#गौतमधर्मसूत्र

सभी धर्मसूत्रों में #गौतम #धर्मसूत्र सबसे प्राचीन है। यह केवल गद्य में है तथा
इसमें श्लोक का कोई उद्धरण नहीं दिया गया है, जबकि दूसरे धर्मसूत्रों में
श्लोक का उद्धरण आ जाता है। इसकी प्राचीनता के प्रमाण :
१. सर्वप्रथम इसका उल्लेख #बौधायनधर्मसूत्र में कई जगह किया गया है। अनेक प्रमाणों से यह बात सिद्ध है कि बौधायन ने ही गौतमधर्मसूत्र
से सामग्री ग्रहण की है।
२. इसी प्रकार वसिष्ठधर्मसूत्र में भी गौतमधर्मसूत्र से सामग्री ली गयी है।
३. #मनुस्मृति ३. १६ में #गौतम का उल्लेख किया गया है और उन्हें #उतथ्य का
पुत्र बताया गया है।

४. #याज्ञवल्क्यस्मृति १. ५ में उन्हें धर्मशास्त्रकारों में गिनाया गया है :
"पराशरव्यासशंखलिखिता दक्षगौतमौ”।
५. #अपरार्क ने '#भविष्यपुराण' से यह श्लोक उद्धृत किया है :
"प्रतिषेधः सुरापाने मद्यस्य च नराधिप ।
द्विजोत्तमानामेवोक्तः सततं गौतमादिभिः।"

६. #मनुस्मृति के टीकाकार #कुल्लुक ने #गौतम के ३. ६. २ सूत्र को भी #भविष्यपुराण का बताया है।
७. '#तन्त्रवार्तिक के लेखक #कुमारिल ने गौतम के अनेक सूत्र उद्धत किये हैं।
८. #शंकराचार्य ने अपने #वेदान्तसूत्रभाष्य ३. १. ८ में गौतम के २. २. २९ को
तथा १. ३. ३८ में २. ३. ४ को उद्धत किया है।
९. #याज्ञवल्क्यस्मृति के टीकाकार #विश्वरूप ने गौतम के कई सूत्रों का निर्देश
किया है।
१०. #मनुस्मृति के भाष्यकार #मेधातिथि ने गौतम का उद्धरण अनेक स्थलों पर
दिया है।
११. #गौतमधर्मसूत्र में #हिन्दूधर्म पर #बौद्धों द्वारा किये गये आक्षेपों की ओर
संकेत नहीं है।

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3 May
#जनपदोद्ध्वंस [ #Epidemic ] के कारण के विषय में भगवान् आत्रेय से अग्निवेश का प्रश्न -

#अग्निवेश ने कहा ‘एक ही समय में भिन्न-भिन्न प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, मन और आयु के मनुष्यों का जनपदोद्ध्वंस ( #महामारी ) एक ही व्याधि से कैसे होता है ?’

#चरकसंहिता
भगवान् #आत्रेय का उत्तर - प्रकृति आदि भावों के भिन्न होते हुए भी मनुष्यों के जो अन्य #भाव_सामान्य हैं, उनके विकृत होने से एक ही समय में, एक ही समान लक्षण वाले #रोग उत्पन्न होकर #जनपद को नष्ट कर देते हैं। वे ये भाव जनपद में सामान्य होते हैं। जैसे-#वायु, #जल, #देश और #काल
(१) विकृत (रोग पैदा करने वाली) #वायु के लक्षण -

ऋतु के विपरीत, अतिनिश्चल, अति वेग वाली, अत्यन्त कर्कश, अतिशीत, अति उष्ण, अत्यन्त रुक्ष, अत्यन्त अभिष्यन्दी, भयंकर शब्द करने वाली, आपस में टक्कर खाती हुई, अति कुण्डली युक्त , बुरे गन्ध, वाष्प, बालू , धूलि और #धूम से दूषित हुई।
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2 May
#नाड़ीचक्र का वर्णन-

