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सभी को इतवार को आना है ओर सॉफ़्ट कॉपी के साथ,ताकि रेक्वायअर्मेंट्स एक साथ कम्पाइल हो सके ओर हम सब कमेटी/ @MygovU की मदद कर पाए जिससे हमारे प्रदेश के लिए
शख़्त क़ानून बने
#उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून
#Thread
twitter.com/i/spaces/1DXxy…
जब तक नया क़ानून नहि बनता तुरंत प्रभाव से पहाड़ी ज़िलों की कृषि योग्य ज़मीन की बिक्री,ख़रीद, रेजिस्ट्री पूर्ण तरीक़े से बंद हो.
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#उत्तराखंड_मागें_भू_कानून
कमेटी टाइम बाउंड (30-40 दिन ) हो
जिसने सभी पहलू
पहाड़ियों की संस्कृति
पर्यावरण
कितना पैसा खर्चा होगा
अड्मिनिस्ट्रेशन कैसे करेगा
कितना टाइम लगेगा
++
#उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून
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#Thread
#1
9 नवंबर 2000 में उत्तराखंड राज्य उत्तर प्रदेश से अलग हुआ। इसी के साथ ही उत्तराखंड की भूमि का सस्ते दामों पर खरीद का खेल सुरु हो गया था। नवीन राज्य बनने के बाद सरकारों ने सस्ते दामों पर जमीनें उद्योगपतियों और अन्य संस्थाओं को बेच दी।
#उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून
#2
(1.)नित्यानंद स्वामी सरकार पर आरोप लगे कीमती जमीन की बंदरबांट के। जिसका काफी विरोध भी हुआ। उत्तराखंड में भूमि खरीद-फरोख्त कारोबार बन गया।
#उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून
#3
(2.)पहली बार 2002 में एन डी तिवारी सरकार ने बाहरी व्यक्तियों के लिए जमीन खरीद की सीमा तय की। और उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम में यह प्रावधान किया कि बाहरी व्यक्ति राज्य में 500 वर्ग मीटर से अधिक भूमि नहीं खरीद सकेगा।
#उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून
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(1) यह थ्रेड उन सभी मित्रों के लिये जो भू_कानून को सरल शब्दों में समझना चाहते हैं। कुछ मित्र #उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून के उद्देश्यों और लाभ के बारे में भी सवाल कर रहे थे। उत्तराखंड की स्थापना नौ नवंबर 2000 को की गयी थी …क्रमश:
#उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून
(2) वर्ष 2002 में प्रावधान किया गया था कि उत्तराखंड में बाहरी व्यक्ति 500 मीटर जमीन ही खरीद सकता था। इस सीमा को वर्ष 2007 में घटाकर 250 मीटर कर दिया गया। सरल शब्दों में कहें तो तब कोई बाहर का व्यक्ति यहां की कृषि योग्य भूमि नहीं खरीद सकता था ...क्रमश:
#उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून
(3) यहां तक तो बात ठीक थी लेकिन 6 अक्टूबर 2018 को #भू_कानून में संशोधन कर दिया। नया कानून इस तरह से बनाया गया कि उत्तराखंड में बाहरी व्यक्ति जितनी चाहे उतनी जमीन खरीद सके। इसे लागू भी कर दिया गया। यह सब उद्योगों को बढ़ावा देने के नाम पर किया गया। क्रमश:
#उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून
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हिमालयी राज्य उत्तराखंड में भूमि (संशोधन) दबकर रह गया। यह मसला सत्तारूढ़ बीजेपी के खिलाफ विपक्षी कांग्रेस के लिए बेहद काम का हो सकता था,लेकिन कांग्रेस ने अपने पूरे कैंपेन में इसका जिक्र तक नहीं किया। कारण है बारी-बारी सत्ता संभालने की चाहत और साझा हित।
#उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून
6 दिसंबर 2018 को जब विधानसभा के शीतकालीन सत्र में सरकार ने यह संशोधन विधेयक पेश किया तो कांग्रेस ने ‘मित्र विपक्ष’ की भूमिका निभाते हुए इसे आराम से पास होने दिया।
नए संशोधन के जरिए राज्य सरकार ने अब तक चले आ रहे कानून में++
#उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून
धारा 143-क और धारा-154 (2) जोड़ते हुए पहाड़ों में भूमि खरीद की अधिकतम सीमा खत्म कर दी
राज्य में कृषि योग्य जमीन खरीदने की अधिकतम सीमा 12.5 एकड़ थी और इसे वही व्यक्ति खरीद सकता था जो सितंबर, 2003 से पहले तक यहां जमीन का खातेदार रहा हो।
#उत्तराखंड_मांगे_भू_कानून
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