सिर्फ याद करिये ! 🙄

वो दौर ! जब भारत डॉ. मनमोहन सिंह, प्रणव मुखर्जी, पी चिदम्बरम, डॉ.रघुराम राजन और मोन्टेक सिंह अहलूवालिया जैसे अर्थशास्त्र के शिल्पियों द्वारा तराशा जा रहा था, इन शिल्पियों की नक्काशी से भारत का बाजार सज धज के अपने यौवन पर इठलाना शुरू कर रहा था ।

...1/10
उद्योग, कृषि अपने खलिहानों की मरम्मत पर जुट गये थे, खलिहान चौक का रूप ले रहे थे । 10 हजार की सरकारी पगार पाने वाले को 24 हजार मिलने लगे थे ।

यूरेनियम और थोरियम के वैश्विक युद्ध में भारत ने सब धमकियों को दरकिनार कर अपना रास्ता तय कर लिया था।
...2/10
14 नवंबर 2008 को चन्द्रमा की सतह पर भारत के मानव रहित चन्द्रयान-1 ने तिरंगा फहरा कर दुनिया को भारत की ताकत का अहसास करवा दिया था । 2013 के नवम्बर में मंगल मिशन दुनिया में भारत का परचम लहराने मंगल की ओर कूच कर गया था ।

...3/10
दूसरी ओर इन सब उपलब्धियों और भारत के बढ़ते कदमों से कोई था जो परेशान और भयाक्रान्त हो रहा था, उसके आर्थिक साम्राज्य को खतरा महसूस हो रहा था!
स्वाभाविक है वो चुप नहीं बैठा होगा!

याद करिये ये वही दौर था जब ओबामा ने अमरीका से कहा था एक दिन भारत तुम्हारे सारे रोजगार खा जायेगा।
4/10
अब यहीं से शुरूवात होती है भारत में सुसाइड बॉम्बर्स को ढूंढ़ने की!
खोजे गये, बिके, मिले और शुरू हुआ भारत में इंडिया एगेन्स्ट करप्शन, अन्ना मुखौटे के नेतृत्व में भारत बचाओ आन्दोलन।

विदेशी एजेन्सियों के चन्दे से भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन चलने लगा।
...5/10
पीआर एजेन्सियों को ठेके दिये गये और ढूंढा गया एक ऐसा चेहरा जो बादलों में रडार का काम करना बन्द कर दे।

सेना के रडार तो बादल तो घनघोर घटाओं में भी काम करते रहे किन्तु जनता के एक बडे हिस्से के रडार ने काम करना बंद कर दिया, और वो केवल वही संदेश पढ पा रहा था जो आका चाहते थे।
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देश का राजनैतिक परिदृश्य बदला, अब आया सपनों का युग, 240 से ज्यादा बिना सर पैर के अभियान बने सबके नाम अलाना इंडिया और फलाना इंडिया रखे गये ।
इन अभियानों के कोरे प्रचार में लाखों अरब रूपये की पूंजी स्वाहा कर दी गयी ।
...7/10
फिर बैंको को निशाना बनाया गया, देश में नोटबंदी जैसा महाघोटाला देशभक्ति के कपडे पहना कर राजकीय सम्मान के साथ किया गया।

भारत को दूसरी आजादी का सपना दिखा कर संसद के केन्द्रीय कक्ष में देश की जड़ खोदने के लिये जीएसटी का रंगमंच सजाया गया, लुटेरों का गिरोह देश भक्त कहा जाने लगा।
8/10
70 सालों से संभाल कर रखा गया रिजर्व बैंक लूट लिया गया, राष्ट्रीय बैंको को खोखला किया गया, देश की नवरत्न कम्पनियों की नीलामी की तैयारी कर दी गयी । 7 करोड लोगों का प्रत्यक्ष और 16 करोड लोगों का अप्रत्यक्ष रोजगार छीन लिया गया।
..9/10
फिर देश को मोर और बतख के साथ फोटो सेशन कर रईसी का एहसास करवाया गया, तब जा के इतनी लगन और मेहनत से दुनिया में +9% GDP का देश -24% GDP के गहरे खड्ड में धकेला जा सका।

