आइए आज बताते हैं कि शिवजी ने ब्रह्मा विष्णु और अन्य देवताओं को
सत्यं शिवम् सुंदरम का अर्थ क्या बताया था। कहानी आरंभ होती है श्री विष्णु के प्रथम अवतार मत्स्यावतार से। पहले बहुत संक्षेप में सुनिए मत्स्यावतार के विषय में।
सतयुग त्रेतायुग में भारत की केंद्रीय
सत्ता अयोध्या से संचालित होती रही। द्वापरयुग में यह हस्तिनापुर से होने लगी और वर्तमान कलयुग में दिल्ली से हो रही है। यह सृष्टि के प्रारंभ की कथा है। वैवस्वत मनु
एक बार सरयू नदी में स्नान कर रहे थे। सूर्य देव को अर्घ्य देते समय उनके अंजलि में एक मछली आ गई। राजा
को तब घोर आश्चर्य हुआ जब मछली ने मनुष्य की आवाज में कहा राजन मुझे बड़ी मछलियां बहुत तंग करती हैं ‌। आप मुझे घर ले चलिए और मेरी रक्षा करिए।
मनु महाराज मछली को घर लाए और एक छोटी सी हांडी में पानी भरकर रख दिया। दूसरे दिन मछली बढ़कर हांड़ी के बराबर हो गई राजा ने
फिर उसे एक बड़ी नांद में रख दिया।यह अलौकिक मछली बढ़ती गई।राजा ने क्रमशः तालाब झील और नदी में रखा पर मछली का आकार बढ़ता ही जा रहा था। अंत में मनु महाराज ने उसे समुद्र में छोड़ दिया पर ज्यों ही वह समुद्र तट से लौटने लगे मछली ने कहा राजन
मेरी बात ध्यान से सुनिए।
यह वर्तमान सृष्टि अपनी आयु पूरी कर चुकी है और अब यह जल
प्रलय में डूबकर नष्ट होने वाली है।
आप एक बहुत बड़ी नौका बनवाइए और उसमें समय जीव जंतुओं के एक एक जोड़े सारी वनस्पतियों के बीज कुछ दिन तक के लिए खाने पीने का सामान रख लीजिएगा। फिर इस नौका को मेरे सींग के साथ
बांध दीजिएगा।मनु महाराज ने ऐसा ही किया।मनु महाराज ने ऐसा ही किया। पहले समस्त जलचर थलचर और नभचर प्राणियों का आवाहन किया और सबके एक एक जोड़े को नाव में रखा फिर पृथ्वी पर उपस्थित समस्त
बनस्पतियों में से थोड़े-थोड़े बीज रख लिया। अब प्रलय की शुरुआत हो गई ‌घनघोर वरषा
होने लगी। धीरे-धीरे पृथ्वी डूबने लगी ‌‌। अब मछली ने नौका को खींचना शुरू कर दिया और ले जाकर हिमालय की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचा दिया और फिर
यह आदेश दिया कि राजन कुछ दिनों बाद पानी उतर जाएगा और आप फिर से नव जीवन शुरू कर दीजिएगा ‌।मेरा कार्य समाप्त हुआ। यह कहकर
मछली अंतर्ध्यान हो गई। यही विष्णु का प्रथम अवतार था। कुछ दिन बाद पानी उतर गया और मनु ने सृष्टि को बसाना शुरू किया पर उनसे एक गलती हो गई थी। उन्होंने ससका आवाहन तो किया था पर मनुष्य को ही भूल गए थे यह सोचकर कि मनुष्य के रूप में मैं तो हूं ही ‌।जल प्रलय में सब
कुछ तो नष्ट हो गया पर श्रीविष्णु और देवाधिदेव महादेव बचे रह गए क्योंकि ए दोनों अविनाशी थे। आपने सीरियल में या धर्म ग्रंथों में एक चित्र देखा होगा कि जल के बीच में पीपल के पत्ते पर मुस्कुराते हुए विष्णु की नाभि कमल से ब्रह्मा जी प्रकट होते हैं। इस प्रकार यह
देवत्रयी पूरी हुई। ब्रह्मा को सृष्टि के निर्माण विष्णु को पालन और शिवजी को संहार का कार्य परमब्रह्म द्वारा दिया गया। सबसे पहले तो ब्रह्मा जी ने मनु की भूल का सुधार किया और शतरूपा को पैदा करके मनु के पास पहुंचा दिया। इसके विषय में कविवर
