.@hsvyas:
राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, मनोहर श्याम जोशी, एसपी सिंह ऐसे नाम हैं, जिनके लिखे, जिनकी शैली, जिनके संपादन, जिनके प्रयोगों के अनुभव व किस्सों पर हिंदीजन बतौर संपादक विचार करते हैं।
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सवाल है इन आठ चेहरों में स्टील वाली हिम्मती रीढ़ की हड्डी लिए कौन था? किसके संपादन से हिम्मत का वैसा जज्बा खिला जैसे अरूण शौरी या (‘संडे टाइम्स’ के प्रतिमान संपादक) हेरोल्ड इवांस से खिला?
मैं नहीं मानता कि आजाद भारत के हिंदीभाषियों को सच्चा संपादक एक भी मिला!
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सच्चे संपादक कौन? वह जो देशकाल को बूझने का बौद्धिक-विचार बल लिए हुए हो, जिसकी रीढ़ की ह़ड्डी स्टील की हो। जो देख-सुन-सूंघ कर यह बूझ सके कि सरकार नागरिकों से धोखा-छल-भ्रष्टाचार कर रही है या जिम्मेवारी का ईमानदार निर्वहन?
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जो संपादकीय-पत्रकार टीम को प्रेरित-सुरक्षित करते हुए तटस्थता से सबकी खबर लेते हुए सबको खबर दे लेकिन अपने आपको पढ़ने-लिखने, जहाज की कप्तानी में रखे। सत्ता से 100% निरपेक्ष! जो धुन, ऊर्जा, लगन में बाकी के लिए प्रेरक हो। टीम की ऊर्जा, बुद्धि, लेखन-रिपोर्टिंग को खिलाने वाला हो।
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सत्य-झूठ मे भेद करने, विचार-बहस के सौ फूल खिलाते हुए वक्त-देशकाल की चुनौतियों-समस्याओं में अखबार को सूचना-समझ की खान बनवाने वाला हो और लोगों की आवाज का भी वाहक!
इन कसौटियों में 75 वर्षों में हिंदी में कौन संपादक था?
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हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में डॉ. वैदिक ने हजारों संपादकों का जिक्र किया है। वे सभी अपने वक्त के पुरुषार्थी और धुनी लोग थे। वह उद्यम-व्यवसायी संस्था निर्माण का वक्त था। लेकिन लबोलुआब लक्ष्मी पुत्रों के धनधान्य पैदा करने वाले संस्थान, न कि सरस्वती साधक संपादकों का पोषक केंद्र।
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असली सवाल: पुरुषार्थ की सहस्त्र मीडिया धाराओं में रामनाथ गोयनका जैसे हिंदी में कितने और उनके संपादक जैसे मुलगांवकर, शौरी के नामों से चिन्हित संपादक हिंदी में क्या हुए?
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बारपुते, माथुर, प्रभाष जोशी, अज्ञेय, भारती, सहाय, मनोहर श्याम जोशी, एसपी सिंह ऐसे नाम हैं, जिनके लिखे-शैली-संपादन, जिनके प्रयोगों के अनुभव व किस्सों पर हिंदीजन बतौर संपादक विचार करते हैं। इनमें अज्ञेय, भारती, सहाय, मनोहर श्याम जोशी मूलतः साहित्य लेखन के चेहरे हैं।
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यदि 75 वर्षों की हिंदी पत्रकारिता संपादक लिस्ट में इन्हें भी शामिल नहीं करेंगे तो हिंदी के प्रभु-एलिट वर्ग ने दिल्ली प्रेस के विश्वनाथ, ‘वीर अर्जुन’ के महाशय कृष्ण जैसे आर्यसमाजी मगर स्टील की रीढ़ वाले संपादकों को तो पहले से ही आउट किया हुआ है।
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क्या आपने जाना-सुना कि नेहरू-कांग्रेस के महिमामंडन काल में खम ठोक कर विरोध करने वाले विश्वनाथ, महाशय कृष्ण या के नरेंद्र जैसे संपादक भी हुए हैं? पर इनका नाम मैंने भी पत्रकारिता पठन-पाठन में नहीं सुना!
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hv often mentioned abt महाशय कृष्ण ji here; how many even know his name?
