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#धर्म_चर्चा
नेटवर्क खराब हो गया है आज इसलिए पता नहीं कि उत्तर अपलोड हो सकेगा कि नहीं। इसलिए संक्षिप्त उत्तर दे रहा हूं।
यह प्रश्न सबको मथता है कि आखिर शिव पार्वती ने अपने
विवाह में अपने पुत्र की अग्रपूजा कैसे कर लिया। यही प्रश्न मेरे गांव देश के लोग भी पूछते
रहते हैं। यद्यपि मैं कोई शास्त्री आचार्य या बड़ा विद्वान हूं और न ही मैं कोई गुरू पुरोहित हूं। साधारण सा अध्यापक ही रहा। फिर भी अध्यात्म की ओर रुचि रही और
थोड़ा बहुत जानता हूं। उत्तर देखिए
सबसे पहले तो यह भ्रम ही दूर कर लीजिए कि शिवजी ने किसी गणेश की पूजा किया
था। रामायण में तुलसी दास जी ने
गनपतिहि शब्द का प्रयोग किया है न कि गणेश का। यह गणपति एक
वैदिक देवता हैं। यहां तक कि शिवजी से भी प्राचीन। ऋग्वेद में
रुद्र शब्द आया है न कि शिवजी का पर गणपति या ब्रह्मणपति के नाम की कई ऋचाएं मिलती हैं।बाद के
पौराणिक या कहें कि
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#धर्म_चर्चा
लगता है कि इस प्रश्न से लोग ऊब गए हैं। और हों भी क्यों नहीं? एक बार इस पर चर्चा हो चुकी है। यह तो कुछ लोग सौजन्यता वश संकोच के साथ शामिल हो रहे हैं पर मैं भी क्या करता। एक मित्र का आग्रह कि गणेशोत्सव पर गणेश जी की चर्चा होनी चाहिए ठुकरा न सका।
खैर
कोई बात नहीं है।जो भी आये सबका स्वागत है। यहां गणेश जी की पत्नियों ही नहीं सब पर प्रश्न था। गणेश जी के वृहत्तर परिवार में मां पार्वती पिता महादेव भाई कार्तिकेय आदि सभी से मतलब था। मूल प्रश्न का सबसे अच्छा और विस्तृत उत्तर भाई @Sunnyharsh44 ने दे दिया है और वही
मेरा भी उत्तर है। यह परिवार महान क्यों कहा जाता है इसे जानिए। यह
परिवार बहुत ही समन्वयवादी था। अब यही देखिए कि कितनी विसंगतियां हैं। कार्तिकेय जी का वाहन मयूर शिवजी के नाग का शत्रु है।नाग गणेश जी के वाहन चूहे का शत्रु है।आग का पानी से बैर है पर यहां तो दोनों
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#धर्म_चर्चा
आज का प्रश्न बस औपचारिक भर था क्योंकि इस पर चर्चा हो चुकी है और कुछ जिज्ञासु पाठकों ने लिख कर रख भी लिया होगा। फिर भी आप लोगों ने जिस उत्साह से भाग लिया वह प्रसंशनीय है।
@Sunnyharsh44
@ShashibalaRai6
@BhagwaSherni05
@ajayamar7 आदि ने विस्तार से
बता ही दिया है पर बिना मेरे उत्तर दिए आप संतुष्ट नहीं होंगे।मेरा उत्तर सुनने के पहले हम हिंदुओं के
पारिवारिक ढांचे पर ध्यान देना होगा। एक अघोषित नियम है कि बड़े कार्य के लिए परिवार के बड़े बेटे को बड़ा त्याग करना पड़ता है।
आपने बालीवुड की बलराज साहनी और नासिर
अभिनीत फिल्मों में बड़े भाई का
त्याग बलिदान अवश्य देखा होगा।
यहां भी कुछ वैसा ही हुआ है।
सतयुग के अंत तक उत्तर और दक्षिण भारत में एक अदृश्य दीवार
खिंची हुई थी। उत्तर के लोग उत्तर में और दक्षिण के लोग दक्षिण में
मगन रहते थे। परिणाम स्वरूप दक्षिणी भारत सभ्यता
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#धर्म_चर्चा