जयशंकर प्रसाद ने महाकाव्य
कामायनी में विशद वर्णन किया है।
जीवन की उत्पत्ति तो शुरू हो गई पर इसकी गति बहुत धीमी रही। तब ब्रह्मा जी ने दस मानस पुत्र और दस प्रजापति को उत्पन्न किया।इन लोगों ने मन से मानव प्रजाति को जन्म देना शुरू किया पर यह प्रयोग बहुत सफल नहीं हुआ। सबसे पहले तो ब्रह्मा
ने अपने मानस पुत्र भगवान विश्वकर्मा से कहा कि पृथ्वी को मनुष्यों के रहने लायक बनाओ।
विश्वकर्मा ने पहले देवलोक फिर मनुष्य लोक और अंत में पाताल लोक का निर्माण किया। प्रजापति दक्ष की ८४ कन्याओं और कश्यप के साथ सृष्टि का निर्माण शुरू हुआ। वरुण देव ने जल थल का विभाजन
किया और विश्वकर्मा ने देव दानव मानव यक्ष प्रश्न गंधर्व आदि को भू भाग आवंटित तो कर दिया। पर यह थोड़े से लोग फिर ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और कहा कि पितामह आपने राज्य दो दिया पर प्रजा कहां है जिसपर राज्य किया जाय।तब तक जो भी लोग पैदा किए गए सब मन से उत्पन्न होते थे
स्त्री पुरुष समागम का कोई विधान था ही नहीं। चिंतित ब्रह्मा जी श्रीविष्णु के पास पहुंचे और इस समस्या का समाधान पूछा। विष्णु ने कहा कि चलिए चलते हैं शिवजी के पास ‌वही इसका समाधान कर सकते हैं।सब लोग शिवजी के पास पहुंचे और समस्या बताया। शिवजी हंसते हुए बोले इतनी
छोटी सी समस्या आप लोग हल नहीं कर सके। अब उन्होंने पास पड़े हुए दो पत्थर उठाया ‌। एक को अरघे का आकार दिया और एक को लिंग का। लिंग को अरघे में प्रवेश कराते हुए कहा कि यही सृष्टि रचना का सर्वोत्तम उपाय है। जब तक स्त्री पुरुष यों कहें कि पुरुष का प्रकृति से समागम
नहीं होगा चराचर जगत का निर्माण संभव नहीं है ‌। फिर उन्होंने अदृश्य कामदेव को बुलाया और आदेश दिया कि समस्त जीवधारियों में बनस्पतियों में काम भावना उत्पन्न करो और यथायोग्य सबमें वीर्य और रज कण उत्पन्न करो ‌।नर नारी के
समागम से जीवन आगे बढ़ेगा।
यही सत्य है और इसी
से जगत का कल्याण होगा और अगर कल्याण होगा तो यही सुंदर भी होगा। इस तरह महादेव ने सृष्टि के संचालन का मूल मंत्र दिया और तभी से यह सतयम् शिवम् सुंदरम
शिवजी का हस्ताक्षर बन गया।
आपको याद होगा कि जब काशी में कई विद्वानों ने अपनी अलग-अलग रामायण लिखा और झगड़ा शुरू हो
गया कि किसकी रामायण सर्वश्रेष्ठ है। अंत में निश्चय किया गया कि काशी विश्वनाथ ही इसका निर्णय करें। सबने अपने-अपने ग्रंथ रखा जिसमें द्वेषवश गोस्वामी तुलसीदास जी का रामचरितमानस सबसे नीचे रखा और मंदिर का कपाट बंद कर दिया गया ‌। दूसरे दिन सबेरे सबेरे जब कपाट खोलकर
देखा गया तो गोस्वामी जी का रामचरितमानस मानस सबसे ऊपर रखा मिला और उसपर शिवजी का हस्ताक्षर "सत्यं शिवम् सुंदरम' लिखा मिला।तब सबने मान लिया कि रामचरितमानस ही सर्वश्रेष्ठ रामायण है। आपने देखा होगा कि
रामचरितमानस की हर प्रति में सबसे पहले पृष्ठ पर सत्यं शिवम्
सुंदरम् लिखा मिलेगा। तो संक्षेप में
