अब समस्या ये है कि ईश्वर ने भारतवर्ष को मानव संसाधन छप्पर फाड़ कर दिया है। 10-12 लाख लोग यहां चंद ही कहलाते हैं। और सिविल सर्विसेज में सीटें हैं 8००।
पहले 1400 हुआ करती थीं मगर सरकार को शायद ग्रेजुएट लोगों के हाथ के पकौड़े ज्यादा अच्छे लगते हैं इसलिए हर साल सरकारी नौकरियां कम करती जा रही है। 10 लाख लोग फॉर्म भरते हैं, 5 लाख लोग प्री देते हैं।
आधे इसलिए क्यूंकि बाकी को प्री के टाइम लगता है कि तैयारी पूरी नहीं है, इसलिए एटेम्पट बर्बाद नहीं करना। प्री क्वालीफाई करते हैं 13-14 हजार। यानि लगभग २.5%। फिर आती है असली समस्या की जड़। यानि मैन्स। नौ पेपर, सब के सब सब्जेक्टिव।
चार सामान्य अध्ययन (GS), एक निबंध, दो हिंदी -अंग्रेजी, और दो ऑप्शनल सब्जेक्ट के। सामान्य अध्ययन जिसमें कि सामान्य जैसा कुछ नहीं होता उसमें सबको एवरेज से ही नंबर मिलते हैं, 250 में से 90-120। असली धांधलेबाजी ऑप्शनल में ही होती है। किसी ऑप्शनल में नंबर ज्यादा आते हैं किसी में कम।
लोक प्रशासन में जहां 100 नंबर लाना मुश्किल होता है वहीँ जूलॉजी में 220 तक भी नंबर आते हैं। किसी का सिलेबस गागर जितना है तो किसीका सागर जितना। किसी ऑप्शनल में 3000 सेभी ज्यादा उम्मीदवार होते हैंतो किसी में 5 भी नहीं होते।क्षेत्रीय भाषाओँ के विषय में दिल खोल के नंबर बांटे जाते हैं।
ऐच्छिक विषयों की चेकिंग में Normalization की बात सुनी थी पर ये सिर्फ अफवाह ही लगती है। समस्या पेश आती है इंजीनियरिंग के छात्रों के साथ।एक तो UPSC का सिलेबस इंजीनियरिंग के कोर्स से बिलकुल मेल नहीं खाता और दूसरा भारत में इंजीनियरिंग की पढाई जॉब हंटिंग एक्सरसाइज से ज्यादा कुछ नहीं।
बहुत सारे इंजीनियरिंग के विषय तो UPSC में हैंही नहीं।इसीलिए इंजीनियरिंग क्षेत्र के उम्मीदवार हयूमैनिटिज़ के विषयों को लेने के लिए बाध्य होते हैं। मतलब जहां बाकि लोग अपने स्नातक वाले विषय को ही ऐच्छिक विषय चुनते हैं वहीँ इंजीनियरिंग के छात्र एक पूर्णतया नए विषय से शुरुआत करते हैं।
हिंदी अंग्रेजी का पेपर क्वालीफाइंग होता है तो उसके नंबर नहीं जुड़ते। बाकी पेपर में तीन घंटे में औसतन 50 पेज लिखने होते हैं। करीब 4500 शब्द। यूनिवर्सिटी की एक्साम्स में आँख मूँद के पन्ने भरने का टैलेंट यहाँ काम आता है।
भाषा की अपनी समस्या है। अधिकतर किताबें अंग्रेजी में आती हैं। अच्छे अख़बार जैसे इंडियन एक्सप्रेस और द हिन्दू अंग्रेजी में आते हैं। प्रश्नपत्र भी अंग्रेजी में ही सेट किया जाता है। पेपर में गूगल ट्रांसलेटर की मदद से ऐसा हिंदी अनुवाद किया जाता है जो शायद जयशंकर प्रसाद भी न समझ पाएं।
कुल मिला कर कोई लेवल प्लेइंग फील्ड है ही नहीं। सिविल सेवा की उत्तरपुस्तिकाओं की जांच प्रक्रिया भी अति गोपनीय रखी जाती है। कोई मॉडल आंसर नहीं होते हैं। एग्जामिनर अपने मन माफिक नंबर दे सकते हैं।
