वैसे तो भक्त कई प्रकार के होते हैं। अधिकांश दास भाव से ईश्वर की भक्ति करते हैं और कुछ सखा भाव से पर आज मैं आपको दो ऐसे भक्तों के विषय में बताने जा रहा हूं जिन्होंने कुछ और ही भाव ईश्वर की भक्ति किया है। उनमें से एक थे
अयोध्या के जानकी महल के अब ब्रह्मलीन महंत
जिनका नाम याद नहीं है। यह घटना आज ७०-८० साल पहले की है। महन्त जी श्रीराम को पुत्र और सीताजी को बहू मानते थे। इसलिए कभी कनक भवन नहीं जाते थे।
अयोध्या में कनक भवन में ही राम-सीता का स्थाई निवास स्थान है।
जब भी कभी किसी अत्यावश्यक कार्य से जाना होता था तो कनक भवन
स्थित दोनों के श्रीविग्रह के सामने पर्दा डाल दिया जाता था। कुछ लोगों को आश्चर्य हुआ कि कि ऐसा क्यों होता है या फिर स्वामी जी कोई नाटक करते हैं। वास्तविकता जानने के लिए एक योजना बनाई गई।कनक भवन के महंत ने एक दिन संत समाज की बैठक बुलाया।न चाहते हुए भी स्वामी जी
को जाना पड़ा। योजना यह थी कि उनके आने के पहले परदा लगा तो दिया जाय पर ज्यों ही वह मंदिर में प्रवेश करें पर्दा गिरा दिया जाय और हुआ भी यही। स्वामी जी के आते पर्दा गिरा दिया गया। अब लोगों के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि सीताजी की मूर्ति अपने
स्थान से गायब है।दूसरी ओर
दरवाजे पर स्वामी जी का हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में झुका हुआ है जैसे कि किसी को आशीर्वाद दे रहे हों। यह अलौकिक दृश्य किसी ने नहीं देखा केवल स्वामी जी और माता जानकी ने देखा। पुनः कुछ देर के बाद सीता जी अपने स्थान पर विराजमान हुईं। अब एक
और विलक्षण घटना हुई कि सीताजी के गले पर चढ़ाई गई ताजी माला स्वामी जी के गले में पड़ी हुई थी। लोगों के पूछने पर बताया कि मैं स्वयं को वशिष्ठ मानता हूं इसलिए राम-सीता को पुत्र और पुत्र वधू मानता हूं। यह घटना चूंकि मेरे पूज्य गुरुदेव के सामने घटी थी इसलिए अविश्वास
का कोई कारण नहीं था।
दूसरी घटना सन् १५४६ ईस्वी की है। आप सब जानते हैं कि मीराबाई श्रीकृष्ण को पति मानकर पूजा करतीं थीं। उनके पद की एक पंक्ति है
मेरो तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई
जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।
जीवन के अंतिम दिनों में वे द्वारिका
जाकर रहने और
रणछोड़ दास जी की पूजा करने लगी थीं। एक बार उनके शरीर में असह्य दर्द होने लगा। दासियां परेशान हो गईं। आश्चर्य मत करिए वह भक्तिन होने के साथ-साथ एक राजकुमारी भी थीं। सिसौदिया
