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#काँग्रेस_के_कुकर्म Vs #इतिहास_ही_हमारी_धरोहर_है

Operation Blue Star: जानिए भिंडरावाले के उदय से अंत तक की पूरी कहानी

37 साल पहले भारत के इतिहास में ऐसा स्याह पन्ना लिखा गया था जिसकी मोटी कीमत देश को चुकानी पड़ी थी. जानिए ऑपरेशन ब्लू स्टार की पूरी कहानी.

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जरनैल सिंह भिडरावाला 1977 में दमदमी टकसाल का मुखिया बना

15 दिसंबर,1983 को भिंडरावाले ने अकाल तख्त पर कब्जा जमा लिया।
आज से 37 साल पहले जून के पहले सप्ताह में अमृतसर के हरमंदर साहब( स्वर्ण मंदिर) प्रांगण में जो वाकया हुआ था वो आजादी के बाद भारतीय इतिहास के सबसे सियाह पन्ने के रूप
में आज भी दर्ज है.
वो ऐसी घटना थी जिसने पूरे भारत को झखझोर कर रख दिया था. जरनैल सिंह भिंडरावाले की मौत के साथ ऑपरेशन ब्लू स्टार सफल रहा था लेकिन उसकी बड़ी कीमत आगे चलकर देश को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की शहादत के रूप में चुकानी पड़ी थी।

इस पूरी घटना के केंद्र में जरनैल सिंह
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सुखविंदरसिंह चीमा वीरजी का लेख✍️✍️✍️

#एक_नई_लय_में_बहकता_हरियाणा

जरनैल सिंह भिंडरवाला कौन था? जो आज उसे संत,बाबा इत्यादि कहते घूम रहें है। आखिरकार ऐसी क्या वजह है और इतना उतावलापन क्यो हैं भिंडरेवाला के प्रति???

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स्वर्ण मंदिर मे बाकायदा आज भी जनरैल सिंह भिंडरवाले का गुरूद्वारा बना हुआ है।

अब देखा देखी की इस लहर में हरियाणा,दिल्ली,पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट युवा भी भिंडरवाले को अपना संत मानने लगे है।सही मायने मे इनको स्वयं ही नही पता कि वो था कौन❓ जिसके आज तुम SUV गाडियो के शीशो पर
भिंडरवाले के स्टीकर लगाकर घूम रहे हो।

जरनैल सिंह भिंडरवाला"बरार"गोत्र का जट्ट सिख था। और उसी भिंडरवाले को ठोकने वाले मेजर जनरल"कुलदीप सिंह बरार"भी उसी गोत्र के थे।उसी वंश के थे।
मगर अफसोस कि आज के युवाओं का आदर्श जनरल कुलदीप सिंह बरार नही बल्कि जरनैल सिंह बरार उर्फ भिंडरवाला है।
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काँग्रेस को हर वक़्त याद किया जाना लाजिमी है और इसके हर कुकर्म को भी याद करना हर वक़्त जरूरी है
पता है क्यों❓
क्योंकि हमें भूलने की सबसे बड़ी बीमारी है,
अपने इतिहास और अतीत से भागने की आदत बहुत पहले से लग चुकी है,

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हमें सच से भागने की लत लग चुकी है,अपने अतीत के सच को अपनाने से डर लगता है,हम बार-2 भूल जाते हैं और सिर्फ इसलिए ही हम सभी का अतीत आप सभी के सामने लाना पड़ता है।

2 Nov 1984 को दिल्ली में घर का फर्नीचर इकट्ठा करके घरवालों ने घर मे सड़ रही अपनो की लाशों का दाह संस्कार किया था।😢😢😢
एक दुःखद दास्तां एक माँ व पत्नी की
तारीख : 1 नवंबर 1984
समय : सुबह के 9 बजेे।जगह : दिल्ली।