एक बार जांच होने के बाद न तो कॉपी देखी जा सकती है, न रिव्यु अपील की जा सकती है, न रीचेकिंग कराई जा सकती है। जो UPSC ने कह दिया सो कह दिया। मैन्स ही सबसे महत्वपूर्ण चरण है। मैन्स में सेलेक्ट होते हैं दो से ढाई हजार।
आगे इंटरव्यू है और फिर फाइनल रिजल्ट। जिसमें होते हैं "The Chosen Ones". 10 लाख में से सेलेक्ट हुए 800, और उनमें से भी IAS केवल 180. मतलब पहले छाछ को मथ के मक्खन निकाला। फिर मक्खन को दोबारा मथा ताकि और बढ़िया मक्खन निकल सके।
फिर उसमें से ऊपर ऊपर से थोड़ा सा मक्खन उठा के उसे दोबारा मथा ये सोच के अभी और शुद्ध मक्खन निकलेगा। मैकाले, जिन्होंने सिविल सेवा परीक्षा की रूपरेखा तैयार की थी, उन्होंने कहा था कि इस परीक्षा का उद्देश्य उम्मीदवार में "Ordinary Prudence" यानि सामान्य विवेक जांचना है।
UPSC को दस लाख लोगों में से केवल 180 विवेकशील लोग मिले!!! और उन 180 विवेकशील लोगों ने देश की क्या हालत की है ये किसी से छुपा नहीं है। अगर इस भारी भरकम ढकोसले की बजाय अक्कड़-बक्कड़ करके भी 180 लोग सेलेक्ट कर लेते तो भी इससे अच्छा देश चला लेते।
और ये सच्चाई सरकार से भी छुपी नहीं है। इसीलिए तो सिविल सेवा में सुधार के लिए कभी बंसल समिति तो कभी बसावन समिति बनायी जाती है। लेकिन अहोभाग्य!!! इन कमिटियों में भी तो पुराने नौकरशाह ही भरे हैं, जिन्हें देश से ज्यादा चिंता है अपने बच्चों की।
तभी तो सिविल सेवा परीक्षा के लिए अधिकतम आयुसीमा २६ वर्ष करने जैसे सिफारिशें देते हैं। नौकरशाहों के बच्चे तो पैदा होने के साथ ही सिविल सेवा का टॉनिक पी लेते हैं। 21-22 साल की उम्र तक तो सारा सिलेबस कई कई बार रिवाइज़ हो चुका होता है।
फिर अख़बारों में चौड़े होके हैडलाइन छपवाते हैं, "21 वर्ष की उम्र में रचा कीर्तिमान, पहले ही प्रयास में गाड़े झंडे"। यहां गाँव के युवा को 21 साल की उम्र तक पता ही नहीं होता की जिंदगी में करना क्या है। ग्रेजुएशन करने के बाद तो पता चलता है कि ऐसी भी कोई परीक्षा होती है।
जब तक एग्जाम देने लायक होते हैं तब तक तो सरकार हमें बूढा घोषित कर देती है। नेताओं केलिए भी अच्छा है। जितना यंग अफसर उतना कम अनुभव। उसको दबाना, बहकाना, खरीदना, हड़काना, डराना उतना ही आसान होगा। अगर ठेठ गांव से घोर असुविधाओं में पलेबढे हुए युवा को अधिकारी बनाओगे तो उसे कैसे दबाओगे?
जो पहले ही पहाड़ों, जंगलों और देश के सुदूर कौनों से आया है उसे रिमोट लोकेशन पे ट्रांसफर के नाम पे कैसे डरा पाओगे? हाँ जो बड़े शहर में रहा हो, जिसके मां-बाप पैसे वाले हों, जिसने AC के बाहर कदम न रखा हो उसे जरूर गांवों में ट्रांसफर से डर लगेगा।
एक ईमानदार IAS की सिस्टम में जाते ही क्या हालत होती है इसके बारे में 2013 के IAS टॉपर श्री गौरव अग्रवाल ने अपने इस ब्लॉग में बखूबी दर्शाया है। एक बार जरूर पढ़ें।
क्या वास्तव में देश को ऐसे चाटुकार सामंत वर्ग की आवश्यकता है? जिस नवयुवक को सीधे जिला अधीक्षक बना दिया जाए क्या वो कभी पटवारी, हवलदार जैसे लोगों की परिस्थिति समझेगा? क्या कोई कांस्टेबल कभी SP बनने के सपने देख सकता है?
