Just composed a verse for a beautiful verse composed by Respected Rigvedamurtti Acharya Sri Oravankara Damodaran Nambudiri sir

My verse is as follows:

गोविन्दरूपिण्यहमस्मि सत्यताम्
अश्वास्यवाचं प्रददाति सायुधम्।
स्वीकृत्य नीलारुणवर्णसन्निभं
राधायुतं कृष्णकलेवरं सती॥ Image
In order to make Hayagreeva's words truthful,satI(Devi) showing that "I am govindarUpinI",assumes the form of kriShNa with rAdhA with blue & dark complexions decorated with Ayudhas. Image
"मैं गोविन्दरूपिणी हूँ" यह बताने के लिये, देवी सती राधायुक्तकृष्ण के नीले और रक्ताभ वर्ण वाले स्वरूप को आयुध समेत धारण करके भगवान् हयग्रीव के वचनों को सत्यता प्रदान करती हैं। Image

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4 May
This is a photo of a Hindi blessing/article written by HH Jagadguru Shakaracharya anantaSrIvibhUShita Sri Bharati teerthaji Mahaswami, Sringeri ij which importance of Upanayana as per swaSAkhA & demerits of conducting upanayan as per other shakha has been established a/t SAstras. Image
Quote
जो व्यक्ति जिस शाखा का परम्परा से अध्ययन करने वाला है, उसका कर्तव्य होता है कि वह पहले अपनी शाखा का अध्ययन करे। अपनी वेदशाखा का अध्ययन किये बिना दूसरी शाखा का अध्ययन करना उचित नहीं है। इसी प्रकार जो जिस सूत्र का है, उसको उस सूत्र के अनुसार अनुष्ठान भी सर्वथा कर्तव्य है।+
अङ्गिरा का कथन है-
स्वे स्वे गृह्ये यथा प्रोक्तास्तथा संस्कृतयोऽखिलाः।
कर्तव्या भूतिकामेन नान्यथा सिद्धिमृच्छति॥
स्वगृह्यसूत्र में कथित सभी संस्कार यथोक्त रीति से सम्पन्न करने चाहिये, अन्यथा ऐहिकामुष्मिक फल की प्राप्ति नहीं होती।
//ऐहिकामुष्मिक अर्थात् इस पृथ्वी पर प्राप्य +
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9 Mar
शास्त्रसम्मत सदाचार में कोई भी पदस्थव्यक्ति प्रमाण नहीं होता है अपितु शास्त्रवचन प्रमाण होते हैं व शास्त्रसम्मत कृत्य मान्य होते हैं।
शास्त्रानुसार, राजा दिक्पतियों का अंश होता है।
इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च।
चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः॥ +
यस्मादेषां सुरेन्द्राणां मात्राभ्यो निर्मितो नृपः।(मनु)
ऐसे में राजा को ही इन्द्र,ईशान आदि का साक्षात् स्वरूप मानकर क्या ऋषियों ने वेन आदि के व आचार्य शङ्कर ने सुधन्वा आदि के धर्मपराङ्मुखता का समर्थन किया था! क्या उन्होंने शास्त्रमर्यादा के ऊपर पदस्थव्यक्ति को रखा दिया था!+
आज बड़ी विकट समस्या यह आ गयी है कि सामूहिक उपनयनादि दुर्भाग्यपूर्ण व हेय कृत्यों की पापपूर्णता के विषय में सद्गृहस्थ ब्राह्मणों द्वारा शास्त्रोक्तवस्तुस्थिति बताये जाने पर उन्हीं शास्त्रधर्मस्थब्राह्मणों व शास्त्रविचारों की व्यङ्ग्यपूर्ण व कठिन शब्दों में अवहेलना कर दी जा रही है।
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