कल, 12 नवंबर को डॉ. सालिम अली का 125 वां जन्म दिवस था!
भावभीना पुण्यस्मरण!
💐🙏💐
भारत के सर्वश्रेष्ठ पक्षी-शास्त्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण, डॉ. सालिम अली से मेरी 1960 के दशक के अंत में हुई एकमात्र मुलाकात को याद कर के आँखें नम हैं।
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बड़ा अजीब था वो मंज़र, जब साइकिल के युग में अपने शहर से एक अकेले बुजुर्ग को 5 हॉर्स पॉवर की Sunbeam motorcycle से अकेले गुज़रते देखना।
पीछे कैरियर पर लदा हुआ बड़ा सा बैग, चमड़े की जैकिट, आँख पर चश्मा, कंधे पर भारी भरकम कैमरा और 5 क्विंटल की बाइक और बामुश्किल 50 किलो का शरीर!
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उस पर कहर, मोटरसाइकिल का खराब हो जाना! बुज़ुर्गवार को अकेला परेशान देख मैंने अपनी साइकिल रोकी, और उस कार्टूननुमा शख्स से कौतूहलवश पूछ ही लिया - 'अंकल, कोई दिक्कत है क्या?'

'बेटा, ज़िंदगी खुद एक दिक्कत है' जवाब मिला।
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मैंने प्रश्नवाचक निगाहों से उन्हें देखा तो बुढ़ऊ की हँसती हुई सी आँखों में एक वात्सल्य का भाव दिखा।

'गाड़ी बंद हो गई क्या?' मैंने पूछा।

बोले, 'हाँ, बेटे, कोई मैकेनिक की कोई दुकान है आस पास?'
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मैं बोला 'हाँ अंकल, पास ही आज़ाद भाई का गैरेज है, मेरा दोस्त है, पर आपकी मोटरसाइकिल अजीब है...'

'बेटे, मुझे रास्ता दिखा दो..' बुज़ुर्गवार बोले।

मैंने एक क्षण रुक कर कहा 'नहीं, आप रुकिए, मैं उन्हें लेकर आता हूँ...'

'नहीं बेटा, क्यों तकलीफ करते हो..' वे बोले।
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मैं निश्चय कर चुका था... मैंने दृढ़ता से कहा 'नहीं अंकल, आप दस मिनिट यहीं पेड़ की छाया में रुकिए, मैं व्यवस्था करता हूँ।'

20 मिनिट बाद मैं मय आज़ाद भाई और औजारों समेत वापस लौटा। बुज़ुर्गवार अपने बॉक्स कैमरा से 120 mm रील में आसपास के फोटो ले रहे थे।
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एक घंटे में बाइक दुरुस्त हुई। तब तक वे पेड़ के नीचे मुझसे बतियाते रहे। उनकी बातें सुन कर लगा, यार ये बहुत बड़े लेवल की चीज हैं, अपने बस के नहीं! उन्होंने अपने बैग में से निकाल कर पंछियों के फ़ोटो दिखाए, जाने क्या क्या बताया, पर सारे बाउन्सर बॉल हो गए!
उम्र का तकाजा था! 😆
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मैंने सोचा - 'गुरु, मामला अपने बूते के बाहर का है, इनकी मुलाक़ात अपने पिताश्री से करवा दो..।'

खैर, बाद का किस्सा लंबा है, पिछले बरसों के लंबे रिश्तों को आप को समझाने में लंबा वक़्त लग जाएगा...
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कुल मिला कर लब्बो लुवाब ये कि एक अज़ीम शख्सियत से जिंदा मुलाक़ात अंधेरे में क्यों रहे?
क्यों न लोग उस अज़ीमुश्शान शख्सियत के बारे में जानें, जिसके नाम से आज हिंदोस्तान में पचासों पक्षी अभयारण्य बने हैं। स्वर्गीय डॉ. सालिम अली का पुण्य स्मरण।

🙏🙏🙏💐
9/9

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12 Nov
बिहार में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र को ‘बिहार बदलाव पत्र’ का नाम दिया था, लेकिन नतीजों से साबित‍ किया कि बदलाव की असल जरूरत बिहार से ज्यादा कांग्रेस को ही है।
राज्य में 2015 के चुनाव में जहां कांग्रेस ने 27 सीटें जीती थीं, वहीं इस बार यह आंकड़ा 19 ही रह गया। 🤦‍♂️
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कांग्रेस का चुनाव अभियान भी कोई खास दमदार नहीं था। पार्टी के स्टार नेता राहुल गांधी ने जिन क्षेत्रों में सभाएं कीं, पार्टी वहां भी ज्यादतर सीटें हार गईं।
सभाओं में राहुल उसी मोदी से प्रश्नवाचक मुद्रा में भाषण देते रहे, जैसे कि पहले देते रहे हैं।
...2/13
लेकिन राजनेता की विश्वसनीयता तब बनती है, जब सवालों के जवाब भी उसके पास हों।
राहुल गांधी के भाषणों से कई बार ऐसा लगता है कि कहीं वो भारतीय राजनीति के ‘पर्मनेंट पेपर सेटर’ तो नहीं बन गए हैं?
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Read 13 tweets
11 Nov
ओपीनियन पोल, एग्जिट पोल, काउंटिंग ट्रेंड और एक्जेक्ट रिजल्ट। हर चुनाव की वो स्टेप्स हैं, जिनको नापना चुनाव विश्लेषक की जिम्मेदारी और शगल होता है। हकीकत में उन्हें उड़ती चिडि़या को देखकर बताना होता है कि वो किस डाल पर बैठेगी।
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अब चिडि़या है कि कई बार उस डाल पर जा बैठती है, जो विश्लेषकों की नापसंद होती है या कई दफा वो किसी भी डाल पर बैठने के बजाए फुर्र से उड़ जाती है या फिर आसमान में ही पर मारती रहती है।
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चुनाव विश्लेषक चिडि़या की हर अदा का विश्लेषण इस अंदाज में करते हैं ‍कि मानो चिडि़या उन्हीं से पूछकर उड़ी थी। वैसे कई चुनाव विश्लेषक अपनी राय जताते हुए यह भी कहे जाते हैं कि वो जो कह रहे हैं, अंतिम परिणाम वैसा होगा, जरूरी नहीं है।
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Read 13 tweets
6 Nov
‘ये मेरा आखिरी चुनाव है’- जैसा जुमला उस राजनीतिक बूटी की तरह है, जिसका इस्तेमाल सारे वशीकरण मंत्र फेल होने के बाद किया जाता है। निर्मोह के आवरण में सत्ता के मोह पाश की यह ऐसी हवस है, जो मिटते नहीं मिटती और बाहर से भीतर तक ‘मैं ही मैं’ के रूप में गूंजती रहती है।