"मैं अपने "रिटायर्ड आर्मी मैन" पति और अपने बेटे के साथ खाना खा रही थी।मेरा बेटा भी आर्मी में था कुछ दिनों के लिए छुट्टी पर आया था। दिवाली की छुट्टियां थी तो मेरे नाती और नातिन भी आये थे।
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प्रियंका वाड्रा आज वही 40 साल पुरानी घिसी-पिटी स्क्रिप्ट पर नया ड्रामा कर रही है,
हाथरस,सोनभद्र और लखीमपुर खीरी आदि और भी कांड उसी स्क्रिप्ट के हिस्से ही हैं,
ये ड्रामेबाज, धोखेबाज,डरपोक, चोर, लुटेरा, देशद्रोही खानदान

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अपने आप को कितना भी प्रमोट कर ले...
इस बार मैदान में "सोशल मीडिया" है
हम सभी इनके "झूठ के पांव" कहीं भी पड़ने नहीं देंगे और इस देशद्रोही खानदान की सच्चाई को उधेड़कर रख देंगे,

इस स्क्रिप्ट में इंदिरा ने जिस तरह से सत्ता में वापिसी के लिए नारायणपुर कांड और बेलछी हत्याकांड का सहारा
लिया था और सफल भी हुई थी,
लेकिन अब समय बदल चुका है,हर बार की तरह अब जनता इन देशद्रोहियों के झाँसे में नहीं आएगी और अब मूर्ख भी नहीं बनेगी,

☝️नारायणपुर कांड:-
चुनाव से पहले इंदिरा ने 2 बच्चियों को गले लगाकर गोद लिया था और UP का इलेक्शन जीता था।

इंदिरा चुनाव जीतने के बाद उन 2
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अच्छे दिन कब आयेंगे❓❓❓

बन्दरों का एक समूह था,जो फलों के बगीचों में फल तोड़कर खाया करते थे। माली की मार और डंडे भी खाते थे,रोज पिटते थे...

उनका एक सरदार भी था,जो सभी बंदरो से ज्यादा समझदार था।

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एक दिन बन्दरों के कर्मठ और जुझारू सरदार ने सब बन्दरों से विचार-विमर्श कर निश्चय किया कि "रोज माली के डन्डे खाने से बेहतर है कि यदि हम अपना फलों का बगीचा लगा लें...
तो इतने फल मिलेंगे की हर एक के हिस्से मे 15-15 फल आ सकते है,हमें फल खाने मे कोई रोक -टोक भी नहीं होगी
और हमारे अच्छे दिन आ जाएंगे।"

सभी बन्दरों को यह प्रस्ताव बहुत पसन्द आया। जोर-शोर से गड्ढे खोदकर फलों के बीज बो दिये गये।

पूरी रात बन्दरों ने बेसब्री से इन्तज़ार किया और सुबह देखा तो फलों के पौधे भी नहीं आये थे!
जिसे देखकर बंदर भड़क गए और सरदार को गरियाने लगे और नारे लगाने लगे,
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#काँग्रेस_के_कुकर्म Vs #इतिहास_ही_हमारी_धरोहर_है Vs मोदीजी का नेतृत्व
@abhijeetrai00 भाईजी का लेख✍️✍️✍️

जरासंध दुनिया भर से सारे राक्षसों को इकट्ठा करके बार-बार भगवान श्रीकृष्ण से लड़ने आता था!
भगवान श्रीकृष्ण सबको मार देते थे,
लेकिन जरासंध को छोड़ देते! वो फिर जाता,

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दुनिया भर से सारे राक्षसों को इकट्ठा करता और भगवान श्रीकृष्ण से युद्ध करने आता!
एक दिन बलराम ने श्रीकृष्ण से पूछा तुम ऐसा क्यों करते हो?
इसे मार क्यों नहीं देते?

तब श्रीकृष्ण ने कहा, भ्राता मैं जरासंध को बार-बार जानबूझकर इसलिए छोड़ दे रहा हूं ताकि वह पूरी पृथ्वी से दुष्टों को
अपने साथ जोड़े और मेरे पास लाता रहे और मैं आसानी से एक ही जगह रहकर धरती के सभी दुष्टों को मार दे रहा हूं। नहीं तो मुझे इन दुष्टों को मारने के लिए पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाना पड़ता। दुष्टदलन का मेरा यह कार्य जरासंध ने बहुत आसान कर दिया है!

