।।गणपति।।
-राजेश चन्द्रा-
यह कई साल पहले की बात है।
एक बार दीपावली के अवसर पर मुझे एक बुद्ध विहार में आमंत्रित किया गया, इस विषय पर बोलने के लिए कि बौद्धों को दीपावली कैसे मनानी चाहिए? मैंने जो कुछ वहाँ बोला उसका सारांश यह है:
"गण" मायने होता है संघ अथवा समूह या
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संगठन। पुराने समय में भारत में, विशेषतः बौद्ध काल में, अधिकांशतः शासन व्यवस्था गणतंत्रात्मक थी। भगवान बुद्ध के समय सोलह प्रसिद्ध गणराज्य थे जिनका कि त्रिपिटक में कई बार वर्णन है। गणाध्यक्ष को गणपति कहा जाता था। जैसे सभा के अध्यक्ष को सभापति कहा जाता है वैसे ही
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इसलिए संघ प्रमुख, संगठन अध्यक्ष, समूह नायक का एक पर्यायवाची गणपति भी है, गणेश भी है, गण नायक भी है। भगवान बुद्ध पावन संघ के अध्यक्ष थे, संघ नायक थे, इसलिए भगवान बुद्ध के लिए गणपति, गणेश, गणनायक सम्बोधन भी प्रयोग किये गये हैं। पालि ग्रंथों में भगवान बुद्ध के अनेक
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सम्बोधनों में एक सम्बोधन गणपति भी है, गणेश भी है और गणनायक भी। तिब्बती व लद्दाखी बौद्ध परम्परा में हाथी के सूड़ वाले गणेश की भी पूजा होती है। लेकिन वह गणेश का आज प्रचलित व स्थापित गणेश से कोई सम्बन्ध नहीं है। वे तिब्बती व लद्दाखी लोग गणेश को भगवान बुद्ध के प्रतीक के
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रूप में पूजते हैं। हाथी महाप्रज्ञा का प्रतीक है। भगवान महाप्रज्ञावान हैं। सम्राट अशोक के द्वारा निर्मित अशोक स्तम्भ में शेर, घोड़ा, बैल के साथ भगवान बुद्ध का एक प्रतीक हाथी भी उत्कीर्णित किया गया है। सम्राट अशोक द्वारा निर्मित स्तम्भों में सिर्फ हाथी वाले स्तम्भ भी हैं,
5)
जिसमें शीर्ष पर हाथी है। जातक कथाओं में भी भगवान बुद्ध पूर्व भवों में हाथी की योनि में भी रहे हैं। भगवान के परिनिर्वाण के पांच सौ साल तक विहारों में भगवान की प्रतिमाएँ नहीं होती थीं। प्रतीक रूप में हाथी, बैल जिसे अब नन्दी कहते हैं, शेर, घोड़ा, धम्मचक्र, स्वास्तिक अथवा
6)
श्रीवत्स, चरणचिन्ह तथा उस पर अंकित मंगलचिन्ह इत्यादि होते थे। प्रतिमाओं का प्रचलन पांच सौ साल के बाद शुरू हुआ। रोचक तथ्य यह है कि मूर्ति कला का उद्गम ही बौद्धों ने किया है। यूनानी और भारतीय शैली ने मिलकर मूर्ति कला की
मथुरा शैली को जन्म दिया। तात्पर्य कहने का यह कि बौद्ध
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परम्परा में हाथी का अर्थ भगवान बुद्ध है।
पालि ग्रंथों में भगवान बुद्ध का नाम विनायक भी देखने को मिलता है। विनायक का अर्थ होता है- विनय का नायक। भगवान बुद्ध विनय के नायक हैं, इसलिए विनायक हैं, विनयपिटक के सृजक हैं।
इन सन्दर्भों के देखने के लिए आप सिर्फ मज्झिम निकाय ही
8)
देख लीजिए, आपको भगवान बुद्ध के लिए गणपति, विनायक दोनों शब्द मिल जाएंगे।
सदियों के अन्तराल ने बहुत कुछ बदल दिया है। शब्द व चित्र अथवा प्रतिमा वही रहे लेकिन अर्थ बदल गये। मूल तक पहुँचो तब तत्वार्थ समझ में आते हैं, भ्रम दूर होते हैं।
फिर प्रश्न उठा कि बौद्धों को दीपवली कैसे
8)
मनानी चाहिए?