नये भारत को इस गहरे खड्ड में ले जाने के लिये नायक के नारे नहीं लगाओगे यारों ?
तो बोलो .....की.....!!
😂😂😂
10/10

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28 Sep
मोदी जी तो हमारे देश के लिए भगवान हैं...
क्योंकि 2014 से पहले भारत में सब भूखे नंगे थे, ना रहने को घर था, ना कोई रोज़गार था, ना शौचालय था, ना कोई हिंदू सुरक्षित था।
मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले कांग्रेस ने 60 साल में इतने घोटाले किये कि देश कंगाल हो चुका था।
..1/8
कांग्रेस ने ना कोई यूनिवर्सिटी, ना IIT, ना AIIMS जैसे बड़े सरकारी अस्पताल, ना एअरपोर्ट, ना ISRO जैसे वैज्ञानिक संस्थान और ना ही BSNL, LIC जैसे सरकारी संस्थान बनाए,
देश का सारा पैसा गाँधी परिवार ने इटली भेज दिया था, बैंक दिवालिया हो चुके थे, जनता त्राहि त्राहि कर रही थी।
..2/8
दुनिया की भी हालात बद से बदतर होती जा रही थी 2014 आते आते तो धरती ने घूमना ही बंद कर दिया था, फिर 2014 में मोदी रूपी भगवान आए और देश को पहला ईमानदार प्रधानमंत्री मिला जिसकी कृपा से धरती ने फिर से घूमना शुरू कर दिया।
...3/8
Read 8 tweets
27 Sep
आर्थर कॉनन डायल की कृति शेरलॉक होम्स में एक कहानी है, "The Illistratious Client". लड़की को पता है कि जिससे प्रेम करती है वह womanizer है, मानसिक रोगी है, और अपनी पत्नियों का हत्यारा भी। फिर भी वो उसे बेइंतहा चाहती है, उसकी मीठी मीठी flattering बातें उसे बेहद पसंद हैं।
...1/9
वह लड़की मरने के करीब पहुँच जाती है। उसका अगला शिकार बनने के बेहद करीब। लेकिन ख़ुद को गलत कैसे माने?

उसी तरह, देश के एक एक इंच को बेचा जा रहा है, लेकिन मोदी समर्थक लोगों को ज़रा सा भी संदेह नहीं हो रहा है।
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जब तक इनके खुद के घर नहीं जल रहे, ये भरपूर चटखारे लेकर सरकार का विरोध करने वालों का मज़ाक उड़ाते रहते हैं।

कुछ रिजल्ट तुरन्त पाने की बेचैनी ने ही क्रांतिकारियों को हथियार उठाने पर मज़बूर किया होगा, वे राम और कृष्ण के द्वारा किये गए अंतिम विकल्प को पहले आजमा रहे थे।
...3/9
Read 9 tweets
20 Sep
प्रासंगिकता तो देखिए 😂

1950 में सोहराब मोदी की फिल्म 'भिखारियों का सरदार' रिलीज़ हुई थी। फिल्म बुरी तरह फ्लॉप रही थी और आज इसका कोई प्रिंट मौजूद भी नहीं है।

फिल्म की कहानी थी -
एक व्यापारी एक भिखारी को सड़क से उठाकर एक राज्य का राजा बना देता है,
...1/4
लेकिन चूंकि भिखारी को राजपाट का कोई अनुभव या अंदाजा नहीं होता, इसलिए वह पूरे राज्य का बंटाधार कर देता है।
दुश्मन राजा की सेना उसके राज्य की सीमा पर पड़ने वाले गाँवों को कब्ज़िया लेती है और जनता भुखमरी की शिकार हो जाती है।
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इस कारण सैकड़ों लोग खाने की तलाश में अपने घरों से निकल जाते हैं और रास्ते में मारे जाते हैं।

फिल्म के अंत तक भिखारी एकदम राजसी गेटअप में आ जाता है, दाढ़ी बढ़ा कर। लेकिन तब तक राज्य की माली हालत इतनी खराब हो जाती है कि वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता।
...3/4
Read 4 tweets
19 Sep
अंधभक्त कभी भी गलत को गलत नहीं मान सकता!
जो जहाँपनाह कह दें वो सही ! 🙏