कल तो इस पूरे प्रश्न पत्र कोई
@BhagwaSherni05 ने लीक कर दिया था इसलिए मैंने सोचा कि आज कोई उत्तर देने आएगा। सभी यह कह देंगे कि कल ही नीलम ने इसका उत्तर दे दिया है पर नहीं आज तो कल से भी अधिक लोगों ने उत्तर दिया। आप सभी लोगों को धन्यवाद है। आज का
सबसे अच्छा और सबसे विस्तृत उत्तर @ajayamar7 ने दिया है।
इन्हीं का उत्तर पढ़ लीजिए और समझ लीजिए कि मेरा ही उत्तर है।
अच्छा प्रयास @gargee99887
ने भी किया है। बहन शशिबाला राय जिसके उत्तर की प्रसंशा कर दें उसे अपने को धन्य मानना चाहिए। यदि मैंने कुछ गलत कहा है तो
पूरी निर्ममता से मेरी भर्त्सना कर सकते हैं।इसका अधिकार आपको प्राप्त है।जैसा उत्तर मेरे विज्ञ पाठकों ने दिया है उसे दोहराकर सूर्य को दीपक दिखाना नहीं चाहता। हां आपके उत्तरों से प्रश्न पूछने का साहस अवश्य बढ़ गया है। अपनी ओर से कुछ न कहने भी संचालक के दायित्व से
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#धर्म_चर्चा
बहुत सरल सा सवाल था और आप सबको मालूम भी था इसलिए सबने सही-सही उत्तर दिया। वास्तव में इस प्रश्न का उद्देश्य श्रीकृष्ण की छोटी-छोटी बाल लीलाओं के विषय में याद दिलाना भर था और मैं इसमें सफल रहा। पूतना के बाद कंस ने तृणावर्त को ही भेजा था जो आंधी का रूप
धरकर श्रीकृष्ण को उड़ाकर ऊपर ले गया था। इसका इरादा ऊपर से गिराकर मार देने का था पर उसे मालूम नहीं था कि कृष्ण योगिराज परब्रह्म परमात्मा हैं। वह केवल नर लीला कर रहे हैं। अपनी गुरुणा
योग शक्ति से उन्होंने अपने शरीर को इतना भारी कर लिया कि उनके
शरीर से दबकर
तृणावर्त का अंत हो गया। वास्तव में जिन आठ राक्षसों को कृष्ण ने मारा वे सब पूर्व जन्म में राक्षस थे जो राम के हाथों मरने से बच गए थे।
उसी समय उन्होंने कहा था कि तुम लोगों का प्रायश्चित अभी पूरा नहीं हुआ है। इसलिए अगले जन्म में मैं तुम लोगों को अपने हाथों मारकर
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#धर्म_चर्चा
मित्रों आज का प्रश्न बहुत रोचक रहा इसलिए बहुत से लोग उत्तर देते हुए इस चर्चा में शामिल हुए। सबसे पहले तो मैं अपने नए प्रतिभागियों को धन्यवाद देता हूं जो आज आये। इस प्रश्न को पूछने का एक विशेष उद्देश्य रहा। परसों @Manojkumar18877 ने एक बहुत अच्छा
लेख लिखा था इस ८ अंक के संयोग और महत्व पर। शायद मुझे लगा कि आप लोगों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। इसीलिए प्रश्न करते समय ही मैंने मनोज को इंगित कर दिया था कि वह एक बार फिर यह अति महत्वपूर्ण जानकारी आपको दे सकें। आप लोगों ने बहुत अच्छा उत्तर दिया।बेटी नीलम ने इतना
विस्तार से बता दिया कि मुझे कुछ और कहने के शेष ही नहीं रहा। कोई और मित्र नाराज न हो मैं सबका नाम नहीं लिख पा रहा हूं।
भोजन में अगर चटनी न हो तो भोजन में आनंद नहीं आता। तो भाई रघुवीर जी भाई अरुणेश जी
टोंकाटोंकी करके उसी चटनी जैसा आनंद देते हैं। मैं मनोज कुमार
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#धर्म_चर्चा