कुलभूषण राणा सांगा की सबसे बड़ी पुत्रवधू भी थीं।पूरे गुजरात से भांति भांति के वैद्य
बुलाए गए पर किसी की समझ में नहीं आया कि इस रोग का इलाज क्या।तब आर्त्त होकर मीराबाई ने अपना प्रसिद्ध भजन गाया
ए री मैं तो प्रेम दिवाणी मेरो दरद न जाने कोय।
मीरा के प्रभु दरद मिटै जद बैद
सांवरिया होय।
आश्चर्यजनक रूप से एक किशोरवय है सांवला सलोना वैद्य कंधे पर
दवाओं की झोली डाले ड्योढ़ी पर आ खड़ा हुआ। दासियां दौड़कर गई और कहा कि वैद्य जी यह रोग आपके बस का नहीं है। आप अभी बालक और नौसिखिया हो। क्षेत्र के बड़े-बड़े वैद्य आए और थक हारकर चले गए। वैद्य बने मुरलीधर ने कहा फिर भी एक बार देखने में क्या हर्ज है। शायद रोग मेरा
ही इंतजार कर रहा हो। किसी प्रकार वैद्य जी आये और भक्त
मीराबाई की नाड़ी पकड़ा। अब
दास दासियां आश्चर्य से एक दूसरे का मुंह देखने लगी कि कैसा आश्चर्य हुआ।हाथ लगते ही उनका सारा दर्द जाता रहा। वैद्य जी ने कुछ जड़ी बूटियां निकाल कर दिया। अब मीराबाई ने पूछा वैद्य जी
रहते कहां हो ‌उत्तर मिला कि
वैसे तो मैं वृंदा में रहता हूं पर आज कल यहीं रहता हूं।
मीराबाई- द्वारिका में कहां रहते हैं?
वैद्य जी- बस यहीं बिल्कुल पास में ही रहता हूं।
मीराबाई- आपको कैसे ज्ञात हुआ कि एक रोगी यहां बीमार है?
वैद्य जी- मुझे कुछ सिद्धि प्राप्त है।
कुछ लोग मजाक में मुझे योगीराज कहते हैं।
मीराबाई- मैं काफी दिनों तक वृंदावन में रही और अब कह रहे हैं कि पास ही रहते हैं फिर कभी दिखाई क्यों नहीं पड़े?
वैद्य जी- तुमने इतने भाव से पुकारा ही कब था?जब तुमने पुकारा तो मैं झोलाझंटा लिए आ गया।
यह कहकर वैद्य जी चलते
बने।इधर भक्त मीराबाई की छठवीं इंद्रिय खुल गई कि यह तो मेरे
सांवरिया प्यारे थे जिन्हें खोजते-खोजते मेरा जीवन बीत गया। प्रेम मगन मीराबाई भवन से बाहर निकल आईं और लोगों से पूछा कि एक वैद्य अभी-अभी यहां से निकले थे वे किधर गए?
लोगों ने बताया कि ऐसा एक लड़का कंधे पर
झोली लिए हुए रणछोड़जी के मंदिर में गया है। शायद दर्शन करने गया हो। मीराबाई मंदिर में पहुंचीं तो देखा कि रणछोड़जी जी की मूर्ति के स्थान पर वैद्य जी बैठे हैं।उनकी खुशी का ठिकाना न रहा और प्रसन्न होकर वहीं नाचने लगीं।लोग कहते हैं कि वैसा अलौकिक नृत्य न किसी ने
किया था और न ही देखा था। नाचते नाचते वह प्रभु श्रीकृष्ण जी के श्रीविग्रह में समा गईं। तो ऐसे-ऐसे भक्त भी हो चुके हैं। बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय।