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इन आठ चेहरों में स्टील वाली हिम्मती रीढ़ की हड्डी लिए कौन था? एक नहीं। दूसरे किसके संपादन से हिम्मत का वह जज्बा खिला जैसे अरूण शौरी या हेरोल्ड इवांस से खिला? किसी से नहीं! । तीसरा सवाल हिंदी पाठकों, पत्रकारिता को इन संपादकों से क्या मिला?
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इनका विचार-विश्लेषण-लेखन समसामयिक इतिहास में सही साबित हुआ या गलत? ये सत्ता से निरपेक्ष सत्यावलोकन में कप्तानी से जहाज को सही दिशा में ले जाते हुए थे या सत्ता, दरबार, नेताओं के चुंबक की और खींचे?
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मैंने राहुल बारपुते और अज्ञेयजी के अखबारी लेखन को नहीं पढ़ा है। बारपुते के बारे में राजेंद्र माथुर के संस्मरणों के हवाले कहता हूं कि मालिक मिजाज में पारिश्रमिक फैसले लेते हुए भी वे पत्रकारों को खिलने देने के प्रकाशपुंज थे। तभी हिंदी पत्रकारिता के इतिहास के स्मरणीय संपादक।
उनके कारण सत्तर-अस्सी के दशक में ‘नई दुनिया’ हिंदी का वह अखबार बना, जिससे पूरे देश की पत्रकारिता में हिंदी पत्रकारिता का मान बना, +ve राय बनी। उनसे पत्रकार और संपादकों की पीढ़ी बनी व हिंदी पाठकों को सोचने-विचारने की खुराक प्राप्त हुई।
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His Sun col was a must read, @hsvyas Sir.
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अज्ञेयजी दिनमान के पहले संपादक और इमरजेंसी के बाद नवभारत टाइम्स के संपादक थे। उन्होंने दिनमान की टीम अच्छी बनाई। नवभारत टाइम्स में सही चेहरों को लेने की शुरुआत की। बावजूद इसके दोनों जगह उनका साहित्यिक व्यक्तित्व-कृतित्व हावी था।
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दिनमान was a top-class ideas magazine!
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आजादी के बाद हिंदी पत्रकारिता को दो मुश्किलों से गुजरना पड़ा। एक, गुरूकुल कांगड़ी से निकले लेखकों-संपादकों से, जिनकी संस्कृतनिष्ठ हिंदी की जिद्द से लोगों में अखबार पढ़ने का चाव नहीं बना और गोयनका को भी साठ के दशक में ‘जनसत्ता’ निकाल कर बंद करना पड़ा था।
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totally disagree!
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दूसरा, रोजी-रोटी के टोटे में हिंदी साहित्यकारों का पत्रकार बन कर पत्र-पत्रिकाओं को रियल पत्रकारिता से महरूम बनाना था। अखबारों में खबर-संपादकीय पेज निराकार हेडिंग, कहानी-कविता, फूहड़ व्यंग्य में भरे होते थे। संपादक हिंदी का साहित्यिक पोप होता था और उसकी कृपा पर जिंदा स्टाफ।
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क्यों मालिक तब साहित्यकार को संपादक बनाता था? इसलिए कि बतौर विधा हिंदी में पत्रकार बनने की पढ़ाई, ढलाई का शिक्षण था ही नहीं? दूसरे, जो साहित्य लिखता है वह लिखने की कला, हुनर, शैली में हल्का सा भी अनहोनापन, वैशिष्टय लिए होता था तो मालिक द्वारा उसे उपयुक्त समझना स्वभाविक था।
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याद करें, हिंदी बढ़ रही है, हिंदी ही भविष्य है यह सोचकर टाइम्स और हिंदुस्तान टाइम्स के अशोक जैन, केके बिड़ला ने अखबार के अलावा पत्रिकाएं निकालने का फैसला किया तो ‘धर्मयुग’, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’, ‘दिनमान’ आदि निकाले गए।
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मेरा मानना है तब सेठ-मैनेजमेंट इस ख्याल में थे कि जैसे समाचारों की मैगजीन ‘टाइम’, ‘न्यूजवीक’, ‘इलेस्ट्रेटेड वीकली’ पत्रिकाएं निकलती हैं वैसे हिंदी में भी निकले और ब्रांड बने।
सो, स्थापित मीडिया समूहों ने वक्त, हिंदी की जरूरत में पत्रिकाएं सोचीं, निकालीं।
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टाइम्स, हिंदुस्तान टाइम्स, आनंद बाजार से लेकर पत्रिका की इतवारी पत्रिका, ‘रीडर्स डाइजेस्ट’, एक्सप्रेस समूह, ‘इंडिया टुडे’ ग्रुप सबने हिंदी पत्रिकाएं निकालीं लेकिन हिंदी संपादकों ने ऐसा गुड़गोबर किया कि हर मालिक रोता मिला कि हिंदी में पढ़ने वाले नहीं, पैसे खर्च करने वाले नहीं।
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हिंदी के संपादकों ने वह दरिद्रता दिखाई कि सारा ठीकरा पाठकों, हिंदी भाषियों पर इस जुमले से फूटा कि इनमें न पढ़ने की बुद्धि है और न खरीदने का पैसा!
