इजराइल और यूएई की ऐतिहासिक डील होने के महीने भर के भीतर ही अब बहरीन ने भी दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया है। बहुत संभव है कि सूडान और ओमान भी जल्द ही इस राह पर आगे बढ़े।
मिडिल ईस्ट में स्थापित हो रहे नए संबंधों का प्रभाव क्या सिर्फ खाड़ी तक ही सीमित रहेगा या हम भी प्रभावित होंगे?
अब तक कट्टर दुश्मन रहे इजराइल के प्रति खाड़ी देशों के लचीली होती सोच की भनक तब लगी थी जब सऊदी ने इजराइल के तेल अवीव जाने वाली एयर इंडिया की फ्लाइट्स को अपने एयर स्पेस के इस्तेमाल की छूट दी थी। 2018 में हुई इस घटना की अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बहुत चर्चा रही थी।
इन संकेतों को पकड़ते हुए डोनाल्ड ट्रम्प के दामाद जारेड कुशनर, जोकि ट्रम्प के मिडिल ईस्ट सलाहकार भी है, ने बैकडोर में सऊदी अरब के साथ मिल कर इजराइल से दोस्ती की कवायद शुरू की जोकि यूएई और बहरीन के रूप में फलित हुई।
आइये एक बार देखते हैं कि आखिरकार डील है क्या!
नीचे के मैप में देखिए पीले रंग में इजराइल है। गाज़ा और वेस्ट बैंक की जो दो बाउंड्रीज दिख रही हैं इजराइल के अंदर वो मिलकर फ़िलिस्तीन का निर्माण करती हैं (हालांकि यह पूरा इलाका इजराइल के कब्जे में है)।इजराइल लगातार इन दोनों स्थानों में से थोड़ी थोड़ी जमीन का अधिग्रहण करता रहता है।
यूएई से इस डील के बाद इजराइल ने इन इलाकों में और अधिग्रहण करना रोक दिया है। जो काम अरब मुल्क इजराइल से ताकत से कभी नही कर पाएं वो काम इस डील से हो गया
इजराइल को यह मिला कि उसके पड़ोस में उसके दुश्मनों की संख्या कम हुई। अरब देशों द्वारा इजराइल के आस्तित्व स्वीकारना ही बड़ी बात है
दुनिया के 57 मुस्लिम मुल्कों के लिए फिलिस्तीन का मुद्दा एक ऐसे गोंद का काम करता है जिससे सब आपस में जुड़े रहते हैं। दुनिया भर के मुसलमान आँसू बहाते हैं।
तो जैसा कि अरब मुल्कों ने दिखाया कि इस डील से फिलिस्तीन की मदद होगी, उस हिसाब से तो सभी मुस्लिम मुल्कों को खुश होना चाहिए?
लेकिन सब खुश नहीं है, और कुछ तो बिल्कुल भी खुश नहीं हैं। और इसका कारण है कि एक दूसरा गोंद जो इन सब को बांध के रखता है उसने गोंद का काम करना बंद कर दिया है।
वह दूसरा गोंद है कश्मीर!
इस्लामिक देशों की संस्था OIC में इजराइल मुद्दे पर पड़ी फूट को समझने के लिए थोड़ा पीछे चलना होगा
2014 में जब मोदी सत्ता में आए तब से उन्होंने इजराइल और अरब दोनों से मधुर संबंध बना कर दुनिया को चौंका दिया।
खाड़ी देशों द्वारा पीएम मोदी को दिए हुए सर्वोच्च नागरिक सम्मान देखिए
अप्रैल 2016 - सऊदी
फरवरी 2018 - फ़िलिस्तीन
अगस्त 2019 - यूएई
अगस्त 2019 - बहरीन
आप सोच सकते हैं कि मैं आपको अवार्ड क्यों गिना रहा हूँ लेकिन फिर मैं कहूँगा की आखिरी दो अवार्ड कौन से महीने में मिले हैं उसपे गौर करें।
यह दोनों अवार्ड अगस्त के उस महीने में मिले हैं जब भारत ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाई थी और पाकिस्तान सारे मुस्लिम देशों से समर्थन मांग रहा था
धारा 370 हटाने के मुद्दे पर पाकिस्तान के लगातार रोने के बावजूद ना ही अरब मुल्कों ने भारत के खिलाफ बयान दिया और ना ही इस मुद्दे पर OIC की मीटिंग रखी।
सिर्फ कुछ ही मुसलमान देशों ने भारत का विरोध किया वो हैं तुर्की, मलेशिया और दबे शब्दों मे ईरान।
कश्मीरी गोंद का असर कम होने लगा।
दिसंबर 2019
खीज कर पाक ने तुर्की के साथ मिल मलेशिया में OIC के विकल्प के तौर पर एक नया इस्लामिक संगठन बनाने की कवायद शुरू की। लेकिन अंतिम मौके पर सऊदी की तरफ से एक बड़ा डंडा आते हुए देख इमरान ख़ान ने इस मीटिंग में जाने से हाथ खींच लिए। पाक ने सोच शायद अब OIC की मीटिंग हो जाए।
