संस्कृत बोलने से दिमाग तेज होता है
संस्कृत विश्व की एकमात्र वैज्ञानिक भाषा है। स्वर-विज्ञान के सिद्धांतों का इसमें पूरा-पूरा उपयोग किया गया है। कंप्यूटर के लिए भी यह सर्वाधिक उपयुक्त भाषा मानी जाती है, हालांकि इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं हुआ है।
संस्कृत के उच्चारण से मन और मस्तिष्क पर भी सकारात्मक प्रभाव होता है। स्पेन के 'बास्क भाषा एवं मस्तिष्क संस्थान' में शोध-रत स्नायु-विज्ञानी डॉ. हार्टजेल ने सिद्ध किया है कि संस्कृत के लगातार शुद्ध उच्चारण से मस्तिष्क की क्षमता बढ़ जाती है।
डॉ हार्टजेल प्रसिद्ध स्नायु वैज्ञानिक (न्यूरो साइंटिस्ट) हैं तथा उन्होंने वर्षों तक संस्कृत के प्रभाव का अध्ययन किया है।
2 जन. 2018 को प्रकाशित अपने शोध-पत्र में उन्होंने लिखा है - " मैंने पाया कि जितना अधिक मैंने संस्कृत का अध्ययन किया उतनी ही अधिक मेरी याददाश्त बढ़ गई।
" उनका उक्त शोध-पत्र प्रसिद्ध अमरीकी जर्नल साइंटिफिक अमरीकन में प्रकाशित हुआ है। डॉ. हार्टजेल ने प्रतिदिन शुक्ल--यजुर्वेद के मन्त्रो का समवेत स्वरों में पाठ किया।
परीक्षणों से पाया गया कि लगातार सस्वर पाठ से प्रत्येक प्रतिभागी के मस्तिष्क का वह हिस्सा बढ़ गया जो चीजों को
याद रखने का काम करता है।
दुर्भाग्य यह है कि संस्कृत को जन्म देने वाले भारत में ही सेकुलरवाद के दुष्प्रचार से इन वैज्ञानिक भाषा की उपेक्षा होती रही संस्कृत की दुरावस्था के लिए संस्कृत के विद्वान भी कम जिम्मेदार नहीं है।

• • •

Missing some Tweet in this thread? You can try to force a refresh
 

Keep Current with दीपक शर्मा(सनातन सर्व श्रेष्ठ)

दीपक शर्मा(सनातन सर्व श्रेष्ठ) Profile picture

Stay in touch and get notified when new unrolls are available from this author!

Read all threads

This Thread may be Removed Anytime!

PDF

Twitter may remove this content at anytime! Save it as PDF for later use!

Try unrolling a thread yourself!

how to unroll video
  1. Follow @ThreadReaderApp to mention us!

  2. From a Twitter thread mention us with a keyword "unroll"
@threadreaderapp unroll

Practice here first or read more on our help page!

More from @sharma_Deepak45

6 Apr
हिन्दू सिक्ख ..

दशमेश पिता गुरू गोविंद सिंह जी सैनिको में उत्साह भरने के लिये जो भाषण देते थे, उनका संग्रह 'चंड़ी दी वार' कहलाता है । उसमें लिखे दोहे पर सेक्युलर गौर करें :-

मिटे बाँग सलमान सुन्नत कुराना ।
जगे धमॆ हिन्दुन अठारह पुराना ॥
यहि देह अँगिया तुरक गहि खपाऊँ ।
गऊ घात का दोख जग सिऊ मिटाऊँ ॥

अर्थात :- हिंदुस्तान की धरती से बाँग (अजान), सुन्नत (इस्लाम) और कुरान मिट जाये, हिन्दू धर्म का जागरण होकर अट्ठारह पुराण आदर को प्राप्त हों। इस देह के अंगों से ऐसा काम हो कि सारे तुर्कों को मारकर खत्म कर दूँ
और गोवध का दुष्कृत्य संसार से नष्ट कर दूँ ।

