प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी से देश में ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और उसकी परिसीमा का मुद्दा फिर चर्चा में है। शाहीन बाग प्रकरण में अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विरोध प्रदर्शन का संवैधानिक अधिकार सब को है, लेकिन इसकी आड़ में सार्वजनिक स्थान पर कब्जा नहीं किया जा सकता।
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जबकि तब्लीगी जमात से जुड़े मामले में एक याचिका पर सुनवाई में चीफ जस्टिस एस.ए.बोबडे ने गंभीर टिप्पणी की कि आज ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ सबसे ज्यादा दुरूपयोग हो रहा है। इन पर बहुत गंभीरतापूर्वक विचार करने की जरूरत है।
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बेशक आज जरूरत इस बात की भी है कि कोर्ट को ऐसी टिप्पणी करने की नौबत क्यों आई? और ऐसा होने देने के लिए कौन जिम्मेदार है, तंत्र की मनमानी या व्यक्ति की स्वच्छंदता?
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यूं तो ये दोनो मुकदमे अलग-अलग हैं, लेकिन इनमे समान बिंदु ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ यानी बोलने या बात कहने की सार्वजनिक स्वतंत्रता का है। चूंकि ये अब मानवाधिकार में ही शामिल है। अत: इसके औचित्य पर तो कोई सवाल है ही नहीं, यह अधिकार मनुष्य की गरिमा और उसकी चेतनता से जुड़ा है।
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भारतीय संविधान में भी अभि‍व्यक्ति की आजादी एक मौलिक अधिकार है। संविधान इसकी रक्षा की गारंटी देता है। एक लोकतांत्रिक तथा बहुभाषी,बहुजातीय और बहुधर्मी देश होने के बावजूद बुनियादी रूप से हमारे एक होने और रहने की जमानत भी है। इसे खत्म करने का अधिकार किसी को नहीं है।
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न ही ऐसी किसी कोशिश का समर्थन किया जा सकता है। लेकिन शाहीन बाग प्रकरण ने लोकतांत्रिक ढंग से विरोध प्रदर्शन के औचित्य के साथ इस प्रश्न को भी रेखांकित किया है कि क्या ऐसा विरोध प्रदर्शन उन लोगों को मुश्किल में डाल कर किया जाना चाहिए, जो समर्थन में नहीं हैं या फिर तटस्थ हैं?
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क्या ध्यानाकर्षण का यह तरीका पूरी तरह निर्दोष है?
इन दोनो मामलों में मुख्‍य समानता यह है कि ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की आड़ में अपने राजनीतिक एजेंडे चलाने की पुरजोर कोशिश की गई। दोनो में एक समुदाय विशेष को टारगेट बनाने की कोशिश की गई।
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मामला इतना गड्डमड्ड करने की कोशिश हुई कि कौन ‘टारगेट’ और कौन ‘मोहरा’ यह फर्क करना भी मुश्किल हो गया। जहां शाहीन बाग मामले में भारत और मोदी सरकार की छवि मुस्लिम विरोधी चित्रित करने की थी तो तब्लीगी जमात मामले में कोरोना का सारा दोष जमातों पर मढ़ने का लगभग स्पष्ट एजेंडा था।
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'अभिव्यक्ति की आजादी’ के इस संवेदनशील मुद्दे की लक्ष्मण रेखा पर भी कुछ सवाल खड़े हैं। यह बात सही है कि हर पब्लिक प्लेस पर विरोध प्रदर्शन की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। आखिर आम जनता के कष्ट बढ़ाकर आप उसका नैतिक समर्थन कैसे हासिल कर सकते हैं?
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हालांकि ‘पब्लिक प्लेस’ पर विरोध अथवा समर्थन को लेकर राजनीतिक दलों और सरकारों की व्याख्या अपनी सुविधानुसार और सिलेक्टिव होती है। मसलन यदि सत्तारूढ़ दल को राजनीतिक जमावड़े से लेकर कवि सम्मेलन तक कराना हो तो वह सार्वजनिक स्थल का ‘सदुपयोग’ होगा।
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भले ही आम लोगों को कितनी ही परेशानी उठानी पड़े।
लेकिन यही काम सत्ता के विरोध के लिए किया जाएगा तो वह ‘दुरूपयोग’ होगा। इस दुराग्रह को भी खत्म करना जरूरी है।
‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का अर्थ हर बात का विरोध करना नहीं है तो हर मामले में सरकार के अनुकूल पुंगी बजाना भी नहीं है।
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4 Oct
मैं कांग्रेस को सिर्फ इसलिये नहीं पसन्द करता कि आज़ादी की लड़ाई में इसके लीडरों ने देश का नेतृत्व किया..
बल्कि मेरी सोच, मेरी विचारधारा का राजनैतिक पटल पर कोई दल यदि प्रतिनिधित्व करता है तो वह काँग्रेस है।
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मैं जानता हूँ, व्यक्तिपूजक होना खतरनाक होता है,किन्तु नेहरू के प्रति मुझे आकर्षण है। मुझे नेहरू की तार्किकता और बुद्धिमानी आकर्षित करती है,
गांधी जी की सात्त्विक सीमा है, नेहरू की व्यवहारिकता असीम है।
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तमाम मानवीय कमजोरियों और भूलों के बावजूद सिर्फ नेहरू ही इस देश के सलामी बल्लेबाज बन सकते हैं, यह सोचने की दूरदर्शिता गांधी जी में थी और वे सही साबित हुए।
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Read 9 tweets
1 Oct
पप्पू लगभग हर दूसरे भारतीय घर में मिल जाएंगे। तकरीबन हर दूसरे तीसरे मां बाप अपने लाडलों का नाम पप्पू रखते हैं।

