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Aug 18, 2020, 5 tweets

मुनौव्वर राना के ख़िलाफ़ न्यायालय की अवमानना का केस बनता भी है और होना भी चाहिए। यदि ऐसा न किया गया तो लोकतंत्र और न्याय-व्यवस्था में विश्वास रखनेवालों करोड़ों लोगों के प्रति अन्याय होगा।

जिस तरह का बयान राना ने दिया है उसे देख और सुनकर हज़ारों के मन में आया होगा कि वे उन्हें गाली दें। अगर ये लोग गाली नहीं देते या राना के विरुद्ध हिंसा की वकालत नहीं करते तो केवल इसलिए कि उनका विश्वास सरकार और न्यायालय में है।

ऐसे में अगर राना के विरुद्ध कार्यवाई नहीं होती तो यह तो इनलोगों के प्रति अन्याय होगा जिनकी आस्था देश के क़ानून में है।
किसी अपराधी को सजा न मिले तो लोगों द्वारा देश के क़ानून में विश्वास रखने का औचित्य क्या है?

यह न्यायपालिका पर निर्भर करता है कि वह इतिहास में क्या लिखवाना चाहती है? चुप रहकर यह लिखवाना चाहती है कि; “एक महान शायर ने न्यायपालिका को लताड़ा था और शायद न्यायाधीश ने रिश्वत ली थी इसीलिए कुछ नहीं बोला” या यह कि; “न्यायपालिका ने निराधार आरोप का संज्ञान लिया और शायर को सजा दी”

आनेवाले समय में ऐसे और निर्णय होंगे। यदि उच्चतम न्यायालय ने राना की इसबात पर उनसे जवाब न माँगा, तो ऐसे आरोप लगानेवालों की भीड़ बढ़ेगी और न्यायपालिका की कार्यवाई पर लगातार संदेह ज़ाहिर किया जायेगा।

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