आज का प्रश्न जैसा कि मैंने कहा था छोटा सा था पर उत्तर विस्तार से आप लोगों ने दिया।इसके लिए बधाई है। कृष्ण चरित की महिमा या कुछ और कि आज बहुत से मित्रों ने उत्तर दिया। इसीलिए आज समय पूर्व उत्तर दे रहा हूं ताकि आपकी प्रतिक्रियाएं मिल सकें। अभी दो
कृष्ण भक्तिनों @gargee99887
@ShashibalaRai6
का उत्तर नहीं मिला है इसलिए प्रतीक्षा कर रहा था। तो जैसा कि आप सबने बताया है कि वसुदेव और नंद बाबा दोनों आपस में चचेरे भाई थे। शूरसेन और पर्जन्य सगे भाई थे। इनके पिता का नाम देवमणि था। पर्जन्य आरंभ से महावन में रहते
थे और गौपालन इनका मुख्य व्यवसाय था शूरसेन पहले मथुरा में ही रहते थे और बाद में बटेश्वर में उन्होंने अपना एक स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया था पर कभी-कभी मथुरा के अंधक वंशी राजा के मंत्री का कार्य भी करते थे। शूरसेन के वसुदेव जी और पर्जन्य के पुत्र नंद बाबा थे।
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#धर्म_चर्चा
लगता है कि कृष्ण चर्चा में आप लोगों की रुचि नहीं है इसलिए बहुत कम लोग उत्तर देने आए पर कोई बात नहीं। अगर एक भी उत्तरदाता रहेगा तब तक यह चर्चा चलती रहेगी। आज इस प्रश्न का उत्तर कई लोगों ने बताया जैसे
@Sunnyharsh44
@ShashibalaRai6
@BhagwaSherni05
@Arunesh24797107 ने। पर सबसे अच्छा उत्तर बहन शशिबाला और सनी तथा भाई अरुणेश ने दिया।भाई अरुणेश ने तो बड़े
परिश्रम से लिखा है। यह विषय बहुत विशद है और इसका कोई एक दो कारण नहीं है।सनी ने दो कारण बताया है और शशिबाला राय ने आध्यात्मिक समीक्षा कर दिया। बेटी नीलम ने
उत्तर तो दिया पर विषयांतर कर दिया।इसका सबसे बड़ा कारण तो उन्होंने स्वयं ही गीता में बताया है।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारते अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं
सृजाम्यहं।परित्राणाय साधुनाम्
विनाशाय च दुषकृताम्
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।
पर इसके और
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#धर्म_चर्चा
बंधुओं क्षमा करना आज मेरे यहां रुद्राभिषेक और भोज का आयोजन किया गया है अतः मैं उत्तर नहीं दे पा रहा हूं। कुछ पल का समय निकालकर आप सबका उत्तर पढ़ा। बहुत अच्छा उत्तर दिया है आप सभी ने। मैं आप सबका बहुत आभारी हूं। अच्छा लगा कि आज बहुत से नये पुराने
मित्र चर्चा में भाग लेने आए। वैसे तो इसके विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं पर सबका मूल स्रोत
देवगुरु बृहस्पति द्वारा बनाया गया
रक्षा सूत्र है जो उन्होंने इंद्राणी शची को दिया था देवराज इन्द्र की कलाई पर बांधने के लिए जब वह वृत्रासुर
से युद्ध करने जा रहे थे।बाद
में अनेक कथाएं प्रचलित हुईं।आज मैंने थोड़ा सा समय निकाल कर
हुमायूं और कर्मावती के झूठे प्रसंग की बखिया उधेड़ते हुए एक लेख लिखा है। अनुरोध है कि आप लोग उसे पढ़कर अपनी-अपनी राय दें।
उस पर बहुत से कमेंट आ रहे हैं ‌
अंत में सभी लोगों को धन्यवाद जिन्होंने इस चर्चा
