ठकुराइन कंगना रनौत नेपटोइज्म का मुद्दा उठाकर, हिन्दी फिल्मों में सवर्ण वर्चस्व को बखूबी छिपाने का काम कर रही है !
नेपटोइज्म का अर्थ है भाई-भतीजावाद. लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नही है कि फिल्मों में नए लोगों को चांस नही मिलता. सबसे बड़ा उदाहरण शाहरुख खान हैं. भारतीय फिल्म
1)
इंडस्ट्री में हमेशा सवर्ण वर्चस्व हावी रहा है !
जैसे सुप्रीम कोर्ट में ब्राह्मण जाति का वर्चस्व है, उसी तरह हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में खत्री जाति का वर्चस्व है. कपूर.. चोपड़ा.. जोहर.. खन्ना.. मल्होत्रा.. खोसला.. चड्डा.. अरोरा.. भाटिया.. आहूजा.. सब खत्री जाति के हैं !
2)
कंगना रनौत में हिम्मत है तो हिंदी फिल्मों में विविधता का मुद्दा उठाए. मूल समस्या नेपटोइज्म नही कुछ जातियों का वर्चस्व है, इन्ही जातियों के वर्चस्व के कारण हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में नेपटोइज्म है !
हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को भी हॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री की तरह विविधता
3)
पर रिपोर्ट जारी करनी चाहिए !
2020 में हॉलीवुड ने विविधता पर रिपोर्ट जारी की. C-लेवल रोल और अन्य काम 91% श्वेत समुदाय के हिस्से गया. टॉप 15% कमाऊ फिल्मों में 11% लीड रोल ब्लैक अफ्रीकन समुदाय के कलाकारों को मिला !
क्या कंगना रनौत हिंदी फिल्म एंड टीवी
4)
इंडस्ट्री में विविधता की रिपोर्ट जारी करने की मांग करेंगी ?
पता तो चले ओबीसी एससी एसटी और पूरब राज्यों को कितना हिस्सा हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री देने में सफल हुई ?
5)
✍️Kranti Kumar
#Prem_Prakash
Share this Scrolly Tale with your friends.
A Scrolly Tale is a new way to read Twitter threads with a more visually immersive experience.
Discover more beautiful Scrolly Tales like this.