उसे भी पता है कि वो कितना भी अच्छा काम कर ले कभी साहब नहीं बन सकता। क्यूंकि साहब तो आसमान से पैराशूट से उतारे जाते हैं। तो फिर अच्छा काम करना ही क्यों? करो घूसखोरी, नौकरी जायेगी नहीं और प्रमोशन तो ऐसे भी नहीं होना।
बाहर से आयातित लोगों को जिलाधिकारी बनाना अंग्रेजों की मजबूरी थी क्यूंकि वे देश को गुलाम रखना चाहते थे। हमारी ऐसी कौनसी मजबूरी है? सिवाय इसके कि नेताओं को गुलाम प्यादे चाहियें जो उनके इशारों पे काम करें। पहले भी राजा का बेटा राजा और सामंत का बेटा सामंत बना करता था।
राजा सामंतों पे हुकुम चलते थे और सामंत जनता का शोषण करते थे। आज भी तो वही हो रहा है। पुराने सामंत बड़ी जागीरदारी और अधिकारों के लालच में राजा की जी हुजूरी किया करते थे और आज के सिविल सर्वेंट मलाईदार पोस्टिंग के लिए नेताओं की करते हैं।
क्यों नहीं इस सामंतवादी, अभिजात्यिक व्यस्था को ख़तम कर एक समान एंट्री लेवल रखा जाए और फिर परफॉरमेंस के हिसाब से पदोन्नति हो। अगर पंचायत सचिव को ये उम्मीद हो कि वो अगर ईमानदारी और मेहनत से काम करे तो वो कलेक्टर भी बन सकता है तो वो भी जोश से काम करेगा।
हो सकता है गाँवों कि हालत सुधर जाए। हो सकता है देश की हालत सुधर जाए।
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थ्रेड: #बेगानी_शादी
नौकरीपेशा आदमी के लिए जिंदगी की हर चीज मुसीबत की तरह ही लगती है। फलाने की शादी है। ज्यादा करीब हुआ तो छुट्टी लेनी पड़ेगी, नहीं तो ऑफिस से जल्दी निकलकर शादी में जाना पड़ेगा। अगर फैमिली रिलेशन है तो वाइफ को भी साथ ले जाना पड़ेगा।
नहीं तो कोशिश तो अकेले ही अटेंडेंस लगाने की रहती है। आठ बजे ऑफिस से छूटो, फिर शादी में जाओ। लिफाफा भी तो देना है। घर पहुँचते पहुँचते 11 बज जाते हैं। त्यौहारों का तो और भी बुरा हाल है। एक दिन की छुट्टी में क्या त्यौहार मनाये आदमी।
दिवाली पे अक्सर एक दिन की छुट्टी आती है। कई जगह दो दिन की और कई जगह तो कोई छुट्टी ही नहीं। एक दिन की छुट्टी में क्या दिवाली मनाये आदमी?
थ्रेड: #हंस_चला_बगुले_की_चाल
भारत एक मानसून आधारित देश हैं जहाँ साल में एक तिहाई समय मानसून का होता है। मानसून में जबरदस्त बरसात होती है। साल भर के हिस्से की बरसात चार महीनों में ही हो जाती है। बाकी समय लगभग सूखा ही रहता है।
यहाँ के मानसून को समझना विदेशियों के लिए हमेशा से एक टेढ़ी खीर ही रहा। विशेषकर अंग्रेज तो मानसून से इतने परेशान थे कि भारत की कृषि व्यवस्था की रीढ़ तोड़कर ही माने। लेकिन भारतीयों के लिए मानसून जीवनशैली का एक अभिन्न अंग था। हमारी जीवनशैली मानसून के हिसाब से ढली हुई थी।
मानसून के "चौमासे" में न तीर्थ यात्रा होती थी और ना ही शुभ कार्य जैसे विवाह इत्यादि। इन चार महीनों में हो देवताओं से सोने की परंपरा शुरू हुई थी वो आज भी जारी है। राम ने भी लंका पर चढ़ाई चार महीने के लिए रोकी थी और मानसून के दौरान माल्यवान पर्वत पर इंतज़ार किया था।
थ्रेड: #अंधी_पीसे_कुत्ता_खाय
भूखी जनता राजा के पास पहुंची: महाराज!!! विदेशी सब लूट के ले गए। खाने को कुछ नहीं है। कुछ कीजिये।
राजा (मंत्रियों से): सबके भोजन का इंतज़ाम करो। और सबको अन्न उगाने के लिए पर्याप्त भूमि, बीज खाद दो ताकि भविष्य में कोई भूखा न रहे।
कुछ समय बाद राज्य के सभी धनी व्यापारी राजा के पास पहुंचे: महाराज!!! हम तो बर्बाद हो गए।
राजा: क्या हुआ?
