कमलनाथ के नेतृत्व वाली प्रदेश कांग्रेस कार्यकारिणी में तीन साल पहले जब 84 सदस्यों को शामिल किया गया था, तब भाजपाई उस पर हंसते थे। अब प्रदेश भाजपा की 402 सदस्यों वाली ‘महाजम्बो कार्यसमिति’ के कांग्रेसी मजे ले रहे हैं। कटाक्ष कर भाजपा को ‘भारतीय जाति पार्टी’ तक बता दिया।
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लगता है ऐसी जम्बो कार्यसमितियों के गठन के पीछे भाव यही रहता है कि संगठन की रेल में सवार होने से कहीं कोई छूट न जाए। किसी कार्यकर्ता को यह अहसास न हो कि सत्ता की मलाई उसे भले न मिल रही हो, लेकिन पार्टी के जनरल कोच में खुरचन तो उसके हिस्से में आई ही समझो। 😉
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यानी संगठन की कार्यसमिति न हुई, राजनीतिक रेवड़ी का भंडारा हो गया, जहां सब को कुछ न कुछ टिकाना जरूरी है। 😀
कुल मिलाकर ‘एजडस्टमेंट’ की यह आजमाई हुई ‘वैक्सीन’ है, जिसे हर पार्टी को लगाना ही पड़ती है, चाहे वह सिद्धांतो की कितनी ही बात करे।
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ज्योतिरादित्य सिंधिया के भोपाल फेरे के ठीक पहले आधी रात को प्रदेश भाजपा कार्यसमिति की लिस्ट जिस तरह आनन-फानन में जारी हुई, फिर वापस ली गई। संशोधन के बाद पुन: जारी हुई, उससे संदेश यही गया कि प्रदेश कार्यसमिति की यह बहुप्रतीक्षित सूची भी हड़बड़ी में ही बनाई और सुधारी गई है।
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यूं तो भाजपा सहित देश की हर राजनीतिक पार्टी जातीय गुणा भाग पर ही चलती है। लेकिन संगठन की घोषित सूचियों में सदस्यों की जाति के नाम का उल्लेख करने से अमूमन बचा जाता है, लेकिन प्रदेश भाजपा कार्यसमिति की पहली सूची सदस्यों के जातिगत उल्लेख के साथ लीक हो गई।
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गोया फलां जाति का होने से ही उसे संगठन में जगह मिली!
जातियां लिखने में भी गल्तियां हुईं। बाद में सुधारा गया। ऐसा क्यों और कैसे हुआ, इसको लेकर कई चर्चाएं हैं। सिंधिया के आने के पहले संगठन की सूची फाइनल करने का प्लान था ताकि बाद में ‘एडजस्टमेंट’ से पल्ला झाड़ा जा सके।
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यह भी कहा जा रहा है कि सूची तो पिछले साल दिसंबर में ही घोषित होनी थी पर कोविड के चलते उसमे देरी हुई। क्योंकि आलाकमान से हरी झंडी नहीं मिली। अब कार्यसमिति गठन के लिए कोविड की तीसरी लहर का इंतजार तो नहीं ही किया जा सकता था। लिहाजा ताबड़तोड़ लिस्ट जारी कर दी गई।
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इसकी तुलना अगर आज प्रतिपक्ष में बैठी कांग्रेस से करें तो वहां प्रदेश कार्यसमिति कमलनाथ की अध्यक्षता में 2018 में बनी थी, उसमें 84 सदस्य हैं। इनमें 19 उपाध्यक्ष, 25 महामंत्री व 40 सचिव बनाए गए थे। इसमें गुटीय, जातीय व क्षेत्रीय संतुलन साधने की पूरी कोशिश की गई थी।
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इस कार्यसमिति ने बरसों बाद राज्य की सत्ता कांग्रेस के हाथ आते देखी तो सवा साल बाद फटी आंखो से सत्ता हाथ से फिसलते हुए भी देखी। यानी जिन हाथों ने राजदंड ग्रहण किया था, उन्हीं हाथो ने सत्ता का तर्पण भी कर डाला। 😂
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तब कांग्रेस की इस कार्यसमिति को ‘जम्बो’ कहकर भाजपाइयों ने मजाक उड़ाया था। उन्हें शायद पता नहीं था कि तीन साल बाद उनकी किस्मत में तो ‘महाजम्बो कार्यसमिति' लिखी है।

जैसे-जैसे पार्टी आकार और असर में बड़ी होती जाती है, वह ‘जम्बो कल्चर’ में क्यों ढलने लगती है?
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इन प्रश्नो के उत्तर कुछ यूं दिए जा सकते हैं। पहला तो यह कि कोई भी सियासी दल जैसे-जैसे आकार-प्रकार में बड़ा होता जाता है, उसके आंतरिक तनाव और दबाव भी उसी अनुपात में बढ़ते हैं।
प्रबल 'सत्ताग्रह' के चलते विचार, मू्ल्य, संस्कार, जैसे शब्द स्वत: ट्रेश में चले जाते हैं।
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सत्ता में आना, हरसंभव बने रहना और सत्ता का चरणोदक किसी न किसी रूप में कार्यकर्ताओं तक पहुंचाना ही परम उद्देश्य बन जाता है।
या यूं कहें कि डिनर पार्टी में न बुला पाए तो कम से कम भंडारे का जनरल न्यौता तो मिल ही जाए। 😂😂
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लिहाजा संगठन में भी ‘अपने भरोसे के’, पसंदीदा, मजबूरी में शामिल किए लोगों के साथ-साथ गुटीय, जातीय व क्षेत्रीय समीकरणों का ध्यान भी रखना पड़ता है।

इस कवायद का नतीजा कई बार यह होता है कि ‘कमांडो टीम’ कब ‘वानर सेना’ में तब्दील हो जाती है, पता नहीं चलता।😀😀
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कांग्रेस तो सदा ‘सियासी जिम्नास्टिक्स’ में जीती रही। वहां संतुलन की हर कोशिश नए असंतुलन को जन्म देती है। इसलिए ‘जम्बो कल्चर’ वहां स्थायी संस्कृति है।

अब भाजपा ने भी संगठन में ‘महाजम्बो कल्चर’ की नींव रखकर कांग्रेस को एक नया ‘हाथ’ दिखाया है। आगे-आगे देखिए होता है क्या?
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8 Jun
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देशों के नाम से पुकारें तो यह उस देश के लिए ‘चिढ़’ जैसा हो जाता है।
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😂
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😂
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26 May
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..3/5
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