सरल-सी बात तो यह समझ लें कि पारम्परिक दीपावली अमावस्या के दिन पड़ती है। असंशयरूप से अमावस्या, पूर्णिमा, दोनों अष्टमियां, कृष्ण पक्ष की अष्टमी व शुक्लपक्ष की अष्टमी बौद्धों के लिए उपोसथ की तिथियाँ हैं। इस दिन को बौद्ध अपनी ही तरह से मनाएं कि उपोसथ रखें,
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अष्टशील धारण करें और शाम के समय भगवान बुद्ध की प्रतिमा के सम्मुख दीपदान करें। बहिष्कार से नहीं परिष्कार से परम्पराएं पुनर्जीवित होंगी।
एक प्रश्न और उठाया गया कि इस अमावस्या के दिन महामोदगल्यायन की हत्या हुई थी। इसी खुशी में विरोधियों ने दीप जलाए थे। हम क्यों जलाएं,
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शोक क्यों न मनाएं?
मैंने कहा- इतिहास में ज्यादा दूर मत जाइये, अभी हाल की घटना लीजिये। 6 दिसम्बर को आप किस रूप में मनाते हैं?
सबने कहा- बाबा साहेब की पुण्यतिथि के रूप में, परिनिर्वाण दिवस के रूप में।
आप यह भी जानते हैं कि बाबरी मस्जिद ढहाने के उपलक्ष्य में कुछ
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लोग 6 दिसम्बर को शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं। दोनों घटनाओं के बीच 36 साल का अन्तराल है। बाबा साहेब का परिनिर्वाण हुआ है 6 दिसम्बर'1956 को और बाबरी मस्जिद तोड़ी गयी है 6 दिसम्बर'1992 को। इसी को बाबा साहेब ने क्रान्ति-प्रतिक्रान्ति कहा है। अब आप एक ही तिथि को किस
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रूप में मनाते हैं यह आपका चयन है।
अब आप एक बात और बताइये, बाबा साहेब की परिनिर्वाण तिथि 6 दिसम्बर को आप कैसे मनाते हैं? उस दिन आप कैण्डल मार्च निकालते हैं, बुद्ध पूजा करते हैं, संगोष्ठियां आयोजित करते हैं कि मुँह लटका कर बैठ जाते हैं और शोक मनाते हैं? तो अगर आप को
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महामोदगल्यायन की हत्या का शोक भी मनाना है तो ऐसे मनाइये कि वह भी एक घटना बने। शोक तो हमारे मुस्लिम भाई भी मनाते हैं, पूरे ढाई महीना मुहर्रम चलता है। इसके द्वारा वे अपने इतिहास का स्मरण करते हैं और उससे प्रेरणा लेते हैं।
17 सितम्बर को आप क्या मानते हैं?
सबने एक स्वर से
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कहा- उस दिन विश्वकर्मा जयंती होती है, विश्वकर्मा पूजा होती है।
मैंने कहा कि उसी दिन ई. वी. रामास्वामी नायकर का जन्मदिन भी है। क्या आप सबको मालूम है?
सब चुप हो गये। मैंने कहा कि इसी को कहते हैं- इतिहास पर मिथक का हावी होना। इतिहास आप भूल गए और मिथक स्थापित हो गया।
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प्रतिक्रान्ति का उद्देश्य ही यही होता है, मूल इतिहास को ढकना।
तो अब आप दीपावली को पारम्परिक रूप से मनाते हैं या महामोदगल्यायन की हत्या का शोक मनाते हैं अथवा उपोसथ के रूप में मनाते हैं, यह आपके इतिहास बोध पर निर्भर करता है। बाबा साहेब ने पारम्परिक दशहरा को अशोक विजय दशमी
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के रूप में पुनः स्थापित किया कि नहीं? बहिष्कार नहीं उन्होंने परिष्कार किया और इतने विराट रूप में किया कि प्रतिक्रान्ति फीकी पड़ गयी, क्रान्ति पुनः स्थापित हो गयी। मगर है क्या कि परिष्कार के लिए मेहनत करनी पड़ती है, बहिष्कार फोकट में हो जाता है। बहिष्कार सरलतम कामों में से
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एक काम है, बस जुबान ही तो हिलाना है, थोड़ा कलम चला देना है। मगर प्रतिक्रान्ति को क्रान्ति में बदलने के लिए मेहनत करना पड़ेगा। इसलिए काहिल लोग परिष्कार का नहीं बहिष्कार का रास्ता चुनते हैं।
अंततः उस शाम बुद्ध विहार में दीपावली इसी तरह मनायी गयी, भगवान बुद्ध की
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पूजा-वन्दना के रूप में, उपोसथ के रूप में।
विगत वर्ष लखनऊ में ठीक दीपावली के दिन अन्तरराष्ट्रीय त्रिपिटक संगायन का आयोजन करके अपने कथन को व्यवहार में परिणत किया। तेरह देशों के पावन संघ के सान्निध्य में दीपोत्सव मनाया और अगली
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सुबह त्रिपिटक संगायन हुआ। एक अन्तरराष्ट्रीय आयोजन वैश्विक समाचार बना।
तिलोकदीपं सम्बुद्धं पूजयामी तमोनुदं...
पावन संघ का पुनः लखनऊ आगमन होने को है।
20).
#Prem_Prakash
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