क्या आप जानते हैं बैजनाथ धाम देवघर को चिता भूमि क्यों कहते हैं? नहीं जानते हैं तो सुनिए।
इस कथा का आरम्भ होता है प्रजापति दक्ष के यज्ञ से। इसके पहले की कथा सबको मालूम है कि कैसे राम की परीक्षा लेने के लिए माता सती सीता जी का रूप धारण करके वन में गईं थीं और वापस
आने पर शिव जी ने उनका परित्याग कर दिया था।इसके बाद
दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसमें सभी देवताओं को निमंत्रित किया पर शिवजी को नहीं किया।
वर्चस्व की लड़ाई में दोनों ससुर दामाद में अनबन चल रही थी। सती ने बिना बुलाए शिवजी से पिता के यहां जाने की अनुमति मांगी
शिवजी ने बहुत समझाया कि बिना बुलाए किसी के यहां नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे स्वयं का और कुल का अपमान होता है।पर आप सभी जानते हैं कि नारी हठ बाल
हठ कितना कठिन होता है। कभी-कभी स्त्रियां अपने मायके के मोह में इतना लीन हो जाती हैं कि मानापमान का ध्यान नहीं रखती
और सती के साथ भी हुआ। अंत में
शिवजी ने विवश हो कर अनुमति दे और सेनापति वीरभद्र के साथ सती को दक्ष के यहां भेज दिया ‌। गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में ए इसका विस्तृत वर्णन किया है।
सती मायके पहुंची और वहां उनका ठंडा स्वागत हुआ। पिता दक्ष ने बात नहीं किया। माता
ने भी केवल औपचारिकता पूरी किया। बहनें (यह संख्या में ८४ थीं)
भी व्यंग्य कसने लगीं।मन मारकर
सती यज्ञ में भाग लेने लगीं पर अति तब हो गई जब देवताओं को यज्ञ भाग दिया जाने लगा।सबके नाम पर आहुति दी गई पर शिवजी के नाम पर नहीं दी गई।सती को अतिशय क्षोभ हुआ। उन्होंने
इसका कारण पूछा तो दक्ष ने शिवजी की बुराई करना शुरू कर दिया।क्षुब्ध होकर सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया।
वीरभद्र ने किसी तरह उनके शरीर को कुंड से बाहर निकाला पर तब तक उनके प्राण पखेरू उड़ चुके थे।
अब क्रोधित होकर वीरभद्र ने यज्ञ का विध्वंस कर दिया और
दक्ष का सिर काट दिया। संसार में हाहाकार मच गया। सृष्टि का कार्य रुक गया। ब्रह्मा जी ने कहा इसी समय संसार में जो भी सद:जात
माने तत्काल पैदा हुआ हो उसका सिर काटकर लाया जाय तो मैं इन्हें
पुनर्जीवित कर दूंगा और सृष्टि का क्रम जारी रहेगा। संयोग से एक बकरा मिला जिसका
सिर लाया गया जिसे जोड़कर ब्रह्मा जी ने दक्ष प्रजापति को पुनः जीवित कर दिया। यह सृष्टि का पहला अंग प्रत्यारोपण था और दूसरा स्वयं
शिवजी ने किया था जब गणेश जी के सिर पर हाथी का सिर जोड़ दिया था।याद रखें कि त्रिदेवों में केवल विष्णु ही थे जिन्होंने यह कार्य कभी
नहीं किया। खैर वीरभद्र सती के मृत शरीर को लेकर कैलाश पर्वत पर पहुंचे। सती को मृत देखकर शिवजी पागल हो उठे और और उसे उठाकर सारे विश्व में घूमने लगे।शव से संड़ाध आने लगी और सारे देवगण विष्णु के पास पहुंचे और कहा कि आप ही कोई उपाय करिए। विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र
को आज्ञा दिया कि सती के शरीर के अंगों को इस प्रकार से काटकर गिराओ कि शिवजी को पता न चले। चक्र ने ऐसा ही किया और एक एक अंग काटकर गिराना शुरू कर दिया।इस प्रकार सती के कटे हुए अंग जिस स्थान पर गिरे वहां-वहां शक्तिपीठ बनता गया। इस तरह कुल ५१ शक्ति पीठ बने जिनकी
पूजा आज भी होती है। अब सारे अंग कहां-कहां गिरे कहां-कहां शक्तिपीठ बने यह बहुत विस्तृत प्रसंग है ‌‌। इसपर कभी एक प्रश्न होगा इसलिए आज इसका विवरण नहीं दे रहा हूं।अंत में जब कमर और गले के नीचे का भाग बच गया तब विष्णु साक्षात प्रकट हुए और कहा प्रभु यह कंधे पर क्या
लटकाए घूम रहे हैं? शिवजी की तंद्रा भंग हो गई और ज्ञान हो गया।
तब तक वे वैद्यनाथ धाम पहुंच गए थे।सती की इच्छानुसार शिवजी ने वहीं अपने हाथ पर चंदन की चिता सजाकर सती का दाह-संस्कार कर दिया। इसीलिए वैद्यनाथ धाम को चिताभूमि कहते हैं। इसके बाद सती ने कहा प्रभु आप