जब वो जीएसटी को बुरा कहते थे तब वो सही थे, जब उन्होंने जीएसटी लागू किया तब वो सही हो गए!
जब वो आधार कार्ड का विरोध करते थे तब वो सही थे, जब उन्होंने आधार लागू किया तब वो सही हो गए!
..1/7
जब वो मनरेगा का भरी संसद में मजाक उड़ा रहे थे तब वो सही थे, जब उन्होंने मनरेगा लागू की तब वो सही हो गए!
जब उन्होंने नोटबंदी जैसी मूर्खता की तब भी आपने तालियाँ बजाईं,
जब उन्होंने बोला न कोई घुसा है न घुसाया गया है तब भी आपने तालियाँ बजाईं,
...2/7
जब उन्होंने चार घंटे के नोटिस पर पूरे देश में ताला डाल दिया तब भी आपने तालियाँ बजाईं,
आप लोग बोले कि मोदी ने अर्थव्यवस्था डुबाई तो सोच कर देशहित में ही डुबाई होगी..
उन्होंने ताली, थाली, टॉर्च से कोरोना भगाने का गणित दिया आप सब उस जहालत में एक साथ लगे रहे!
...3/7
Read 7 tweets
13 Sep
कल्पना कीजिए उस देश की, जहाँ दुनिया की सबसे ऊँची मूर्ति होगी, जगमगाता हुआ भव्य राम मंदिर होगा, सरयू में देशी घी के छह लाख दीयों की अभूतपूर्व शोभायमान महा आरती हो रही होगी। सड़कों, गलियों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर जुगाली और चिंतन में संलग्न गौवंश आराम फरमा रहा होगा।
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धर्म उल्लू की तरह हर आदमी के सर पर बैठा होगा ।
लेकिन, अस्पतालों में ऑक्सीजन नहीं होगी, दवाइयां, बेड, इन्जेक्शन नहीं होंगे। दुधमुंहे बच्चे बे-सांस दम तोड़ रहे होंगे। मरीज दरबदर भटक रहे होंगे। देश में ढंग के स्कूल-कॉलेज नहीं होंगे, बच्चे कामकाज की तलाश में भटक रहे होंगे।
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कोविड-19 जैसी महामारियां देश पर ताला लगा रही होगी और देश का प्रवासी मजदूर भूखे-प्यासे सैकड़ों मील की पैदल यात्रा कर रहे होंगे, आम जनता घुट-घुट कर जी रहे होंगे और तिल-तिल कर मर रहे होंगे ।
बेटियां स्कूलों, कॉलेजों, मेडिकल, इंजीनियरिंग संस्थाओं में न होकर....
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Read 14 tweets
9 Sep
पिछले छह साल में खुद को बचाये रखने के लिेए किस एक तकरीब का सहारा लिया गया है?
जवाब है— नफ़रत!!

यही एक करेंसी है, जिसके दम पर सब कुछ चल रहा है।
नाकामियां छिपानी हों तो नफ़रत।
सवालों से बचना हो तो नफ़रत,
अगर नफ़रत का एक फॉर्मूला पिट गया हो तो फिर नफ़रत की कोई नई स्कीम!
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ताजा स्कीम पचास साल से उपर वाले सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ माहौल बनाने का है।
देखते जाइये आने वाले दिनों में क्या होता है।

भोंपू मीडिया डुगडुगी बजाएगा कि देश का बेड़ा गर्क बूढ़े कामचोर कर्मचारियों की वजह से हो रहा है और भगवन उन सबको निकाल फेंकने का महायज्ञ कर रहे हैं!
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क्या दुनिया की कोई सरकार किसी उम्र विशेष के लोगों को प्रति इस तरह का पूर्वाग्रह रख सकती है?
नौकरी चाहे सरकारी हो या प्राइवेट अगर आपने उसमें अपने जीवन के बेशकीमती साल दिये हैं तो आजीविका के सुरक्षा के अधिकारी हैं।
...3/14
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