गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने एवं राष्ट्र-निर्माण में उनके योगदान तथा महत्व को रेखांकित करने हेतु National Assessment And Accreditation Council (NAAC) द्वारा आयोजित "आचार्य देवो भव:" वेबिनार में प्रतिभाग किया।
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हमारा देश 'गुरु-शिष्य परंपरा' का देश है। यह ज्ञान, तपस्या एवं साधना की भूमि है। यह वंदन एवं अभिनंदन की भूमि है। अतः हमें गुरु और आचार्यों का गौरव करना है और उनकी वंदना करनी है।
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मैं हमेशा से इस बात का प्रबल पक्षधर रहा हूं कि शिक्षा और जीवन के लक्ष्य में अंतर नहीं होना चाहिए। इसके लिए हमारे प्रतिभावान शिक्षकों को विद्यार्थियों में मूल्यों का विकास करते हुए विद्यार्थियों में छुपी जिज्ञासा एवं क्रियाशीलता को जागृत करना होगा।
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जितने प्रतिभावान एवं कर्मठ हमारे शिक्षक होंगे, उतनी ही प्रतिभावान एवं कर्तव्य परायण हमारी आने वाली पीढ़ी होगी। इसके लिए हमारे शिक्षकों को नवाचार युक्त शिक्षण पद्धतियों को अपनाना होगा। इसी से विद्यार्थियों की समझ एवं जिज्ञासा बढ़ेगी और वे राष्ट्र-समर्पित, जिम्मेवार नागरिक बनेंगे।
हमारी नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में हमारे अध्यापकों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। आज समय आ गया है कि सभी शिक्षक, आचार्य, प्राचार्य एवं कुलपति सब मिलकर अपनी प्रतिभा, ज्ञान एवं कर्मठता से देश को वैश्विक ज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित करें।
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