• • •

Missing some Tweet in this thread? You can try to force a refresh
 

Keep Current with सभापति मिश्र

सभापति मिश्र Profile picture

Stay in touch and get notified when new unrolls are available from this author!

Read all threads

This Thread may be Removed Anytime!

PDF

Twitter may remove this content at anytime! Save it as PDF for later use!

Try unrolling a thread yourself!

how to unroll video
  1. Follow @ThreadReaderApp to mention us!

  2. From a Twitter thread mention us with a keyword "unroll"
@threadreaderapp unroll

Practice here first or read more on our help page!

More from @Sabhapa30724463

15 Jul
#धर्म_चर्चा
आज के प्रश्न का उत्तर यद्यपि मित्रों
@Sunnyharsh44
@Sam_Mahakaal
@annapurnaupadhy
@Viveksagarbjp
@BhagwaSherni05
आदि ने विस्तृत रूप से दे दिया है फिर भी संचालक होने के कारण मुझे भी कुछ कहना उचित है। ऋग्वेद के विषय आप लोग काफी कुछ पढ़ चुके हैं
और उस ज्ञान से लाभान्वित होते रहें।खुशी है कि मैंने यह कार्यक्रम
स्वांतसुखाय शुरू किया था और तब तक मुझे ऐसी आशा नहीं थी कि आप लोग इतना अच्छा रिस्पॉन्स देंगे। अब तो यह चर्चा एक वटवृक्ष का रूप धारण कर चुकी है और माधवी शशिबाला राय जैसी विदुषी बहन बेटियां संचालक
का दायित्व भी संभालने लायक हो गई हैं और कभी-कभी करती भी हैं। ऋग्वेद सनातन धर्म की आत्मा है। हमारे वेद ही सौभाग्यवश शुद्ध रूप में बचे हुए हैं।शेष सब में थोड़ी बहुत मिलावट हो गई है। जैसे कि सभी १८ पुराण किसी विषय पर एकमत नहीं हैं। एक दूसरे को काटते हैं। इसका कारण
Read 9 tweets
15 Jul
क्या आप जानते हैं बैजनाथ धाम देवघर को चिता भूमि क्यों कहते हैं? नहीं जानते हैं तो सुनिए।
इस कथा का आरम्भ होता है प्रजापति दक्ष के यज्ञ से। इसके पहले की कथा सबको मालूम है कि कैसे राम की परीक्षा लेने के लिए माता सती सीता जी का रूप धारण करके वन में गईं थीं और वापस
आने पर शिव जी ने उनका परित्याग कर दिया था।इसके बाद
दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसमें सभी देवताओं को निमंत्रित किया पर शिवजी को नहीं किया।
वर्चस्व की लड़ाई में दोनों ससुर दामाद में अनबन चल रही थी। सती ने बिना बुलाए शिवजी से पिता के यहां जाने की अनुमति मांगी
शिवजी ने बहुत समझाया कि बिना बुलाए किसी के यहां नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे स्वयं का और कुल का अपमान होता है।पर आप सभी जानते हैं कि नारी हठ बाल
हठ कितना कठिन होता है। कभी-कभी स्त्रियां अपने मायके के मोह में इतना लीन हो जाती हैं कि मानापमान का ध्यान नहीं रखती
Read 18 tweets
14 Jul
#धर्म_चर्चा
समय है इस चर्चा का उत्तर देने का।
मित्रों एक मांगलिक कार्य में भाग लेने के लिए मैं पिछले कई दिनों से व्यस्त था इसलिए मैंने अपना कोई उत्तर नहीं दिया और न ही आज भी कोई उत्तर दे रहा हूं। भविष्य में जब भी कोई प्रश्न पौराणिक कथाओं का होगा तो मैं विस्तृत
उत्तर दूंगा। वास्तव में यह जो प्रसंग चल रहा है उसे कहते हैं अपने धर्म ग्रंथों को जानिए और यह चर्चा न हो कर परिचर्चा में बदल गई है। इसमें आप सभी लोग उत्साह से भाग ले रहे हैं और अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार उत्तर प्रत्युत्तर दे रहे हैं और यही मेरा उद्देश्य भी रहा।
योग के विषय में वैसे तो सभी प्रतिभागियों ने अच्छा उत्तर दिया है।न कोई कम है और न ही अधिक। मैं किसी को निराश नहीं कर रहा हूं।
@annapurnaupadhy
@Arunesh24797107
@BhagwaSherni05
