नरेंद्र मोदी देश के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री है।

क्यूंकि उन्होंने कांग्रेस को धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया। देश मे बहुत साल ऐसे भी थे जब कांग्रेस प्रत्याशी होना मतलब लगभग आपकी जीत पक्की ।नेताओं को चुनाव जीतने में इतनी मुश्किल नही होती थी जितनी कांग्रेस का टिकट लेने में।
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आज उसी कांग्रेस का ये हाल है कि सरकार बनाना तो दूर की बात। विपक्ष का नेता चुनने लायक भी उनके पास संख्या नही है।

इस बात में कोई दो राय नही है कि आज भाजपा जो भी है इसकी नीव आडवाणी और अटल जी ने रखी लेकिन वो कभी भी @BJP4India संख्या सदन में 182 के पार नही कर पाई।
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प्रधानमंत्री @narendramodi के कुशल नेतृत्व , लोक प्रिय छवि और @AmitShah की कुशल रणनीति का ही ये करिश्मा था कि पार्टी ने लगातार दो बार पूर्ण बहुमत हासिल कर देश को एक मजबूत और स्थिर सरकार दी।
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पहला लोकसभा चुनाव (1952-57)

देश मे कुल 489 सीटों में चुनाव हुए | कांग्रेस ने 45% वोट के साथ 364 सीटें जीती। भारतीय जनसंघ को केवल 3 सीटों में जीत हासिल हुई। लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुने गए नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने।

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दूसरा आम चुनाव (1957-1962)
लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़कर 494 हुई। कांग्रेस को 48% वोटों के साथ 371 सीटें मिली। भारतीय जनसंघ के सीटों की संख्या 3 से बढ़कर 4 हुई।
नेहरू फिर से प्रधान मंत्री बनने।

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तीसरा आम चुनाव (1962-1967)
494 सीटों वाली लोकसभा में कांग्रेस ने 45% मतप्रतिशत के साथ 361 सीटें जीती | भारतीय जनसंघ ने केवल 2 सीटें जीती। नेहरू फिर से प्रधानमंत्री बने। लेकिन इस लोकसभा अवधि में देश ने चार प्रधान मंत्री देंखे। 1964 में नेहरू जी की मृत्यु के बाद

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गुलजारी लाल नन्दा केवल 15 दिनों के लिए देश के अंतरिम प्रधानमंत्री बने। उनके त्यागपत्र देने के बाद लाल बहादुर शास्त्री जी देश के तृतीय प्रधानमंत्री बने। लेकिन 11 जनवरी 1966 के दिन ताशकंद में शास्त्री जी की रहस्यात्मक मौत हो गयी। वो 19 महीने के लिए देश के प्रधान मंत्री रहे।

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24 जनवरी 1966 को इंदिरा गांधी ने देश के चौथे प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल समहाला

चौथा लोकसभा चुनाव (1967-1970)

कुल योग्य मतदाताओं की संख्या थी 25 करोड़ । 41% मतप्रतिशत के साथ ये पहला चुनाव था जहाँ कांग्रेस को 300 से कम सीटें मिली। 283 सीटों के साथ इंदिरा गांधी ने
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दूसरी बार देश की प्रधानमंत्री बनी। लेकिन कांग्रेस में अंदुरनी कलह और गैर पार्टी गतिविधियों की वजह से उस समय के कांग्रेस अध्य्क्ष स. निंजलिंगप्पा ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी से निष्काषित कर दिया। जिसके बाद इंदिरा गांधी ने 1969 में कांग्रेस(R) का गठन किया।
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कांग्रेस कार्यसमिति के आधे से ज्यादा सदस्यों ने इंदिरा गांधी की नेतृत्व वाली कांग्रेस(r) का दामन थामा।

पाचवीं लोकसभा (1971-1977)
ये पहला चुनाव था जहाँ इंदिरा गांधी की कांग्रेस (R) ने कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लड़ा। नतीजा ये हुआ कि इंदिरा गांधी की पार्टी ने 518 सीटों वाली