देही शिवा बर मोहे, शुभ कर्मन ते कभुं न टरूं ।
न डरौं अरि सौं जब जाय लड़ौं, निश्चय कर अपनी जीत करौं ॥

अर्थात :-
हे परमशक्ति माँ(शिवा) ऐसा वरदान दो कि मैं अपने शुभ कर्मपथ से कभी विचलित न हो पाऊँ
Read 6 tweets
6 Apr
अग्नि में किए जाने वाले होम - अर्थात् अग्नि में घी, समिधा, चावल अर्पित करने को ही 'अग्निहोत्र' कहते हैं।
विशेष कर, सूर्योदय-सूर्यास्त समय के ठीक क्षण में गायत्री मंत्र हो या "अग्नये स्वाहा, अग्नये इदं न मम" इस मंत्र का उच्चारण करते हुए, अग्नि को घी - समिधा - चावल समर्पित करने के
विधान को ही अग्निहोत्र कहते हैं।
इस प्रकार संध्या समय में निरंतर अग्निहोत्र करने हेतु तांबे से बनाए गए होमपात्र में - प्रातः पूर्व दिशा तथा सायंकाल पश्चिम दिशा की ओर मुख करते हुए बैठ कर, ठीक उसी क्षण को मंत्रोच्चार करते हुए द्रव्य समर्पित करने चाहिए ।
इस होम का आचरण पुरुष
महिलाएँ, बच्चे, चाहे जो कोई कर सकता है । ठीक उसी समय पर करना चाहिए।

*अग्निहोत्र से होने वाले लाभ *

 इसका आचरण करने से करने वालों की बुद्धि - विवेक सवंर्धित होती है। अच्छी संतान प्राप्ति होती है। तेज- कांति बढ़ती है। परिसर शुद्ध होता है। आसपास के कृमि-किट अंदर नहीं आ सकते।
Read 6 tweets
5 Apr
पूर्वांचल के महान क्रान्तिवीर शम्भुधन फूंगलो

भारत में सब ओर स्वतन्त्रता के लिए प्राण देने वाले वीर हुए हैं। ग्राम लंकर (उत्तर कछार, असम) में शम्भुधन फूंगलो का जन्म फागुन पूर्णिमा, 1850 ई0 में हुआ। डिमासा जाति की कासादीं इनकी माता तथा देप्रेन्दाओ फूंगलो पिता थे।
शम्भुधन के पिता काम की तलाश में घूमते रहते थे। अन्ततः वे माहुर के पास सेमदिकर गाँव में बस गये। यहीं शम्भुधन का विवाह नासादी से हुआ।

शम्भु बचपन से ही शिवभक्त थे। एक बार वह दियूंग नदी के किनारे कई दिन तक ध्यानस्थ रहे। लोगों के शोर मचाने पर उन्होंने आँखें खोलीं और कहा
कि मैं भगवान शिव के दर्शन करके ही लौटूँगा। इसके बाद तो दूर-दूर से लोग उनसे मिलने आने लगे। वह उनकी समस्या सुनते और उन्हें जड़ी-बूटियों की दवा भी देते। उन दिनों पूर्वांचल में अंग्रेज अपनी जड़ें जमा रहे थे। शम्भुधन को इनसे बहुत घृणा थी। वह लोगों को दवा देने के साथ-साथ देश और धर्म
Read 12 tweets
5 Apr
*भारत के विभाजन से पूर्व एक अति सम्पन्न धनाढ्य हिन्दुओं का नगर था नाम था सियालकोट ...*…

