मोदी जी तो हमारे देश के लिए भगवान हैं...
क्योंकि 2014 से पहले भारत में सब भूखे नंगे थे, ना रहने को घर था, ना कोई रोज़गार था, ना शौचालय था, ना कोई हिंदू सुरक्षित था।
मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले कांग्रेस ने 60 साल में इतने घोटाले किये कि देश कंगाल हो चुका था।
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कांग्रेस ने ना कोई यूनिवर्सिटी, ना IIT, ना AIIMS जैसे बड़े सरकारी अस्पताल, ना एअरपोर्ट, ना ISRO जैसे वैज्ञानिक संस्थान और ना ही BSNL, LIC जैसे सरकारी संस्थान बनाए,
देश का सारा पैसा गाँधी परिवार ने इटली भेज दिया था, बैंक दिवालिया हो चुके थे, जनता त्राहि त्राहि कर रही थी।
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दुनिया की भी हालात बद से बदतर होती जा रही थी 2014 आते आते तो धरती ने घूमना ही बंद कर दिया था, फिर 2014 में मोदी रूपी भगवान आए और देश को पहला ईमानदार प्रधानमंत्री मिला जिसकी कृपा से धरती ने फिर से घूमना शुरू कर दिया।
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मोदी जी 2014 में विष्णु के 11वें अवतार बन कर प्रधानमंत्री बने तब जा हमें खाने के लिए दो वक्त की रोटी नसीब हुई, पहनने को कपड़े मिले, देश के हर नागरिक को नौकरी मिली, 125 करोड़ परिवारों को रहने को घर मिला।
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मोदी जी ने मोबाइल सेवा शुरू की, स्मार्ट फोन के साथ फ्री डाटा भी दिलवाया, ताकि उनके "मन की बात" जनता सुन पाये।

पेट्रोल जो कि 54/56 रू पर था वो रात दिन मेहनत करके 85-90 रू पर ले आए, डाॅलर 52-54 रू तक पहुंचा था मोदी जी ने 18-18 घंटे काम करके 76 रू तक पहुंचा दिया।
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मोदी जी ने 350रू का गैस सिलेंडर 900 रू तक पहुंचा कर भारत को हिंदू राष्ट्र बना दिया।

बिना छुट्टी लिए 6 साल मेहनत करके जीडीपी 8% से - 23% पर ले आए। महान अर्थशास्त्री मोदी जी की सूझबूझ के कारण बेरोज़गारी ने 45 साल का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया और 19 बैंकें दिवालिया हुईं।
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कोरोना महामारी पर WHO और राहुल गांधी की दी गई चेतावनियों को नज़र अंदाज़ करके गोबर, गौमूत्र, आयुर्वेद, ताली थाली की ध्वनि तरंगों और दिया मोमबत्ती जलवा कर लड़ाई लड़ी और दुनिया में देश को 52वें स्थान से तीसरे स्थान पर ले आए।
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मोदी जी जैसा देशभक्त और महान हिंदू नेता ना हमारे देश में पैदा हुआ था और ना ही कभी होगा
इसलिए महान अर्थशास्त्री और हिंदू धर्म के इकलौते रक्षक मोदी जी को जाने मत देना, जब तक हर देशवासी के हाथ में कटोरा ना आ जाए।‌
😕🙏🙏
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24 Nov
यावज्जीवेत्सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् ।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ।।
त्रयोवेदस्य कर्तारौ भण्डधूर्तनिशाचराः ।
-महर्षि चार्वाक

