ढेरों राजनीतिक विमर्शों की तरह ही यह भी समझ नहीं आता कि सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु की जाँच बिहार चुनावों में लाभ लेने के लिए की जा रही है।
कल से हमारे पश्चिम बंगाल में यह बहस शुरू की गई है।
यदि मुंबई पुलिस द्वारा मृत्यु की जाँच न करना या महाराष्ट्र सरकार द्वारा हर क़ीमत पर जाँच को रोकना राजनीति नहीं थी तो सीबीआई द्वारा जाँच किया जाना भी राजनीति नहीं है।
चुनाव में लाभ लेने के लिए जाँच की जा रही है, ऐसा तर्क है जैसे कोई कहे कि; मोदी सरकार पुरानी समस्याओं को केवल इसलिए हल कर रही है ताकि चुनावों में उसका लाभ लिया जा सके।
नरेंद्र मोदी यदि देश में इसबात पर बहस करवाना चाहते हैं कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ हों तो उनपर लोकतंत्र का नाश करने की कोशिश के आरोप लगते हैं। फिर सामान्य सरकारी कामों को चुनाव में लाभ लेने की कोशिश बताया जाता है। लोग घोड़ा या चतुर येक पर नई रहते।
पिछले तीस वर्षों में नए राज्य बने हैं। बात-बात पर सरकारें गिराई गई हैं। परिणाम यह है कि भारत एक चुनाव प्रधान राष्ट्र के रूप में उभरा है। यदि सरकारें केवल इसलिए अपना दायित्व नहीं निभायेंगी क्योंकि चुनाव परिणाम प्रभावित होंगे, तो हम जल्द ही लोकतंत्र का सत्यानाश कर देंगे।
कौन सी जाँच राजनीति को प्रभावित करेगी और कौन सी नहीं, इतको लेकर इतनी चिंता करने का क्या है, वो भी तब जब महान विचारक और दर्शनशास्त्री श्री राहुल गाँधी ने वर्षों पहले बता दिया था कि; पॉलिटिक्स इज इन योर पैंट एंड पॉलिटिक्स इज इन योर शर्ट!
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