#नाड़ीचक्र का वर्णन-

मूलाधार में आधा बाँस काटा गया हो ऐसे आकार (आभा) वाली, मूलाधार के त्रिकोणाकार प्रदेश में अवस्थित, बारह अंगुल के परिमाणवाली #सुषुम्ना नाम की #नाड़ी है, उसे #ब्रह्मनाड़ी भी कहा जाता है । उस सुषुम्ना के दोनों पार्थों में #इडा और #पिंगला नाम की दो नाड़ियाँ हैं।
वे दोनों नाड़ियाँ #विलम्बिनी नाम की #नाड़ी में अनुस्यूत (पिरोयी हुई)हैं और वे दोनों नाड़ियाँ नासिका के अन्तभाग-नथुने तक पहुँची हुई हैं ।वाम नथुने से इडा में हेमरूप से (सूर्य नाड़ी से) प्राणवायु पहले आता है।और नासिका के दक्षिण भाग से (दाहिने नथुने से) सूर्यस्वरूप वह वायु जाता है ।
अब जो #विलम्बिनी नाम की नाड़ी है, वह व्यक्त होकर #नाभि प्रदेश में प्रतिष्ठित हुई है, उसके थोड़े ऊपर के भाग में नीचे मुख किए हुए नाड़ियाँ उत्पन्न हुई हैं । उस स्थान को #नाभिचक्र कहा जाता है । कुक्कुट ( मुर्गी ) के अण्डे की तरह उसका आकार है ।
वहाँ से #गान्धारी और #हस्तिजिह्वा नाम की दो नाड़ियाँ दोनों #आँखों तक पहुँची हुई है और #पूषा तथा #अलम्बुसा नाम की दो नाड़ियाँ दोनों #कानों तक पहुँची हुई हैं । #शूरा नाम की एक #महानाड़ी उससे उत्पन्न होकर दोनों भौहों के बीच में पहुँची हुई है ।
जो #विश्वोदरी नाम की #नाड़ी है , वह चारों प्रकार के #अन्न -#लेह्य , #चोष्य , #पेय और #खाद्य को ग्रहण करती है । जो #सरस्वती नाम की नाड़ी है , वह जीभ के अन्त तक फैली हुई है और जो #राका नाम की नाड़ी है , वह पानी पीकर एक क्षण में छींक को पैदा कर देती है और कफ को एकत्रित करती है ।
#शंखिनी नाम की #नाड़ी कण्ठकूप से उत्पन्न होती है , वह नीचे मुख किए हुए है । वह अन्न के सारतत्त्व को इकट्ठा करके सदा #मस्तक में रख देती है । #नाभि के नीचे के भाग में तीन नाड़ियाँ हैं , ये सब अधोमुखी हैं । इनमें से जो #कुहू नाम की नाड़ी है , वह मल का त्याग करती है
और जो #वारुणी ,नाम की नाड़ी है , वह #मूत्र का त्याग करती है । #सीवनी के स्थान में जो #चित्रा नाम की नाडी है , वह शुक्ल ( शुक्र ) का मोचन करने वाली है । इसको #नाड़ीचक्र कहा गया है ।

#योगशिखोपनिषद्

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More from @dharmakibaat

4 May
राजा इन ३६ गुणोंसे सम्पन्न होनेकी चेष्टा करे -

१ - #धर्म का आचरण करे , किंतु कटुता न आने दे
२ - #आस्तिक रहते हुए दूसरों के साथ प्रेमका बर्ताव न छोड़े
३ - क्रूरताका आश्रय लिये बिना ही #अर्थ - संग्रह करे
४ - #मर्यादा का अतिक्रमण न करते हुए ही विषयोंको भोगे
सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन-

५ - दीनता न लाते हुए ही प्रिय #भाषण करे
६- #शूरवीर बने , किंतु बढ़ - बढ़कर बातें न बनावे
७- #दान दे , परंतु अपात्रको नहीं
८ - #साहसी हो , किंतु निष्ठुर न हो
९- #दुष्टों के साथ मेल न करे
१० - बन्धुओं के साथ लड़ाई - #झगड़ा न ठाने ।
११ - जो राजभक्त न हो , ऐसे #गुप्तचर से काम न ले
१२ - किसीको #कष्ट पहुँचाये बिना ही अपना कार्य करे
१३ - दुष्टोंसे अपना #अभीष्ट कार्य न कहे
१४ - अपने गुणोंका स्वयं ही वर्णन न करे
१५ - श्रेष्ठ पुरुषोंसे उनका #धन न छीने
१६ - नीच पुरुषोंका #आश्रय न ले
Read 7 tweets
3 May
(३) विकृत #देश के लक्षण - जिस देश के स्वाभाविक वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श विकृत हो गए हों, अधिक क्लेदयुक्त, साँप, हिंसक जन्तु, मच्छड़, टिड्डी, मक्खियाँ, चूहा, उल्लू, गोध, सियार आदि जन्तुओं से व्याप्त, तृण और फूस से युक्त उपवन वाले, विस्तृत लता आदि से युक्त,

