तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे बच्चे नहीं हैं
वह तो जीवन की अपनी आकांक्षा के बेटे बेटियां हैं
वह तुम्हारे द्वारा आते हैं लेकिन तुमसे नहीं,

वह तुम्हारे पास रहते हैं लेकिन तुम्हारे नहीं
तुम उनके शरीरों को घर दे सकते हो
तुम उन्हें अपना प्यार दे सकते हो लेकिन अपनी सोच नहीं
क्योंकि उनकी अपनी सोच होती है
तुम उनके शरीरों को घर दे सकते हो, आत्माओं को नहीं
क्योंकि उनकी आत्माएं आने वाले कल के घरों में रहती हैं
जहां तुम नहीं जा सकते, सपनों में भी नहीं
तुम उनके जैसा बनने की कोशिश कर सकते हो,
पर उन्हें अपने जैसा नहीं बना सकते
क्योंकि जिन्दगी पीछे नहीं जाती,
न ही बीते कल से मिलती है

तीर चलाने वाला निशाना साधता है
तुम वह कमान हो जिससे तुम्हारे बच्चे
जीवित तीरों की तरह छूट कर निकलते हैं
तीर चलाने वाला निशाना साधता है एक असीमित राह पर
और अपनी शक्ति से तुम्हें जहां चाहे उधर मोड़ देता है
ताकि उसका तीर तेज़ी से दूर जाये
स्वयं को उस तीरन्दाज़ की मर्ज़ी पर खुशी से मुड़ने दो,
क्योंकि वह उड़ने वाले तीर से प्यार करता है
और स्थिर कमान को भी चाहता है.
- ख़लील जिब्रान

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11 Jun
इतिहास हिंदू-मुसलमान नहीं होता। वो कांग्रेसी या भाजपाई भी नहीं हो सकता। वामपंथी या राष्ट्रवादी होने का भी सवाल नहीं। वो बस घट चुके का हिसाब है। ज्यों का त्यों और जस का तस।
शहरों, सड़कों और देश के नाम भी घट चुके से पैदा होते हैं। आपको अच्छा लगे या बुरा इससे फर्क नहीं पड़ता। जब
मुज़फ्फरनगर, शिमला या इलाहाबाद के नाम बदले गए होंगे तब कुछ को बुरा लगा होगा, आज बदले जा रहे हैं तो भी बुरा लग रहा है लेकिन ना कोई तब कुछ कर सकता था और ना आज ही कुछ किया जा सकेगा। सत्ता ने तब भी इतिहासकारों और विद्वानों का मत नहीं लिया था, सत्ता आज भी इनका मुंह नहीं ताकेगी। सत्ता
में बैठा सुल्तान हो या सीएम उसे सिर्फ नाम रखने या बदलने के पीछे एक ही तर्क नज़र आता है, और वो सिर्फ उसका खुद का रुझान है।

शक, हूण, कुषाण, मुसलमान, ईसाई एक-एक करके सिंधु पार आबाद धरती के इस टुकड़े पर आए थे।कुछ ने इसे जीता, कुछ ने हारा, कुछ ने अपने घोडों-ऊंटों पर लूट का माल बांधकर
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10 Jun
अपने बेटे को बुरी तरह डांटने के बाद गहरी आत्मग्लानि से भरे हुए डबल्यू लिविंगस्टन लारनेड यह पत्र हर पिता को पढ़ना चाहिए-