मोदीजी, मोटा भाई और बाबाजी चाहें तो देश
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पंचतंत्र में एक कहानी है...
एक ग्रामीण को विवाह के बहुत सालों बाद पुत्र हुआ,
लेकिन कुछ वर्षों बाद बालक की असमय मृत्यु हो गई।
ग्रामीण शव लेकर श्मशान पहुंचा,वह मोहवश उसे दफना नहीं पा रहा था,उसे पुत्र प्राप्ति के लिए किए

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जप-तप और पुत्र का जन्मोत्सव याद आ रहा था।

श्मशान में एक गिद्ध और एक सियार रहते थे,दोनों शव देख कर बड़े खुश हुए,दोनों ने प्रचलित व्यवस्था बना रखी थी
दिन में सियार मांस नहीं खाएगा और रात में गिद्ध।
सियार ने सोचा यदि ग्रामीण दिन में ही शव रखकर चला गया तो उस पर गिद्ध का अधिकार होगा,
इसलिए क्यों न अंधेरा होने तक ब्राह्मण को बातों में फंसा कर रखा जाए।

वहीं गिद्ध ताक में था कि शव के साथ आए कुटुंब के लोग जल्द से जल्द जाएं और वह उसे खा सके।

गिद्ध ब्राह्मण के पास गया और उससे वैराग्य की बातें शुरू की।
गिद्ध ने कहा- हे मनुष्यों,आपके दु:ख का कारण यही मोहमाया ही है,
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गुजरात के वरिष्ठ लेखक "रजनीकुमार पंड्या जी" की क़िताब "आप की परछाईयां" से ✍️✍️✍️

॥जवाहरलाल नेहरू अभिनेत्री नरगिस के मामा थे॥
नरगिस की नानी "दिलीपा",मंगल पाण्डेय के ननिहाल के "राजेन्द्र पाण्डेय" की बेटी थीं।

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उनकी शादी 1880 में बलिया में हुई थी,
लेकिन शादी के एक हफ़्ते के अंदर ही उनके पति गुज़र गए थे।

दिलीपा की उम्र उस वक़्त सिर्फ़ 13 साल थी।
उस ज़माने में विधवाओं की ज़िंदगी बेहद तक़लीफ़ों भरी होती थी।ज़िंदगी से निराश होकर दिलीपा एक रोज़ आत्महत्या के इरादे से गंगा की तरफ़ चल पड़ीं...
लेकिन रात में रास्ता भटककर मियांजान नाम के एक सारंगीवादक के झोंपड़े में पहुँच गयी,जो तवायफ़ों के कोठों पर सारंगी बजाता था...

मियांजान के परिवार में उसकी बीवी और एक बेटी मलिका थे... वो मलिका को भी तवायफ़ बनाना चाहता था...

दिलीपा को मियांजान ने अपने घर में शरण देदी..
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सोचिये कितना अद्धभुत था अपना भारत...

प्राचीन भारत के 13 विश्वविद्यालय,जहां पढ़ने आते थे दुनियाभर के छात्र।
तुर्की मुगल आक्रमण ने सब जला दिया,बहुत अधिक संख्या में "हिन्दू मंदिर" लूटे गये।
मेगास्थनीज अलविरुनी इउ एन सांग के

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ग्रन्थो में अति समृद्ध भारत का वर्णन है।

वैदिक काल से ही भारत में शिक्षा को बहुत महत्व दिया गया है। इसलिए उस काल से ही गुरुकुल और आश्रमों के रूप में शिक्षा केंद्र खोले जाने लगे थे। वैदिक काल के बाद जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया। भारत की शिक्षा पद्धति भी और ज्यादा पल्लवित होती गई।
गुरुकुल और आश्रमों से शुरू हुआ शिक्षा का सफर उन्नति करते हुए विश्वविद्यालयों में तब्दील होता गया।
पूरे भारत में प्राचीन काल में 13 बड़े विश्वविद्यालयों या शिक्षण केंद्रों की स्थापना हुई।

