कहते हैं कि बद अच्छा, बदनाम बुरा। कोविड मामले में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।
यह वायरस इतना खतरनाक है कि कोई भी देश इससे अपना नाम किसी सूरत में नहीं जो़ड़ना चाहता। लेकिन जब तक किसी वायरस का वैज्ञानिक नामकरण न हो, तब तक उसे क्या कहा जाए?
...1/22
देशों के नाम से पुकारें तो यह उस देश के लिए ‘चिढ़’ जैसा हो जाता है।
याद करें कि पिछले साल जब अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कोविड को ‘चीनी वायरस’ कहा था तो चीन भड़क गया था। जबकि इस वायरस का सबसे पहले पता चीन के वुहान शहर में ही चला था।
...2/22
पिछले दिनो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केन्द्र सरकार को वायरस के कथित ‘सिंगापुर स्ट्रेन’ के बारे में चेताया था तो सिंगापुर सरकार ने नाराज होकर वहां भारतीय उच्चायु्क्त को तलब कर लिया था।
...3/22
वहां के विदेश मंत्री विवियन बालकृष्णन ने ट्वीट कर कहा कि सिंगापुर वेरिएंट जैसा कोई वायरस नहीं है और न ही ऐसे किसी वायरस से बच्चों को खतरा है। मामला इतना गर्माया कि भारत के विदेशमंत्रालय को सफाई देनी पड़ी कि केजरीवाल के बयान को भारतसरकार का बयान न समझें।यह उनकी निजी राय है।
.4/22
इसके समांतर हम मीडिया में कोविड 19 के अलग-अलग वेरिएंट्स के नाम मुख्यत: वो जहां पहली बार ‍मिले, उन देशों के नाम से जानते आ रहे हैं। मसलन ब्राजील वेरिएंट, यूके वेरिएंट, अफ्रीकन वेरिएंट आदि।
इसी आम बोलचाल में भारत में मिले स्ट्रेन को ‘इंडियन स्ट्रेन’ कहा गया।
...5/22
हालांकि यह कोई अधिकृत नामकरण नहीं है, लेकिन यह वैसा ही है कि किसी नवजात बच्चे का विधिवत नामकरण होने से पहले परिजन उसे मनचाहे नामों से पुकारते हैं। क्योंकि हर जीव फिर चाहे वह वायरस ही क्यों न हो, उसे पहचान तो चाहिए ही।
...6/22
और लोग हैं कि तब तक रूकते नहीं है कि भई अधिकृत नामकरण तो हो जाने दें।

अब बच्चे का नामकरण तो मां-बाप करते हैं, संस्थानों, वास्तु आदि का नाम सरकारें तय करती हैं, लेकिन वायरस जैसे अत्यंत सूक्ष्म विषाणु का नाम कौन और किस विधि से रखता है?
...7/22
तो जान लें कि किसी वायरस का नामकरण भी उसकी वैज्ञानिक कुंडली देखकर किया जाता है। इसके लिए एक वैश्विक कोरोना वायरस स्टडी ग्रुप काम करता है। यह स्टडी ग्रुप इंटरनेशनल कमेटी ऑन टैक्साॅनामी ऑफ वायरसेस के तहत काम करता है। यह कमेटी सार्स कोविड 2 वायरस के नामकरण के लिए जवाबदेह है।
.8/22
नामकरण भी वायरस की पहचान और इससे होने वाली बीमारी को ध्यान में रखते हुए किया जाता है। मसलन हम जिसे कोविड-19 के नाम से जानते हैं, उसमें ‘को’ से तात्पर्य कोरोना, ‘वि’ से तात्पर्य वायरस, ‘डी’ से तात्पर्य डिसीज तथा ‘19’ से तात्पर्य वो वर्ष, जिसमें यह वायरस खोजा गया।
...9/22
लेकिन अब यह वायरस भी अलग अलग देशों में अपने भीतर उत्परि वर्तन कर रहा है। यानी अपना रंग-रूप और मारकता बदल रहा है। इसलिए अब इसके अलग-अलग स्ट्रेनों का अलग-अलग नामकरण जरूरी हो गया है।
..10/22
लेकिन इसके पहले जब तक इस वायरस के विभिन्न रूपों का कोई अधिकृत नाम सामने नहीं आया था, तब तक लोगों ने जिस देश में जो वेरिएंट मिला, उसे उसी के नाम से पुकारना शुरू कर दिया।
सारे बवाल की जड़ यही है। लेकिन वैज्ञानिक क्षेत्र में ऐसी हड़बड़ाहट या सियासत काम नहीं करती।
...11/22
हमारे देश में तो किसी भी मुद्दे पर राजनीति हो सकती है। लिहाजा ‘इंडियन वेरिएंट’ पर भी घमासान मचा। मानो इसका भी कोई राजनीतिक लाभ हो सकता है।
जब पाकिस्तानी मीडिया में खबर चमकी कि वहां कोरोना का पहला ‘इंडियन स्ट्रेन’ मिला तो संबित पात्रा ने इसके लिए राहुल गांधी को घेर लिया।
..12/22
उन्होंने ट्वीट कर कहा कि राहुल की मंशा पूरी हुई। आशय यह कि राहुल ने कोरोना वायरस को ‘इंडियन’ बताकर भारत को बदनाम किया।
यही काम मप्र भाजपा ने पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर हमला कर और उनके खिलाफ एफआईआर करके किया (अब उस एफआईआर का क्या होगा, देखने की बात है)।
..13/22
यानी जो कुछ हुआ, वह राजनीतिक मूर्खता और हमारे नेताओं के दिमागी दिवालियापन के अलावा कुछ नहीं है।