यहां कब आएंगे? शिवजी ने कहा कि इसके लिए समय का इंतजार करो। त्रेतायुग में मैं यहां आ कर स्थाई रूप से तुम्हारे साथ रहूंगा।
इसके आगे की कथा संक्षेप में यही है कि एक बार रावण के द्वारा कैलाश पर्वत समेत शिवजी को लंका ले जाने का असफल प्रयास किया गया। फिर उसकी भक्ति
से प्रसन्न होकर शिवजी ने अपना एक आत्म लिंग रावण को देकर कहा कि इसे ले जाकर लंका में रख दो। रावण लेकर चला तो शिवजी ने विष्णु से कहा कि अब इसे आप संभालिए। यह शिवलिंग लंका नहीं जाना चाहिए और इसका उपाय मैंने कर दिया है।कह दिया कि यह बीच में जहां भी जमीन पर रख दिया
जाएगा मैं वहीं पर रह जाऊंगा।अब विष्णु एक चरवाहे का रूप धारण कर के वैद्यनाथ धाम पहुंच गए।इसी समय उनकी प्रेरणा से रावण को पेशाब लग गई। रावण ने बैजू को शिवलिंग देकर कहा कि इसे कुछ देर तक पकड़े रहना। मैं पेशाब करके ले लूंगा। पर रावण की पेशाब रुकने का नाम नहीं ले
रही थी।बैजू को बहाना मिल गया और उसने शिवलिंग नीचे रख दिया। फिर रावण उसे उठा न सका और थककर वापस चला गया। संयोग से वह वही स्थान था जहां शिव जी ने सती का दाह-संस्कार किया था। इस तरह दोनों आसपास स्थापित हो गए। कालांतर में भक्तों ने भव्य मंदिर बना दिया एक शिव जी का
और एक सती का। आज भी वहां प्रथा है कि सुहागिन स्त्रियां वहां ग्रंथिबंधन करती हैं। अर्थात दोनों मंदिरों के शिखरों एक धागे से बांध कर गांठ लगा देती हैं और अपने अचल सुहाग का वरदान मांगती हैं। इसीलिए वैद्यनाथ धाम को चिता भूमि कहते हैं। कथा कैसी लगी मुझे अवश्य बताइएगा

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16 Jul
वैसे तो भक्त कई प्रकार के होते हैं। अधिकांश दास भाव से ईश्वर की भक्ति करते हैं और कुछ सखा भाव से पर आज मैं आपको दो ऐसे भक्तों के विषय में बताने जा रहा हूं जिन्होंने कुछ और ही भाव ईश्वर की भक्ति किया है। उनमें से एक थे
अयोध्या के जानकी महल के अब ब्रह्मलीन महंत
जिनका नाम याद नहीं है। यह घटना आज ७०-८० साल पहले की है। महन्त जी श्रीराम को पुत्र और सीताजी को बहू मानते थे। इसलिए कभी कनक भवन नहीं जाते थे।
अयोध्या में कनक भवन में ही राम-सीता का स्थाई निवास स्थान है।
जब भी कभी किसी अत्यावश्यक कार्य से जाना होता था तो कनक भवन
स्थित दोनों के श्रीविग्रह के सामने पर्दा डाल दिया जाता था। कुछ लोगों को आश्चर्य हुआ कि कि ऐसा क्यों होता है या फिर स्वामी जी कोई नाटक करते हैं। वास्तविकता जानने के लिए एक योजना बनाई गई।कनक भवन के महंत ने एक दिन संत समाज की बैठक बुलाया।न चाहते हुए भी स्वामी जी
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15 Jul
#धर्म_चर्चा
आज के प्रश्न का उत्तर यद्यपि मित्रों
@Sunnyharsh44
@Sam_Mahakaal
@annapurnaupadhy
@Viveksagarbjp
@BhagwaSherni05
आदि ने विस्तृत रूप से दे दिया है फिर भी संचालक होने के कारण मुझे भी कुछ कहना उचित है। ऋग्वेद के विषय आप लोग काफी कुछ पढ़ चुके हैं
और उस ज्ञान से लाभान्वित होते रहें।खुशी है कि मैंने यह कार्यक्रम
स्वांतसुखाय शुरू किया था और तब तक मुझे ऐसी आशा नहीं थी कि आप लोग इतना अच्छा रिस्पॉन्स देंगे। अब तो यह चर्चा एक वटवृक्ष का रूप धारण कर चुकी है और माधवी शशिबाला राय जैसी विदुषी बहन बेटियां संचालक
का दायित्व भी संभालने लायक हो गई हैं और कभी-कभी करती भी हैं। ऋग्वेद सनातन धर्म की आत्मा है। हमारे वेद ही सौभाग्यवश शुद्ध रूप में बचे हुए हैं।शेष सब में थोड़ी बहुत मिलावट हो गई है। जैसे कि सभी १८ पुराण किसी विषय पर एकमत नहीं हैं। एक दूसरे को काटते हैं। इसका कारण
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14 Jul
#धर्म_चर्चा
समय है इस चर्चा का उत्तर देने का।