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#धर्म_चर्चा
यद्यपि आज के प्रश्न का भाई
@Sunnyharsh44 और बिटिया
@BhagwaSherni05
ने विस्तृत रूप से दे दिया है इसलिए डिटेल में लिखना जरूरी नहीं है।
आप केवल यह जान लीजिए कि
कुछ शिवलिंग स्वयंभू हैं अर्थात जिनकी स्थापना किसी व्यक्ति ने किया है और यह अपने आप प्रकट
हुए हैं उनमें से एक यह भी है। इसे
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग क्यों कहते हैं यह जानिए। ऊं शब्द ही परब्रम्ह है।
संगीत में इसे ही नाद ब्रह्म कहते हैं।
संसार की उत्पत्ति इसी ऊं शब्द से हुई है जिसे पाश्चात्य विद्वान बिग
बैंग थ्योरी कहते हैं। यह ज्योतिर्लिंग उन
ज्योतिर्लिंगों में से एक है जो केदारनाथ से रामेश्वरम तक सीधी रेखा में पड़ता है। यों कहें कि यह भारत के मध्य में स्थित है।इसकी एक विशेषता बताना चाहता हूं कि यह ज्योतिर्लिंग दो भागों में विभाजित है। ओंकारेश्वर और
ममलेश्वर। एक पवित्र नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर
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#धर्म_चर्चा
आज के प्रश्न का विस्तृत उत्तर
यद्यपि मित्रों
@Sunnyharsh44
@ShashibalaRai6
@annapurnaupadhy
@BhagwaSherni05
आदि ने दे दिया है। फिर भी कुछ मुझे कहना पड़ता है क्योंकि बिना मेरे उत्तर के आपको संतुष्टि नहीं मिलती है। यह बारहवां ज्योतिर्लिंग जिसे
घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग या घृष्णेश्वर
ज्योतिर्लिंग कहते हैं महाराष्ट्र के और में देवगिरी के पास वेरुल गांव में स्थित है। यह शिवलिंग ब्राह्मण सुधर्मा की पत्नी घुष्मा के पुत्र को पुनर्जीवित करने के लिए स्वयं प्रकट हुआ था जिसे उसकी विमाता सुमेधा ने मारकर निकट के
तालाब में फेंक दिया था।यह शिवलिंग बहुत पुराना है और मैं यहां दर्शन के लिए गया था।इसका
सर्वप्रथम जीर्णोद्धार शिवाजी के दादा मालोजीराव भोंसले ने कराया था। पुनः इसे तोड़ने का प्रयास औरंगजेब ने किया पर आंशिक रूप से ही सफल हो सका। अंत में इंदौर की धर्मपरायण महारानी
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#धर्म_चर्चा
आज का प्रश्न बहुत छोटा सा था और इसका बहुत लंबा-चौड़ा उत्तर न है और न देने का उद्देश्य है। केवल शिवलिंग के प्रसाद की कुछ भ्रांतियां दूर करना ही था। यद्यपि
@Sunnyharsh44
@BhagwaSherni05
आदि ने समझाने का प्रयास किया और अच्छी तरह बताया। अब जानिए इसके
कुछ मुख्य कारण
१- शिव जी के एक गण चंडेश्वर जो भूत प्रेतों का नियंत्रण कर्ता है इस पर उनका अधिकार होता है इसलिए नहीं खाया जाता।
२- शिवलिंग परमाणु ऊर्जा का अजस्र स्रोत भी होते हैं और इसलिए कुछ शिवलिंग पर चढ़ाए गए प्रसाद नहीं खाए जाते जाते कि शिवालयों की निर्माणी
नहीं लांघते कुछ वैसा ही।
अब मेरा मत सुनिए सभी शिवलिंगों का प्रसाद वर्जित नहीं है। कुछ का प्रसाद खाया जाता है।
शिवलिंग मुख्यत:दो प्रकार के होते हैं।
१- तांत्रेश्वर। इसमें शिवलिंग और अरघा आपस में मिले होते हैं अर्थात