8 वी शताब्दी से 12 वी शताब्दी के बीच भारत पूरे विश्व में शिक्षा का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध
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माँ भारती के सच्चे वीर पुत्र "वीर सावरकरजी"की अमूल्य बेशकीमती पुस्तक "1857 का स्वातंत्र्य समर" के अंश✍️✍️✍️

अंग्रेजों के शासन का जुआ उतार फेंकने के बाद जिस एक कमी के कारण आज तक स्वतंत्रता के सिपाहियों और लोगों के सारे

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परिश्रम विफल हो रहे थे.पह धुरारत्य की न्यूपता इस शाहाबाद जिले में जगदीशपुर के महल ने शेष नहीं रहने दी थी और इसीलिए उस जगदीशपुर के हिंदू राजा के ध्वज की और शोण नदी उतरकर ये सिपाही दौड़ते जा रहे थे;
क्योंकि स्वराज्य संग्राम के लिए सुयोग्य एक नेता उन सैनिकों को अंत में जगदीशपुर में
ही मिलने वाला था। राजपूत वंश की एक कोहिनूर की खान से ही जिस स्वतंत्रताप्रिय नेता का जन्म हुआ उनका नाम था कुंवर सिंह...शाहाबाद तहसील की विस्तीर्ण भूमि का स्वामित्व कुंवर सिंह के उदार चरित्र वंश में सुप्रतिष्ठित हुआ था और उस राजांश।

वहाँ की जनता में निसर्ग स्फुरित प्रीति थी। बड़े-
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माँ भारती के सच्चे पुत्र "वीर सावरकर जी" की अमूल्य बेशकीमती पुस्तक "1857 का स्वातन्त्र्य समर" के अंश✍️

दिल्ली हार जाने के विद्रोहियों की स्वतंत्रता की चेतना घटने की जगह अधिकारियों सुलगती गई और दिल्ली का प्रतिशोध लेने
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के लिए वे लखनऊ और बरेली-इन शहरों की ओर लड़ते निकले। क्योंकि दोआब जीतने के बाद रूहेलखंड और अवध,ये दो प्रदेश अभी भी विद्रोहियों के कब्जे में थे और वहां उनके राजसिंहासन क्रियाशील थे। इसलिए अंग्रेजी सेना का मुख्य प्रश्न इन दोनों प्रदेशों को जीतने का था।
इस प्रश्न का उत्तर सर कोलिन ने
यह दिया कि पहले रूहेलखंड जीता जाए और फिर लखनऊ का समाचार लिया जाए।
लॉर्ड केनिंग का आग्रह यह था कि पहले लखनऊ का बड़ा केंद्र ध्वस्त किया जाए।
जिससे विद्रोहियों के दूसरे छोटे-छोटे शहर अपने आप शरण में आ जाएंगे।
लॉर्ड केनिंग के आदेशों के अनुसार चलना बाध्य होने के कारण कमांडर-इन-चीफ सर
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@tbsingh1008 चाचाजी का लेख✍️✍️✍️

#कास्ट_का_इतिहास और उसका समय के साथ बदलता अर्थ:
ये तीन पुस्तकें हैं जिनमे कास्ट के बारे में विस्तृत विवरण है।
पहली पुस्तक है फ्रांसिस हैमिलटन बुचनान की,जिसको लगभग 30,000 पौंड देकर

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दक्षिण भारत के समस्त कृषि, वाणिज्य, शिल्प संबंधी डेटा एकत्रित करने का काम 1799 मे दिया गया था।

उसने 1807 में 1487 पेज में तीन वॉल्यूम में दक्षिण भारत का डेटा एकत्रित किया था। उसने एक स्थान पर भी अछूत शब्द का प्रयोग नही किया है।
इसका क्या अर्थ है? अछूत थे नहीं कि उसे दिखे नहीं?
बुचनान का नाम इतिहास पढ़ने वाला हर बच्चा जानता है।
विश्व की इकोनॉमिक हिस्ट्री, बुचनान का सहयोग लिए बिना, लिखा जाना संभव नही है।

ज्ञातव्य है कि 1757 में,ब्रिटिश दस्यु जब भारत आये तो भारत विश्व के 24 % जीडीपी का उत्पादक था।