सत्यं शिवम् सुंदरम का अर्थ यही है।सभी मित्रों को धन्यवाद दिया जाता है। आज मैं किसी को टैग नहीं कर रहा हूं पर आप सब के उत्तर की प्रतीक्षा रहेगी ‌

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19 Jul
#धर्म_चर्चा
आज का प्रश्न बहुत छोटा सा था और इसका बहुत लंबा-चौड़ा उत्तर न है और न देने का उद्देश्य है। केवल शिवलिंग के प्रसाद की कुछ भ्रांतियां दूर करना ही था। यद्यपि
@Sunnyharsh44
@BhagwaSherni05
आदि ने समझाने का प्रयास किया और अच्छी तरह बताया। अब जानिए इसके
कुछ मुख्य कारण
१- शिव जी के एक गण चंडेश्वर जो भूत प्रेतों का नियंत्रण कर्ता है इस पर उनका अधिकार होता है इसलिए नहीं खाया जाता।
२- शिवलिंग परमाणु ऊर्जा का अजस्र स्रोत भी होते हैं और इसलिए कुछ शिवलिंग पर चढ़ाए गए प्रसाद नहीं खाए जाते जाते कि शिवालयों की निर्माणी
नहीं लांघते कुछ वैसा ही।
अब मेरा मत सुनिए सभी शिवलिंगों का प्रसाद वर्जित नहीं है। कुछ का प्रसाद खाया जाता है।
शिवलिंग मुख्यत:दो प्रकार के होते हैं।
१- तांत्रेश्वर। इसमें शिवलिंग और अरघा आपस में मिले होते हैं अर्थात
लिंग भाग को अरघे से अलग नहीं किया जा सकता।इस
Read 5 tweets
18 Jul
#धर्म_चर्चा
अच्छा लगा कि आज बहुत से उत्तर देने वाले आए और इनमें से
@Sunnyharsh44
@annapurnaupadhy
@BhagwaSherni05
@Sam_Mahakaal
@Manojkumar18877
ने बहुत सुंदर और विस्तृत उत्तर दिया है इतना कि मुझे कुछ लिखने की जरूरत नहीं है। आज केवल इतना ही कि मैं अगले
कुछ दिनों तक शिवजी की पूजा विधि पर प्रश्न करता रहूंगा क्योंकि आप लोग जिस तरह पूजा करते हैं उसके बारे में जानकारी प्राप्त करें।
आज उत्तर के नाते केवल इतना ही कि शिवजी पर जो जल दूध गन्ने का रस नारियल पानी चढ़ाया जाता है वह रेडियो एक्टिव हो जाता है और निर्माणी म
में बहता रहता है।यह पानी रेडियो एक्टिव होने के कारण जब आप इसे लांघते हैं तो इसका प्रभाव आपके शरीर पर न पड़े। शिवलिंग
ऊर्जा का अजस्र स्रोत होता है। संसार के सारे परमाणु विद्युत गृह
शिव लिंग के आकार के होते हैं।
बिग बैंग थ्योरी को जानने के लिए
स्विट्जरलैंड में
Read 7 tweets
17 Jul
#धर्म_चर्चा
जैसा कि मैं आशा करता था वही हुआ भी। आप सब की रुचि वेदों को जानने की नहीं है।दोष भी किसी का नहीं है क्योंकि वेद अगम हैं और इतने गूढ़ रहस्यों से भरे हुए हैं कि सभी लोग जान भी नहीं सकते। मैं स्वयं भी भी बहुत कुछ नहीं जानता पर प्रयास किया कि आप लोग खोज
कर कुछ उत्तर दें पर बहुत कम लोग उत्तर देने आए। आभारी हूं बहन शशिबाला राय का जिसने कुछ प्रयास कर के थोड़ा बहुत बताने का प्रयास किया। इसीलिए तो मैंने तीसरे वेद सामवेद पर प्रश्न न करके सीधे अंतिम अथर्ववेद की चर्चा करते हुए इस श्रृंखला का समापन करना चाहा। खैर सुनिए
इसे अथर्ववेद इसलाम कहते हैं क्योंकि इसकी रचना ऋषि अथर्व ने किया था। इनके पुत्र दधीचि और पौत्र पिप्पलाद की कथा बता चुका हूं।इस वेद की दो शाखाएं हैं एक को ऋषि शौनक ने लिखा है और दूसरी को दधीचि पुत्र पिप्पलाद ने।
