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#चतुर्भुज_का_चश्मा 【 CKC-1005】

संदर्भ :- मौलिक अधिकार बैंकर की दृष्टिकोण से ।

हमारे वर्तमान संविधान में छः मौलिक अधिकार हैं ।
आइये हम इन्हें एक बैंकर की वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से देखते हैं।

1. समानता का अधिकार - एक सा नियम, और एक ढंग से लागू , पर वेतन में CPC कहाँ है?
कर्मचारियों को उनके मेहनत के हिसाब से अन्य विभागों से बहुत ही कम वेतन मिलता है ।
काम के बोझ को अगर वेतन से जोड़ा जाए तो असमानता अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
#WeDemandCPC

2. स्वतंत्रता का अधिकार : बैंकर्स के स्वतंत्र तथा उन्मुक्त विचारो का सदैव हनन ही हुआ है , उनकी बुलंद आवाज़ को
रोकने के भरसक प्रयास, सरकार की निजीकरण की नीतियों में निहित है ।
मुख्यतः गोदी मीडिया द्वारा बैंकर्स की आवाज़ को तोड़ मरोड़ के प्रस्तुत किया जाता है । #StopPrivatizationOfBanks
#ShameOnMedia
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#StopPrivatizationOfBanks
निजीकरण क्या है?
ये एक अवधारणा है शक्ति के केंद्रीयकरण की।

सरकारी संस्थान और निजीसंस्थान दोनों के सोच में मूलभूत अंतर है जो आज के नए नए बने बुद्धिजीवियों को शायद पता नहीं है या वो जानबूझकर अंजान बने हुए है।
#StopPrivatizationOfBanks
किसी भी दल का या सरकार का समर्थन करना या विरोध करना आप की विचारशीलता पर होना चाहिए ना की केवल सुनी सुनाई बातों पर।

सरकारी संस्थानों के नितिपरक निर्णय एक चुना हुआ दल लेता है जबकि निजी संस्थानों के नीतिपरक निर्णय एक व्यक्ति द्वारा आदेशित बोर्ड लेता है।
#StopPrivatizationOfBanks
सरकारी संस्थानों की स्थापना देश के निचले और पिछड़े वर्ग को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए किया गया था किन्तु आज सरकार की ओर से किए जा रहे निजीकरण के प्रयास देश के उस निचले और पिछड़े वर्ग को किस और लेकर जाएगा ये तो अभी खुद उस वर्ग को भी नहीं पता है
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1)
उर्जित पटेल का हाल ही में एक बयान आया कि केंद्र सरकार चाहती थी कि RBI कर्ज न चुकाने वाले के खिलाफ नरम रहे। साहब को अब कही से अटेंसन नही मिल रहा तो बेतुके बयान शुरू कर दिए। एक हमारे और RBI गवर्नर थे रघुराम राजन, ये भी जॉब में रहते कुछ ज्यादा नही कर पाए
2)
तो अब ये देश की आर्थिक स्थिति सुधारने की सलाह देते फिर रहे है। एक है हमारे शक्तिकांत दास जी, फिलहाल अभी ये चुप है क्योंकि इनको ये ओहदा केंद्र सरकार ने खैरात में दी है। इनको अभी मुफ्त में पब्लिसिटी मिल रही है, शायद इसीलिए इनके बयान केंद्र सरकार के खिलाफ अभी तक नही आ रहे है।
3)
लाइमलाइट में रहने वाले को रिटायरमेंट के बाद कि जिंदगी शायद काल कोठरी जैसी लगती है। खुद से जब कुछ नही हो पाए फिर अपनी पूरी भड़ास मौजूदा सरकार पर थोप देना, जैसे हमारे पप्पू खान(यहाँ भावनाओ को समझना है) है। इन लोगो को जब कही से अटेंसन मिलना बंद हो जाता है
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