अब सवाल यह कि राहुल गांधी ने इसे ‘इंडियन स्ट्रेन’ क्यों कहा? तो इसका जवाब खुद मोदी सरकार के कोर्ट में दिए हलफनामे में था।
...14/22
‘द हिंदू ‘की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते 9 मई के एक हलफनामे में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी ने देश में कोवैक्सीन विकसित करने के लिए उठाए गए कदमों का विवरण देते हुए कोरोना वायरस के लिए ‘इंडियन डबल म्यूटेंट स्ट्रेन’ शब्द का उल्लेख किया।
..15/22
ICMR के इस हलफनामे पर कांग्रेस नेता शशि थरूर ने आपत्ति जताई थी, लेकिन सरकार और भाजपा को इस की गंभीरता समझ नहीं आई।
परंतु इस हलफनामे के तीन दिन बाद ही केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने उन मीडिया रिपोर्ट्स पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें कोरोना...
..16/22
वायरस के एक स्वरूप बी.1.617 को ‘इंडियन वेरिएंट’ कहा गया था।
मंत्रालय ने कहा कि डब्लूएचओ ने इस वेरिएंट को इंडियन जैसा कोई नाम नहीं दिया है।
उधर ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ ने भी सफाई दी कि वह वायरस के किसी वेरिएंट को किसी देश के नाम से नहीं जोड़ता है।
...17/22
बहरहाल, अब डब्लूएचओ ने बदनाम कोरोना वायरस के वैज्ञानिक नामकरण की पद्धति तय कर दी है।
इसके मुताबिक ग्रीक अल्फाबेट (वर्णाक्षर) को आधार बनाकर सभी कोविड वेरिएंट्स का नामकरण किया जाएगा। ग्रीक वर्णमाला में 24 अक्षर हैं।
...18/22
इसी के तहत कथित इंडियन वेरिएंट यानी B.1.617.2 का नाम ‘डेल्टा वेरिएंट’ कर दिया गया है तथा देश में ‍मिले एक और वेरिएंट B.1.617.1 का नाम ‘कप्पा’ रख दिया गया है। इसी प्रकार ब्रिटिश वेरिएंट ‘अल्फा’, साउथ अफ्रीकन वेरिएंट ‘बीटा’, ब्राजील वेरिएंट ‘गामा’
...19/22
फिलीपीन्स वेरिएंट ‘थीटा’ व यूएस वेरिएंट ‘‍एप्सिलान’ कहलाएगा। यदि ग्रीक अल्फाबेट के वर्ण भी खत्म हो जाएंगे तो नामकरण की नई सीरिज शुरू होगी। लेकिन अब किसी देश के नाम से कोई वायरस नहीं जाना जाएगा।
यहां प्रश्न किया जा सकता है कि क्या ग्रीस के लोग इस नामकरण के लिए तैयार हैं?
😂
.20/22
या वो लोग भी हमारे नेताओं की तरह बवाल मचाएंगे?
क्या उनकी संस्कृति भी खतरे में आ जाएगी?