1500 के आस पास,मोघल जब भारत पर कब्जा किये तो भारत विश्व
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@tbsingh1008 चाचाजी का लेख✍️✍️✍️

#राजशिल्प_से_अछूतपन_की_यात्रा

ये है आज से 350 वर्ष पूर्व 1651 में निर्मित उदयपुर निर्मित जगदीश मन्दिर।
अब इसकी आर्थिक और सामाजिक पृष्ठिभूमि को देखा जाय। ऐसा अद्भुत वास्तुकला का उदाहरण

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आज भी मिलना असंभव है।
350 साल पहले आर्किटेक्ट नही होते थे, जो सीना चौड़ा करके घूमते हों। राजशिल्पी अवश्य हुआ करते थे।
1600 के आसपास भारत विश्व की 30% जीडीपी का उत्पादक था। आजकल जो बजट आता है। आप जीडीपी का महत्व समझ सकते हैं।
इसके निर्माण हेतु गरीबों का खून नही चूसा जाता था...
जैसा कि आने वाले मात्र 100 साल बाद शुरू हो जाएगा।

कौन निर्मित करता था इनको???
ब्राह्मण, क्षत्रिय ,वैश्य या शूद्र ???

इनको निर्मित करने वाले थे राजशिल्पी। शूद्र जिनको कौटिल्य ने बताया था वार्ता में करकुशीलव -"एक्सपर्ट इन टेक्नॉलॉजिकल साइंस"

यह अकेला मन्दिर नहीं है भारत में।
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गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति भाग-2

धर्म की वैज्ञानिकता को समझना और इसकी आवश्यकता क्या है?
हमें ज्ञान-विज्ञान हमारे ऋषियों ने मनुष्यों को दिया तो किस ऋषि ने अपने किस ग्रन्थ में विज्ञान और गणित के सिद्धांत दिए हैं )???

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इन मूलभूत जिज्ञासाओं के समाधान के बिना मनुष्य की समस्त शिक्षायें अधूरी और विनाशक हैं।
हमें गर्व है कि इन सब मूल जिज्ञासाओं का समाधान मात्र गुरुकुलीय शिक्षा में हैं।
गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति बालक के सर्वांगींण विकास का महानतम व्यवस्था है:-जिसमें बालक के शारीरिक,मानसिक , आत्मिक और
सामाजिक विकास का ध्यान रखा जाता है।

जिसके लिए ऋषियों-आचार्यों ने बालकों की उम्र के साथ शिक्षा के निम्न क्रम की व्यवस्था स्थापित की है -

1. नैतिक शिक्षा-भाषा शास्त्र:-हृदय के विकास के लिए ऋषियों ने भाषा के प्रारंभिक ज्ञान के साथ जीवन मूल्यों संस्कारों की शिक्षा का विधान किया।)
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#गुरुकुलीय_शिक्षा_पद्धति

"गुरुकुल" जिनके आगे "सत्ताएं" झुकती थी,
"सम्राटों" से लेकर "नागरिकों" तक पूरे समाज और शासन के लिए न्याय-अन्याय, नीति-अनीति और धर्म-अधर्म की परिभाषा
"गुरुकुल" में ही निर्धारित किया करते थे।

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जिनके आदेश समस्त सत्ताओं के लिए अंतिम आदेश होते थे
गुरुकुल
जहाँ सामान्य नागरिकों से लेकर के सम्राटों की संतानें बिना जातिगत - आर्थिक भेदभाव के एक साथ अध्ययन-भोजन-उपासना- यज्ञ- क्रीड़ा और कर्म किया करते थे।
इस महान शिक्षा पद्धति के बल पर भारत में महान गौरवशाली समाज का निर्माण हुआ।
और भारत विश्व में ज्ञान-विज्ञान-तकनीक-अध्यात्म और व्यापार के जाना गया और "विश्वगुरु" के रूप में विख्यात हुआ ।

दुनिया की समस्त सभ्यताओं जैसे मिश्र-रोम-बेबीलोन-कोरिया,
चीन, तिब्बत, मंगोलिया आदि देशों के ज्ञान के भूखे-जिज्ञासु मनुष्य इतिहास के अलग-अलग काल खंडों में हजारों मील महीनो
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@tbsingh1008 चाचाजी का लेख✍️✍️✍️