लिंग भाग को अरघे से अलग नहीं किया जा सकता।इस
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#धर्म_चर्चा
अच्छा लगा कि आज बहुत से उत्तर देने वाले आए और इनमें से
@Sunnyharsh44
@annapurnaupadhy
@BhagwaSherni05
@Sam_Mahakaal
@Manojkumar18877
ने बहुत सुंदर और विस्तृत उत्तर दिया है इतना कि मुझे कुछ लिखने की जरूरत नहीं है। आज केवल इतना ही कि मैं अगले
कुछ दिनों तक शिवजी की पूजा विधि पर प्रश्न करता रहूंगा क्योंकि आप लोग जिस तरह पूजा करते हैं उसके बारे में जानकारी प्राप्त करें।
आज उत्तर के नाते केवल इतना ही कि शिवजी पर जो जल दूध गन्ने का रस नारियल पानी चढ़ाया जाता है वह रेडियो एक्टिव हो जाता है और निर्माणी म
में बहता रहता है।यह पानी रेडियो एक्टिव होने के कारण जब आप इसे लांघते हैं तो इसका प्रभाव आपके शरीर पर न पड़े। शिवलिंग
ऊर्जा का अजस्र स्रोत होता है। संसार के सारे परमाणु विद्युत गृह
शिव लिंग के आकार के होते हैं।
बिग बैंग थ्योरी को जानने के लिए
स्विट्जरलैंड में
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#धर्म_चर्चा
जैसा कि मैं आशा करता था वही हुआ भी। आप सब की रुचि वेदों को जानने की नहीं है।दोष भी किसी का नहीं है क्योंकि वेद अगम हैं और इतने गूढ़ रहस्यों से भरे हुए हैं कि सभी लोग जान भी नहीं सकते। मैं स्वयं भी भी बहुत कुछ नहीं जानता पर प्रयास किया कि आप लोग खोज
कर कुछ उत्तर दें पर बहुत कम लोग उत्तर देने आए। आभारी हूं बहन शशिबाला राय का जिसने कुछ प्रयास कर के थोड़ा बहुत बताने का प्रयास किया। इसीलिए तो मैंने तीसरे वेद सामवेद पर प्रश्न न करके सीधे अंतिम अथर्ववेद की चर्चा करते हुए इस श्रृंखला का समापन करना चाहा। खैर सुनिए
इसे अथर्ववेद इसलाम कहते हैं क्योंकि इसकी रचना ऋषि अथर्व ने किया था। इनके पुत्र दधीचि और पौत्र पिप्पलाद की कथा बता चुका हूं।इस वेद की दो शाखाएं हैं एक को ऋषि शौनक ने लिखा है और दूसरी को दधीचि पुत्र पिप्पलाद ने।
जैसा कि आप सब जानते है कि ऋषि अंगिरा ने सभी वेदों
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#धर्म_चर्चा
आज के प्रश्न का उत्तर यद्यपि मित्रों
@Sunnyharsh44
@Sam_Mahakaal
@annapurnaupadhy
@Viveksagarbjp
@BhagwaSherni05
आदि ने विस्तृत रूप से दे दिया है फिर भी संचालक होने के कारण मुझे भी कुछ कहना उचित है। ऋग्वेद के विषय आप लोग काफी कुछ पढ़ चुके हैं
और उस ज्ञान से लाभान्वित होते रहें।खुशी है कि मैंने यह कार्यक्रम
स्वांतसुखाय शुरू किया था और तब तक मुझे ऐसी आशा नहीं थी कि आप लोग इतना अच्छा रिस्पॉन्स देंगे। अब तो यह चर्चा एक वटवृक्ष का रूप धारण कर चुकी है और माधवी शशिबाला राय जैसी विदुषी बहन बेटियां संचालक
का दायित्व भी संभालने लायक हो गई हैं और कभी-कभी करती भी हैं। ऋग्वेद सनातन धर्म की आत्मा है। हमारे वेद ही सौभाग्यवश शुद्ध रूप में बचे हुए हैं।शेष सब में थोड़ी बहुत मिलावट हो गई है। जैसे कि सभी १८ पुराण किसी विषय पर एकमत नहीं हैं। एक दूसरे को काटते हैं। इसका कारण