मूलाधार में आधा बाँस काटा गया हो ऐसे आकार (आभा) वाली, मूलाधार के त्रिकोणाकार प्रदेश में अवस्थित, बारह अंगुल के परिमाणवाली #सुषुम्ना नाम की #नाड़ी है, उसे #ब्रह्मनाड़ी भी कहा जाता है । उस सुषुम्ना के दोनों पार्थों में #इडा और #पिंगला नाम की दो नाड़ियाँ हैं।
वे दोनों नाड़ियाँ #विलम्बिनी नाम की #नाड़ी में अनुस्यूत (पिरोयी हुई)हैं और वे दोनों नाड़ियाँ नासिका के अन्तभाग-नथुने तक पहुँची हुई हैं ।वाम नथुने से इडा में हेमरूप से (सूर्य नाड़ी से) प्राणवायु पहले आता है।और नासिका के दक्षिण भाग से (दाहिने नथुने से) सूर्यस्वरूप वह वायु जाता है ।
अब जो #विलम्बिनी नाम की नाड़ी है, वह व्यक्त होकर #नाभि प्रदेश में प्रतिष्ठित हुई है, उसके थोड़े ऊपर के भाग में नीचे मुख किए हुए नाड़ियाँ उत्पन्न हुई हैं । उस स्थान को #नाभिचक्र कहा जाता है । कुक्कुट ( मुर्गी ) के अण्डे की तरह उसका आकार है ।
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2 May
शंका- इस देह के अन्त के बाद कौन-सा जन्म मिलेगा, यह आभास #ज्ञानी मनुष्य जानते नहीं है। इसलिए #योग से रहित केवल जानकारी का ज्ञान और वैराग्य तो अर्थविहीन परिश्रम ही है।
#ध्यान में बैठे हुए जिस मनुष्य का ध्यान एक चींटी के काटने से भी छूट जाता है, वह पुरुष #मृत्यु के समय के में बिच्छुओं के डंक मारने की-सी पीड़ा होने पर किस तरह #सुखी हो सकता है भला?
समाधान- इस बात को मिथ्या तर्क से घिरे हुए लोग समझ नहीं सकते कि जब #अहंकार (मैं-मेरा) ही नष्ट हो जाता है, तब देह भी वास्तव में नष्ट ही हो जाता है। (भले ही वह बाहर से दिखाई दे) और तब तो फिर पीड़ाएँ होंगी किसको ? तब तो फिर जल, अग्नि, शस्त्र और खाई आदि की बाधाएँ भला किसको होंगी ?
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1 May
आदि #सत्ययुग में जिस प्रकार #राजा और #राज्य की उत्पत्ति हुई वह सारा वृतांत सुनो -

पहले न कोई राज्य था ना राजा। न दंड था और न दंड देने वाला। समस्त प्रजा धर्म के द्वारा ही एक दूसरे की रक्षा करती थी।
...

- भीष्म

#शान्तिपर्व
सब मनुष्य धर्मके द्वारा परस्पर पालित
और पोषित होते थे। कुछ दिनोंके बाद सब लोग पारस्परिक संरक्षणके कार्यमें महान् कष्टका अनुभव करने लगे।फिर उन सबपर #मोह छा गया। जब सारे मनुष्य मोहके वशीभूत हो गये, तब कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे शून्य होनेके कारण उनके #धर्म का नाश हो गया।
कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान नष्ट हो जानेपर
मोहके वशीभूत हुए सब मनुष्य #लोभ के अधीन हो गये। फिर जो वस्तु उन्हें प्राप्त नहीं थी, उसे पानेका वे प्रयत्न करने लगे। इतनेहीमें वहाँ #काम नामक दूसरे दोषने उन्हें घेर लिया। कामके अधीन हुए उन मनुष्योंपर #क्रोध नामक शत्रुने आक्रमण किया।
Read 10 tweets
1 May
राजनीतिके छ : #गुण होते हैं - #सन्धि , #विग्रह , #यान , #आसन , #द्वैधीभाव और #समाश्रय । इन सबके गुण - दोषोंका अपनी बुद्धिद्वारा सदा निरीक्षण करे।

यदि शत्रुपर चढ़ाई की जाय और वह अपनेसे बलवान् सिद्ध हो तो उससे मेल कर लेना #सन्धि नामक गुण है ।

#शान्तिपर्व
#महाभारत
यदि दोनोंमें समान बल हो तो लड़ाई जारी रखना #विग्रह है ।

यदि शत्रु दुर्बल हो तो उस अवस्थामें उसके दुर्ग आदि पर जो आक्रमण किया जाता है , उसे #यान कहते हैं ।
यदि अपने ऊपर शत्रुकी ओरसे आक्रमण हो और शत्रुका पक्ष प्रबल जान पड़े तो उस समय अपनेको दुर्ग आदिमें छिपाये रखकर जो आत्मरक्षा की जाती है , वह #आसन कहलाता है।
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1 May
#श्येनयाग के #धर्म या #अधर्म होने में निर्णय-

(१) ‘अनिष्ट से असम्बद्ध #इष्ट की सिद्धि जिससे हो वही #धर्म है।’ यदि धर्म
का यह लक्षण करें तो फिर श्येन याग अधर्म होने के कारण वर्जनीय होगा, क्योंकि इस याग से उत्पन्न होने वाले शत्रुवध स्वरूप फल से अनिष्ट का होना निश्चित है।
(२)यदि किसी रीति से अर्थात् शत्रुवधादि स्वरूप अकार्य के उत्पादन के द्वारा भी #प्रीति का जो कारण विधिवाक्य के द्वारा विधेयरूप में निर्दिष्ट हो वही 'धर्म' है-धर्म का लक्षण करें तो फिर श्येनयाग भी #धर्म ही है, क्योंकि श्येनयाग भी शत्रु के वध से ही उत्पन्न होनेवाली प्रीति का कारण है।
एवं 'श्यनेनाभिचरन् यजेत' इस #विधिवाक्य के द्वारा विधेय रूप में निर्दिष्ट भी है। भले ही वह शत्रुवध रूप 'अकार्य' अर्थात् #अधर्म का जनक हो। #धर्म होने के लिये #अधर्म का उत्पादकत्व #बाधक नहीं है। #धर्म होने के लिये केवल #प्रीतिजनकत्व एवं #चोदनागम्यत्व ये ही दोनों आवश्यक हैं।
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