#गुरुकुलों_से_निकलते थे वर्ल्ड क्लास के आर्किटेक्ट और टेक्नोक्रेट।
ये गुरुकुल ब्राम्हण चलाते थे,लेकिन वे किसी राजा के वेतनभोगी नौकर नहीं होते थे। मैकाले के पूर्व भारत के गुरुकुलों के

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बारे में एकत्रित किये गए डेटा को धरमपाल जी ने अपनी पुस्तक "The beautiful Tree" में संकलित किया है।
☝️उसके अनुसार उन गुरुकुलों में चारों वर्ण के छात्र शिक्षा प्राप्त करते थे।
☝️इन गुरुकुलों में शूद्र छात्रों की संख्या द्विज छात्रों से चार गुना अधिक थी।
शिक्षा को किसी भी सभ्य समाज
के वैभव और सभ्यता संस्कृति का आधार माना जाता है।

☝️यदि शिक्षा को किसी समाज के वैभवशाली होने का आधार माना जाये,तो भारत के उस विशाल वैभव का राज उस "गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था" के कारण ही थी।
यह व्यवस्था जब तक भारत में जीवित थी,किसी भी भारतीय को किसी विदेशी भूमि में जाकर गिरमिटिया
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#काँग्रेस_के_कुकर्म Vs #इतिहास_ही_हमारी_धरोहर_है
‘’ऑपरेशन पोलो‘’
जब सरदार वल्लभभाई पटेलजी ने भारत-विरोधी मुसलमानों सबक सिखाया था,"सरदार पटेलजी" और "भारतीय सेना" के जज्बे व एक्शन की वजह से हैदराबाद में पल रहे आंतकियों को सबक सिखाने के बाद भारत में विलय किया था...

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☝️आजादी के समय "हैदराबाद की जनता" भारत में विलय चाहती थी,
लेकिन हैदराबाद का "निजाम मीर उस्मान अली खान बहादुर हैदराबाद को एक स्वतन्त्र देश का रूप देना चाहता था,
इसलिए उसने भारत में हैदराबाद के विलय कि स्वीकृति नहीं दी।

निज़ाम हैदराबाद के भारत में विलय के किस क़दर ख़िलाफ था कि इस
का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने जिन्ना को संदेश भेजकर ये जानने की कोशिश की थी कि"क्या वह भारत के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ने में हैदराबाद का साथ देंगे,ताकि हैदराबाद में मुसलमानों का ही शासन बना रहे?"

जिन्ना ने इसका जवाब देते हुए कहा था कि"वो मुट्ठी भर मुसलमानों के लिए अपने
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#इतिहास_ही_हमारी_धरोहर_है

माँ भारती के सच्चे पुत्र "वीर सावरकर जी" की अमूल्य बेशकीमती अनमोल पुस्तक "1857 का स्वातंत्रय समर" के अंश✍️✍️✍️

सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के वक़्त 55वीं रेजिमेंट की ये दर्दनाक कहानी आप सभी को झकझोड़ कर रख देगी,

इस दर्दनाक कहानी को पढ़ने

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पर रूह तक कांप जाती है,तो आप सोचिए जिन्होंने इस दर्दनाक मंजर को सहा होगा,उन सभी के दिल पर क्या गुजरी होगी...

बहुत से मुस्लिम कहते हैं कि हमने आजादी की लड़ाई में साथ दिया था*
कौनसा साथ दिया था???जब खुद पर बन आयी थी,अपनी रियासतों को और अपने धर्म पर अंग्रेजों का अत्याचार देखा तब...
जब हिन्दू और मुसलमान एक साथ लड़ते थे और अँग्रेजों से जीत जाते थे,तब क्या अत्याचार होता था हिन्दू-सिख भाईयों व उनके परिवारों के साथ?
ये कोई नहीं बताता क्योंकि तुम्हारी सच्चाई बाहर आ जायेगी इसलिए...