@madhvi555
@Sunnyharsh44
इन सभी प्रतिभागियों ने काफी विस्तृत विवरण प्रमाण सहित
Read 5 tweets
13 Jul
#धर्म_चर्चा
क्षमा करें मित्रों इन ६ शास्त्रों के विषय में प्रश्न का उत्तर देने का विचार इसलिए नहीं है कि मैं अपने विद्वान मित्रों को केवल प्रेरित करना चाहता था और इस कार्य में सफल रहा।रही आज के प्रश्न की बात तो इसका विस्तृत उत्तर मेरे मित्रों
@Sam_Mahakaal
@annapurnaupadhy
@gargee99887
@BhagwaSherni05
@Sunnyharsh44
ने बहुत विस्तृत और विश्लेषणात्मक अध्ययन के साथ
सम्यक रूप से उत्तर दिया है।आप सब इस उत्तर से लाभान्वित हों।
मेरा संक्षिप्त उत्तर यह है कि इस
शास्त्र के प्रणेता ऋषि उलूक के महर्षि कणाद थे। हमारी
अज्ञानता का प्रतिफल है कि जान डाल्टन को परमाणु का आविष्कार्ता मानते हैं। वास्तव में परमाणु का आविष्कार्ता कणाद ही थे और इन्होंने ही कनाडा को बसाया था। कहते हैं कि इनकी प्रयोगशाला कनाडा में ही कहीं थी। एक रोचक तथ्य यह भी कि भारत को प्रथम परमाणु भट्ठी अप्सरा
Read 7 tweets
21 Jun
#धर्म_चर्चा
आज के प्रश्न का विस्तृत उत्तर
@madhvi555
@Sam_Mahakaal
@Kanubha21169684
@doharerajkumar
आदि लोगों ने सही-सही दे दिया है। इसलिए मुझे बहुत कुछ कहने के लिए बाकी नहीं बचा है। और अन्य सभी मित्रों ने भी सम्यक उत्तर दिया है। यह ऋषि ऋचीक के साले गाधि
के पुत्र थे।यह गायत्री मंत्र के रचयिता थे। इनका जन्म एक वरदान स्वरूप हुआ था। ऋषि ऋचीक द्वारा बनाए गए हव्य के
बदल जाने के कारण क्षत्रिय को
ब्रह्मर्षि बने और इनके भांजे
(बहन सत्यवती के पुत्र) परशुरामजी ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियोचित कर्म करने लगे। अब आते हैं
रामकथा के विस्तार में योगदान देने के विषय में तो राम को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम बनाने में इनका सबसे ज्यादा योगदान रहा।
उस की परिस्थितियां इस प्रकार थीं कि अयोध्या दक्षिण कोसल (दशरथ की ससुराल) और कैकय नरेश को छोड़कर सारा जंबू द्वीप रावण के प्रभाव में आ
Read 6 tweets
21 Jun
आइए आपको बताते हैं राम और कृष्ण का अंतर बताती महाभारत की एक सार्थक कथा के बारे में। महाभारत युद्ध बीत चुका था। मैदान में कटी-फटी लाशें टूटे-फूटे शस्त्र बिखरे पड़े थे। ऐसे में द्वापर युग के सबसे बड़े योद्धा भीष्म पितामह शरसैया पर पड़े हुए सूर्य देव के उत्तरायण
होने की प्रतीक्षा कर रहे थे।इतने में एक शहद मिश्रित ध्वनि कानों में पड़ी।
प्रणाम पितामह। भीष्म की आंख खुली। बोले आओ देवकीनंदन बड़े मौके पर पहुंचे हो। मरने के पहले कुछ मन थी जिसका समाधान चाहता हूं। प्रभु तुम्हीं हो न?
नहीं पितामह में तो आपका पौत्र हूं।
भीष्म- ठगो मत द्वारिकाधीश मैं जान गया हूं तुम्हें। कृष्ण पास पहुंचे और नरमी से हाथ पकड़कर पूछा
कहिए पितामह क्या पितामह क्या पूछना चाहते हैं।
भीष्म- पूछना यह था कि युद्ध में जो अन्याय हुआ क्या वह उचित था?
कृष्ण- किसकी ओर से?
भीष्म- कौरव तो इतिहास बन चुके हैं।
Read 11 tweets

Did Thread Reader help you today?

Support us! We are indie developers!


This site is made by just two indie developers on a laptop doing marketing, support and development! Read more about the story.

Become a Premium Member ($3/month or $30/year) and get exclusive features!

Become Premium

Too expensive? Make a small donation by buying us coffee ($5) or help with server cost ($10)

Donate via Paypal Become our Patreon

Thank you for your support!

Follow Us on Twitter!

:(