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लोकसभा में 352 सीटों की भारी बहुमत के साथ तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। मोरारजी देसाई की नेतृत्व वाली कंग्रेस(o) को केवल 16 सीटें मिली। भारतीय जनसंघ ने पहली बार दो अंको का आंकड़ा पर कर 22 सीटें हासिल की।
लेकिन 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने

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इंदिरा गांधी को चुनाव में सरकारी तंत्र का गलत इस्तेमाल करने की वजह से उनकी संसद सदस्यता को रद कर दिया और साथ ही अगले 6 साल तक उन्हें कोई भी सवैधानिक पद में रहने से वर्जित कर दिया। न्यायलय के इस फैसले के ठीक 13 दिन बाद 25 जून 1975 को राष्ट्रपति फकरुद्दीन अली अहमद ने इंदिरा
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गांधी की अनुसंशा पर देश मे आपातकाल की घोषणा कर दी।

6th Loksabha Election (1977-1979)
18 जनवरी 1979 को इंदिरा गांधी ने देश मे आम चुनाव की घोषणा की। मार्च में आपातकाल में बंद किये गए सारे नेताओ को रिहा किया गया और देश मे 6वां आम चुनाव हुआ। आपातकाल की वजह से इंदिरा गांधी की

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नेतृत्व वाली कांग्रेस को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। लोगो मे गुस्सा इतना था कि स्वयं इंदिरा गांधी रायबरेली से और संजय गांधी अमेठी से चुनाव हार गए। मोरारजी देसाई की नेतृत्व वाली जनता पार्टी को 295 सीटें मिली और उनके नेतृत्व में देश मे पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी।
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24 मार्च 1977 को मोरारजी ने देश के 5वे प्रधानमंत्री के रूप में सपथ ली लेकिन कुछ चरण सिंह की भारतीय लोक दल और कुछ अन्य सहयोगी दलों के समर्थन वापिस लेने के कारण जनता पार्टी की सरकार गिर गयी और 28 जुलाई 1979 को चरण सिंह ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। 28 जुलाई 1979 को

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कांग्रेस के समर्थन से चरण सिंह देश के 5वे प्रधानमंत्री बने । बाद में कंग्रेस के समर्थन वापस लेने की वजह से वो केवल 24 हफ़्तों तक देश के प्रधान मंत्री रहे। किसी भी पार्टी के पास बहुमत न होने के कारण देश मे फिर से आम चुनाव का ऐलान हुआ।

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7वां लोकसभा चुनाव (1980-1984)
इस चुनाव में जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा| 529 सीटों वाली लोकसभा में कांग्रेस ने 353 सीटें लाकर फिर से सत्ता में वापसी की। और एक बार फिर इंदिरा देश की प्रधानमंत्री बनी। 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या की वजह से 31अक्टूबर 1984
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को उनके बेटे राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने।

8वीं लोकसभा (1984-1989)
इंदिरा गांधी की मृत्यु की सहानुभूति की वजह से 8वें लोकसभा में कांग्रेस ने राजीव गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा। इस चुनाव में कांग्रेस ने 404 सीटें हासिल की और राजीव गांधी देश फिर देश के प्रधानमंत्री बने
भाजपा ने पहली बार 2 सीटों के साथ संसद में दस्तक दी। dr A K.Pate मेहसाणा, गुजरात और चंदूपाटला जंगा रेड्डी आंध्र प्रदेश के हनमकोंडा से सांसद बने। संख्या के हिसाब से भले ये ये नंबर का कोई महत्व नही था। लेकिन इस जीत ने भारतीय राजनीति में एक नया अध्याय लिख दिया।