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नेताओं का बस चले तो वो यमदूतों को भी यह कहकर लौटा दें कि यह मेरा ‘आखिरी चुनाव’ है। अगले चुनाव के वक्त आना। दूसरे शब्दों में कहें तो यह नेताओं के लिए अपने सियासी वजूद की वो जीवन रक्षक दवा है,जिसके कारगर होने की संभावना फिफ्टी- फिफ्टी रहती है।

...2/5
इसमें राजनीतिक वानप्रस्थ का छद्म वैराग्य भाव छिपा रहता है।
वैसे भी राजनीति में खाने और दिखाने के दांत अलग होते हैं।
एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि भले ही नीतीश इस विधानसभा चुनाव को अपना ‘आखिरी चुनाव’ बता रहे हों, लेकिन खुद उन्होंने 2004 के बाद से कोई चुनाव नहीं लड़ा है।
..3/5
Read 5 tweets
2 Nov
मित्रों,

जब आपको लगने लगे कि आपकी रीच कम हो गई है, आपके घर पर पत्थर नहीं फेंके जा रहे हैं, या आपके मन में सवाल उठने लगे कि देश में से अंडभक्तों की संख्या चिंताजनक रूप से कम हो गई है तो एक मजेदार प्रयोग करें। 😄

...1/4
एक संदेहास्पद विश्वसनीयता वाली पोस्ट करें। देखिए तुरंत किसी बिल से नकल कर भक्तों की फौज हरिश्चंद्र की औलादों के सुर में तत्काल आपकी पोस्ट पर फुफकारने लगेगी। 😂
आपको चैलेंज किया जाने लगेगा, आपकी माता बहनों को याद किया जाने लगेगा, ..

...2/4
और आपको हलाला की औलाद वगैरह विशेषणों से नवाजते हुए सत्य की दुहाई दी जाने लगेगी। 😆

समस्त दूध से धुला हुआ भक्त संसार आपको झूठा, कपटी, चमचा आदि सिद्ध करते हुए दुनिया का निकृष्टम व्यक्ति साबित कर देंगे। 😁

...3/4
Read 4 tweets
1 Nov
आपने दूरदर्शन देखना छोड़ा, प्राइवेट ऑपरेटरों ने 500 रुपये महीने निकाल लिए।

BSNL छोड़ा, प्राइवेट वाले दोगुना लेने की तैयारी में ताल ठोकने लगे हैं।

आप सरकारी रेडियो आकाशवाणी नही सुनेंगे तो प्राइवेट FM वाले आपको गाना और सिर्फ गाना सुनाकर खुद करोडों कमाएंगे।
...1/8
आपने दूरदर्शन देखना छोड़ा, प्राइवेट ऑपरेटरों ने 500 रुपये महीने निकाल लिए।

BSNL छोड़ा, प्राइवेट वाले दोगुना लेने की तैयारी में ताल ठोकने लगे हैं।

आप सरकारी रेडियो आकाशवाणी नही सुनेंगे तो प्राइवेट FM वाले आपको गाना और सिर्फ गाना सुनाकर खुद करोडों कमाएंगे।
...2/8
आप लोग रोडवेज बसों में सफर नहीं करेंगे और दो पैसे बचाने के चक्कर में निजी बसों में यात्रा करेंगे तो रोडवेज बंद हो जाएगी। फिर निजी बस वाले मनमाना किराया वसूलेंगे और रोज सरकार का करोड़ों रूपये का टैक्स रूपी राजस्व चोरी करेंगे। उनमें सुरक्षा की भी कोई गारंटी नहीं।
...3/8
Read 8 tweets
30 Oct
क्या ‘धार्मिक कट्टरवाद बनाम धर्मनिरपेक्षतावाद’ की लड़ाई अब एक नए दौर ‘उदार धर्मनिरपेक्षतावाद ( सेक्युलरवाद) बनाम कट्टर धर्मनिरपेक्षतावाद’ में तब्दील होती जा रही है?

...1/15
यह सवाल इसलिए क्योंकि धर्मनिरपेक्ष समाज और सत्ता तंत्र का पालन कहे जाने वाले फ्रांस में इस को लेकर तगड़ी बहस छिड़ी है कि धार्मिक और विशेषकर इस्लामिक कट्टरवाद से मुकाबला किस तरह से किया जाए।
...2/15
इस सवाल का उत्तर वाकई जटिल है कि धार्मिकता की हदें कहां तक होनी चाहिए और धर्मनिरपेक्षता को किस हद सहिष्णुता का मास्क पहनना चाहिए। कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि धर्मनिरपेक्षता में धार्मिक सहिष्णुता स्वत: निहित है।

यानी तुम्हारी भी जय-जय और हमारी भी जय-जय!
...3/15
Read 15 tweets

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