हिन्दू-सिक्खों को एक साथ तीन लड़ाई लड़नी पड़ रही थीं,
☝️पहली अँग्रेजों के खिलाफ,
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#इतिहास_ही_हमारी_धरोहर_है

माँ भारती के सच्चे पुत्र "वीर सावरकरजी" की अनमोल पुस्तक "1857 का स्वातंत्रय समर" के अंश :-भाग-2✍️✍️✍️
झाँसी की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी🙏🙏🙏
झाँसी के घेरे का आंखों देखा वर्णन दत्तात्रेह पारसनी कृत"रानी लक्ष्मीबाई का जीवन चरित"पृष्ठ187-193 के

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आधार पर इस प्रकार है-"25 तारीख से दोनों ओर से बराबर की मुठभेड़ हुई।अंग्रेजी तोपें दिन रात आग बरसा रही थीं।रात को किले के अंदर उर शहर में गोले गिरने लगे।बड़ा भयंकर दृश्य था।पचास-साठ पौंड का गोला टेनिस गेंद की तरह,किंतु अंगार सा दिखाई पड़ता था।

पांचवे छठे दिन तक इसी तरह युद्ध हुआ।
रानी की तोपों ने अच्छा काम किया,अतः अब अँग्रेजों की तोपों की भीषण मार से रानी की तोप निक्कमी होने लगीं।कोई वहां खड़ा नहीं हो सकता था।अँग्रेजों के गोलों से मुंडेर ढह पड़ी।
किंतु रात में ही कम्बलों में छिपाकर 11 राज वहां लाये गए और सुबह होने से पहले ही मुंडेर का काम पूरा हो गया।
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#इतिहास_ही_हमारी_धरोहर_है
माँ भारती के सच्चे पुत्र "वीर सावरकरजी" की अनमोल पुस्तक
"1857 का स्वातंत्र्य समर" के अंश✍️✍️✍️
झाँसी की वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जी🙏🙏🙏
सन 1853 में उनके पति अचानक परलोक सिधार गए थे और उनके दत्तक पुत्र दामोदर को उत्तराधिकार के अधिकार न देते हुए

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अंग्रेज सरकार ने उनकी झांसी अधिगृहित कर ली थी।
परंतु ऐसी चिट्ठी पत्री से अधिगृहित होने वाली यह रियासत नहीं थी।
उस झांसी की रियासत पर वीर साहसी तेजस्वी महारानी लक्ष्मीबाई जी राज कर रही थीं।
वह ऐसे अधिग्रहण की क्या परवाह करें। अंग्रेजों का यह कुटिल और जल्लादी कृत्य देखकर दुःख,
अपमान,मानभंग के बादलों की गड़गड़ाहट होने लगी और उनमें से झाँसी की उस चपला ने कड़कड़ाहट की-"अपनी झाँसी मैं नहीं दूँगी।" (डलहौजी एडमिनिस्ट्रेशन खंड 2)

जिन राजाओं ने अपने पीछे राज्य का कोई उत्तराधिकारी नहीं छोड़ा था,उनका राज्य "ईस्ट इंडिया कम्पनी" में मिलाने की नीति "लॉर्ड डलहौजी"
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भारत-पाकिस्तान विभाजन और RSS
☝️1941 की जनगणना के मुताबिक तब हिंदुओँ की संख्या 29.4 करोड़,मुस्लिम 4.3 करोड़ और बाकी लोग दूसरे धर्मों के थे। ☝️परंतु फिर भी भारत के एक बहुत बड़े भू-भाग को धर्म के नाम पर अलग कर दिया गया था।

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जिसमें 29 करोड़ हिन्दुओं की राय नहीं ली गई...