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#धर्म_चर्चा
समय है इस चर्चा का उत्तर देने का।
मित्रों एक मांगलिक कार्य में भाग लेने के लिए मैं पिछले कई दिनों से व्यस्त था इसलिए मैंने अपना कोई उत्तर नहीं दिया और न ही आज भी कोई उत्तर दे रहा हूं। भविष्य में जब भी कोई प्रश्न पौराणिक कथाओं का होगा तो मैं विस्तृत
उत्तर दूंगा। वास्तव में यह जो प्रसंग चल रहा है उसे कहते हैं अपने धर्म ग्रंथों को जानिए और यह चर्चा न हो कर परिचर्चा में बदल गई है। इसमें आप सभी लोग उत्साह से भाग ले रहे हैं और अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार उत्तर प्रत्युत्तर दे रहे हैं और यही मेरा उद्देश्य भी रहा।
योग के विषय में वैसे तो सभी प्रतिभागियों ने अच्छा उत्तर दिया है।न कोई कम है और न ही अधिक। मैं किसी को निराश नहीं कर रहा हूं।
@annapurnaupadhy
@Arunesh24797107
@BhagwaSherni05
@madhvi555
@Sunnyharsh44
इन सभी प्रतिभागियों ने काफी विस्तृत विवरण प्रमाण सहित
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#धर्म_चर्चा
क्षमा करें मित्रों इन ६ शास्त्रों के विषय में प्रश्न का उत्तर देने का विचार इसलिए नहीं है कि मैं अपने विद्वान मित्रों को केवल प्रेरित करना चाहता था और इस कार्य में सफल रहा।रही आज के प्रश्न की बात तो इसका विस्तृत उत्तर मेरे मित्रों
@Sam_Mahakaal
@annapurnaupadhy
@gargee99887
@BhagwaSherni05
@Sunnyharsh44
ने बहुत विस्तृत और विश्लेषणात्मक अध्ययन के साथ
सम्यक रूप से उत्तर दिया है।आप सब इस उत्तर से लाभान्वित हों।
मेरा संक्षिप्त उत्तर यह है कि इस
शास्त्र के प्रणेता ऋषि उलूक के महर्षि कणाद थे। हमारी
अज्ञानता का प्रतिफल है कि जान डाल्टन को परमाणु का आविष्कार्ता मानते हैं। वास्तव में परमाणु का आविष्कार्ता कणाद ही थे और इन्होंने ही कनाडा को बसाया था। कहते हैं कि इनकी प्रयोगशाला कनाडा में ही कहीं थी। एक रोचक तथ्य यह भी कि भारत को प्रथम परमाणु भट्ठी अप्सरा
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#धर्म_चर्चा
आज के प्रश्न का विस्तृत उत्तर
@madhvi555
@Sam_Mahakaal
@Kanubha21169684
@doharerajkumar
आदि लोगों ने सही-सही दे दिया है। इसलिए मुझे बहुत कुछ कहने के लिए बाकी नहीं बचा है। और अन्य सभी मित्रों ने भी सम्यक उत्तर दिया है। यह ऋषि ऋचीक के साले गाधि
के पुत्र थे।यह गायत्री मंत्र के रचयिता थे। इनका जन्म एक वरदान स्वरूप हुआ था। ऋषि ऋचीक द्वारा बनाए गए हव्य के
बदल जाने के कारण क्षत्रिय को
ब्रह्मर्षि बने और इनके भांजे
(बहन सत्यवती के पुत्र) परशुरामजी ब्राह्मण होकर भी क्षत्रियोचित कर्म करने लगे। अब आते हैं
रामकथा के विस्तार में योगदान देने के विषय में तो राम को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम बनाने में इनका सबसे ज्यादा योगदान रहा।
उस की परिस्थितियां इस प्रकार थीं कि अयोध्या दक्षिण कोसल (दशरथ की ससुराल) और कैकय नरेश को छोड़कर सारा जंबू द्वीप रावण के प्रभाव में आ