सुनो बेटे ! मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूं। तुम गहरी नींद में सो रहे हो। तुम्हारा नन्हा सा हाथ तुम्हारे नाजुक गाल के नीचे दबा है और तुम्हारे पसीना-पसीना ललाट
पर घुंघराले बाल बिखरे हुए हैं। मैं तुम्हारे कमरे में चुपके से दाखिल हुआ हूं, अकेला। अभी कुछ मिनट पहले जब मैं लाइब्रेरी में अखबार पढ़ रहा था, तो मुझे बहुत पश्चाताप हुआ। इसीलिए तो आधी रात को मैं तुम्हारे पास खड़ा हूं किसी अपराधी की तरह।
जिन बातों के बारे में मैं सोच रहा था, वे ये
है बेटे ।
मैं आज तुम पर बहुत नाराज हुआ। जब तुम स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे थे, तब मैंने तुम्हें खूब डांटा ...तुमने तौलिये के बजाए पर्दे से हाथ पोंछ लिए थे। तुम्हारे जूते गंदे थे इस बात पर भी मैंने तुम्हें कोसा। तुमने फर्श पर इधर-उधर चीजें फेंक रखी थी.. इस पर मैंने तुम्हें भला
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8 Jun
कभी-कभी एक छोटी सी घटना इतिहास को दिशा दे देती है। जैसे अभी ख्याल आया कि एक दौर में डच लुटेरों से ब्रिटिश व्यापारी तय दर पर मसाले खरीदा करते थे। फिर अचानक एक दिन लुटेरों ने काली मिर्च के दाम में एक पौंड पर पांच शिलिंग बढ़ा दिए जिससे व्यापारी बेहद नाराज़ हो गए। उनका मुनाफा कम हो
गया था। बस, चौबीस अंग्रेज़ व्यापारियों ने मिलकर लंदन के लेडनहाल स्ट्रीट के एक जर्जर भवन में बैठक बुला ली। तारीख थी 24 सितंबर 1599. तय हुआ कि 125 व्यापारी मिलकर 72 हजार पौण्ड इकट्ठा करें और अपनी ही कंपनी बनाएं।
यही वो कंपनी थी जो आगे चलकर भारत में मसालों समेत और चीज़ों का व्यापार
करने लगी। इसी के दो जहाज़ हर महीने भारतीय तटों से मसाले लाकर दो सौ गुना मुनाफे में ब्रिटेन में बेचने लगे। इन्होंने ही मुगल दरबार में सलामी पेश की और आगे चलकर भारतीय मामलों में दखलंदाज़ी करके व्यापार से राजनीति का सफर पूरा किया। कॉलिन्स-लैपियर ने सही लिखा था कि जो मुनीम और सौदागर
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4 Jun
ये तस्वीर हैं इंग्लैंड के लंकाशायर में डार्वेन नाम की जगह की।महात्मा गांधी को 1931 में इंग्लैंड दौरे के वक्त यहां आने का न्यौता मिला था।उन्हें आमंत्रित करनेवाला डेविस घराना था।डेविस घराना कपड़ा मिल चलाता था लेकिन उस दौर में बुरे हाल से गुज़र रहा था। उसकी बदहाली की एक बड़ी वजह खुद
महात्मा गांधी थे।गांधी जी ने देसी व्यापार पर अंग्रेज़ी शिकंजा कसता देख विदेशी माल के बहिष्कार का आह्वान किया था।उसी आह्वान का असर था कि इंग्लैंड में बन रहे कपड़े की खपत भारत में अचानक घटती चली गई और देखते ही देखते नुकसान उठा रहे कपड़ा मिलों ने मज़दूरों की छंटनी शुरू कर दी।डेविस
घराना चाहता था कि गांधी जी खुद आकर श्रमिकों की हालत देखें।पर्सी डेविस को उम्मीद थी कि वो महात्मा गांधी को विदेशी माल के बहिष्कार के फैसले से डिगा लेंगे।
25 सितंबर 1931 को गांधी डार्वेन पहुंचे थे। आशंका जताई जा रही थी कि परेशान हाल श्रमिक उनका ज़बरदस्त विरोध करेंगे लेकिन जब गांधी
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3 Jun
सुभाषचंद्र बोस के साथ महात्मा गांधी के मतभेदों को गांधी विरोधियों ने खूब उछाला है। 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नेताजी के सामने गांधी ने पट्टाभिसीतारमैया को उतारा था। उनके पास कई कांग्रेसी सुभाष के खिलाफ शिकायत लेकर आए थे। चुनाव हुए और गांधी के समर्थन के बावजूद सीतारमैया
हार गए सुभाष को 1580 वोट मिले थे जबकि सीतारमैया को महज़ 1377 वोट मिल सके।गांधी जी ने इसके बाद एक बड़ी गलती की।अपनी हताशा नहीं छिपा सके और इस हार को अपनी हार बताते हुए कह दिया कि जो भी कार्यकारिणी छोड़ना चाहें वो छोड़ सकते हैं।14 में से 12 सदस्यों ने तुरंत इस्तीफा दे दिया जिसके
बाद सुभाष ने भी इस्तीफा सौंप कर कांग्रेस से हमेशा के लिए किनारा कर लिया।

अब सुनाता हूं गांधी से जुड़ी दूसरी कहानी जो कम ही बताई जाती है।इस घटना के करीब तीन साल बाद 1942 के अगस्त महीने में AICC के 13 वामपंथी सदस्यों ने भारत छोड़ो आंदोलन प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया।ऐसा करने के उनके
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28 May
आज भारतीय राजनीति के दो विपरीत ध्रुवों की उस मुख़्तसर सी मुलाकात पर बात करने का सही मौका है जो 124 साल पहले हुई थी।मुलाकात की जगह उसी मुल्क की राजधानी थी जिसके साम्राज्य में सूरज ना छिपने की कहावत चर्चा पाई थी।

एक था 37 साल का वो वकील जिसे लोग एमके गांधी के नाम से जानते थे।उसने
दक्षिण अफ्रीकी भारतीयों के बीच नेतृत्व जमा लिया था।सरकार से बातें मनवाने का वो तरीका भी खोज लिया था जिसे पूरा भारत महज़ एक दशक बाद अपनाने वाला था।

दूसरा था 23 साल का नौजवान जिसका नाम वीडी सावरकर था। तीन महीने पहले उसने गांधी की ही तरह वकालत के लिए लंदन में दाखिला लिया था। गांधी
के शांतिपूर्ण और दिन के उजाले में संपन्न होने वाले अहिंसक आंदोलनों के ठीक उलट वो गुप्त संगठन और हथियारों के बल पर दमनकारी सत्ता को उखाड़ फेंकने का सपना देखता था।यही वजह थी कि जहां उसके गुरू का नाम बालगंगाधर तिलक था वहीं भविष्य में गांधी ने राजनीतिक गुरू के तौर पर गोपालकृष्ण गोखले
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