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थ्रेड: #सबका_नंबर_आएगा

पहले सरकार बैंकरों के पीछे पड़ी। नोटबंदी करवाई, बिना कोलैटरल की लोन स्कीम्स लांच करवाई, बैंकों पर आधार और बीमे का बोझ डाला, स्टाफ में कटौती की। नोटबंदी के बाद साहब ने कहा कि बैंक वालों ने जितना काम नोटबंदी में किया उतना पूरी जिंदगी में कभी नहीं किया।
जो समझदार थे वो इस बेइज़्ज़ती को समझ गए। साहब ने एक झटके में बैंकरों सर्कस का निकम्मा जानवर और खुद को कुशल रिंगमास्टर घोषित कर दिया। कोरोना में बैंक खुलवाए जबरदस्ती के लोन बंटवाए लेकिन कोरोना वारियर्स मानने से मना कर दिया।
फिर बैंकों के निजीकरण का प्रस्ताव लेकर आयी। लोग खुश हो गए। अब मजा आएगा इन सरकारी बैंक वालों को। साले निकम्मे कहीं के। आटे दाल का भाव पता चलेगा जब प्राइवेट बैंक में आधी सैलरी पर काम करना पड़ेगा। लोन देने में नखरे करते थे, पासबुक प्रिंट करने में नखरे करते थे, दस नियम समझाते थे।
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थ्रेड: #ठेके_वाले_बाबू

लोगों को सरकार और राजनीती के बारे में काफी भ्रम हैं। लोगों को लगता है कि नेता नीति बनाते हैं। गलत। नेता केवल नीति बताते हैं। बनाने और लागू करने का काम नौकरशाह ही करते हैं। नौकरशाह को जनता नहीं चुनती। ना ही हटा सकती है।
ये परीक्षा देकर आते हैं और रिटायर होकर जाते हैं। वहीँ नेता को जनता चुनती है और जनता ही हटाती है। नौकरशाहों को नेता भी नहीं हटा सकते, केवल परेशान कर सकते हैं। संविधान का आर्टिकल 311 उनकी रक्षा करता है। मतलब नौकरशाह परमानेंट हैं और नेता टेम्पररी।
सरकार कोई भी आये नीति वही रहती है, क्यूंकि नौकरशाह भी तो वही है। हाँ उसको जनता के सामने लाने का तरीका बदल जाता है, क्योंकि नेता बदल जाता है। मंडल कमीशन बनाया इंदिरा ने और लागू किया राजीव गाँधी के धुर विरोधी वी पी सिंह ने।
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