वजह? बड़ा मुश्किल है जवाब खोजना।
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सोचने वाली बात है कि आम पाठक भले विद्यालंकार, अज्ञेय, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय के साहित्य को न पढ़-समझ पाए लेकिन फिर भी वे ही समाचार पत्र के संपादक बने? क्योंकि हिंदी के प्रोफेशनल संपादक, पत्रकार थे कहां? साहित्यकार के नाते ही जब नाम है तो उन्हीं में से संपादक छांटना!
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आधुनिक हिंदी की #1 समस्या रही कि उसके रचनाकर्मी, साहित्यकार अपने-अपने वाद/मठ/अनुयायी, अपनी-अपनी दृष्टि लिए हुए थे। तभी संपादक नियुक्त साहित्यकार अपने नजरिए, अनुयायियों, भक्तों में पोपगिरी को बनाने के लिए पत्र-पत्रिकाओं को मठ बना देता था बिना यह सोचे कि इससे हिंदी का अहित होगा।
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हिंदी पत्रकारिता में साहित्यकारों को संपादक बनाने के अधिकांश प्रयोग पत्रकारिता के मठ, संपादक विशेष के मिजाज की धारा बनवाने वाले थे। उनसे वे संपादक हुए, जिनकी चार धाराएं समझ आती है। एकेश्वर मठ, चंदन पत्रकारिता, दरबारी पत्रकारिता और एक्टिविस्टों की क्रांतिकारी पत्रकारिता!
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धर्मवीर भारती पर गौर करें। जब ‘धर्मयुग’ का संपादकत्व मिला तो वे साहित्यकार होने की महिमा के साथ अपना झंडा लिए हुए थे। ध्यान रहे ‘धर्मयुग’ अपने कारणों से हिंदी की झंडाबरदार पत्रिका थी। निश्चित ही हिंदी की एक स्मरणीय पत्रिका और संपादक।
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तर्क है कुछ भी हो भारती के संपादन में प्रोडक्ट लाजवाब था! पर ऐसा होना क्या टाइम्स ग्रुप से, पूंजी की ताकत से नहीं था? सवाल है हिंदी का वह प्रोडक्ट क्या ‘टाइम’, ‘न्यूजवीक’, ‘इकोनॉमिस्ट’ जैसी पत्रिकाओं वाला हुआ, जिससे हिंदीभाषी लोगों को खबर-विश्लेषण-बुद्धि की गंगोत्री मिलती?
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नहीं। क्योंकि धर्मवीर भारती सात्विक पत्रकारी संपादक के संस्कारों में रचे-बसे नहीं थे, बल्कि अपनी साहित्यिक अहमन्यता, अपना वाद, मठ बनाने की प्रवृत्ति वाले थे। उनके संपादकत्व का वह एकेश्वरवादी मठ था। भारतीजी का मठ क्या विचार लिए हुए था? कुछ नहीं, केवल अपनी महानता का विचार।
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धर्मवीर भारती और रघुवीर सहाय को समाजवादी समझता था लेकिन इमरजेंसी के वक्त दोनों पत्रिकाओं के पन्ने पलटते वक्त कभी नहीं लगा कि ये मधु लिमये, जार्ज फर्नांडीज जैसी उष्मा-छटपटाहट, विरोध का संपादकत्व लिए हुए हैं।
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उन दिनों बिगड़े कांग्रेसी समाजवादी भाव-भंगिमा अपना लेते थे। तभी आश्चर्य नहीं हुआ जो आखिरी दिनों में ख्याल बनाया कि उनके बाद उनकी पत्नी ही ‘धर्मयुग’ की संपादक बनने लायक! वे भला अपने मठ की गद्दी पर किसी बाहरी याकि गणेश मंत्री को विरासत देने का कैसे ख्याल बनाते!