उस समय के पंजाब के मुख्य नगरों में से दूसरे नंबर का नगर सियालकोट उपजाऊ भूभाग और जम्मू के पास होने के कारण सियालकोट अति महत्व का नगर था *...*…
कपास, गन्ना, गेहूँ, चॉवल की भरपूर फसलें, फलों के बाग, नगर में उद्योग अति महत्वपूर्ण स्थान रखते थे कपड़ा मिलें जिसमें उत्तम प्रकार के सूती कपड़े बनाये जाते थे, चमड़े का व्यापार, चमड़े से बनी वस्तुएं, सियालकोट पूरे संसार में आयात करता था सियालकोट की कृषि संबंधी
मशीनें और अन्य मशीनों का उत्पादन में अतिविशिष्ट स्थान था *...*…

सियालकोट में 85% जनसँख्या हिन्दुओं की थी और व्यापार तो 100% हिन्दुओं के पास ही था सियालकोट में बाहर से आये मुस्लिम, हिन्दुओं के सेवक बन कर कार्य करते थे उस समय सियालकोट में बैंकिंग का कार्य
Read 19 tweets
5 Apr
🙏🏻❤️हमारा धर्म पहले संपूर्ण धरती पर व्याप्त था।
पहले धरती के सात द्वीप थे- जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर। इसमें से जम्बूद्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है। राजा प्रियव्रत संपूर्ण धरती के और राजा अग्नीन्ध्र सिर्फ जम्बूद्वीप के राजा थे।
जम्बूद्वीप में नौ खंड हैं- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। इसमें से भारतखंड को भारत वर्ष कहा जाता था। भारतवर्ष के 9 खंड हैं- इसमें इन्द्रद्वीप, कसेरु, ताम्रपर्ण, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य, गन्धर्व और वारुण तथा यह समुद्र से घिरा
हुआ द्वीप उनमें नौवां है। भारतवर्ष के इतिहास को ही हिन्दू धर्म का इतिहास नहीं समझना चाहिए।
ईस्वी सदी की शुरुआत में जब अखंड भारत से अलग दुनिया के अन्य हिस्सों में लोग पढ़ना-लिखना और सभ्य होना सीख रहे थे, तो दूसरी ओर भारत में विक्रमादित्य, पाणीनी, चाणक्य जैसे विद्वान व्याकरण और
Read 7 tweets
4 Apr
🌹सदोष और निर्दोष जीवन 🌹

एक आदमी है जो मनौतियाँ मानता है कि जहाज में बैठ जाऊँगा तो प्रसाद बाँटूगा, नारियल फोड़ूँगा। वह पैसा भी खर्च रहा है और जहाज की यात्रा करने के बाद नारियल भी फोड़ता है, प्रसाद भी बाँटता है, खुशियाँ मनाता है। लेकिन जहाज में नौकरी वाला पायलट तथा दूसरे
मददगार लोग जहाज में बैठते भी हैं, ऊपर से पैसा भी लेते हैं और घड़ी देखते रहते हैं कि कब समय पूरा हो। डयूटी पूरी हुई तो ‘हाश! जान छूटी!’ करके घर पहुँचते हैं क्योंकि वे सुख लेने के लिए जहाज में नहीं बैठते, डयूटी के लिए बैठते हैं। जैसे यात्री सैर करने जाता है, ऐसे पायलट के मन में
सैरबुद्धि नहीं है। साधन में होते हुए भी उसमें सुखबुद्धि नहीं है। ऐसे ही देहरूपी साधन में ब्रह्मवेत्ता भी होगा और अज्ञानी भी होगा, बुद्धू भी होगा और बुद्ध भी होगा लेकिन बुद्धु शरीररूपी साधन में सुखबुद्धि करके जियेगा और बुद्धपुरुष शरीररूपी साधन का उपयोग करने के लिए जियेगा। यात्री
Read 7 tweets

Did Thread Reader help you today?

Support us! We are indie developers!


This site is made by just two indie developers on a laptop doing marketing, support and development! Read more about the story.

Become a Premium Member ($3/month or $30/year) and get exclusive features!

Become Premium

Too expensive? Make a small donation by buying us coffee ($5) or help with server cost ($10)

Donate via Paypal Become our Patreon

Thank you for your support!

Follow Us on Twitter!