व्यापारी: महाराज!!! लोग खुद ही अन्न उगा रहे हैं और खा रहे हैं। साथ ही बुरे समय के लिए अन्न बचा भी रहे हैं। लोग आत्मनिर्भर हो रहे हैं। हमारी किसी को जरूरत ही नहीं।
फिर हमारा क्या होगा?
राजा: तो मैं क्या करूँ? जनता को अन्न उगाने से तो नहीं रोक सकता।
व्यापारी: लेकिन अन्न बचाने से तो रोक सकते हैं। ताकि हमारी भी दुकान चल सके। याद रखिये की आपका सिंहासन रथ वगैरह सब हमने ही स्पांसर किया हुआ है।
तो हुआ यूं कि पिछले महीने हमारी मोबाइल फ़ोन की एलिजिबिलिटी रिन्यू हुई। और हमारा फ़ोन भी काफी पुराना हो चुका था। छः साल से एक ही फ़ोन को चला रहे थे। हमारे फ़ोन को लोग ऐसे नजरों से देखते थे
जैसे कि हड़प्पा की खुदाई से निकला हुआ कोई नमूना देख लिया हो। लेकिन हम भी उस पुराने फ़ोन को घूंघट के ऑउटडेटेड रिवाज़ की तरह चलाये जा रहे थे। लेकिन समस्या तब हुई जब मोबाइल बैंकिंग के एप्प ने एंड्राइड 8 को ब्रिटिशराज घोषित करके आज़ादी की मांग कर दी।
अब तो हमें नया फ़ोन चाहिए ही था। अब चूंकि हम मोबाइल की दुनिया में चल रही क्रांति से नावाक़िफ़ थे इसलिए हमने यूट्यूब का रुख किया। वहां हमको अलग ही लेवल की भसड़ मिली। उनके बारे में बाद में बात करेंगे।
नोटबंदी जैसी तुग़लकी स्कीम जिससे सिर्फ एक पार्टी और चंद पूंजीपतियों को हुआ, लेकिन पूरा देश एक एक पैसे के लिए तरस गया, धंधे बर्बाद हो गए, बैंकरों ने अपनी जान खपा दी, दिन रात पत्थरबाजी झेली, रोज गालियां खाई,
साहब के कपड़ों की तरह दिन में कई कई बार बदले नियमों को झेला, नुक्सान की भरपाई जेब से करी। और जैसा कि होना था, भारी मीडिया मैनेजमेंट और ट्रोल्स की फ़ौज के बावजूद नोटबंदी फेल साबित हुई।
जब नोटबंदी फेल हुई थी तो बड़ी बेशर्मी से इन लोगों ने नोटबंदी की विफलता का ठीकरा बैंकों के माथे फोड़ दिया।
"अजी वो तो बैंक वाले ही भ्रष्ट हैं वरना जिल्लेइलाही ने तो ऐसे स्कीम चलाई थी कि देश से अपराध ख़त्म ही हो जाना था।"
थ्रेड: #ड्यू_डिलिजेंस
बैंक में ड्यू डिलिजेंस बहुत जरूरी चीज है। बिना ड्यू डिलिजेंस के हम लोन देना तो दूर की बात है कस्टमर का करंट खाता तक नहीं खोलते।
लोन देने से पहले पचास सवाल पूछते हैं। पुराना रिकॉर्ड चेक करते हैं। चेक बाउंस हिस्ट्री चेक करते हैं।
और लोन देने के बाद भी उसकी जान नहीं छोड़ते। किसी कस्टमर के खाते में अगर एक महीने किश्त ना आये तो उसकी CIBIL खराब हो जाती है। और तीन महीने किश्त न आये तो खाता ही NPA हो जाता है और फिर उसे कोई लोन नहीं देता। #12thBPS
अगर डॉक्यूमेंट देने में या और कोई कम्प्लाइंस में ढील बरते तो बैंक पीनल इंटरेस्ट चार्ज भी करते हैं। लेकिन बैंकों का ये ड्यू डिलिजेंस केवल कस्टमर के लिए ही है। पिछले 56 सालों से बैंकरों का अपना रीपेमेंट टाइम पर नहीं आ रहा। हर पांच साल में बैंकरों का वेज रिवीजन ड्यू हो जाता है।