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मैंने ‘धर्मयुग’ से ही हिंदी पत्रकारिता की मठ परंपरा का अनुभव किया। बतौर ट्रेनी जर्नलिस्ट कुछ सप्ताह ‘धर्मयुग’ में रहा।
मैंने देखा कि केबिन में बैठे धर्मवीर भारती मानो स्टालिन या महामंडलेश्वर की तरह आसन जमाएं बैठे हैं और पत्रकारगण आतंक में नौकरी करते हुए।
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मैं खांटी समाजवादी गणेश मंत्री की शैली के विचार प्रवाह का मुरीद हुआ करता था लेकिन मुंबई में धर्मवीर भारती के आगे गणेश मंत्री, उदयन शर्मा, एसपी सिह की समाजवादी रीढ़ सौ टका रेंगती हुई थी। बार-बार सोचता था यह बुद्धिमना-पत्रकारों का जमावड़ा है या कैदियों का!
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सीनियर गणेश मंत्री जैसे पत्रकारों के लिए लाल रजिस्टर और एसपी सिंह, उदयन शर्मा, हरिवंश जैसे उप संपादकों के लिए हाजिरी का काला रजिस्टर। मतलब ठीक साढ़े नौ बजे से शाम साढ़े पांच बजे की हाजिरी की सख्त समय पाबंदी। यदि तय समय के अनुसार पत्रकार नहीं पहुंचा तो आधे दिन की तनख्वाह कटी।
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महामंडलेश्वर भारतीजी सप्ताह में दो दिन निश्चित समय पर मुलाकात करते और उन्हें बताते कि क्या करना है। यदि पत्रकार ने सुझाव दिया, बहस की तो भारती उस बात को ध्यान में रखते। उसे फिर सालाना वेतन बढ़ोतरी (तीस रुपए) नहीं मिलती।
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"big" names n so "petty"!
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उदयन शर्मा को ज्योतिष, एसपी सिंह को खेल, अनुराग चतुर्वेदी को चुटकुले याकि तमाम प्रतिभाओं को डब्बूजी में कन्वर्ट कर धर्मवीर भारती महान संपादक कहलाते थे। प्रतिभा व पत्रकारिता को कुचलते हुए कैसे महान संपादक बना जाता है इसके हिंदी प्रयोग के नाम थे धर्मवीर भारती और ‘धर्मयुग’।
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टाइम्स में ही एक साहित्यकार संपादक थे कमलेश्वर - प्रगतिशील, कम्युनिस्ट। वे अपनी पत्रिका में क्रांतिकारिता बघारते। मगर भारती मठ का अधिक जलवा था तो कमलेश्वर अपने अनुयायियों से प्रतिस्पर्धी मठ की हवा बिगाड़ते। जैसे भारती पर निशाना साधते हुए छपा शीर्षक: जो कायर हैं कायर ही रहेंगे!
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मठाधिपति भारती बिलबिलाए। उन्होंने शरद जोशी से जवाबी हमला लिखवा छापा - जो टायर थे वे टायर ही रहेंगे! दोनों अपनी-अपनी पत्रिका के आदि और अंत। ध्यान रहे कि दोनों की पत्रकारिता याकि कायर व टायर पत्रकारिता आखिर में राजीव गांधी के घाट पर साझा पाई गई!