क्योंकि मान लीजिए यदि डब्लूएचओ तय करता कि वह देवनागरी के वर्णों (या ऐसी ही किसी और भाषा) का इस्तेमाल कोविड नामकरण के लिए करेगा तो हमारे देश में कितना बवाल मचता?
😆😆
..21/22
लेकिन ग्रीस जैसे देशों में ऐसा कुछ नहीं होगा, क्योंकि उनकी सांस्कृतिक, वैज्ञानिक समझ हमसे कई गुना ज्यादा और व्यापक है।
वायरस से जोड़े जाने पर ग्रीक अल्फाबेट की महत्ता और ग्रीस की महान संस्कृति पर कोई आंच नहीं आने वाली है।
यही वैश्विक समझ और वैज्ञानिक सहिष्णुता भी है। 😇
..22/22
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10 Jun
कमलनाथ के नेतृत्व वाली प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी में तीन साल पहले जब 84 सदस्यों को शामिल किया गया था, तब भाजपाई उस पर हंसते थे। अब प्रदेश भाजपा की 402 सदस्यों वाली ‘महाजम्बो कार्यसमिति’ के कांग्रेसी मजे ले रहे हैं। कटाक्ष कर भाजपा को ‘भारतीय जाति पार्टी’ तक बता दिया।
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लगता है ऐसी जम्बो कार्यसमितियों के गठन के पीछे भाव यही रहता है कि संगठन की रेल में सवार होने से कहीं कोई छूट न जाए। किसी कार्यकर्ता को यह अहसास न हो कि सत्ता की मलाई उसे भले न मिल रही हो, लेकिन पार्टी के जनरल कोच में खुरचन तो उसके हिस्से में आई ही समझो। 😉
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यानी संगठन की कार्यसमिति न हुई, राजनीतिक रेवड़ी का भंडारा हो गया, जहां सब को कुछ न कुछ टिकाना जरूरी है। 😀
कुल मिलाकर ‘एजडस्टमेंट’ की यह आजमाई हुई ‘वैक्सीन’ है, जिसे हर पार्टी को लगाना ही पड़ती है, चाहे वह सिद्धांतो की कितनी ही बात करे।
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7 Jun
अजीब सर्कस चल रहा है!
मोदी अपने लिए चुनौती बन रहे योगी और शाह को अपने रास्ते से हटाना चाहते हैं।
योगी पीएम बनने के लिए मोदी और शाह को अपने रास्ते से हटाना चाहते हैं।
शाह को अपने ऐन सामने 2024 में पीएम की कुर्सी दिखाई दे रही है इसलिए वो मोदी और योगी को हटाना चाहते हैं।
😂
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आडवाणी ने इस आपसी भाजपाइयों की लड़ाई की आपदा में अवसर निकालने के लिए कई नेताओं से मुलाकात की, ताकि वे सब मिलकर मोदी, योगी, शाह को हटाकर अगले पीएम बन सकें।
😂
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उधर भागवत को लग रहा है कि 10 साल के भाजपा शासन से मूर्ख अंधभक्तों की संख्या में वृद्धि हुई है तो क्यों नहीं मोदी, शाह और योगी को हटाकर कोई अपरकास्ट के ब्राह्मण को इस देश की सत्ता सौंपी जाए या खुद पीएम बनने का मौका निकाल सकें।
😂
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30 May
राजनैतिक वंशवाद देश के लिए चुनौती है : मोदीजी ने कहा।

दरअसल हर वो शै जो जिससे भारतीय जनता पार्टी को डर लगता है, वह देश के लिये चुनौती है। जाहिर है वंशवाद का मतलब गांधी परिवार है। वह किला, जिसे ढहाने के बाद ही आपके दिल का खटका खत्म होगा।
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आप जानते हैं, कि इस किले के गिरे बगैर एक पार्टी की भावी तानाशाही मजबूत नहीं होगी।

आरएसएस भाजपा और उनकी वानर सेना को अच्छे से पता है, कि तमाम नाकामियों के बावजूद 20% वोट कांग्रेस को जो मिले हैं उसका अधिकांश हिस्सा गांधी परिवार के नाम का है।
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आंकड़े बताते हैं, 2014- 2019 के बीच भी यह प्रतिशत घटा नही, बढ़ा है।

गांधी परिवार कांग्रेस को एकजुट रखने का गोंद है, बैकबोन है। आप पूरी कांग्रेस खरीद सकते हैं, मगर गांधी परिवार नहीं खरीद सकते। इसके गिर्द खड़े 20 करोड़ वोट नहीं खरीद सकते।
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Read 13 tweets
26 May
रिजर्व बैंक, देश की तिल्ली ..