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9वीं लोकसभा (1989-1991)
बोफोर्स घोटाला, LTTE मुद्दा और दूसरे कई कारणों की वजह से इस चुनाव में कंग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। 39.5% मतप्रतिशत के साथ कांग्रेस को 197 सीटें मिली। 2 सीटों से बढ़कर भाजपा ने इस चुनाब में 85 सीटें हासिल की जिसका श्रेय आडवाणी जी को जाता है।
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Vp singh की अगुवाई वाली जनतादल ने 143 सीटें जीती । भाजपा और वामदलों के समर्थन से 2 दिसंबर 1989 को विश्वनाथ प्रताप सिंह देश के 7वे प्रधानमंत्री बने । लेकिन जनता दल में उनके साथी चन्द्रदेखर के बगावत की वजह से उनकी सरकार अल्पमत में आ गयी और 10 नवम्बर 1990 को उन्हें
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इस्तीफा देना पड़ा।
कांग्रेस के बाहरी समर्थसन से चंद्रशेखर देश के 8वे प्रधानमंत्री बने। लेकिन कांग्रेस ने बाद में सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
इसके साथ ही संसद में किसी भी पार्टी या समूह के बहुमत न होने के कारण देश मे फिर चुनाव हुए।
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10वीं लोकसभा (1991-1996)
राजनीतिक रूप से ये चुनाव बाकी चुनावो से अलग था। VP सिंह की अगुवाई वाली जनता दल ने प्रधानमंत्री रहते पिछली सरकार में मंडल आयोग की सिफारिश को लागू करते हुए OBCs को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया था। इस चुनाव में वो इसका फायदा उठाना चाहती थी। तो दूसरी तरफ
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BJP हमेशा की तरह ने राम मंदिर मुद्दे को ही मुख्य मुद्दा बना चुनाव में उतरी। चुनाव प्रचार के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या Coimbatore में LTTE आतंकवादियों कर दी गयी। इस चुनाव में उस समय तक के लोकसभा चुनाव इतिहास में 55.88% के साथ सबसे कम मतदान हुए।
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राजीव गांधी की हत्या और दूसरी गैर कांग्रेसी दलों का स्थिर सरकार नही दे पाने की वजह से कांग्रेस को चुनावी फायदा हुआ। चुनाव परिणाम रूप 545 सदस्यों वाली लोकसभा में 232 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। भाजपा ने भी अच्छा प्रदर्शन किया और पहली बार 3 अंको का आंकड़ा पर कर 122 सीटें
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जीती। वही जनता दल को हार का सामना करना पड़ा और उन्हें केवल 69 सीटें ही मिली। राजीव गांधी की हत्या की वजह से कांग्रेस के PV नरसिम्हा राव ने अन्य छोटी दलों के समर्थन से सरकार बनाया। और वे देश के 9वे प्रधानमंत्री बने। ये पहला बार था जब कंग्रेस ने बहुमत न होने की वजह से
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दूसरे दलों के सहयोग से एक अल्पमत सरकार बनाई जो 5 साल चली। राम मंदिर का मुद्दा चुनाव के बाद भी छाया रहा और इसी बीच 6 दिसंबर 1992 को श्री राम नगरी अयोध्या में वो विवादित ढांचा गिराया गया।राम मंदिर का मुद्दा अब रुकने वाला नही था। इसी बीच नरसिंह राव ने अपना
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कार्यकाल किया।