मित्रों एक मांगलिक कार्य में भाग लेने के लिए मैं पिछले कई दिनों से व्यस्त था इसलिए मैंने अपना कोई उत्तर नहीं दिया और न ही आज भी कोई उत्तर दे रहा हूं। भविष्य में जब भी कोई प्रश्न पौराणिक कथाओं का होगा तो मैं विस्तृत
उत्तर दूंगा। वास्तव में यह जो प्रसंग चल रहा है उसे कहते हैं अपने धर्म ग्रंथों को जानिए और यह चर्चा न हो कर परिचर्चा में बदल गई है। इसमें आप सभी लोग उत्साह से भाग ले रहे हैं और अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार उत्तर प्रत्युत्तर दे रहे हैं और यही मेरा उद्देश्य भी रहा।
योग के विषय में वैसे तो सभी प्रतिभागियों ने अच्छा उत्तर दिया है।न कोई कम है और न ही अधिक। मैं किसी को निराश नहीं कर रहा हूं।
@annapurnaupadhy
@Arunesh24797107
@BhagwaSherni05
@madhvi555
@Sunnyharsh44
इन सभी प्रतिभागियों ने काफी विस्तृत विवरण प्रमाण सहित
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13 Jul
#धर्म_चर्चा
क्षमा करें मित्रों इन ६ शास्त्रों के विषय में प्रश्न का उत्तर देने का विचार इसलिए नहीं है कि मैं अपने विद्वान मित्रों को केवल प्रेरित करना चाहता था और इस कार्य में सफल रहा।रही आज के प्रश्न की बात तो इसका विस्तृत उत्तर मेरे मित्रों
@Sam_Mahakaal
@annapurnaupadhy
@gargee99887
@BhagwaSherni05
@Sunnyharsh44
ने बहुत विस्तृत और विश्लेषणात्मक अध्ययन के साथ
सम्यक रूप से उत्तर दिया है।आप सब इस उत्तर से लाभान्वित हों।
मेरा संक्षिप्त उत्तर यह है कि इस
शास्त्र के प्रणेता ऋषि उलूक के महर्षि कणाद थे। हमारी
अज्ञानता का प्रतिफल है कि जान डाल्टन को परमाणु का आविष्कार्ता मानते हैं। वास्तव में परमाणु का आविष्कार्ता कणाद ही थे और इन्होंने ही कनाडा को बसाया था। कहते हैं कि इनकी प्रयोगशाला कनाडा में ही कहीं थी। एक रोचक तथ्य यह भी कि भारत को प्रथम परमाणु भट्ठी अप्सरा
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21 Jun
#धर्म_चर्चा
आज के प्रश्न का विस्तृत उत्तर
@madhvi555
@Sam_Mahakaal
@Kanubha21169684
@doharerajkumar
आदि लोगों ने सही-सही दे दिया है। इसलिए मुझे बहुत कुछ कहने के लिए बाकी नहीं बचा है। और अन्य सभी मित्रों ने भी सम्यक उत्तर दिया है। यह ऋषि ऋचीक के साले गाधि
के पुत्र थे।यह गायत्री मंत्र के रचयिता थे। इनका जन्म एक वरदान स्वरूप हुआ था। ऋषि ऋचीक द्वारा बनाए गए हव्य के
बदल जाने के कारण क्षत्रिय को
ब्रह्मर्षि बने और इनके भांजे
(बहन सत्यवती के पुत्र) परशुरामजी ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियोचित कर्म करने लगे। अब आते हैं
रामकथा के विस्तार में योगदान देने के विषय में तो राम को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम बनाने में इनका सबसे ज्यादा योगदान रहा।
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21 Jun
आइए आपको बताते हैं राम और कृष्ण का अंतर बताती महाभारत की एक सार्थक कथा के बारे में। महाभारत युद्ध बीत चुका था। मैदान में कटी-फटी लाशें टूटे-फूटे शस्त्र बिखरे पड़े थे। ऐसे में द्वापर युग के सबसे बड़े योद्धा भीष्म पितामह शरसैया पर पड़े हुए सूर्य देव के उत्तरायण
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प्रणाम पितामह। भीष्म की आंख खुली। बोले आओ देवकीनंदन बड़े मौके पर पहुंचे हो। मरने के पहले कुछ मन थी जिसका समाधान चाहता हूं। प्रभु तुम्हीं हो न?
नहीं पितामह में तो आपका पौत्र हूं।
भीष्म- ठगो मत द्वारिकाधीश मैं जान गया हूं तुम्हें। कृष्ण पास पहुंचे और नरमी से हाथ पकड़कर पूछा
कहिए पितामह क्या पितामह क्या पूछना चाहते हैं।
भीष्म- पूछना यह था कि युद्ध में जो अन्याय हुआ क्या वह उचित था?
कृष्ण- किसकी ओर से?
भीष्म- कौरव तो इतिहास बन चुके हैं।
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