई अस्तित्व ही नहीं है। शिव अकर्ता हैं। वो संकल्प मात्र करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी करती हैं।
जब मैंने इनको सामने से सही करने का प्रयास किया तो अपनी मूर्खता और उद्दंडता और अभिमान का ऐसा उदाहरण मैंने कहीं नहीं देखा। ना तो इनको वेदों का ज्ञान है और ना ही इनको हमारे शास्त्रों का ज्ञान है
इन्हें साधारण तौर पर अर्धनारीश्वर रूप के अवतार के बारे में और उसके उद्देश्य के बारे में कोई ज्ञान नहीं है परंतु यहां पर इन्हें अपना थोथा ज्ञान सबके सामने प्रस्तुत करना है और झूठ मुठ की वाहवाही प्राप्त करनी है
बड़े दुख की बात है कि ऐसे अज्ञानी लोग यहां पर अपना ज्ञान सबको बांटते फिर रहे हैं और उन लोगों को जब जवाब देने का प्रयास किया जाता है तो यह लोग कायरों की तरह भाग जाते हैं। आवश्यक है ऐसे लोगों को उनकी ही भाषा में जवाब दिया जाए

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20 Sep
क्यों यमराज को धरती पर जन्म लेना पड़ा ? Image
पौराणिक समय में मांडव्य नाम के महान ऋषि थे।उन्होंने तपस्या से अनेकों सिद्धियां प्राप्त कर ली थीं । जिस राज्य में मांडव्य ऋषि रहते थे वहां राजकोष में किसी ने चोरी की, जब चोरों का पीछा किया गया तो चोर मांडव्य ऋषि के आश्रम में चले गए और चोरी की हुई वस्तुएं आश्रम में ही छोड़कर भाग गए
ऋषि उस समय तपस्या में विराजमान थे । जब पीछा करते हुए सैनिकों को आश्रम में चोरी हुआ सामान मिला तब उन्होंने मांडव्य ऋषि को ही चोर समझकर उन पर आरोप लगा दिया । सैनिक मांडव्य ऋषि को बंदी बनाकर राजा के पास ले गए ।
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11 Sep
व्रत के प्रकार

व्रत रखने के नियम दुनिया को हिंदू धर्म की देन है। व्रत रखना एक पवित्र कर्म है और यदि इसे नियम पूर्वक नहीं किया जाता है तो न तो इसका कोई महत्व है और न ही लाभ बल्कि इससे नुकसान भी हो सकते हैं। । राजा भोज के राजमार्तण्ड में 24 व्रतों का उल्लेख है
हेमादि में 700 व्रतों के नाम बताए गए हैं। गोपीनाथ कविराज ने 1622 व्रतों का उल्लेख अपने व्रतकोश में किया है। व्रतों के प्रकार तो मूलत: तीन है:- 1. नित्य, 2. नैमित्तिक और 3. काम्य।
1.नित्य व्रत उसे कहते हैं जिसमें ईश्वर भक्ति या आचरणों पर बल दिया जाता है, जैसे सत्य बोलना, पवित्र रहना, इंद्रियों का निग्रह करना, क्रोध न करना, अश्लील भाषण न करना और , प्रतिदिन ईश्वर भक्ति का संकल्प लेना आदि नित्य व्रत हैं। इनका पालन नहीं करते से मानव दोषी माना जाता है।
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8 Sep
श्रीमद् भागवत महापुराण में श्री कृष्ण जी उद्धव जिसे कहते हैं

मेरे अवयवों की गठन बड़ी ही सुडौल है। रोम-रोम से शान्ति टपकती है। मुखकमल अत्यन्त प्रफुल्लित और सुन्दर है। घुटनों तक लंबी मनोहर चार-भुजाएँ हैं। बड़ी ही सुन्दर और मनोहर गरदन है। मरकत-मणि के समान सुस्निग्ध कपोल हैं।
मुख पर मन्द-मन्द मुस्कान की अनोखी ही छटा है। दोनों ओर के कान बराबर हैं और उसमें मकराकृत कुण्डल झिलमिल-झिलमिल कर रहे हैं। वर्षाकालीन मेघ के समान श्यामल शरीर पर पीताम्बर फहरा रहा है। श्रीवत्स एवं लक्ष्मी जी का चिह्न वक्षःस्थल पर दायें-बायें विराजमान है।
हाथों में क्रमशः शंख, चक्र, गदा एवं पद्म धारण किये हुए हैं। गले में वनमाला लटक रही है। चरणों में नूपुर शोभा दे रही हैं, गले में कौस्तुभ मणि जगमगा रही है। अपने-अपने स्थान पर चमचमाते हुए किरीट, कंगन, करधनी और बाजूबंद शोभायमान हो रहे हैं।
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8 Sep
रामजी सीताजी के साथ सिंहासन पर विराज रहे हैं। सब ओर हर्षोल्लास है,उत्साह है। पर न मालूम क्यों, भगवान के मुखमंडल पर प्रतीक्षा का भाव है। आँखें हर एक आने वाले की ओर उठती हैं, और बार बार निराश होकर झुक जाती हैं
हनुमानजी को चिंता लगी। पूछने लगे- प्रभु!आप किसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं?
भगवान की आँखों की कोर में नमीं स्पष्ट मालूम पड़ती है। भगवान ने कहा- हनुमान! केवट नहीं आए।
सद्गुरू ही केवट हैं, वही नाम रूपी नाव, और नियम रूपी चप्पू द्वारा पार कराते हैं।
उन्होंने मुझे पार लगाया, मैं उनकी कोई सेवा नहीं कर पाया, वे नहीं आए।
हनुमानजी ने चारों ओर नजर दौड़ाई, तो उन्हें एक बात का बड़ा आश्चर्य हुआ, केवट तो वहाँ थे ही नहीं, भरत लाल जी भी नहीं थे।
विस्मित स्वर से हनुमानजी भगवान से पूछते हैं- प्रभु! यहाँ तो भरतजी भी नजर नहीं आ रहे हैं, आपको उनका खयाल नहीं है? वे कहाँ हैं?
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8 Sep
प्रत्येक दिशा का एक देवता नियुक्त किया गया है जिसे दिग्पाल कहा गया है अर्थात दिशाओं के पालनहार।
प्रत्येक मानव जब भी चलता है किसी न किसी दिशा में ही चलता है बिना दिशा वह कभी चल ही नहीं सकता या तो वह सही दिशा में जाएगा या गलत दिशा में, गलत दिशा में चलने वाले को दिशाहीन,
उत्तर दिशा के देवता कुबेर हैं जिन्हें धन का स्वामी कहा जाता है और सोम को स्वास्थ्य का स्वामी कहा जाता है। जिससे आर्थिक मामले और वैवाहिक व यौन संबंध तथा स्वास्थ्य प्रभावित होता है।
उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) के देवता सूर्य हैं जिन्हें रोशनी और ऊर्जा तथा प्राण शक्ति का मालिक कहा जाता हैं। इससे जागरूकता और बुद्धि प्रदान करते है
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7 Sep
श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी,
हे नाथ नारायण वासुदेवा॥
हे नाथ नारायण…॥
एक मात्र स्वामी सखा हमारे,
हे नाथ नारायण वासुदेवा॥
हे नाथ नारायण…॥
॥ श्री कृष्णा गोविन्द हरे मुरारी…॥
बंदी गृह के तुम अवतारी
कही जन्मे कही पले मुरारी
किसी के जाये किसी के कहाये
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