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ज्ञान-बुद्धि-प्रतिभा वालों को बंजर-कुंठित बना कर हिंदी मुख्यधारा के इन संपादकों ने दशकों हिंदी के साथ वह ज्यादती की, जिससे वह राष्ट्रभाषा होते हुए भी बांग्ला, मलयाली, मराठी, तमिल की क्षेत्रीय पत्रकारिता से पिछड़ी रही।
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उधर "नवभारत टाइम्स" के अक्षय कुमार जैन / आनंद जैन या "दैनिक हिंदुस्तान" के रतनलाल जोशी / चंदूलाल चंद्राकर के संपादकत्व का मिजाज मठ परंपरा से अलग होते हुए भी दिल्ली के सत्तावानों में बंधा था। वह बिना किसी प्रयोजन के दरबारी पत्रकारिता थी।
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तब दिल्ली के हिंदी अखबार प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री दफ्तर या सरकार की रीति-नीति पर टीका-टिप्पणी करने की कल्पना लिए हुए नहीं थे। ये सभी संपादक बिना निजी स्वार्थ के सहज भाव सत्तापरस्त थे। मालिक और संपादक इस साझा समझ में अखबार निकालते थे कि सब चंगा है।
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हिंदी अखबार और संपादक - दोनों सपाट बावजूद इसके राष्ट्रीय अखबार का रूतबा। इस स्थिति में परिवर्तन इमरजेंसी से आया। तब इमरजेंसी विरोध से संपादकों-पत्रकारों में पत्रकारिता, अभिव्यक्ति का महत्व बना। इसलिए ज्योंहि चुनाव की घोषणा..हिंदीभाषियों ने जाना कि पत्रकारिता क्या होती है!
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उस मोड़ पर मठ व सत्तामुखी पत्रकारिता बिखरी। दो नई धारा, एक्टिविज्म और चंदन पत्रकारिता का उदय हुआ। एक्टिविज्म पत्रकारिता में एमजे अकबर के हिंदी प्रतिनिधि चेहरे एसपी सिंह थे तो चंदन पत्रकारिता के प्रतिनिधि कन्हैयालाल नंदन। मोटे तौर पर दोनों का सत्ता के ईर्द-गिर्द सरोकार।
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तभी फिर संपादकों-पत्रकारों की राज्यसभा सांसद, नेता बनने की भूख शुरू हुई। इसका पहला अनुभव श्रीकांत वर्मा और कन्हैयालाल नंदन से हुआ।
दिल्ली की सत्ता पर हिंदीआग्रही नेता बैठे, जो हिंदी अखबारों को पढ़ते थे। चरण सिंह, राजनारायण,फर्नांडीज, लिमये, वाजपेयी-आडवाणी...सभी हिंदी हिमायती।
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हिंदी पत्रकारिता के लिए वह मौका था। इसमें कुछ हिंदी संपादकों और पत्रकारों ने सत्ता का दरवाजा खुला बूझा। पत्रकारिता-राजनीति का घालमेल बना। संपादक चरण सिंह, बहुगुणा, राजनारायण, जगजीवन राम आदि पर कवर फोटो-स्टोरी छापते और अपना सियासी एक्टिविज्म चमकाते।
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भारत की आजादी के 75 साला सफर में भारत को बदलने वाला पहला मोड़ था 1977। 20 मार्च 1977 की रात। इधर इंदिरा गांधी के हारने की खबर और अगली सुबह नई दिल्ली हतप्रभ, बदली हुई। उस सत्ता परिवर्तन ने भारत का बहुत कुछ बदला तो उसमें एक क्षेत्र भारतीय पत्रकारिता-हिंदी पत्रकारिता का भी था।
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एक्टिविज्म सभी रंग लिए हुए, पूरी मुखरता से। विपक्ष में रहते हुए तब इंदिरा गांधी और कांग्रेस को भी हिंदी पत्रकारों का महत्व समझ आया। ‘दिनमान’ के श्रीकांत वर्मा जैसे समाजवादियों का उपयोग हुआ। राजनारायण के जरिए जनता सरकार में तोड़फोड़ करवाने के लिए संवाददाताओं का उपयोग हुआ।
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‘ब्लिट्ज’ के करंजिया इंदिरा की आवाज तो ‘दिनमान’ समाजवादी चेतना का वाहक व मनोहर श्याम जोशी का ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ वाला मठ कभी जनसंघ के वाजपेयी को खिलाते हुए तो कभी इंदिरा गांधी को। कह सकते हैं जनता राज की आबोहवा से पत्रकारिता को सत्ता का चस्का लगने, करप्ट बनाने का बीज फूटा।
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नेताओं के घरों में संपादकों-पत्रकारों के खूंटे बनने शुरू हुए। एसपी सिंह, उदयन शर्मा को मौका मिला। अविक सरकार ने टाइम्स ग्रुप से एमजे अकबर को लेकर ‘संडे’ पत्रिका लांच की तो अकबर ने अपने सखा एसपी सिंह का धर्मयुग से पिंड छुड़ाते हुए ग्रुप से हिंदी पत्रिका निकलवाई।
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एसपी सिंह को "रविवार" का संपादक बनाया। और हिंदी में एक्टिविज्म-cum-दरबारी पत्रकारिता की नई धारा फूटी। ‘धर्मयुग’ की मठगिरी से कुछ पत्रकार मुक्त हुए। एसपी सिंह, उदयन शर्मा ने मौका लपका और वह प्रयोग किया, जिससे पाठकों ने सर्वप्रथम’ धर्मयुग’ और ‘रविवार’ से पत्रकारिता का फर्क जाना!