जनवरी 2020
भारत ने मलेशिया को सज़ा देते हुए वहाँ से पाम आयल के इम्पोर्ट पर बैन लगा दिया। इससे मलेशिया की अर्थव्यवस्था पे लगभग 5% का धक्का लगा जिसके कारण मलेशिया की राजनीति में राष्ट्रपति महातिर के खिलाफ व्यापक रोष उत्पन्न हुआ और मार्च 2020 में वह अपने पद से हटाए गए|
6 अगस्त 2020
कश्मीर मुद्दे पर लगातार OIC की मीटिंग नही होने से बेहद खीज कर पाक विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने एक नई इस्लामिक संस्था बनाने की माँग कर डाली। आगबबूला हुए सऊदी ने तुरंत पाक से 1B$ की उधारी वापस करने का अल्टीमेटम दे दिया। जैसे तैसे चीन से पैसे लेकर पाक ने चुकाए।
इतना ही नहीं, सऊदी ने पाक को उधार पर सस्ता तेल देना बंद कर दिया और ग्वादर पोर्ट के निवेश को वापस लेने का इरादा दिखाया।
पाक आर्मी चीफ बाजवा भागते हुए सऊदी माफ़ी माँगने गए। सऊदी प्रिंस सलमान ने ना सिर्फ बाजवा से मिलने से इनकार किया बल्कि उनको दिया जा रहा मैडल भी कैंसिल कर दिया।
इधर लगातार तुर्की से दोस्ती बढ़ा रहे इमरान ख़ान पेशोपेश पे तब फंस गए जब 13 अगस्त को यूएई और इजराइल की डील हुई। दबे तौर पर पाक हमेशा से इजराइल से दोस्ती चाहता है लेकिन उसका सोचना यह है कि फ़िलिस्तीन पर समझौता करने का मतलब पाक के लिए कश्मीर मुद्दे का और कमजोर होना है।
लाज़िम तौर पर इस शांति समझौते का विरोध सिर्फ उन्हीं मुल्कों ने किया जिन्होंने 370 हटाने का विरोध किया।
ईरान, तुर्की, पाकिस्तान।
और यह कोई संयोग मात्र नही अपितु एक ही कहानी की दो कड़िया हैं। मलेशिया अभी वेट एंड वाच में है और ईरान से क्या चल रहा है वह मैंने पिछले थ्रेड में बताया।
अब आइये अंततः देखते हैं कि भारत के लिए इन सब के क्या मायने हैं।
• पाकिस्तान के तुर्की के और करीब जाने का मतलब यह कि उसके लिए सऊदी की सरपरस्ती लगभग खत्म जिसका मतलब की उसे दशकों से मिल रही आर्थिक मदद समाप्त। यह पाक को कंगाल करने के मोदी मिशन में बड़ी सफलता है (इसपे थ्रेड कभी और)
• OIC में विभाजन का अर्थ यह कि कश्मीर मुद्दे का सऊदी वाले बड़े कैम्प के लिए लंबे समय के लिए ठंढे बस्ते में चले जाना। तुर्की और ईरान दोनों अब सऊदी से मुस्लिम दुनिया की बादशाहत छीनना चाहते हैं। सऊदी के लिए एकमात्र प्राथमिकता इनदोनो से निपटना है। यह हमारे मिशन गिलगित मे लाभदायक है
• यूएई, बहरीन, कोसोवो के बाद अब शायद ओमान और सूडान का नंबर है। हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण होगा कि बांग्लादेश क्या निर्णय लेता है। यह इतना महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यदि उसने इजराइल के पक्ष में निर्णय लिया तो इससे वहां पर चीनी प्रभाव के ऊपर भारत के प्रभाव की भरपूर पुष्टि होगी।
• जैसा कि मैंने अपने ईरान थ्रेड में कहा था कि विश्व में सिर्फ भारत एक ऐसा देश है जिसके ईरान/सऊदी/इजराइल और अमेरिका सबसे अच्छे संबंध है।
ऐसे में जब भी इन सब को एक टेबल पर लाना हो तब भारत की भूमिका बहुत बढ़ जाती है। ग्लोबल प्लेयर बनने के लिए ग्लोबल पीस मेकर बनना जरूरी होता है।
तो अंततः कहना चाहूंगा कि मिडिल ईस्ट में स्थापित हो रही शांति से हमारे लिए यह अवसर हैं
• कंगाल होता पाकिस्तान
• कश्मीर मुद्दे पर अरब सहयोग
• पड़ोसी बंगलादेश पर प्रभाव की पुष्टि
• अंतरराष्ट्रीय मंच पर शांति में बड़ी भूमिका
टीम मोदी को मजबूत करते रहिए, अच्छी चीज़े हो रही है 😊
मैंने आसान भाषा में फॉरेन रिलेशन्स के इन मुद्दों को टॉक शो तथा एक्सप्लेनेर वीडियो के माध्यम से समझाने के लिए अपना यूट्यूब चैनल बनाया है।
ऐसी ही काफी स्क्रिप्ट्स पे काम कर रहा हूँ और जल्द ही वीडियोस डालूंगा।
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