11वी लोकसभा चुनाव (1996-1998)
अयोध्या में विवादित ढांचा गिरने के बाद ये पहला लोकसभा चुनाव था। इसलिए ये बात पकी थी कि ये चुनाव राम मंदिर मुद्दे पर ही आधारित होगा। और हुआ ऐसा भी । इस चुनाव में भाजपा 161 सीटें लाकरसबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। कांग्रेस 140 सीटों
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के साथ दूसरे नंबर पर ही। जनता दल को केवल 46 सीटें मिली।
सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का निमंत्रण दिया। 16 मई 1996 को अटल जी ने प्रधानमंत्री की शपथ ली। केंद्र में भाजपा की अगुवाई में ये पहली सरकार थी।
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लेकिन सदन में बहुमत साबित न कर पाने की वजह से मात्र 13 दिनों बाद पद से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इस्तीफा देने से पहले संसद में दिए गया उनका अविस्मरणीय भाषण आज भी चर्चित है। इस भाषण का असर अगले चुनाव में देखने को मिला। सरकार गिरने के बाद United Front ने कांग्रेस के
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बाहरी समर्थन से सरकार बनाई। और इसी प्रकार H D Devegowda देश के 11 वे प्रधानमंत्री बने। लेकिन पहले की तरह फिर कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया और इसी कारण 18 महीने तक पद में रहने के बाद 21 अप्रैल को लेकर 1997 को HD devgowda को त्याग पत्र देना पड़ा। कांग्रेस तुरंत चुनाव
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नही चाहती थी इसलिए कांग्रेस ने फिर से United Front को बाहरी समर्थन देकर इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनाने की शर्त रखी। इंद्र कुमार गुजराल ने 21 अप्रैल 1997 को देश के 12वे प्रधानमंत्री के शपथ ली। लेकिन कंग्रेस ने फिर अपना पुराना रवैया दिखाते हुए समर्थन वापिस ले लिया।
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देश मे फिर से आम चुनाब की घोषणा हुई और अगली सरकार बनने तक गुजराल पड़ पर बने रहे।

12वी लोकसभा (1998-1999)

लोकसभा के इतिहास में ये सबसे कम अवधि का सत्र था। 543 सीटों में हुए चुनाव में 183 सीटें लाकर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस को 141 सीटें बनी।
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अटल बिहारी वाजपेयी ने अन्य क्षेत्रीय पार्टियों की मदद से राजग (NDA) का गठन किया। इसी प्रकार केंद्र में फिर से भाजपा की सरकार बनी । 19 मार्च 1998 को अटल बिहारी वाजपेयी ने दुबारा प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इसी बीच सुब्रमण्यम स्वामी ने जयललिता के साथ सांठगांठ की।

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14th अप्रैल को जयललिता ने दिल्ली आकर राष्ट्रपति शंकर नारायणन से मिलकर NDA साकार से समर्थन वापस लेने का पत्र सौंपा। राष्ट्रपति ने अटल बिहारी वाजपेयी को सदन में दुबारा बहुमत साबित करने का आदेश दिया।
17th अप्रैल को सदन में बहुमत साबित करना था। मायावती ने वाजपेयी को समर्थन
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का भरोसा दिया था। लेकिन मतदान के ठीक पहले उसके भाषण ने सदन को चकित कर दिया जब उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में सरकार के विरुद्ध मतदान करने की बात कही। वाजपेयी सरकार एक वोट से विश्वास प्रस्ताव हार गयी। उड़ीसा के तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस सांसद गिरिधर गमांग के
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मात्र एक वोट से वाजपेयी सरकार वो अविश्वास प्रस्ताव हार गयी। हैरानी की बात तो ये है कि गिरिधर गमांग ने 2015 में भाजपा का दामन थामा।
दूसरी तरफ कोई दूसरे दल भी सरकार बनाने की स्तिथि में नही थे। लोकसभा अध्य्क्ष ने राष्ट्रपति को लोकसभा भंग करने की सिफारिश की और देश मे आम चुनाव की
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घोषणा हुई।