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#धर्म_चर्चा
आज का प्रश्न बहुत सरल था इसलिए सबने सही उत्तर दिया है और मैं आपसे पूर्णतः सहमत हूं
कि भगवान जिसे बताना चाहता है
वही जान पाता है और जो सचमुच भगवान को जान जाता भगवान को प्राप्त कर लेता है। यही आत्मा और परमात्मा का संबंध है। इसे प्रकृति और पुरुष का
संबंध भी कह सकते हैं।इसी बात पर मुझे वृंदावन के एक महात्मा की बात याद आ रही है। पता नहीं आप
लोग क्या सोचेंगे? मैंने किंचित दंभ
पूर्वक कह दिया कि महाराज मैं हर साल बांकेबिहारीजी और किशोरों जी के दर्शन करने के लिए आता हूं।
वृद्ध महात्मा जी ने कहा कि बेटा यह यह
तुम्हारा भ्रम है। इसे जितना शीघ्र हो सके दूर कर लो। तुम आए नहीं हो बल्कि बांकेबिहारीजी ने तुम्हें बुलाया है। संसार में तो करोड़ों हिंदू हैं और भक्त भी हैं पर सब क्यों नहीं आते? तुममें उन्होंने कुछ विशेष देखा होगा तभी बुलाया है और तुम सारा काम छोड़कर दौड़े चले
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#धर्म_चर्चा
आज का प्रश्न बहुत विशद था और इसका उत्तर लिखने में बहुत समय लग सकता है। विषय तो बहुत आसान है इसलिए सभी प्रतिभागियों ने सही-सही उत्तर दिया है पर मुझे तो सबसे अच्छा उत्तर
@p_realhindu का लगा। एक ही वाक्य में समेट दिया कि अगस्त्य जी अवर्णनीय हैं। आइए
जानते हैं कि ऋषि अगस्त्य कौन थे? मैंने भी आज गूगल सर्च किया था पर उससे संतुष्ट नहीं हुआ।इस विषय पर पुराणों में मतभेद है। कुछ कहते हैं कि ऋषि पुलस्त्य और अप्सरा उर्वशी के पुत्र थे पर यह मुझे ठीक नहीं लगा। इस विषय में मेरे कुछ "अतिज्ञानी" मित्र असहमत हो सकते हैं
वास्तव में यह एक वैदिक ऋषि थे और इनके जन्म की कथा स्वयं ऋग्वेद में वर्णित है जिसके अनुसार यह मित्रा-वरुण और उर्वशी के पुत्र थे। यह वशिष्ठ जी के भाई थे। इनका जन्म कुंभ (घड़े) से हुआ था
इसलिए कुंभज भी कहते हैं। वैसे तो कई लोग इनका जन्म स्थान कई जगह बताते हैं पर
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#धर्म_चर्चा
आज के प्रश्न का उत्तर
आप सब ने सही-सही उत्तर दिया है। अब मेरा उत्तर सुनिए। यह सही है कि कैकेई ने अपने दो वरदानों में से एक मे अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी और दूसरे से राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा था।
आइए जानते हैं कैकेई के चरित्र के बारे
में। कैकेई एक वीर महिला ही नहीं एक सुशिक्षित संस्कारवान महिला भी थी।उनके बारे में सारे तथ्य जानने के बाद आपकी धारणा बदल जाएगी।राजा दशरथ के दो विवाह अपने समतुल्य राजाओं
दक्षिण कोसल नरेश न भानुमान और काशीराज की कन्याओं से हुआ था। दोनों से संतान न होने से निराश
दशरथ ने एक अपेक्षाकृत छोटे राज्य कैकय की राजकुमारी कैकेई से किया था। शर्त के अनुसार कैकेई के पुत्र को ही अयोध्या साम्राज्य का उत्तराधिकारी होना था। प्रारंभ में कैकेई एक स्वार्थी महिला दिखाई पड़ती है और हो भी क्यों न। आमतौर पर यह देखा जाता है कि रूपगर्विता