☝️यही सबसे बड़ी पहली त्रासदी थी।
☝️कुछ मुट्ठीभर चंद निजीस्वार्थी लोगों ने टेबल पर बैठकर बंटवारा कर दिया।
☝️विभाजन या बंटवारा किसी देश,भूमि या सीमा का नहीं होता। विभाजन तो लोगों की जिंदगी,भावनाओं का हो जाता है,

☝️जो हमेशा के लिए उनको
इतने गहरे जख्म दे जाता है कि वह उनकी खुद की और आने वाली नस्लों की जिंदगी को झिंझोड़ कर रख देता है।
1857 से 1947 तक 90 साल के संग्राम,आंदोलन और बलिदान के बाद भारतीयों ने आजादी की जगह देखी विभाजन की त्रासदी।
बंटवारा किस आधार पर हुआ और क्यों हुआ?
क्यों नहीं इसके लिए जनमत कराया गया?
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रावलपिंडी के समीप हिन्दुओं का एक छोटा सा गांव था। 500 के लगभग व्यसक होंगे।बाकि बच्चे,बुड्ढे। गांव के सरपंच रामलाल एक विशाल बरगद के नीचे बैठे थे।
तभी मोहन भागता हुआ आया। बोला सरपंच जी,सरपंच जी।
सरपंच जी ने कहा”क्या हुआ

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मोहन ? ”
सरपंच जी मुझे पता लगा है यहाँ से 8 कोस दूर हिन्दुओं ने अपना गांव खाली करना शुरू कर दिया है। सिख भाई भी उनके साथ अमृतसर जाने की तैयारी कर रहे है।

सरपंच जी ने एक लम्बी साँस ली और कहा,” मैंने कल ही रेडियो पर सुना था। महात्मा गाँधी ने कहा है कि "भारत-पाकिस्तान का विभाजन
मेरी लाश पर होगा।"

क्या तुम्हें उनकी बात पर भरोसा नहीं है?”
मोहन बोला,” सुना तो मैंने भी है कि जवाहर लाल नेहरू ने कहा है कि हिन्दुओं आश्वस्त रहो। भारत के कभी टुकड़े नहीं होंगे। तुम लोग लाहौर और रावलपिंडी में आराम से रहो।

पर जिस गांव की मैं बात कर रहा हूँ। उस गांव पर पिछली रात
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#काँग्रेस_के_कुकर्म Vs #इतिहास_ही_हमारी_धरोहर_है
बड़े भईया मनीष शर्मा जी का लेख✍️✍️✍️
अच्छा बताइये कि कौरवों या दुर्योधन को सबसे अच्छा पांडव कौन लगता होगा???
☝️जहां तक मैं समझता हूँ,कौरवों को युधिष्ठिर सबसे अच्छे लगते होंगे।
☝️क्योंकि वो धर्मराज थे,हर कार्य को धर्म की

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की कसौटी से ही देखा करते थे।सीधे थे सरल थे और कई बार अपनी जिद और मान्यताओं के कारण अन्य पांडवों पर दबाव डालने में भी सफल रहते थे।

☝️चाहे वनवास के लिए तैयार हो जाना हो
☝️चाहे अज्ञातवास जैसी कठिन शर्त को सहर्ष तैयार हो जाना हो
☝️चाहे पूरे राज्य को छोड़ 5 गांव मांगने का प्रस्ताव हो
☝️चाहे द्रौपदी को द्युत खेल में दांव लगाने को तैयार*हो जाना हो*

☝️युधिष्ठिर हमेशा ही सर्व सुलभ होते थे और अमूमन उन्हें मनाना आसान हुआ करता था और धर्म की दुहाई पर तो उन्हें पिघलाने में कोई दिक्कत नही हुआ करती थी।

☝️अब बताइये कि कौन से पांडव से कौरव या दुर्योधन सबसे ज्यादा चिढ़ते
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#काँग्रेस_के_कुकर्म Vs #इतिहास_ही_हमारी_धरोहर_है
मुंशी प्रेमचंद की कहानी"जिहाद"सामने लाती है"हिंदुओं का दर्द"
इस कहानी में मुंशीजी ने बहुत कम शब्दों में ही बहुत कुछ बता दिया है।
बहुत पुरानी बात है।हिंदुओं का एक काफ़िला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रदेश

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से भागा चला आ रहा था। मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले
की व्यवस्था अलग थी।आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था।जान का बदला जान था, खून का बदला खून; इस नियम में कोई अपवाद न था।यही उनका धर्म था,यही ईमान; मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे।
पर एक महीने से देश की हालत बदल गयी है।
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