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"धर्मयुग" मठ अनुशासन में निकलती पत्रिका, "रविवार" एक्ट़िविज्म, एजेंडे में खिली हुई पत्रिका। मेरा मानना है कि 1980 के वक्त में हिंदी पत्रकारिता तीन धाराओं में बहकी थी: मठ, सत्तामुखी, एक्टिविज्म। इन धाराओं के प्रतिनिधि संपादक धर्मवीर भारती, अक्षय कुमार जैन और एसपी सिंह थे।
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‘रविवार’ चढ़ती कला थी क्योंकि जनता राज की राजनारायण, चरण सिंह, मधु लिमये, सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता, दोहरी सदस्यता व संजय गांधी की तिकड़मों से चौतरफा राजनीतिक दिलचस्पी और सनसनी ही सनसनी।
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शुरू हुई एजेंडा-केंद्रित पत्रकारिता। उसी से संपादकों को भी फिर पत्रकारिता से राजनीति का लांचपैड बनता नजर आया।
रविवार, दिनमान, माया, ब्लिट्ज ने वह धमाल बनाया जिसके झागों में मजा था मगर हिंदी पत्रकारिता बिखरती - भटकती हुई। पाठकों की संख्या बनी, सत्ता में हिंदी का महत्व भी बढ़ा।
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भाषायी संपादकों-पत्रकारों को नेताओं के बीच रूतबा बनाने का चस्का हुआ, नेताओं को मीडिया के उपयोग का नया भान। मालिकों में उन संपादकों-पत्रकारों की उपयोगिता समझ आई, जिनका नेताओं के साथ उठना-बैठना था।
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It was @hsvyas : FrankM, Prem Bhatia, BGV, etc.
Chanduji was even LS MP, sir.
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यह सब संभवतया इमरजेंसी से पहले नहीं था। अक्षय कुमार जैन, भारती, रतनलाल जोशी जैसे संपादकों की नियुक्ति बिना सियासी पहचान के हुई थी। कोई अपने को कितना ही प्रधानमंत्री या मंत्री का लाड़ला बताता पर उस नाते संपादक नहीं बना था।
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IMO, BGV did b/c of Cong political influence.
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नेताओं में जनसंपर्क के जुगाड़ में संपादकत्व और राजनीति के साझे में करियर बनाने की हिंदी पत्रकार प्रवृत्ति इमरजेंसी के बाद का मामला है। इसी से आगे संपादकों-पत्रकारों में नेता, टिकट लेकर चुनाव लड़ने, राज्यसभा सांसद बनने का शगल पैदा हुआ।
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ध्यान नहीं इमरजेंसी से पहले कोई संपादक सासंद बना हो। एक-दूसरे के मुरीद होते हुए भी नेहरू और चेलापति राव दोनों को कभी विचार नहीं आया होगा कि चेलापति को राज्यसभा सांसद बनाना चाहिए या मुझे क्यों नहीं नेहरू सांसद मनोनीत करते?
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@hsvyas : Chandrakar, Virendra (2), Jagat Narain!