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#धर्म_चर्चा
आज के प्रश्न का उत्तर आप सबने ठीक-ठीक दिया है जैसा कि आपने रामानंद सागर के सीरियल में देखा था और रामायण में पढ़ा था। यह सुग्रीव के महामंत्री और बाद में रामादल के प्रमुख सलाहकार बने। यह या तो दीर्घजीवी थे या सतयुग त्रेतायुग और द्वापर में अवतार लेते
रहे। अगर अलग-अलग युगों में अवतार लिया था तो इनको स्म्रितिलोप नहीं हुआ होगा। जैसा कि समुद्र तट पर कहते हैं कि मैं अब बूढ़ा हो गया हूं। अपनी जवानी में जब भगवान विष्णु वामन अवतार में बलि से दान में लेकर तीनों लोकों को नाप रहे थे तब मैंने उनसे पहले ही पृथ्वी की
सात बार परिक्रमा कर लिया था। इसीलिए रावण ने अंगद से कहा था कि तुम्हारे दल में मेरे समान कोई योद्धा नहीं है। तुम्हारा स्वामी पत्नी वियोग में दुःखी है और उसका भाई उसके दुःख से दुःखी है। मतलब यह है कि रावण भी राम लक्ष्मण को वीर मानता था पर अपने अहंकार के कारण
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#धर्म_चर्चा
आज के प्रश्न का उत्तर- जैसा कि आप सब जानते हैं कि मेरे प्रश्न इतने सरल नहीं होते। कुछ तो आप सब जानते हैं और कुछ मैं बताता हूं। यहां आप लोगों ने सही-सही उत्तर दिया है। इसके लिए धन्यवाद है। आइए जानते हैं कि कबंध कौन था तो यह एक श्री अप्सरा का और
गंधर्व जाति का था जिसका मूल नाम दनु था। अपने अत्याचारी आचरण के कारण स्थूलशिरा ऋषि ने शाप दे कर इसे राक्षस बना दिया था। पहले यह घूम-घूम कर लोगों को खाता रहता था। इंद्र ने वज्र मारकर इसका सिर काट दिया था पर फिर भी यह मरा नहीं पर एक जगह स्थिर हो गया। अपने हाथों
को बढ़ाकर यह अपने शिकार जिसमें मनोरंजन और जानवर सब थे खा जाता था।पर बात इतनी सीधी भी नहीं थी। वास्तव में अति गुरुत्वशाली एक एलियन था।इसकी एक विशेषता यह थी कि यह एक योजन (लगभग १२किलोमीटर) दूर से लोगों को अपने गुरुत्वाकर्षण के बल पर खींच कर अपने में समाहित कर
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#धर्म_चर्चा
आज का प्रश्न जैसा कि आप सब को ज्ञात होगा कि किसी रामायण में वर्णित नहीं है पर लोकमानस में इस तरह रची बसी हुई है कि इसे रामकथा का एक भाग मान लिया गया है। आप सबने सही उत्तर दिया है क्योंकि यह कथा दादी-नानी की कहानियों के माध्यम से बहुप्रचलित है।
मेघनाद की मृत्यु के बाद जब उसका कटा हुआ सिर राम के सामने रखा गया तो उसी समय ससुर रावण की आज्ञा लेकर सती सुलोचना सिर लेने आई थी और बताया कि उनकी कटी हुई भुजा ने लिखकर बताया था कि उसे किसने मारा था।इस बात पर सुग्रीव को शंका हुई कि ऐसा कैसे हो सकता है। अतः
उन्होंने एक शर्त रख दिया कि अगर यह कटा हुआ सिर हंस दे तो विश्वास हो जाएगा। सुलोचना ने हंसाने का बहुत प्रयास किया पर सिर नहीं हंसा। खीजकर सुलोचना ने कहा कि अगर मैं जानती कि आपकी मृत्यु ऐसे होगी तो मैं अपने पिता शेषनाग को युद्ध के लिए बुला लेती।इसी बात पर सिर
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