13वी लोकसभा (1999-2004)
3 साल के अंतराल में ये देश मे तीसरा आम चुनाव था। बेशक इस चुनाव में भाजपा को फायदा होना था। क्योंकि ये चुनाव कारगिल युद्ध और पोखरण परीक्षण के ठीक बाद हुआ था। वाजपेयी सरकार का देशहित में लिया गया फैसला और विपक्षी दलों द्वारा
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सरकार गिराने का गुस्सा जनता में साफ दिक्ज रहा था। बहुत सारी क्षेत्रीय डालो को भी ये अंदाज़ा हो चुका था कि उनके लिए भाजपा के साथ जाना ही एक बेहतर विकल्प है। वाजपेयी और आडवाणी जी ने 24 अन्य दलों के साथ एक मजबूत गठबंधन कर ये चुनाब लड़ा। परिणाम भी अपेक्षा के अनुरूप आये।
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भाजपा को 182 सीटें हासिल हुई और NDA गठबंधन ने बहुमत का आंकड़ा हासिल किया। ये दूसरा ऐसा मौका था जब किसी चुनाव पूर्व गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ।
19 मार्च 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इसी के साथ वो देश के पहले गैर काँग्रेस समर्थित
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प्रधानंत्री बने जो 5 साल की लोकसभा की अवधि तक प्रधानमंत्री रहे।
लेकिन यहां भाजपा की एक गलत निर्णय ने उसे सत्ता से 10 साल दूर कर दिया। वाजपेयी सरकार ने अपने अपनी लोकप्रियता का सहारा लेकर देश मे समय पूर्व चुनाव की घोषणा की।
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14वी लोकसभा (2004-2009)
भाजपा "भारत उदय" (shinning India) नारे के साथ प्रचार में ऊत्तरी। इस चुनाव में महंगाई एक मुख्य मुद्दा बनी।
लेकिन चुनाव परिणाम भाजपा के अनुरूप नही रही। 145 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी दल बनकर उभरी । भाजपा को केवल 136 सीटें ही मिली।
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कांग्रेस की अगुवाई वाली UPA ने अन्य क्षेत्रीय दलों के सहयोग से सरकार बनाया। लेकिन विदेशी मूल की होने के कारण सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नही बन पाई। कांग्रेस अध्य्क्ष सोनिया गांधी ने पूर्व RBI गवर्नर और नरसिम्हा राव सरकार में वित्तमंत्री रहे मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री
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पद के लिए चयनित किया।
22 मई 2004 को मनमोहन सिंह ने देश के तेहरवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। और पूरी अवधि तक प्रधान मंत्री रहे।

15वीं लोकसभा (2004-2009)
एक तरफ UPA ने मनमोहन सिंह पर फिर भरोसा जताया और चुनाव में उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया। दूसरी तरफ अटल
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जी अस्वस्थता के कारण NDA ने लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा।
इस चुनाव में भाजपा के अंदर अंतरकलह साफ दिखी । आडवाणी जी के पाकिस्तान दौरे में जिन्ना पर दिए गए बयान से पार्टी का एक वर्ग उनके प्रधानमंत्री उम्मीदवारी के पक्ष में नही था। कांग्रेस को RTI कानून और MNREGA

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जैसी योजनाओं को लागू करने का फायदा मिला।
इस चुनाव में कांग्रेस को 204 सीटें हासिल हुई। भाजपा ने काफी बुरा प्रदर्शन किया और उसे केवल 116 सीटें ही मिली।
डॉ मनमोहन सिंह ने लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली।
इस दूसरी अवधि में मनमोहन सिंह की सरकार पर घोटालो के आरोप
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लगते चले गए। इसमें 2G घोटाला और coal घोटाला सबसे मुख्य था। आंतरिक सुरक्षा के मामले में भी ये सरकार पूरी तरह फैल दिखी। देश के लगभग सभी बड़े शहरों में आतंकी हमलों ने सरकार की आंतरिक सुरक्षा नीति पर एक सवालिया निशान खड़ा किया।
इधर भाजपा और देश के अंदर
नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता बढ़ती जा रही थी। उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने की बात पार्टी के अंदर लगातार उठ रही थी। लेकिन पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता आडवाणी जी को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने के पक्ष में थे।
10 जून 2013 को तत्कालीन भाजपा अध्य्क्ष राजनाथ सिंह
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ने गोआ में आयोजित किये गए भाजपा के वार्षिक समेलन के आखरी दिन @narendramodi को 2014 लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा की केंद्रीय प्रचार समिति के अध्यक्ष पर नियुक्ति की घोषणा की जिससे ये लगभग तय था कि भाजपा ये चुनाव मोदी के ही नेतृत्व और आडवाणी जी के मार्गदर्शन में लड़ेगी।