तिल्ली, याने स्प्लीन (Spleen)। एक अंग जो आपके शरीर में होता है, पेट के ऊपर, रिब्स के पास। और यह खून से जुड़े काम करता है।

जीवन की शुरुआत में ब्लड को बनाने का काम, स्प्लीन करता है। हड्डियां बनने के बाद ये काम बोन मैरो में होने लगता है।
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शुरू में, पुराने ब्लड को डी-कम्पोज करने (तोड़ने) का काम भी यही करता है, पर बाद में यह काम लीवर को ट्रांसफर कर दिया जाता है।

अंतत: स्प्लीन एक स्पंज की तरह रह जाता है। ब्लड सोखने वाला, रिलीज करने वाला।
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याने जो पांच लीटर खून आपके शरीर मे है, इसका 15 से 20% स्प्लीन में स्टोर रहता है। ये सरप्लस ब्लड है। जब आप दौड़ते, भागते, बीमार या बुखार में होते है, पहाड़ या ऊंचाई पर होते है, खून की जरूरत बढ़ जाती है।
तब स्प्लीन सिकुड़ती है। सरप्लस ब्लड, धमनियों में चला जाता है।
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Read 14 tweets
24 May
कुछ लोगों को लग रहा है मोदी मैजिक अचानक ही घट गया है। उन्हें ये लगता है कि ये कोविड का प्रभाव है। उन्हें ये भी लगता है कि महामारी में किसी का क्या दोष, लोग जल्दी ही भूल जायेंगे।

लेकिन ऐसा नहीं है। इन सालों में मोदी के हर निर्णय से कोई न कोई वर्ग बुरी तरह प्रभावित हुआ।
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इतना प्रभावित हुआ है कि बर्बाद हो गया। कभी व्यापारी तो कभी प्राइवेट जॉब वाले, कभी किसान तो कभी दुकानदार।

होता ये था कि प्रभावित वर्ग से कुछ लोगों के आवाज उठाते ही आईटी सेल वाले बुरी तरह उनके पीछे पड़ जाते थे। बाकि लोग ट्रोलिंग के डर से चुप बैठ जाते थे।
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पहली बार मुखर विरोध किसानों ने किया। आईटी सेल से उन्हें भी जवाब दिया गया –

मेरा कोई अन्नदाता नहीं, मैं कमाकर खाता हूं... जैसे संदेश आपकी नजर में भी आए होंगे।
लेकिन किसान खेत में रहने वाली कौम है। उन्हें इस ट्रोलिंग से क्या मतलब?
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Read 9 tweets
22 May
इस कोरोना काल का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि राजनेता इस पर भी राजनीति का कोई मौका हाथ से जाने नहीं दे रहे हैं। मानकर कि दुनिया खत्म हो जाए, सियासत और राजनेता अमर रहेंगे। गोया दुनिया बनी ही उनके लिए है। वे फिर मूर्ख जनता से अपने वोट कबाड़ लेंगे।
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बेशर्मी का यह खेल केन्द्र और सभी राज्यों में सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दल आपस में खेले जा रहे हैं। बस नाम भर अलग- अलग हैं, लेकिन उद्दंडता, निर्लज्जता और संवेदनहीनता एक-सी है। एक-दूसरे को बदनाम करना, खुद को फरिश्ता बताना और सत्ता की चाभी छीनने के लिए हर संभव सेंध लगाना।
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कोरोना के तांडव से लहुलुहान जनता को तो इन नेताओं का नंगा नाच देखने की भी फुर्सत नहीं है। नेता चाहे रोने बिसूरने की नौटंकी करें या दुखी दिखने की!

जनसाधारण अपने में ही परेशान है, आहत है, बेबस है। अपने आँसू खुद पोंछने के लिए, और अपनी लाशें खुद उठाने के लिए मजबूर है!
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