आदि शंकराचार्य ने देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् की भी रचना की है। जैसा कि नाम से वर्णित है कि यह अपराध क्षमा के लिए लिखा गया है। इस स्तोत्र में अपनी अज्ञानता, अपूर्णता, पापमय होने की बात स्वीकारते हुए शंकराचार्य लिखते हैं कि हे माता! मैं तुम्हारा मन्त्र, यंत्र, स्तुति, आवाहन,
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ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्रा आदि कुछ भी नहीं जानता, इसलिए तुम्हारे बारे मे लिखते हुए, तुम्हारी पूजा में, स्तुतिगान में कोई त्रुटि हुई हो तो क्षमा करो।

वो माता से कहते हैं:

मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि ।
एवम् ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यम् तथा कुरु ।।
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तात्पर्य यह है कि हे महादेवि! मेरे समान कोई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पाप-नाश करने वाली नहीं है, यह जान कर जैसा उचित समझो वैसा करो।

और यहाँ लोग चार कहानी लिख कर बताते हैं कि उनके जैसा कोई नहीं है।
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अरे आदि शंकराचार्य लिख रहे हैं कि उनको कुछ नहीं आता, और लिखने में हुई भूल को क्षमा करो माँ। जिनके एक श्लोक का शब्दार्थ समझने में आधा घंटे, हर भावार्थ जानने में घंटे भर और हर शब्द के पीछे की कहानी समझनें में दिन निकल जाए, वो स्वयं को अज्ञानी कहते हैं।
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17 Oct
भक्तजनो! अब हम महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र के ११वें श्लोक में प्रयुक्त यमक अलंकार पर चर्चा करेंगे कि यहाँ आए पाँच सुमन, रजनी और भ्रमर के क्या अर्थ हैं। यहाँ देवी के आंतरिक (गुणों) और बाह्य (रूप) के सौंदर्य की व्याख्या की गई है। श्लोक पढ़िए: #Mahishasurmardini
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अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोरमकान्तियुते
श्रितरजनीरजनीरजनीरजनीरजनीकरवक्त्रभृते ।
सुनयनविभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमरभ्रमराभिदृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ।।

पहले चार 'सुमनः' का अर्थ क्रमशः सुप्रसन्न, सुंदर मन वाली, पुष्प, फूल सी मृदुल है,
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और इसको बाद 'सुमन' का प्रयोग 'सुमनोरमकान्तियुते' में हुआ है जहाँ 'मन को प्रिय लगने वाली आभा से युक्त' अर्थ आता है।

अगले यमक में पहले 'श्रितरजनी' का अर्थ है रात्रि से सुशोभित, उसके बाद वाली 'रजनी' देवी दुर्गा के कई नामों में से एक है।
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17 Oct
माता को रम्यकपर्दिनी भी कहा गया है। रम्य और कपर्द शब्दों की संधि से ये नाम बना है। ऐसा नहीं है कि माता बस दुष्टतम राक्षसों का विनाश ही करती हैं। बल्कि माता का सौंदर्य भी अलौकिक है। यहाँ पर माता की सुंदर जटाओं को धारण करने के कारण उन्हें रम्यकपर्दिनी कहा गया है।
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कपर्दी भगवान शिव का भी एक नाम है क्योंकि उनकी जटाएँ भी ब्रह्मांड-फेमस हैं। माता ने महिषासुर को मारने के लिए भद्रकाली रूप धरा था, तब उनका सोने के जैसा दमकता हुआ रूप था और जटाधारिणी थीं वो। उसे के कारण कपर्दिनी नाम है।
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साथ ही, एक और जगह शिव जी उन्हें अन्धकासुर को मारने के लिए महाघोरा माताओं का सृजन किया था जिसमें से एक कपर्दिनी रूप भी था। माता जटाजूट धारण करती हैं तो मनोरम, मनोहारी, रम्य और सुखकारी दिखती हैं। ठीक भी है एक तरह से।
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17 Oct
दुर्गा माँ का जलवा लेकिन अलग लेवल का है। बाकी देवता लोगों को 'वर' देते हैं। इनका है कि आप तीनों को (ब्रह्मा, विष्णु, महादेव) अपनी शक्तियाँ महासरस्वती, महालक्ष्मी, और महाकाली देती हूँ और 'यज्ञों में मेरे नाम के उच्चारण मात्र से सारे देवी-देवता सदैव सुखी हो जाएँगे'।
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दुर्गा स्वयं ही प्रकृति हैं, इसलिए वो त्रिदेव से भी ऊपर हैं और अपनी महाशक्तियों को तीनों देवों को देने के कारण, और उन्हें पोषण की शक्ति दे देने के कारण उन्हें 'त्रिभुवनपोषिणी' भी कहा जाता है कि जो देवता त्रिभुवन चलाते हैं, उनको देवी दुर्गा पुष्ट करती हैं।
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जगन्माता वहीं हैं, जगदम्बिका और सबकी माँ... माता के नाम का यज्ञ में उच्चारण होने के कारण ही देवताओं को उनका यज्ञ-भाग प्राप्त होता है। इसलिए, जब देवता लोग स्वयं ही वरदान आदि दे कर फँसते हैं, तब अंत में माता का आह्वान होता है।
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17 Oct
अनुप्रास वाले कुछ श्लोक 'अयि गिरिनंदिनि' से:

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्गनटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्गहताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनिशैलसुते ॥ ८ ॥

1/6 #MahishasurMardini
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहलगानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंगनिनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनिशैलसुते ॥ ९ ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुतितत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृतनूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
2/6
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्यसुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनिशैलसुते ॥ १० ॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैकसहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधिसुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनिशैलसुते ॥ १७ ॥

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17 Oct
कल रात पेरिस में अपने एक मुसलमान ने अपने एक शिक्षक की गला रेत कर हत्या कर दी। बाद में पुलिस ने थोड़ी देर पीछा करने के बाद उसे गोली मार दी। शिक्षक का गला क्यों रेता? क्योंकि शिक्षक ‘अभिव्यक्ति की आजादी' वाली कक्षा में, एक कार्टून दिखा रहा था समझाने के लिए।
1/7 #parisbeheading
कार्टून किसका रहा होगा समझना मुश्किल नहीं है। दूसरा पहलू देखिए कि हर ऐसी घटना के बाद, हर 'लोन वूल्फ' अटैक के बाद, श्वेतों की बस्ती में आतंकी हमेशा मरा हुआ ही मिलता है। लेकिन भारत में आप, इन्हीं शूकरों पर पैलेट गन चला देंगे, तो यही गोरे लोग मानवाधिकारों का ज्ञान देते हैं।
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इसलिए, चाहे ऑरलैंडो समलैंगिक बार हो या ब्रूसेल्स एयरपोर्ट, मैनचेस्टर बम धमाके हों, या नीस आतंकी हमला, मैं बहुत ज्यादा संवेदनशील नहीं हो पाता। वो इसलिए क्योंकि इन लोगों ने इस्लामी आतंक को सबसे ज्यादा पाला-पोसा है। भारत में हो रहे आतंकवाद को 'बायलेटरल कॉन्फ्लिक्ट' कहा करते थे।
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12 Oct
तनिष्क विज्ञापन के बॉयकॉट और उसे दबाव बनवा कर हटवा दिए जाने पर फ्रस्टू वामपंथनों को अत्यंत दुखी पा कर अत्यंत क्षुब्ध हूँ। बेचारियों को वही पुराना राग अलापना पड़ रहा है कि ‘ऐसे समय में जबकि लहसुन बोया जा रहा है छः सालों से, वैसे समय में स्कोडा की जरूरत थी समाज में...’
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बात ये है कि इन टुटपुँजिया शब्दों और घिसे-पिटे वाक्यों को अलावा इनके पास घंटा कुछ नहीं बचा है लिखने को। ऐसी फ्रस्टू चरसी वामपंथनों को दुनिया के सारे ऐब 2014 के बाद से ही होते दिखते हैं। सावन में पैदा हुए, भादो में कह रही हैं कि ऐसी बाढ़ तो आज तक नहीं देखी ही नहीं।
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इन्हें न तो राजनीति की समझ है, न समाज की, और विज्ञापनों के पीछे की योजनाओं की तो खैर रहने ही दीजिए। शब्द संयोजन कर पाना ही आपको विश्लेषक नहीं बना देता न ही ‘कम से कम’ को ‘कम अज कम’ लिख देना आपको गौतम बुद्ध के बाद सबसे बड़ा दार्शनिक बना देता है।
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