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जनता राज से शुरू एक्टिविस्ट पत्रकारिता का बड़ा गुल तब खिला जब इंदिरा गांधी सत्ता में वापिस आईं और ‘दिनमान’ के श्रीकांत वर्मा को सांसद बनाया। चंद्राकर व वर्मा का यह फर्क था कि चंद्राकर शुरू से पहले कांग्रेसी और फिर पत्रकार थे जबकि वर्मा का कांग्रेस से नाता नहीं था।
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इसलिए उनका सांसद बनना हिंदी पत्रकारिता के आगे गाजर लटकना था। संपादकों का विजन दरबारी की जगह खुद का दरबार बनाने का हुआ।…रिपोर्टरों के साथ संपादकों का ऐसा ही सलूक और सांसद बनने का ख्याल।
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सत्ता निरपेक्ष, पक्षपातरहित पत्रकारिता की जमीन बंजर हुई। ध्यान रहे इससे पहले वामपंथियों ने प्रगतिवादी vs अनुदारवादी में बांट कर पत्रकारिता को पहले ही पक्षपाती करार दिया हुआ था। मतलब कॉमरेड है तो सच्चा पत्रकार और नहीं है तो भ्रष्ट, जनविरोधी, सांप्रदायिक पत्रकार!
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संपादकों की नई मनोदशा से मेरा पहली बार 1983 में सामना हुआ।
पत्रकारिता को नेचुरल पंखों के साथ उड़ने देने का परिवेश नहीं। पत्रकारिता लिहाज करने वाली हो, पक्षपातपूर्ण हो, वैचारिक खांचों में बंधी हो, दरबारी हो। मतलब उस चंदन लेप के साथ कि तुम भी खुश, मैं भी खुश सब खुश!
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चंदन पत्रकारिता: न मेहनत, न सामर्थ्य, न पढ़ना-लिखना बावजूद इसके चंदन की ठंडाई से मालिक, नेता, उद्योगपति का वह तिलक मंडन जिससे जीवन भर मलाई का आनंद। उसी में नेतागिरी, सांसदी, पदमश्री का सुख और गर्व से यह भी बता सकना कि मैं देश का, हिंदी का महान पत्रकार, सबसे बडा खोजी पत्रकार।
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प्रधानमंत्री के दौरे में ठसका देख सोचा हिंदी के हमारे इन संपादकों के आगे तो अंग्रेजी के मुलगांवकर, बीजी वर्गीज, अरूण शौरी जैसे संपादक सचमुच फटीचर है। ये कैसे ठसके और जलवे में रहते है जबकि वे पढ़ते-लिखते कलम घसीटते हुए।
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जनता राज से खिली हिंदी पत्रकारिता में और उठाव राजीव गांधी, वीपीसिंह, चंद्रशेखर के वक्त आया। तब वह जहां बिखरी और हिंदू मिजाज की सचमुच प्रतिनिधी होना शुरू हुई। मतलब मंडलवादी-गैरमंडलवादी, जातिवादी, ठाकुरवादी- ब्राह्यणवादी खांचों में बंटने लगी।
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उदयन शर्मा के लिए रविवार चरणसिंह का एक्सटेंशन था तो वीपीसिंह के उदय के साथ एसपी सिंह, संतोष भारतीय का शुरू हुआ चेतक मंच पत्रकारिता दौर। ठाकुर पत्रकारों का जब वीपीसिंह के खूटे पर एकाधिकार तो शर्मा ने राजीव शुक्ला को ले कर पत्रकारिता-राजनीति का जवाबी ब्रहास्त्र: अंबानी का अखबार!
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1977 की जनक्रांति से हिंदी पत्रकारिता खूब खिली। नई प्रवृत्तियों के नए गुल खिले। हिंदी के साथ भारतीय भाषाओं की पत्र-पत्रकारिता का भी फैलाव था। सबका रूतबा बना। जनता पढ़ने लगी और कुकुरमुत्ते की तरह संपादक-पत्रकार पैदा हुए। तभी भाषाई मीडिया घरानों, कॉरपोरेट हाऊस बनना शुरू हुआ।
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मतलब हर स्तर पर भाषाई पत्रकारिता का विस्तार। पर वह सच्चा-सात्विक विस्तार था या क्षुद्रताओं, धंधाई, व मार्केटिंग का विस्तार… और क्या उसी की जमीन में मौजूदा मीडिया खडा हुआ नहीं?