आपने गुंडों मवालियों को लड़ते हुए देखा होगा, जिसे ये लोग कमज़ोर समझते हैं, जिसे चिढ़ाना चाहते हैं, उसे कहते हैं बच्चा है ये, पप्पू है ये।

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तो जो ये पप्पू है , इसका नामकरण इन बड़ों के सबसे बड़े आदर्श बलात्कार सम्राट ठग आशुमल (आसाराम) ने रखा था। ज़ाहिर है टारगेट करना था इसे। लेकिन ये पप्पू अंदर से भी मासूम है।

नहीं भड़का। भड़का लो जितना चाहे।

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मुझे अगर कोई बाल बुद्धि या बच्चे की तरह कहता है तो खुशी होती है।
जीसस ने कहा था मेरे स्वर्ग के राज्य में वही प्रवेश कर सकेगा जो बच्चा बन जायेगा।
मतलब निर्दोष! छल कपट से दूर।
बड़ों की दुनिया ! क्या देख रहे हैं बड़ों के हाथ में?
युद्ध, छल, कपट, हिंसा, बलात्कार, अपहरण!
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Read 8 tweets
28 Sep
मोदी जी तो हमारे देश के लिए भगवान हैं...
क्योंकि 2014 से पहले भारत में सब भूखे नंगे थे, ना रहने को घर था, ना कोई रोज़गार था, ना शौचालय था, ना कोई हिंदू सुरक्षित था।
मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले कांग्रेस ने 60 साल में इतने घोटाले किये कि देश कंगाल हो चुका था।
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कांग्रेस ने ना कोई यूनिवर्सिटी, ना IIT, ना AIIMS जैसे बड़े सरकारी अस्पताल, ना एअरपोर्ट, ना ISRO जैसे वैज्ञानिक संस्थान और ना ही BSNL, LIC जैसे सरकारी संस्थान बनाए,
देश का सारा पैसा गाँधी परिवार ने इटली भेज दिया था, बैंक दिवालिया हो चुके थे, जनता त्राहि त्राहि कर रही थी।
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दुनिया की भी हालात बद से बदतर होती जा रही थी 2014 आते आते तो धरती ने घूमना ही बंद कर दिया था, फिर 2014 में मोदी रूपी भगवान आए और देश को पहला ईमानदार प्रधानमंत्री मिला जिसकी कृपा से धरती ने फिर से घूमना शुरू कर दिया।
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Read 8 tweets
27 Sep
आर्थर कॉनन डायल की कृति शेरलॉक होम्स में एक कहानी है, "The Illistratious Client". लड़की को पता है कि जिससे प्रेम करती है वह womanizer है, मानसिक रोगी है, और अपनी पत्नियों का हत्यारा भी। फिर भी वो उसे बेइंतहा चाहती है, उसकी मीठी मीठी flattering बातें उसे बेहद पसंद हैं।
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वह लड़की मरने के करीब पहुँच जाती है। उसका अगला शिकार बनने के बेहद करीब। लेकिन ख़ुद को गलत कैसे माने?

