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‘भारतीय एकात्मता’ पर यदि विचार करने का प्रयत्न है तो ये अति आवश्यक हो जाता है की हम भारत को समझे
हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्
तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थान प्रचक्षते।
हिमालय से प्रारंभ होकर हिंद महासागर तक जो भूमि फैली हुई है उस भूमि पर रहने
वाला एवं स्वयं को इस धरती का पुत्र मानने वाला भारतीय है।जो इसको मादर-ए-वतन नहीं मानता है,मातृभूमि नहीं मानता है,जो इसको उपासना पंथों से ऊपर जा कर देवी के रूप में नहीं स्वीकार करता है,वह भारतीय नहीं है। मैं यहाँ पर विवेकानंद को उद्धरित करती हूँ जो कहते हैं कि हमें आने वाले 50
वर्षों तक सिर्फ भारत मां की उपासना करनी चाहिए।यही एकमात्र जागृत आराध्य देवी हैं
जो भारत को शक्ति स्वरूपा,वात्सल्यमयी माँ के रूप में स्वीकार करता है वही भारतीय हैं
वसुधैव कुटुंबकम
आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:
वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः इत्यादि की जो अवधारणा है उन अवधारणाओं
के आधार पर हम एक भारत भाव,एक भारत दृष्टि,एक भारत की संकल्पना की बात कर रहे हैं। इस बात को मदन मोहन मालवीय और स्पष्ट करते हैं की भारतीय कौन है? जो यह स्वीकार करता है कि यह हमारी मातृभूमि है, पितृभूमि है, भारत हमारी कर्मभूमि है और बड़े पुण्यों के परिणाम स्वरूप हमारा इस धरती पर जन्म
हुआ है।
यदि हमें भारतीय एकात्मता को समझना है तो हमें भारत को देश-सीमा,संघ एवं संविधान से ऊपर जा कर समझना पड़ेगा। हमें ये आत्मसात करना होगा की इस धरती की पूजा करने का जो हमारा अधिकार है और उसके प्रति जो हमारी अविचल श्रद्धा है,यह श्रद्धा हमको भारतीय बनाती है। दुनिया में और कोई
सभ्यता दिखती है जहाँ यह प्रतिवादित किया जाता है कि माता भूमि पुत्रो अहं पृथिव्या?
इस बात की पुष्टि कोरोना काल में भी हुई,
भारत का जन सुरक्षित रहे इसके लिए देवालयों में ताला लगाया जाना,हमारे परिवार और उनके सुख-साधनों की अपेक्षा इस राष्ट्र की सुरक्षा,इस राष्ट्र के प्रत्येक व्यक्ति
का स्वास्थ्य सुरक्षित हो ये विचार ही भारतीय एकात्मता है।भारतीय वो है जो स्वयं के मुक्ति का मोह त्याग कर समस्त प्राणियों के दुःख का नाश हो ऐसा ईश्वर से प्रार्थना करे
न त्वहं कामये राज्यं न मोक्षं न स्वर्गं नापुनर्भवम् कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्
मेरी मां,मेरी मातृभूमि
इस विचार के साथ जो आगे बढ़ता है वही सच्चे अर्थों में भारतीय है।
मैं और मेरा पंत
मैं और मेरी धार्मिक पुस्तक
मैं और मेरे ईश्वर का वचन
इस प्रकार की जड़ता का निषेध करके
हम और हमारे जीवन मूल्य,
हम और हमारी ज्ञान परम्परा,
ऐसी विशिष्ट जीवन प्रणाली ही भारतीय एकात्मता का परिचय है।
भारतीय एकात्मता केवल क़ानून की किताब से उत्पन्न नहीं होती, भारत में जो अनादि काल से मनुष्य की स्वतंत्रता जो युद्ध चला है उस युद्ध में जिन वीरों ने सीमाओं पर अपने प्राण गवाएं हैं उस बलिदान द्वारा निर्मित पर्यावरण ही भारतीय एकात्मता है।
भारतीयता अहिंसा पर आधारित जीवन दृष्टि है।
लेकिन हिंसा प्रतिकार करना भी हमारी परंपरा है,
तप से खुश होकर के भस्मासुर को वरदान देने की हमारी आदत तो है लेकिन जब वह दुष्ट होगा उसके नाश का स्वभाव भी है,
राक्षस मारा जा सकता है अगर मेरी हड्डियों से तो इन हड्डियों से वज्र बनाया जाना चाहिए इसके लिए अपने को समर्पित करने भाव भी है।
धर्म संचालित समझ हो
इसीलिए व्यास कहते है-
न राज्यं न च राजासीत्,न दण्डो न च दाण्डिकः। स्वयमेव प्रजाः सर्वा,रक्षन्ति स्म परस्परम्॥
भर
एक ऐसे राज्य की कल्पना करना जहाँ ना दंड हो,ना दंड देने वाला हो, प्रत्येक व्यक्ति स्वयं धर्म बद्ध हो ऐसे समाज की कल्पना ही भारतीय एकात्मता है।
मैं अपनी बात समाप्ति की ओर ले जाते हुए बस ये प्रस्तावित करना चाहती हूँ की हम भले अलग स्थान से हो, बोली भाषा अलग हो, खाना पान अलग हो पर हमें जो एक करती है वो है हमारी भारतीयता।
कश्मीर में बैठे अभिनवगुप्त के शिष्य तमिल राज्य तक में मिलते है ये है ही तो भारतीय एकात्मता है
भारतीय एकात्मता का अर्थ है हिंदू मुसलमान सिख ईसाई ना हो कर भारतपुत्र होना,
भारत को मातृशक्ति समझना,
पूर्वजों की गौरवशाली परंपरा को मानना।
ये धरती जो कमला है,
बाहुबल धारिणी है,
रिपु दल वारिणी है
और भी तारिणी है उसके उज्जवल भविष्य के लिए अनवरत यत्न करते रहना ही भारतीय एकात्मता है।
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