मनुष्य जब तक जीवित रहे तब तक सुखपूर्वक जिये । ऋण करके भी घी पिये । अर्थात् सुख-भोग के लिए जो भी उपाय करने पड़ें उन्हें करे ।
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दूसरों से भी उधार लेकर भौतिक सुख-साधन जुटाने में हिचके नहीं । परलोक, पुनर्जन्म और आत्मा-परमात्मा जैसी बातों की परवाह न करे ।
भला जो शरीर मृत्यु पश्चात् भष्मीभूत हो जाए, यानी जो देह दाह संस्कार में राख हो चुके, उसके पुनर्जन्म का सवाल ही कहां उठता है ?
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तीनों वेदों के रचयिता धूर्त प्रवृत्ति के मसखरे निशाचर रहे हैं, जिन्होंने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए आत्मा-परमात्मा, स्वर्ग-नर्क, पाप-पुण्य जैसी बातों का भ्रम फैलाया है ।
(स्रोत: ज्ञानगंगोत्री, संपादन: लीलाधर शर्मा पांडेय, ओरियंट पेपर मिल्स, अमलाई, म.प्र., पृष्ठ 138)
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😇😇
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21 Nov
'कुकरहाव' कुत्तों की लड़ाई का वो तसल्लीबक्श पल होता है, जब कुत्तों के दल आपस में एक दूसरे पर झपट पड़ने, पीछा करने, खदेड़ने या रगड़ने के बजाय थोड़ी थोड़ी दूरी पर बैठ कर इत्मीनान से बैठ कर, या लेट कर या खड़े होकर एक दूसरे पर भौंकते हैं, गर्राते हैं या खौं खौं करते हैं। 😄
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उनके हाव भाव से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वे लड़ाई को किसी निर्णायक क्षण पर ले जाने के उत्सुक हैं, बल्कि तसल्ली के साथ, सिर्फ लड़ाई का आनंद लेना चाहते हैं। क्योंकि बीच बीच में शरीर को खुजाने, चाटने या गाहे बगाहे टाँग उठा कर हल्के होने का क्रम चलता रहता है। 😄
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ऐसा लगता है कि वे गहन गंभीर बहस कर रहे हैं। हम दुर्भाग्यवश उनकी भाषा नहीं समझते, वरना दिख जाता कि वे कुत्तों के विभिन्न धर्म, या उनकी सीमा पर घुसपैठ या दूसरे मोहल्ले के कुत्तों द्वारा किसी की सीमा में अतिक्रमण के मुद्दों पर विरोधी कुत्तों की भूमिका पर सवाल उठा रहे होते हैं।
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20 Nov
ईशावास्य उपनिषद में एक सूत्र है -तेन त्यक्तेन भुंजीथा: !
इसका अर्थ है कि जो त्याग करते हैं वे ही भोग पाते हैं।
यह उन विरोधाभासी सूत्रों में से है जो अस्तित्व के रहस्य का उद्घाटन करते हैं। अब इसका अर्थ क्या हुआ? यह तो पहेली सी बुझा दी?
..1/10
त्याग और भोग तो एकदम विपरीत हैं, या तो त्याग करो या भोग करो - दोनों एक साथ कैसे हो सकते हैं?
तर्क और बुद्घि से सोचें तो यह विरोधाभास लगता है, लेकिन अस्तित्वगत रूप से देखें तो यही अस्तित्व का रहस्य है।
अस्तित्व विरोधाभासी ही है।
..2/10
और यह विरोध एक दूसरे के विपरीत नहीं है, एक दूसरे के परिपूरक हैं।
रात और दिन एक दूसरे के विरोधी हैं? क्या दुख और सुख परस्पर विपरीत हैं? मेरा वक्तव्य विरोधाभासी लगता है, पर है नहीं। यह दृष्टिकोण है।
यह शब्द विरोधाभास बहुत सटीक है, इसका अर्थ हुआ विरोध का आभास, विरोध नहीं।
..3/10
Read 10 tweets
13 Nov
कल, 12 नवंबर को डॉ. सालिम अली का 125 वां जन्म दिवस था!
भावभीना पुण्यस्मरण!
💐🙏💐
भारत के सर्वश्रेष्ठ पक्षी-शास्त्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण, डॉ. सालिम अली से मेरी 1960 के दशक के अंत में हुई एकमात्र मुलाकात को याद कर के आँखें नम हैं।
1/9
बड़ा अजीब था वो मंज़र, जब साइकिल के युग में अपने शहर से एक अकेले बुजुर्ग को 5 हॉर्स पॉवर की Sunbeam motorcycle से अकेले गुज़रते देखना।
पीछे कैरियर पर लदा हुआ बड़ा सा बैग, चमड़े की जैकिट, आँख पर चश्मा, कंधे पर भारी भरकम कैमरा और 5 क्विंटल की बाइक और बामुश्किल 50 किलो का शरीर!
2/9
उस पर कहर, मोटरसाइकिल का खराब हो जाना! बुज़ुर्गवार को अकेला परेशान देख मैंने अपनी साइकिल रोकी, और उस कार्टूननुमा शख्स से कौतूहलवश पूछ ही लिया - 'अंकल, कोई दिक्कत है क्या?'

'बेटा, ज़िंदगी खुद एक दिक्कत है' जवाब मिला।
3/9
Read 9 tweets
12 Nov
बिहार में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र को ‘बिहार बदलाव पत्र’ का नाम दिया था, लेकिन नतीजों से साबित‍ किया कि बदलाव की असल जरूरत बिहार से ज्यादा कांग्रेस को ही है।
राज्य में 2015 के चुनाव में जहां कांग्रेस ने 27 सीटें जीती थीं, वहीं इस बार यह आंकड़ा 19 ही रह गया। 🤦‍♂️
...1/13
कांग्रेस का चुनाव अभियान भी कोई खास दमदार नहीं था। पार्टी के स्टार नेता राहुल गांधी ने जिन क्षेत्रों में सभाएं कीं, पार्टी वहां भी ज्यादतर सीटें हार गईं।
सभाओं में राहुल उसी मोदी से प्रश्नवाचक मुद्रा में भाषण देते रहे, जैसे कि पहले देते रहे हैं।
...2/13
लेकिन राजनेता की विश्वसनीयता तब बनती है, जब सवालों के जवाब भी उसके पास हों।
राहुल गांधी के भाषणों से कई बार ऐसा लगता है कि कहीं वो भारतीय राजनीति के ‘पर्मनेंट पेपर सेटर’ तो नहीं बन गए हैं?
...3/13
Read 13 tweets
11 Nov
ओपीनियन पोल, एग्जिट पोल, काउंटिंग ट्रेंड और एक्जेक्ट रिजल्ट। हर चुनाव की वो स्टेप्स हैं, जिनको नापना चुनाव विश्लेषक की जिम्मेदारी और शगल होता है। हकीकत में उन्हें उड़ती चिडि़या को देखकर बताना होता है कि वो किस डाल पर बैठेगी।
1/13
अब चिडि़या है कि कई बार उस डाल पर जा बैठती है, जो विश्लेषकों की नापसंद होती है या कई दफा वो किसी भी डाल पर बैठने के बजाए फुर्र से उड़ जाती है या फिर आसमान में ही पर मारती रहती है।
2/13
चुनाव विश्लेषक चिडि़या की हर अदा का विश्लेषण इस अंदाज में करते हैं ‍कि मानो चिडि़या उन्हीं से पूछकर उड़ी थी। वैसे कई चुनाव विश्लेषक अपनी राय जताते हुए यह भी कहे जाते हैं कि वो जो कह रहे हैं, अंतिम परिणाम वैसा होगा, जरूरी नहीं है।
3/13
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