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आखिरकार 13 सितंबर 2013 को सारी शंशा पर विराम लग गया जब राजनाथ सिंह ने भाजपा के लगभग सभी वरिष्ठ नेताओं की उपस्तिथि में आधिकारिक तौर नरेंद्र मोदी को भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया
भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगी दल JDU इसके विरुद्ध थी। और चुनाव से ठीक पहले उसने भाजपा का दामन छोड़ दिया।

16वीं लोकसभा (2014-19)
इस चुनाव में भाजपा की रणनीति ये थी कि किसी भी तरह खुद बहुमत के आंकड़े को पार करना। और जैसा कहा जाता है कि दिल्ली जितना है तो उत्तर प्रदेश जितना होगा
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और इसी रणनीति के अंतर्गत राजनाथ सिंह ने मोदी के सबसे करीबी अमित शाह को UP भाजपा का प्रभारी बनाया। परिणाम स्वरूप NDA को up 80 में से 73 सीटें मिली। भाजपा को 283 सीटें मिली। नरेंद्र मोदी एक दलीय पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाले देश के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने
TBC
कांग्रेस को केवल 46 सीटें मिली। 6 दशकों तक देश मे शासन करने वाली कांग्रेस को विपक्ष का नेता भी नही चुन पाई।

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प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पहली अवधी में योजनाओ की शुरुआत की | उज्जवला योजना , जन धन योजना, औषधी योजना, कौशल विकाश , ग्रामीण आवास योजना जैसी गरीब कल्याणकारी योजनाओ को उनके घर तक पहुंचाया | पड़ोसी देशो से अच्छे रिश्ते बनाने में भी ये सरकार काफी हद तक कारगर रही
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अंतरराष्ट्रीय सीमा क्षेत्रो से सटे राज्यो को छोड़कर देश के किसी भी राज्यो में कोई भी आतंकवादी घटना नही घटी। SURGICAL स्ट्राइक और air strike जैसे निर्णय लेकर सरकार ने ये साफ कर दिया था कि सेना और अन्य सुरक्षा एजेंसीज को सरकार ने खुली छूट दे दी है। विभिन सुरक्षा संगठन
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में ये बेहतर तालमेल का ही नतीजा था कि देश के किसी भी शहर मे आतंकवादी हमले नही हुए। पूर्ण बहुमत होने के कारण सरकार बहुत सारी कठिन फैसले लेने में भी सक्षम रही।

17वां लोकसभा चुनाव (2019-24)
एक तरफ भाजपा के पास नरेंद्र मोदी जैसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री और अमित शाह जैसे पार्टी
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रणनीतिकार के रूप में अध्य्क्ष था तो दूसरी और कांग्रेस कंग्रेस फिर से वंशवाद को बढ़वा देते हुए राहुल गांधी को चेहरा बना कर चुनाव में उतरी। बहुत से विपक्षी नेताओं ने तो चुनाव खत्म हमने से कौरव ही हार स्वीकार कर लिया था। नतीजे भी अनुमान अनुरूप आया।
नरेंद्र मोदी की अगुवाई में
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भाजपा ने अपने बल पर 303 सीटें जीती। गठबंधन को मिलाकर ये आंकड़ा 350 के पार चला गया। भाजपा का मतप्रतिशत भी 31.34% से बढ़कर 37.34% हुआ
कांग्रेस को केवल 54 सीटें मिली जो पिछली बार के मुकाबले केवल 8 ज्यादा थी।
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30 Aug
Forget about apologizing to Sarvjeet Singh . Delhi CM @ArvindKejriwal has still not deleted this tweet even almost after 1 yr of court verdict where the delhi boy has been acquitted by the court
One should always listen to both side of the story before coming to a conclusion.

I think we all know about this case when a delhi Girl Jasleen Kaur accused Sarvjeet singh of Harassment and eve teasing through a SM post.
Soon Very High Profile people gave their reaction

TBC
Including DELHI babbling CM posted on Social Media and comgratulated and supported jasleen Kaur even without hearing both side of the story.

he was abbused on social media few also called him "Delhi ka darinda" .

TBC
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