- @hsvyas

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23 Nov
.@nayaindianews Edit:
अगर किसी को यह लगता हो कि पीछे हटने के ताजा निर्णय से वर्तमान सरकार की कार्यशैली में कोई बदलाव आएगा, उसकी ये धारणा गलत ही साबित होगी। इसलिए कि समस्या की जड़ें संवाद ना करने की कार्यशैली है, जो ऐसा लगता है कि मौजूदा सत्ताधारियों में कूट-कूट कर भरी हुई है।
..
इस बिंदु पर यह गौर करने की आवश्यकता है कि आखिर मौजूदा शासनकाल में असल समस्या कहां है? इसकी जड़ें असल में संवाद ना करने की कार्यशैली है। वरना, अगर दूसरे पक्ष का नजरिया सुनने की प्रवृत्ति होती, तो मुमकिन है कि इन कृषि कानूनों के मामले में भी कोई बीच का समाधान निकल सकता था।
..
इन्हें लेने के क्रम में नजरिया आम सहमति के साथ चलने का नहीं, बल्कि बहुमत और सत्ता के जोर से उन्हें थोपने का रहा। संसद में भाजपा ने बहुमत हासिल कर लिया, तो उसका मतलब है कि देश में कोई और पक्ष या समूह नहीं हैं। अगर कोई ऐसा होने का दावा करता है, तो वह अवैध या देश-विरोधी है।
Read 4 tweets
21 Nov
PN Vijay:
We can proudly claim that many of pillars of democracy - freedom of speech, right to property, strong judiciary, vibrant free press are alive n kicking in India tho some people m/say sedition law n some other moves are encroaching into these hallowed areas of liberty.
..
But where we are lacking in democratic reach is in local self-gov. Most Indians have come to believe that govt belongs to netas/babus n citizens are mute helpless spectators, with these “superior souls” shaping their everyday life.
Read 15 tweets
21 Nov
FPJ Edit:
It is not necessary to let writer get away w/questionable theories/conclusions. He needs to be challenged in form of articles, essays, debates n books. Those who believe in Hindutva s/b able to pick holes in Khurshid’s book n expose hollowness of his arguments.
..
But to incite people to go to his house n fire at it is to behave like hotheads. Might of law is demonstrated when those who take law into own hands are punished n sent to jail.
..
Otherwise, anything c/happen.
Khurshid is no ord person. Yet, that c/n save his house from saffron flag-wielding criminals. The point to be noted is that arsonists worked to prove Khurshid's own theory.
Read 6 tweets
21 Nov
FPJ Edit:
Hows n whys w/b analysed, w/interpretations differing based on poli pref of analysers, but it is imp for all parties – govt, farmers n parties which aligned behind protest, out of political exigencies than ideological convictions,
..
to take a step back n analyse what laws were, what they sought to achieve, n whether desirable outcomes envisioned by laws can still be achieved thru other means.
Read 6 tweets
21 Nov
..
Very large # of people, incl PSU staff, are opposed to both privatisation n econ philosophy behind it - business of govt is not business.
Their opposition to privatisation thus is based on incorrect premises in some cases n doctrinaire in others.
..
Wrt SC’s order, A. Shourie said: If SC has said register a case, let the case be registered n everyone concerned w/cooperate fully. But this was challenged when it was disinvested. SC rejected petition challenging sale. Now SC disregards that order n asked CBI to probe.
Read 7 tweets
17 Oct
.@dhume :
India’s privatization program represents a sweeping rollback of state control.. (n) a sharp repudiation of India’s first prime minister, Nehru, n his daughter, Indira Gandhi.
wsj.com/articles/new-d…
..
In 1978 an opposition govt even more suspicious of private ent.. completed Tata’s humiliation by dismissing him...
~
2 factually incorrect claims by @dhume : it had nothing to do with anti-pvt ent..pers thing btwn JRD n Desai who BTW resigned f/govt in oppo to bank takeover.
n, @dhume Sir, 3 out of 5 main constituents of that govt - Swa/BKD, BJS, Old Cong - had opposed all those crazy econ policies/actions of IG - at great political costs, a profile in courage (BTW, among those on IG's sides then were PVN n MMS).
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