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बुद्धि और आत्मा - ये दोनों ही सूक्ष्म तत्त्व हैं तथापि इनमें बड़ा भारी अन्तर है । तुम इस अन्तरपर दृष्टिपात करो । इनमें #बुद्धि तो गुणोंकी सृष्टि करती है और #आत्मा गुणोंकी सृष्टिसे अलग रहता है।
जैसे गूलरका फल और उसके भीतर रहनेवाले कीड़े एक साथ रहते हुए भी एक - दूसरेसे अलग हैं , उसी प्रकार #बुद्धि और #आत्मा दोनोंका एक साथ रहना
और भिन्न - भिन्न होना समझना चाहिये।

#शान्तिपर्व
ये दोनों स्वभावसे ही अलग - अलग हैं तो भी सदा एक - दूसरेसे मिले रहते हैं । ठीक वैसे ही , जैसे मछली और जल एक - दूसरेसे पृथक् होकर भी परस्पर संयुक्त रहते हैं । यही स्थिति बुद्धि और आत्माकी भी है।
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वृक्षोंमें पाञ्चभौतिकता की सिद्धि -

भगुजीने कहा - मुने । यद्यपि #वृक्ष ठोस जान
पड़ते हैं तो भी उनमें #आकाश हैं , इसमें संशय नहीं है ।
इसीसे उनमें नित्यप्रति फल - फूल आदिकी उत्पत्ति
सम्भव हो सकती है।
वृक्षोंके भीतर जो #ऊष्मा या गर्मी है , उसीसे उनके
पत्ते , छाल , फल फूल , कुम्हलाते हैं , मुरझाकर झड़ जाते
; इससे उनमें #स्पर्श का होना भी सिद्ध होता है।
यह भी देखा जाता है कि वायु , अग्नि और
बिजलीकी कड़क आदि भीषण शब्द होनेपर वृक्षोंके
फल - फूल झड़कर गिर जाते हैं । #शब्द का ग्रहण तो
श्रवणेन्द्रियसे ही होता है ; इससे यह सिद्ध हुआ कि वृक्ष
भी सुनते हैं।
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राजा इन ३६ गुणोंसे सम्पन्न होनेकी चेष्टा करे -

१ - #धर्म का आचरण करे , किंतु कटुता न आने दे
२ - #आस्तिक रहते हुए दूसरों के साथ प्रेमका बर्ताव न छोड़े
३ - क्रूरताका आश्रय लिये बिना ही #अर्थ - संग्रह करे
४ - #मर्यादा का अतिक्रमण न करते हुए ही विषयोंको भोगे
सुखकी प्राप्ति करानेवाले छत्तीस गुणोंका वर्णन-

५ - दीनता न लाते हुए ही प्रिय #भाषण करे
६- #शूरवीर बने , किंतु बढ़ - बढ़कर बातें न बनावे
७- #दान दे , परंतु अपात्रको नहीं
८ - #साहसी हो , किंतु निष्ठुर न हो
९- #दुष्टों के साथ मेल न करे
१० - बन्धुओं के साथ लड़ाई - #झगड़ा न ठाने ।
११ - जो राजभक्त न हो , ऐसे #गुप्तचर से काम न ले
१२ - किसीको #कष्ट पहुँचाये बिना ही अपना कार्य करे
१३ - दुष्टोंसे अपना #अभीष्ट कार्य न कहे
१४ - अपने गुणोंका स्वयं ही वर्णन न करे
१५ - श्रेष्ठ पुरुषोंसे उनका #धन न छीने
१६ - नीच पुरुषोंका #आश्रय न ले
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आदि #सत्ययुग में जिस प्रकार #राजा और #राज्य की उत्पत्ति हुई वह सारा वृतांत सुनो -

पहले न कोई राज्य था ना राजा। न दंड था और न दंड देने वाला। समस्त प्रजा धर्म के द्वारा ही एक दूसरे की रक्षा करती थी।
...

- भीष्म

#शान्तिपर्व
सब मनुष्य धर्मके द्वारा परस्पर पालित
और पोषित होते थे। कुछ दिनोंके बाद सब लोग पारस्परिक संरक्षणके कार्यमें महान् कष्टका अनुभव करने लगे।फिर उन सबपर #मोह छा गया। जब सारे मनुष्य मोहके वशीभूत हो गये, तब कर्तव्याकर्तव्यके ज्ञानसे शून्य होनेके कारण उनके #धर्म का नाश हो गया।
कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान नष्ट हो जानेपर
मोहके वशीभूत हुए सब मनुष्य #लोभ के अधीन हो गये। फिर जो वस्तु उन्हें प्राप्त नहीं थी, उसे पानेका वे प्रयत्न करने लगे। इतनेहीमें वहाँ #काम नामक दूसरे दोषने उन्हें घेर लिया। कामके अधीन हुए उन मनुष्योंपर #क्रोध नामक शत्रुने आक्रमण किया।
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राजनीतिके छ : #गुण होते हैं - #सन्धि , #विग्रह , #यान , #आसन , #द्वैधीभाव और #समाश्रय । इन सबके गुण - दोषोंका अपनी बुद्धिद्वारा सदा निरीक्षण करे।

यदि शत्रुपर चढ़ाई की जाय और वह अपनेसे बलवान् सिद्ध हो तो उससे मेल कर लेना #सन्धि नामक गुण है ।

#शान्तिपर्व
#महाभारत
यदि दोनोंमें समान बल हो तो लड़ाई जारी रखना #विग्रह है ।

यदि शत्रु दुर्बल हो तो उस अवस्थामें उसके दुर्ग आदि पर जो आक्रमण किया जाता है , उसे #यान कहते हैं ।
यदि अपने ऊपर शत्रुकी ओरसे आक्रमण हो और शत्रुका पक्ष प्रबल जान पड़े तो उस समय अपनेको दुर्ग आदिमें छिपाये रखकर जो आत्मरक्षा की जाती है , वह #आसन कहलाता है।
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राजासे जीविका चलानेवाले #सेवक अधिक मुंहलगे हो जानेपर मालिकका अपमान कर बैठते हैं । वे अपनी मर्यादामें स्थिर नहीं रहते और स्वामीकी आज्ञाका उल्लंघन करने लगते हैं।

#शान्तिपर्व
वे जब किसी कार्यके लिये भेजे जाते हैं तो उसकी सिद्धिमें संदेह उत्पन्न कर देते हैं । राजाकी गोपनीय त्रुटियोंको भी सबके सामने ला देते हैं । जो वस्तु नहीं मांगनी चाहिये उसे भी मांग बैठते हैं , तथा राजाके लिये रक्खे हुए भोज्य पदार्थोंको स्वयं खा लेते हैं।

#शान्तिपर्व
राज्यके अधिपति भूपालको कोसते हैं , उनके प्रति क्रोधसे तमतमा उठते हैं ; घूस लेकर और धोखा देकर राजाके कार्योंमें विघ्न डालते हैं। वे जाली आज्ञापत्र जारी करके राजाके राज्यको जर्जर कर देते हैं । रनवासके रक्षकोंसे मिल जाते हैं अथवा उनके समान ही वेशभूषा धारण करके वहाँ घूमते फिरते हैं।
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