#चरकसंहिता
#महामारी
जैसा पहले कभी नहीं हुआ हो ऐसे गिरे हुये, सूखे हुये, और नष्ट हुए शस्यवाले, धूम युक्त वायुवाले, लगातार शब्द करते हुए पक्षियों के समूह और जहाँ जोर से कुत्ते चिल्लाते हों, अनेक प्रकार के मृग, पक्षी, घबड़ा कर और दुःखित होकर इधर-उधर दौड़ते हों,
छोड़ दिए हैं और नष्ट हो गए हैं #धर्म, #सत्य, #लज्जा, #आचार, #स्वभाव और गुण जिनमें ऐसे #जनपद वाले, जहाँके #जलाशय क्षुब्ध हों और उसमें बड़ी लहरें उठती हों, जहाँ लगातार आकाश से उल्कापात होता हो, बिजली गिरनी हो, भूकम्प होता हो और भयंकर शब्द सुनाई पड़ते हों,
Read 5 tweets
3 May
#जनपदोद्ध्वंस [ #Epidemic ] के कारण के विषय में भगवान् आत्रेय से अग्निवेश का प्रश्न -

#अग्निवेश ने कहा ‘एक ही समय में भिन्न-भिन्न प्रकृति, आहार, देह, बल, सात्म्य, मन और आयु के मनुष्यों का जनपदोद्ध्वंस ( #महामारी ) एक ही व्याधि से कैसे होता है ?’

#चरकसंहिता
भगवान् #आत्रेय का उत्तर - प्रकृति आदि भावों के भिन्न होते हुए भी मनुष्यों के जो अन्य #भाव_सामान्य हैं, उनके विकृत होने से एक ही समय में, एक ही समान लक्षण वाले #रोग उत्पन्न होकर #जनपद को नष्ट कर देते हैं। वे ये भाव जनपद में सामान्य होते हैं। जैसे-#वायु, #जल, #देश और #काल
(१) विकृत (रोग पैदा करने वाली) #वायु के लक्षण -

ऋतु के विपरीत, अतिनिश्चल, अति वेग वाली, अत्यन्त कर्कश, अतिशीत, अति उष्ण, अत्यन्त रुक्ष, अत्यन्त अभिष्यन्दी, भयंकर शब्द करने वाली, आपस में टक्कर खाती हुई, अति कुण्डली युक्त , बुरे गन्ध, वाष्प, बालू , धूलि और #धूम से दूषित हुई।
Read 6 tweets
2 May
शंका- इस देह के अन्त के बाद कौन-सा जन्म मिलेगा, यह आभास #ज्ञानी मनुष्य जानते नहीं है। इसलिए #योग से रहित केवल जानकारी का ज्ञान और वैराग्य तो अर्थविहीन परिश्रम ही है।
#ध्यान में बैठे हुए जिस मनुष्य का ध्यान एक चींटी के काटने से भी छूट जाता है, वह पुरुष #मृत्यु के समय के में बिच्छुओं के डंक मारने की-सी पीड़ा होने पर किस तरह #सुखी हो सकता है भला?
समाधान- इस बात को मिथ्या तर्क से घिरे हुए लोग समझ नहीं सकते कि जब #अहंकार (मैं-मेरा) ही नष्ट हो जाता है, तब देह भी वास्तव में नष्ट ही हो जाता है। (भले ही वह बाहर से दिखाई दे) और तब तो फिर पीड़ाएँ होंगी किसको ? तब तो फिर जल, अग्नि, शस्त्र और खाई आदि की बाधाएँ भला किसको होंगी ?
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2 May
#गौतमधर्मसूत्र

सभी धर्मसूत्रों में #गौतम #धर्मसूत्र सबसे प्राचीन है। यह केवल गद्य में है तथा
इसमें श्लोक का कोई उद्धरण नहीं दिया गया है, जबकि दूसरे धर्मसूत्रों में
श्लोक का उद्धरण आ जाता है। इसकी प्राचीनता के प्रमाण :
१. सर्वप्रथम इसका उल्लेख #बौधायनधर्मसूत्र में कई जगह किया गया है। अनेक प्रमाणों से यह बात सिद्ध है कि बौधायन ने ही गौतमधर्मसूत्र
से सामग्री ग्रहण की है।
२. इसी प्रकार वसिष्ठधर्मसूत्र में भी गौतमधर्मसूत्र से सामग्री ली गयी है।
३. #मनुस्मृति ३. १६ में #गौतम का उल्लेख किया गया है और उन्हें #उतथ्य का
पुत्र बताया गया है।

४. #याज्ञवल्क्यस्मृति १. ५ में उन्हें धर्मशास्त्रकारों में गिनाया गया है :
"पराशरव्यासशंखलिखिता दक्षगौतमौ”।
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1 May
आदि #सत्ययुग में जिस प्रकार #राजा और #राज्य की उत्पत्ति हुई वह सारा वृतांत सुनो -

पहले न कोई राज्य था ना राजा। न दंड था और न दंड देने वाला। समस्त प्रजा धर्म के द्वारा ही एक दूसरे की रक्षा करती थी।
...

- भीष्म

#शान्तिपर्व
सब मनुष्य धर्मके द्वारा परस्पर पालित
और पोषित होते थे। कुछ दिनोंके बाद सब लोग पारस्परिक संरक्षणके कार्यमें महान् कष्टका अनुभव करने लगे।फिर उन सबपर #मोह छा गया। जब सारे मनुष्य मोहके वशीभूत हो गये, तब कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे शून्य होनेके कारण उनके #धर्म का नाश हो गया।
कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान नष्ट हो जानेपर
मोहके वशीभूत हुए सब मनुष्य #लोभ के अधीन हो गये। फिर जो वस्तु उन्हें प्राप्त नहीं थी, उसे पानेका वे प्रयत्न करने लगे। इतनेहीमें वहाँ #काम नामक दूसरे दोषने उन्हें घेर लिया। कामके अधीन हुए उन मनुष्योंपर #क्रोध नामक शत्रुने आक्रमण किया।
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