जैसा कि आप सब जानते है कि ऋषि अंगिरा ने सभी वेदों
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16 Jul
वैसे तो भक्त कई प्रकार के होते हैं। अधिकांश दास भाव से ईश्वर की भक्ति करते हैं और कुछ सखा भाव से पर आज मैं आपको दो ऐसे भक्तों के विषय में बताने जा रहा हूं जिन्होंने कुछ और ही भाव ईश्वर की भक्ति किया है। उनमें से एक थे
अयोध्या के जानकी महल के अब ब्रह्मलीन महंत
जिनका नाम याद नहीं है। यह घटना आज ७०-८० साल पहले की है। महन्त जी श्रीराम को पुत्र और सीताजी को बहू मानते थे। इसलिए कभी कनक भवन नहीं जाते थे।
अयोध्या में कनक भवन में ही राम-सीता का स्थाई निवास स्थान है।
जब भी कभी किसी अत्यावश्यक कार्य से जाना होता था तो कनक भवन
स्थित दोनों के श्रीविग्रह के सामने पर्दा डाल दिया जाता था। कुछ लोगों को आश्चर्य हुआ कि कि ऐसा क्यों होता है या फिर स्वामी जी कोई नाटक करते हैं। वास्तविकता जानने के लिए एक योजना बनाई गई।कनक भवन के महंत ने एक दिन संत समाज की बैठक बुलाया।न चाहते हुए भी स्वामी जी
Read 16 tweets
15 Jul
#धर्म_चर्चा
आज के प्रश्न का उत्तर यद्यपि मित्रों
@Sunnyharsh44
@Sam_Mahakaal
@annapurnaupadhy
@Viveksagarbjp
@BhagwaSherni05
आदि ने विस्तृत रूप से दे दिया है फिर भी संचालक होने के कारण मुझे भी कुछ कहना उचित है। ऋग्वेद के विषय आप लोग काफी कुछ पढ़ चुके हैं
और उस ज्ञान से लाभान्वित होते रहें।खुशी है कि मैंने यह कार्यक्रम
स्वांतसुखाय शुरू किया था और तब तक मुझे ऐसी आशा नहीं थी कि आप लोग इतना अच्छा रिस्पॉन्स देंगे। अब तो यह चर्चा एक वटवृक्ष का रूप धारण कर चुकी है और माधवी शशिबाला राय जैसी विदुषी बहन बेटियां संचालक
का दायित्व भी संभालने लायक हो गई हैं और कभी-कभी करती भी हैं। ऋग्वेद सनातन धर्म की आत्मा है। हमारे वेद ही सौभाग्यवश शुद्ध रूप में बचे हुए हैं।शेष सब में थोड़ी बहुत मिलावट हो गई है। जैसे कि सभी १८ पुराण किसी विषय पर एकमत नहीं हैं। एक दूसरे को काटते हैं। इसका कारण
Read 9 tweets
15 Jul
क्या आप जानते हैं बैजनाथ धाम देवघर को चिता भूमि क्यों कहते हैं? नहीं जानते हैं तो सुनिए।
इस कथा का आरम्भ होता है प्रजापति दक्ष के यज्ञ से। इसके पहले की कथा सबको मालूम है कि कैसे राम की परीक्षा लेने के लिए माता सती सीता जी का रूप धारण करके वन में गईं थीं और वापस
आने पर शिव जी ने उनका परित्याग कर दिया था।इसके बाद
दक्ष ने एक यज्ञ का आयोजन किया जिसमें सभी देवताओं को निमंत्रित किया पर शिवजी को नहीं किया।
वर्चस्व की लड़ाई में दोनों ससुर दामाद में अनबन चल रही थी। सती ने बिना बुलाए शिवजी से पिता के यहां जाने की अनुमति मांगी
शिवजी ने बहुत समझाया कि बिना बुलाए किसी के यहां नहीं जाना चाहिए क्योंकि इससे स्वयं का और कुल का अपमान होता है।पर आप सभी जानते हैं कि नारी हठ बाल
हठ कितना कठिन होता है। कभी-कभी स्त्रियां अपने मायके के मोह में इतना लीन हो जाती हैं कि मानापमान का ध्यान नहीं रखती
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