उसी तरह, देश के एक एक इंच को बेचा जा रहा है, लेकिन मोदी समर्थक लोगों को ज़रा सा भी संदेह नहीं हो रहा है।
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जब तक इनके खुद के घर नहीं जल रहे, ये भरपूर चटखारे लेकर सरकार का विरोध करने वालों का मज़ाक उड़ाते रहते हैं।

कुछ रिजल्ट तुरन्त पाने की बेचैनी ने ही क्रांतिकारियों को हथियार उठाने पर मज़बूर किया होगा, वे राम और कृष्ण के द्वारा किये गए अंतिम विकल्प को पहले आजमा रहे थे।
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Read 9 tweets
20 Sep
प्रासंगिकता तो देखिए 😂

1950 में सोहराब मोदी की फिल्म 'भिखारियों का सरदार' रिलीज़ हुई थी। फिल्म बुरी तरह फ्लॉप रही थी और आज इसका कोई प्रिंट मौजूद भी नहीं है।

फिल्म की कहानी थी -
एक व्यापारी एक भिखारी को सड़क से उठाकर एक राज्य का राजा बना देता है,
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लेकिन चूंकि भिखारी को राजपाट का कोई अनुभव या अंदाजा नहीं होता, इसलिए वह पूरे राज्य का बंटाधार कर देता है।
दुश्मन राजा की सेना उसके राज्य की सीमा पर पड़ने वाले गाँवों को कब्ज़िया लेती है और जनता भुखमरी की शिकार हो जाती है।
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इस कारण सैकड़ों लोग खाने की तलाश में अपने घरों से निकल जाते हैं और रास्ते में मारे जाते हैं।

फिल्म के अंत तक भिखारी एकदम राजसी गेटअप में आ जाता है, दाढ़ी बढ़ा कर। लेकिन तब तक राज्य की माली हालत इतनी खराब हो जाती है कि वह चाहकर भी कुछ नहीं कर पाता।
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Read 4 tweets
19 Sep
अंधभक्त कभी भी गलत को गलत नहीं मान सकता!
जो जहाँपनाह कह दें वो सही ! 🙏

जब वो जीएसटी को बुरा कहते थे तब वो सही थे, जब उन्होंने जीएसटी लागू किया तब वो सही हो गए!
जब वो आधार कार्ड का विरोध करते थे तब वो सही थे, जब उन्होंने आधार लागू किया तब वो सही हो गए!
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जब वो मनरेगा का भरी संसद में मजाक उड़ा रहे थे तब वो सही थे, जब उन्होंने मनरेगा लागू की तब वो सही हो गए!
जब उन्होंने नोटबंदी जैसी मूर्खता की तब भी आपने तालियाँ बजाईं,
जब उन्होंने बोला न कोई घुसा है न घुसाया गया है तब भी आपने तालियाँ बजाईं,
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जब उन्होंने चार घंटे के नोटिस पर पूरे देश में ताला डाल दिया तब भी आपने तालियाँ बजाईं,
आप लोग बोले कि मोदी ने अर्थव्यवस्था डुबाई तो सोच कर देशहित में ही डुबाई होगी..
उन्होंने ताली, थाली, टॉर्च से कोरोना भगाने का गणित दिया आप सब उस जहालत में एक साथ लगे रहे!
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